Home भारत अजंता गुफा क्रमांक 1 की चित्रकारी – यूनेस्को की विश्व धरोहर

अजंता गुफा क्रमांक 1 की चित्रकारी – यूनेस्को की विश्व धरोहर

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अजंता के भित्ति चित्र
अजंता के भित्ति चित्र

अजंता की ऐतिहासिक रकारी बहुत से पर्यटकों को महाराष्ट्र की अजंता गुफाओं की ओर आकर्षित करती है। जो भी अजंता गुफाओं में गया हो और वहां के भित्ति चित्र देखे हो, इन गुफाओं को देखकर विस्मित हुए बिना नहीं रहा होगा। ये गुफ़ाएं उत्कर्ष अभियांत्रिकी का भी एक नमूना हैं, क्योंकि ये सारी गुफ़ाएं हाथ से खुदाई कर बनाई गई हैं और ये नैसर्गिक नहीं है। अजंता की चित्रकारी पिछले 2000 वर्षों से अस्तित्व में है। लेकिन आज भी इन चित्रों में व्यक्त कथाएं जीवंत सी लगती हैं, जो आपको मंत्रमुग्ध कर देती हैं। मैं बहुत बार अजंता और एलोरा की गुफाओं में जा चुकी हूँ, क्योंकि, कुछ काल तक मेरे पिताजी का पद स्थापन औरंगाबाद में था।

तत पशचात, मैंने दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान से कला के इतिहास का पाठ्यक्रम पढ़ते समय सही मायने में अजंता के भित्ति चित्रों को समझा। उसके बाद जब मैं डेक्कन ओडिसी ट्रेन द्वारा महाराष्ट्र और गोवा का दौरा कर रही थी, तब मुझे एक बार और अजंता और एलोरा की गुफाओं को देखने का अवसर मिला। इसी दौरान मैंने पहली बार अजंता की चित्रकारी को कला के प्रशंसक की नजरों से देखा, जाना और समझा।

अजंता की गुफाएँ        

इस पोस्ट के लिए मैंने अपने आपको अजंता की गुफा क्रमांक 1 की चित्रकारी तक ही सीमित रखा है। छोटी सी पहाड़ी की चढ़ाई करने के बाद आपको घोड़े की नाल जैसी दिखने वाली अजंता की गुफाएं नज़र आएँगी जो वाघोरा नदी के मोड़ पर खुदी गयी हैं। इन गुफाओं को अनुक्रम से क्रमांकित किया गया है, पर यह अनुक्रम खुदाई के अनुसार नहीं है। गुफाओं के इस समूह को कुछ 500-600 इ पूर्व खोदा गया था। पर अभी के लिए इन गुफाओं के पुरातात्विक विवरणों, जैसे कौनसी गुफा किस काल में बनाई गयी थी, जैसी बातों पर ज्यादा ध्यान न देते हुए (इस पर अपने आप में एक पूरा पोस्ट लिखा जा सकता है) इस पोस्ट के द्वारा मैं आपको अजंता की गुफा 1 की चित्रकारी से परिचित करवाना चाहती हूँ।

गुफा क्रमांक 1 में अजंता की चित्रकारी

यह गुफा बहुत सारे चित्रों से भरी हुई है जिन्हें अपेक्षाकृत बहुत अच्छी तरह से संरक्षित किया गया है। अगर आज भी आप इन चित्रों को देखे तो आप आसानी से समझ पाएंगे। इन गुफाओं में बहुत गहन अँधेरा रहता  है। ऐसे में गुफा के प्रवेश द्वार पर लगाए गए प्रतिक्षेपकों (रिफ़्लेक्टर्स) के आधार के बिना यहां की चित्रकारी देखना नामुमकिन है। यहां के गाइड भी अपने साथ मान्यता प्राप्त प्रकाश की सामग्री रखते हैं, जिसका उपयोग चित्रकारी की बारीकियों को दिखाने के लिए किया जाता है। जैसे-जैसे भीतर प्रवेश करते हुए आप अंधेरे के साथ अपनी आँखों का समंजन करने का प्रयास करते हैं। आप स्वभाकिक रूप से इस विचार से जूझते हैं की इतने अंधेरे में इन चित्रकारों ने इतनी उत्तम और इतनी बारीकी से ये भित्ति चित्र कैसे बनाए होंगे। कला के इतिहासकारों के लिए यह अभी भी एक अनुसंधान का विषय बना हुआ है। इस विषय में अभी तक विशेषज्ञो में कोई आम सहमति नहीं है। खासकर की अब जब इस खुदाई और चित्रकारी को लगभग 30-50 साल के भीतर किया गया माना गया है। प्रतिक्षेपक गुफाओं के भीतर तक प्रकाश प्रदान करते हैं, लेकिन दिन के सिर्फ कुछ ही घंटों के लिए। प्रकाश की कोई और तकनीक शायद इन दीवारों को और उज्जवलित कर सकती थी, लेकिन इसकी ओर आज तक किसी ने भी ध्यान नहीं दिया।

अजंता की चित्रकारी क्या है?   

अजंता की दीवारों पे जातक कथाएं
अजंता की दीवारों पे जातक कथाएं

टेम्पेरा तकनीक

अजंता की चित्रकारी को अक्सर फ्रेस्कोस या भित्ति चित्र कहा जाता है। तकनीकी रूप से देखा जाए तो ये फ्रेस्कोस नहीं है, क्योंकि फ्रेस्कोस उन चित्रों को कहा जाता है जो गीली सतह पर बनाए जाते हैं। अजंता के चित्र सूखी सतह पर बनाए गए थे और इसके लिए एक खास प्रकार की तकनीक, जिसे टेम्पेरा कहा जाता है, का उपयोग किया गया था। निचली सतह यही की पत्थर की सतह के अनुसार आधार के रूप में कीचड़ या भूसे की नींव डाली जाती थी, जिस पर चूने की परत चढ़ाई जाती थी। इस चूने की परत के सूखने के बाद इन पर बाद में चित्र बनाए जाते थे।

जातक कथाएँ

विषय-वस्तु की दृष्टि से देखे तो इन गुफाओं की दीवारों पर जातक कथाओं को चित्रित किया गया है। ये चित्र बोधिसत्त्व की कथाओं का बखान करते हैं। बोधिसत्त्व वे प्रारंभिक बौद्ध हैं जो बुद्ध बनने के मार्ग पर हैं, पर अभी तक बुद्ध नहीं बने हैं, लेकिन बुद्ध के कुछ लक्षण उनमें नज़र आते हैं। साहित्य में  550 से भी अधिक जातक कथाएँ हैं। इनमें से कुछ बौद्ध स्थलों पर चित्रों और मूर्तियों के रूप में देखी जा सकती हैं। जातक कथाओं के अलावा इन दीवारों पे बोधिसत्त्वों और बुद्ध के भी चित्र अंकित हैं। बोधिसत्त्व किसी भी प्रजाति के हो सकते हैं – हाथी, बंदर, साँप, हंस या फिर मनुष्य लेकिन इनमें नारी का रूप कभी नहीं होता।

अजंता गुफाओं की छत पे चित्रकारी
अजंता गुफाओं की छत पे चित्रकारी

अजंता गुफाओं की छतों पर कोई भी धार्मिक कथाएँ या आकृतियाँ नहीं हैं। इन छतों पर समान्यतः जानवरों की आकृतियों से बनाए गए सजावटी रूपांकन होते हैं। अजंता की छतों पर आपको बहुत सारी ज्यामितीय रचनाएँ भी दिखेंगी। इन कथाओं को दीवारों पर चित्रित करने के पीछे यही तर्क है कि इन गुफाओं में घूमते हुए आप दीवारों पे इन कथाओं को देखकर उन्हें समझ सकते हैं, नाकी छत को देखते हुए। इन गुफाओं के कोने आम तौर पर धुंधले प्रकार के गहरे सुस्त रंगों वाले राक्षसों से चित्रित किए जाते हैं। जो इस बात की ओर संकेत करता है कि राक्षसों का कोई एक आकार नहीं होता। वे चाहे तो कोई भी आकार ले सकते हैं और ये अच्छे प्राणी नहीं माने जाते।

अजंता की गुफा क्रमांक 1 में बोधिसत्त्व पद्मपानी का चित्र

बोधिसत्व पद्मपनी - अजंता गुफा १
बोधिसत्व पद्मपनी – अजंता गुफा १

गुफा क्रमांक 1 का द्वार खुलते ही भीतर दो बोधिसत्त्व के बड़े चित्र हैं – बोधिसत्त्व पद्मपानी और बोधिसत्त्व वज्रपानी। यहां पर मैं आपको बाई तरफ की मूर्ति के बारे में बताते हुए उसकी बारीकियों पर भी प्रकाश डालने का प्रयास करूंगी, जो अजंता की गुफाओं में सबसे अधिक प्रसिद्ध है। इस जानकारी से आपको अजंता की बाकी की चित्रकारी समझने में सहायता होगी।

यह बोधिसत्त्व पद्मपानी है, अर्थात वह जिसके हाथों में पद्म या कमल का पुष्प है। इस चित्र को कुछ समय के लिए ध्यान से देखने पर आपको यह नज़र आयेगा।

बोधिसत्त्व पद्मपानी के चित्र की बारीकियों पर नज़र डालिए

  • उत्तम रूप से चित्रित बाहरी आकार।
  • अंडाकार चेहरे पर उत्तम अनुपात में पहनाया गया त्रिकोणीय किरीट जिससे माथे पर सिर्फ बालों की पतली सी रेखा दिखाई दे रही है।
  • कमल के आकार की उदास आँखें जो आधी बंद हैं।
  • कामुकता से भरे अधर।
  • धनुष के आकार की भौहें।
  • तराशा हुआ नाक, जिसे सफ़ेद रंग से उभारा गया है।
  • चौड़ी छाती और पतली कमर।
  • उनकी भुजाएँ थोड़ी विचित्र सी हैं और दो हाथ थोड़े भिन्न से। भारतीय शिल्पशास्त्र के अनुसार ऐसा माना जाता है कि, महापुरुषों के हाथ हाथी की सूंड की तरह लंबे होते हैं, जो घुटनों तक पहुँचते हैं। चित्रकार ने संभवतः यही दर्शाने का प्रयास किया है।
  • हाथ में कमल का फूल पकड़े हुए उनकी लंबी और पतली उँगलियाँ नाज़ुक सी लगती हैं।
  • गले में एकावली मोतियों की माला है, जिसके बीच में नीलमणि है। नीलमणि से पीछे गर्दन की ओर जाते हुए मोतियों का आकार छोटा होता जाता है। इस तरह की मालाएँ आप आज भी देख सकते हैं।

कामुक और दिव्य, भौतिकवादी और आध्यात्मिक

बोद्धिसत्व वज्रपाणी - अजंता गुफा १
बोद्धिसत्व वज्रपाणी – अजंता गुफा १

अब इस चित्र को पूर्ण रूप से देखिये। इसमें आपको भौतिकवादी जीवन के सारे लक्षण दिखेंगे, जैसे किरीट, बहुमूल्य गहने और रेशमी कपडे। इसी के साथ क्या आप करुणा से भरी उन अधखुली आँखों को देख सकते हैं? साथ ही साथ क्या वे साधना में लीन नहीं जान पड़ती? यही विरोधाभास अजंता के प्रसिद्ध चित्र पद्मपानी को और सुंदर बनाता है। वह एक साथ कामुक और दिव्य भी है और एक ही समय पर भौतिकवादी और आध्यात्मिक भी है।

वज्रपानी के चित्र में आप उसके किरीट की जटिल रचनावली को देख सकते हैं। तथा उसमें चांदी की महीन कारीगरी को उत्तम तरीके से दिखाया गया है।

अजंता की गुफा क्रमांक 1 में जातक कथाओं के चित्र

अजंता की गुफा क्रमांक 1 की बाईं तरफ आप महाजनक जातक चित्रित रूप में देख सकते हैं, ये दृश्य बोधिसत्व महाजनक की कथा को दर्शाते हैं। मिथिला के राजा महाजनक का जन्म निर्वासन काल के दौरान हुआ था। वे एक सामान्य मनुष्य के रूप में पले-बड़े और बड़ा होने के बाद उन्हें अपने राजसी गौरवों का पता चला। उन्होंने स्वर्णभूमि या श्रीलंका की यात्रा के दौरान राजकुमारी शिवाली से विवाह किया। एक दिन वे सारे सांसरिक सुखों का त्याग कर देते है। शिवाली और बाकी लोगों के समझाने के बावजूद भी वे नहीं मानते।

गुफा की दाहिने ओर की दीवारों पे नन्द जातक चित्रित है, जो बुद्ध के सौतेले भाई की कथा को बताते हैं। इस कथा में बुद्ध अपने भाई नन्द को स्वर्ग में लेकर जाते हैं, जिसके बाद वे संसार का त्याग कर बुद्ध की शिक्षा का पालन करने लगे।

अजंता की चित्रकारी विभिन्न स्तरों पर अभिव्यक्ति

अजंता गुफा १ की छत पे गोलाकार चित्रकारी
अजंता गुफा १ की छत पे गोलाकार चित्रकारी

अजंता के चित्र हमसे कई स्तर पर बात करते हैं. वे उस समय का एक जीत जागता लेखा जोखा हैं, जब यह चित्र बनाये गए थे।

  • आप इन चित्रों में व्यक्तियों द्वारा पहने गए कपडे की छपाई साफ-साफ देख सकते हैं। इसमें आपको धारियों वाला इक्कत का प्रिंट और पोल्का डोट्स जिसे पुल्काबंध भी कहा जाता है की छपाई दिखाई देती है। यहां पर जरदोज़ी या जरी का कपड़ा भी दिखाया गया है। उड़ते हुए कलहंसों की छपाई का प्रयोग शुभ अवसरों पर पहने जाने वाले कपड़ों पर किया जाता है।
  • इन चित्रों में परिदृश्य नहीं दिखाये जाते। प्रकृति का अपना कार्यात्मक उद्देश्य होता है, जिसे जानवरों, जैसे हिरण या फिर टीलों और चट्टानों के द्वारा दिखाया जाता है।
  • अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र संगीत की उत्पत्ति को दर्शाते हुए बताते हैं कि, संगीत राजाओं के राज दरबारी जीवन का एक अविभाज्य भाग है।
  • इन कथाओं को क्रमिक रूप से नहीं बल्कि स्थानिक रूप से चित्रित किया गया है, यानि जो घटनाएँ किसी एक स्थान पर घटित हुई हैं, उन्हें एक साथ चित्रित किया गया है। कथाओं को समझने के लिए यह जरूरी है कि आप इन कथाओं को पहले से ही जानते हो, नहीं तो इन घटनाओं के क्रम को समझना बहुत मुश्किल है। लेकिन अब इन कथाओं को अच्छी तरह से प्रलेखित किया गया है।

    फारसी व्यापारी - अजंता गुफा १
    फारसी व्यापारी – अजंता गुफा १
  • आप इस गुफा में एक फ़ारसी राजदूत भी देख सकते हैं और गुफा के इस भाग की सारी चित्रकारी फ़ारसी परिवेश को प्रदर्शित करती है। इस व्यक्ति को गोरी त्वचा में दर्शाया गया है, जबकि ज़्यादातर मूल निवासियों की त्वचा सांवली है। पर्दे, लम्बे बरसाती जैसे कपड़े, टोपी और उन्होंने अपने हाथ में पकड़ा हुआ कप सबकुछ फ़ारसी ढंग का है, जो न सिर्फ फ़ारसी व्यापार के बारे में बताते हैं बल्कि यह भी बताता है की चित्रकार को उनकी संस्कृति का अच्छा खासा ज्ञान था।

अजंता की चित्रकारी का प्रभाव

कहा जाता है कि अजंता की चित्रकारी का प्रभाव सभी प्रसिद्द बौद्ध स्थलों की चित्रकारी में भी देखा जा सकता है, जैसे श्रीलंका में सिगीरीय, पश्चिम चीन की दुन्हुयांग गुफाएँ और जापान की नारा गुफाएँ।

अगली बार आप जब अजंता जाएँ, तो इन छोटी छोटी बातों पर ध्यान दीजियेगा। आपकी अजंता यात्रा और भी रुचिकर हो जाएगी।

अजंता की वास्तुकला एवं भित्ति चित्रों को समझने के लिए आप भारतीय पुरातत्व विभाग की पुस्तिका का उपयोग कर सकते हैं, जो की आपको टिकट खिड़की पर मिल जाएगी। भारतीय पुरातत्व विभाग अजंता एवं अन्य विश्व धरोहर स्थलों का संरक्षक है और उनके रख रखाव के लिए उत्तरदायी है।

भारत के अन्य विश्व धरिहार स्थल

एलिफेंटा गुफाएं – शिव के अवतार – एक विश्व धरोहर

नालंदा – विद्या का प्राचीनतम केंद्र, बिहार स्थित विश्व धरोहर

रानी की वाव – पाटन गुजरात का विश्व धरोहर का स्थल (यूनेस्को)

बोधगया – जहाँ बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई

दार्जिलिंग हिमालय रेलवे – एक जीता जागता स्वप्न

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