कलदी – केरल में आदिगुरूआदि शंकराचार्य की जन्म स्थली

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कलदी, इस स्थान के विषय में मुझे सर्वप्रथम जानकारी तब प्राप्त हुई थी जब मैं आदि शंकराचार्यजी की जीवनी पढ़ रही थी। मैंने ढूंडने का प्रयत्न किया कि कलदी कहाँ है? गूगल की सहायता से ज्ञात हुआ कि यह कोच्ची हवाईअड्डे से अत्यंत समीप स्थित है। मन ही मन निश्चय कर लिया था कि प्रथम अवसर में ही वहाँ जाने का प्रयत्न करुँगी।

कीर्ति स्तम्भ - कांची मठ, कलदीमेरी इच्छा शीघ्र ही पूर्ण हुई जब मुझे केरल यात्रा का अवसर प्राप्त हुआ। इस अवसर को हाथ से जाने ना देते हुए मैंने पूर्णा नदी के तीर स्थित आदि शंकराचार्य की जन्मस्थली के दर्शन को तुरंत अपने यात्रा-कार्यक्रम में सम्मिलित कर लिया। पूर्णा नदी अब पेरियार नदी के नाम से जानी जाती है।

आदि शंकराचार्य की जन्मस्थली कलदी में आप अब भी कई मंदिर देखेंगे जहां उनकी माताश्री पूजा अर्चना करती थीं। आज उस स्थान पर श्रृंगेरी मठ स्थापित है। इस स्थान को आदि शंकराचार्य जन्म क्षेत्र कहा जाता है। अर्थात् वह क्षेत्र जिसकी धरती पर भारतवर्ष के सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक के प्रथम चरण स्पर्श हुए थे।

कलदी की दन्तकथा

आदि शंकर जन्म क्षेत्र में केरल शैली में चित्रकारी
आदि शंकर जन्म क्षेत्र में केरल शैली में चित्रकारी

कलदी का अक्षरशः अर्थ है, पदचिन्ह। कुछ किवदंतियों के अनुसार, पूर्णा अर्थात् पेरियार नदी गाँव से कुछ दूरी पर बहती थी। एक दिन बाल शंकराचार्य की माता नदी की ओर जाते समय मूर्छित होकर गिर पड़ी। उन्हें देख शंकराचार्य आहत हो गए तथा उन्होंने कृष्ण की आराधना की। बालक की भक्ति एवं आस्था से प्रसन्न होकर कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि नदी उनके पदचिन्हों का अनुगमन करेगी। इस प्रकार वे नदी को गाँव के समीप ले आये। आज भी कलदी पेरियार नदी के तीर बसा हुआ है।

संयोग से कलदी एवं आदि शंकराचार्य से उसके सम्बन्ध की खोज कुछ १०० वर्षों पूर्व ही हुई थी। तब से देश के विभिन्न शंकर मठों के अनुयायियों ने इस क्षेत्र के संरक्षण का बीड़ा उठाया है।

कलदी के दर्शनीय स्थल

दर्शन योग्य यहाँ तीन प्रमुख क्षेत्र हैं। उनमें से दो क्षेत्र कांची एवं श्रृंगेरी के शंकर मठों के हैं। तीसरे क्षेत्र में कई प्राचीन मंदिर एवं गाँव के चारों ओर स्थित अन्य स्थल सम्मिलित हैं। तो आईये कलदी दर्शन के लिए चलते हैं।

श्रृंगेरी मठ

कलदी श्रृंगेरी मठ यहाँ का विशालतम मठ है। आदि शंकराचार्य एवं उनकी जन्मस्थली के विषय में जानने के लिए यहीं सर्वाधिक समय व्यतीत करना चाहिए।

आदि शंकराचार्य जन्म भूमि क्षेत्र

आदि शंकर जन्म क्षेत्र - कलदी
आदि शंकर जन्म क्षेत्र – कलदी

जैसा कि इस क्षेत्र के नाम से ही विदित है, यह आदि शंकराचार्य की जन्म भूमि है। इसका प्रवेश द्वार अत्यंत ही मनमोहक है। इसकी भित्तियों पर गेरुआ नारंगी रंग में पारंपरिक केरल चित्रकारियाँ हैं जिनकी शोभा बढ़ाते हुए मध्य में गहरे रंग की लकड़ी की पट्टियां लगाई हुई हैं। द्वार के ऊपर कई चित्र शोभायमान हैं जिनमें प्रमुख हैं, शिष्यों समेत आदि शंकराचार्य, मठ की अधिष्ठात्री देवी शारदम्बा तथा मठ के विभिन्न शंकराचार्य। उन चित्रों के सौंदर्य ने मुझे इतना मोह लिया कि मैं कितने क्षण वहीं खड़ी उन्हें निहारती रही। भारतीय सौंदर्यशास्त्र से रूपांकित, समकालीन इमारतों के इतने मनमोहक अग्रभाग सामान्यतः दृष्टिगोचर नहीं होते।

और पढ़ें: श्रृंगेरी – शारदम्बा मंदिर के चहुँ ओर मंदिरों की नगरी

परिसर के भीतर एक विशाल शारदम्बा मंदिर है। जिस समय मैं यहाँ उपस्थित थी, उस समय मंदिर के पट बंद थे। झरोखों से भीतर झांकने पर मुझे सभी सप्तमातृकाओं की प्रतिमाएं दिखीं। मुझे यह विशाल भित्तियों से युक्त एक विशाल मंदिर प्रतीत हुआ। भीतर से दर्शन करने की तीव्र इच्छा दबाते हुए आशा की कि मेरी अगली यात्रा के समय कदाचित यह मंदिर मुझे अपने पट खोलकर दर्शन दे।

श्रृंगेरी मठ - कलदी
श्रृंगेरी मठ – कलदी

यहाँ मैंने आर्यम्बा का वृन्दावन देखा जो वास्तव में आदि शंकराचार्य की माता की समाधि है। एक शक्ति गणपति मंदिर भी है। आप सोच रहे होंगे कि आदि शंकराचार्य की जन्म स्थली है तो उनकी जीवनी भी यहाँ उल्लेखित अवश्य होगी। जी हाँ, आप उनकी जीवनी संगमरमर के फलकों पर पढ़ सकते हैं। आदि शंकराचार्य की जन्म स्थली उनके जन्म का मंगलगान करती है तथा दर्शनों द्वारा करोड़ों का मंगल करती है।

खुलने का समय: प्रातः ६ बजे से दोपहर १२.३० बजे तक तथा संध्या ४ बजे से रात्रि ८ बजे तक है। परिधान पर कोई विशेष पाबंदी नहीं है।

संकुल के भीतर छायाचित्रकारी की अनुमति नहीं है। मठ के विषय में अधिक जानकारी हेतु मठ के वेबसाइट पर संपर्क करें।

पूर्णा नदी के घाट

पूर्णा या पेरियर नदी के घाट
पूर्णा या पेरियर नदी के घाट

पूर्णा अर्थात् वर्तमान में पेरियार नदी आदि शंकराचार्य जन्म क्षेत्र के पृष्ठभाग से मृदुता से बहती रहती है। आदि शंकराचार्य जन्म क्षेत्र संकुल से एक पगडण्डी इस नदी तक जाती है। नदी चारों ओर से वनीय परिवेश से घिरी हुई है। इसके ऊपर एक इकलौता सेतु है जिसे आप नदी के तटों से देख सकते हैं। यदि आपने आदि शंकराचार्य के विषय में पढ़ा है तो आपने कई कथाएं पढ़ी होंगी जो आपको इस नदी तक ले आती हैं।

अवश्य पढ़ें – आदि शंकराचार्य की आत्मकथा

आदि शंकराचार्य के विषय में कई कथाएं प्रचलित हैं। उनमें से एक कथा के अनुसार उनकी माताजी को उनके संन्यास ग्रहण करने पर आपत्ति थी। एक बार वे नदी के भीतर गये जहां एक मगरमच्छ ने उनके पैर को अपने जबड़े में जकड़ लिया। शंकराचार्य ने अपनी माता से कहा कि मगरमच्छ उनके पैर तभी छोड़ेगा जब वे उन्हें संन्यास लेने की अनुमति दे दें। उनकी माताजी ने उन्हें सहमति दे दी। इस घटना ने बालक शंकराचार्य के आदि शंकराचार्य बनने के द्वार खोल दिए। यहाँ प्राचीन कृष्ण मंदिर में इस कथा पर आधारित एक भित्तिचित्र आप देख सकते हैं।

प्राचीन श्री कृष्ण मंदिर

कलदी का प्राचीन कृष्णा मंदिर
कलदी का प्राचीन कृष्णा मंदिर

श्री कृष्ण मंदिर इस नगरी का प्राचीनतम मंदिर है। आदि शंकराचार्यजी के माता-पिता यहाँ पूजा अर्चना हेतु आते थे। आप उनकी कथाओं में इस मंदिर का उल्लेख देख सकते हैं। वर्तमान में यह मंदिर एक नवीन संरचना है जिसका मुख्य भाग आज भी छोटा सा है।

प्राचीन श्री कृष्ण मंदिर
प्राचीन श्री कृष्ण मंदिर

इसका परिसर अत्यंत विशाल है। मंदिर संकुल में एक मंदिर धर्म शास्त्र को समर्पित है जिन्हें कार्तिक का अवतार माना जाता है। यहाँ कई भित्तिचित्र हैं जिनमें अन्य देवताओं की उपस्थिति में बालक शंकराचार्य को उनकी माता के संग कृष्ण की भक्ति करते दर्शाया गया है। एक अन्य भित्तिचित्र में वे एक मगरमच्छ से क्रीड़ा कर रहे हैं।

आगंतुकों हेतु परिधान संहिता: पारंपरिक वस्त्र

कलदी कांची कामकोटी पीठम

कांची मठ ने एक अति सुन्दर कीर्ति स्तंभ की स्थापना करवाई है जो आदि शंकराचार्य द्वारा बताये गए भक्ति के ६ पथों का प्रतीक है।

श्री आदि शंकराचार्य कीर्ति स्तंभ मंडप

आदि शंकर कीर्ति स्तम्भ मंडप
आदि शंकर कीर्ति स्तम्भ मंडप

गेरुए रंग के इस ऊंचे स्तंभ में कई झरोखे हैं जिन्हें देख आपको किसी प्राचीन मंदिर में स्थित ऊंचे दीपस्तंभ का स्मरण होगा। यह अपेक्षाकृत नवीन संरचना है। सौंदर्य की अत्यधिक कमतरता भी इसका प्रमाण है। प्रवेश द्वार पर दो गज प्रतिमाएं हैं। द्वार के ऊपर अपने चार शिष्यों समेत शंकराचार्य की प्रतिमाएं हैं। मेरे अनुमान से इन्ही चार शिष्यों ने कालान्तर में भारत के चार दिशाओं में चार मठों की स्थापना की थी।

आदि शंकर कीर्ति स्तम्भ का प्रवेश द्वार
आदि शंकर कीर्ति स्तम्भ का प्रवेश द्वार

मंडप के भीतर एक घुमावदार ढलुआ मार्ग आपको ऊपर ले जाता है। ऊपर जाते हुए आप हिन्दू धर्म के ६ पंथों को समर्पित मन्दिर देखेंगे जिनके देव क्रमशः गणेश, षन्मुख अर्थात् कार्तिकेय, सूर्य, विष्णु, शक्ति तथा शिव हैं। प्रत्येक मंदिर में देवों की पूजा अर्चना आदि शंकराचार्य द्वारा की जाती है। ऊपर जाते हुए ढलुआ मार्ग की भित्तियों पर आप आदि शंकराचार्य की जीवनी देख सकते हैं। उनके जीवन की कई घटनाओं को नक्काशी एवं चित्रकला द्वारा यहाँ चित्रित किया गया है।

कीर्ति स्तंभ के ऊपरी तलों से आप केरल के हरे-भरे ग्रामीण क्षेत्रों के अप्रतिम विहंगम दृश्य देख सकते हैं।

कीर्ति स्तंभ के भीतर प्रवेश करने के लिए १०/- रुपयों का नाममात्र शुल्क है।

कांची मठ के मंदिर

कांची मठ के छोटे मंदिर
कांची मठ के छोटे मंदिर

कांची मठ के इसी परिसर में दो छोटे मंदिर और हैं। उनकी जन्म स्थली का प्रतीक, आदि शंकराचार्य का मंदिर इनमें से एक है। दूसरा मंदिर शिव पार्वती तथा गणेश को समर्पित है। यद्यपि ये मंदिर छोटे एवं साधारण हैं तथापि आपको इनके भीतर विशेष ऊर्जा का अनुभव तुरंत प्रतीत होगा।

इन दोनों मंदिरों के पृष्ठभाग छोटे एवं गोलाकार हैं। ये उस क्षेत्र की वास्तु शैली का अनुसरण करती प्रतीत होती हैं।कलदी के प्राचीन मंदिर एवं अन्य आकर्षण

भारत प्राचीन मंदिरों से भरा हुआ है। किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में आप इन्हें अनदेखा नहीं कर सकते। यहाँ भी मैंने एक प्राचीन मंदिर देखा जो केरल की देवालय वास्तुकला का ठेठ नमूना था।

नायथोडू शंकर नारायण मंदिर

नायथोडू शंकर नारायण मंदिर
नायथोडू शंकर नारायण मंदिर

यह मंदिर कोची विमानतल से अत्यधिक समीप स्थित है। दूर से यह एक बड़ा घर प्रतीत होता है जिसकी श्वेत भित्तियाँ तथा लाल टाईलों युक्त तिरछी छत है। हमने भीतर प्रवेश कर एक खुले प्रांगण में एक अन्य छोटे घर के समान संरचना देखी। एक संकरी गली हमें इसके प्रवेश द्वार तक ले गयी। भीतर एक सुन्दर गोलाकार मंदिर था जो लाकड़ी स्तंभों से घिरा हुआ था।

केरल के काष्ठ से घिरे भित्ति चित्र
केरल के काष्ठ से घिरे भित्ति चित्र

मंदिर की सम्पूर्ण गोलाकार भित्ति पर मद्धम गहरे नारंगी रंग में भित्तिचित्र बने हुए हैं। मैंने इस प्रकार के भित्तिचित्र इससे पूर्व त्रिवेंद्रम के पद्मनाभस्वामी मंदिर में देखे थे। छत से पीतल के दीपक लटकाए हुए हैं। चारों दिशाओं पर बनी पाषाणी सीड़ियाँ आपको गर्भगृह तक ले जाती हैं। प्रवेश द्वारों पर शिला के द्वारपाल स्थापित हैं। इन्हें देख मैं कल्पना के विश्व में खो गयी कि संध्याकाळ में तेल के दीपक प्रज्ज्वलित करने के पश्चात ये भित्ति चित्र कितने मनमोहक प्रतीत होते होंगे। दीपकों पर एकत्र तेल एवं कालिमा अवश्य बता रहे थे कि इन्हें संध्याकाळ प्रज्ज्वलित किया जाता है।

केरल की देवालय वास्तुकला

केरल के मंदिरों के काष्ठ मंडप
केरल के मंदिरों के काष्ठ मंडप

नायथोडू शंकर नारायण मंदिर में जब हम पहुंचे, दोपहर का समय हो चुका था। यह समय सामान्यतः भक्तों द्वारा देव दर्शन का नहीं होता। कदाचित इसी कारण वहां हमारे सिवाय अन्य कोई नहीं था। सम्पूर्ण मंदिर को निहारने का मुझे पर्याप्त अवसर प्राप्त हुआ था। मृदु रंगों से रंगी गोलाकार भित्तियाँ, ढलुआ शुण्डाकार छत, लाकड़ी कोष्टक, लाकड़ी स्तंभों एवं छतों का मंडप, बाहरी भित्ती से सटे गलियारे। नायथोडू शंकर नारायण मंदिर केरल के देवालय वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

पाषाण के द्वारपाल - केरल का शंकर नारायण मंदिर
पाषाण के द्वारपाल – केरल का शंकर नारायण मंदिर

इस मंदिर की एक अनोखी विशेषता है कि यहाँ भगवान् शिव की आराधना विष्णु मंत्र द्वारा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि भगवान् विष्णु भगवान् शिव के आराध्य हैं जो उनके संग इसी मूर्ति में वास करते हैं। शिव एवं विष्णु का एक ही प्रतिमा में वास होना एक प्रकार से आदि शंकराचार्य की अद्वैत दर्शन का उत्सव है। मुझे मंदिर के व्यालमुख भी किंचित अनोखे प्रतीत हुए। यक्ष के शीश पर बैठे व्यालमुख मुझे पुनः प्रयोग किये गए तोप की भान्ति प्रतीत हुए।

रामकृष्ण अद्वैत आश्रम – यह बेलूर के रामकृष्ण मठ की शाखा है। यह श्रृंगेरी मठ के समीप स्थित है।

मनिक्कमंगलम कार्त्यायनी मंदिर – ऐसा माना जाता है कि शंकराचार्य के पिता इस मंदिर में पुजारी थे।

संस्कृत विश्वविद्यालय – यह संस्कृत भाषा पर केन्द्रित स्वयं में एक अनोखा विश्वविद्यालय है।

शंकराचार्य की जन्मस्थली कलदी कैसे पहुंचें?

आदि शंकराचार्य अपनी जन्मस्थली में
आदि शंकराचार्य अपनी जन्मस्थली में

कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, नेदुम्बसरी ५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित, कलदी से निकटतम हवाईअड्डा है। निकटतम रेल स्थानक एर्नाकुलम(लगभग ८ की.मी.), अन्गमाली( लगभग ८ की.मी.) अथवा अलुवा(लगभग १६ की.मी.) हैं। आपकी सुविधा के लिए स्थानीय बसें भी चलती हैं।

कलदी प्रसिद्ध धार्मिक नगरी गुरुवायुर से लगभग ८० की.मी. की दूरी पर है। दोनों के मध्य पर्याप्त बसें चलती हैं।

मुझे कलदी में कोई बड़ा अतिथिगृह दृष्टिगोचर नहीं हुआ। आप कोच्चि में ठहर कर दिन के समय कलदी की एक दिवसीय यात्रा कर सकते हैं। श्रृंगेरी मठ में ठहराने की कुछ सुविधायें हैं किन्तु इसके लिए आप मठ के नियमों का अध्ययन अवश्य करें।

यदि आपके पास स्वयं अपनी गाड़ी अथवा टैक्सी हो तो सर्वाधिक उचित होगा क्योंकि यहाँ के उपरोक्त उल्लेखित तीन क्षेत्र कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। आप कोच्चि हवाईअड्डे से टैक्सी के सेवा ले सकते हैं।

कलदी के ग्रामीण भागों को निहारने के लिए आप यहाँ पहुंचकर गाँव की पैदल यात्रा करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

4 COMMENTS

  1. अति उत्तम। मैंने अपने चिकमगलूर यात्रा के दौरान इनके द्वारा स्थापित श्रृंगेरी शारदा पीठ के दर्शन किए थे।

    • श्रृंगेरी अदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित ४-५ पीठों में से एक है – शारदा पीठ, आशा है आपको अन्य पीठ भी शीघ्र ही देखने को मिलेंगे।

  2. अनुराधा जी,
    कलदी- आदि शंकराचार्य की जन्म भूमि श्रृंगेरी मठ एवम् कांची मठ का बहुत ही सुंदर वर्णन ! सिर्फ श्रृंगेरी मठ एवम् कांची मठ ही नहीं वरन् संपूर्ण कलदी क्षेत्र ही निश्चित रूप से अलौकिक उर्जा से परिपूर्ण होगा । पिछले दिनों द्वारका यात्रा के समय आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित द्वारका पीठ के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ,आशा है अन्य पीठों के भी दर्शन शीघ्र ही होंगे । आपके सुंदर अनुवादित आलेखों से भारत में स्थित अनेक ऐतिहासिक/पौराणिक स्थलों के बारे मे ज्ञानवर्धन तो होता ही हैं,साथ ही साथ इन्हें प्रत्यक्ष देखने की इच्छा भी प्रबल होती हैं ।धन्यवाद !

    • प्रदीप जी – पिछले एक साल में मुझे अदि शंकराचार्य से जुड़े कई स्थानों पर जाने को मिला, सब आनंददायी स्थल हैं ।

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