बिनसर कुमाऊँ में वैभवशाली हिमालय के दर्शन

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हिमालय की चोटियाँ - बिनसर से
हिमालय की चोटियाँ – बिनसर से

उत्तराखंड प्रदेश के कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित झंडी धार पहाड़ियों के मध्य स्थित बिनसर, भव्य हिमालय पर्वत श्रंखला के अप्रतिम परिदृश्यों से परिपूर्ण है। बिनसर एक वन्य जीव अभ्यारण्य है। प्राचीनकाल में यह चन्द्र वंशीय राजाओं की ग्रीष्म राजधानी हुआ करती थी। ११वीं से १८वीं शताब्दी के बीच यहाँ चन्द्र वंशीय राजाओं का शासन था। ये वही चन्द्र वंशीय राजा हैं जिनके विषय में मैंने जागेश्वर के अपने संस्मरण में उल्लेख किया था तथा उस काल में यहाँ प्रचलित कलाकृतियों से भी आपका परिचय कराया था।

यद्यपि बिनसर अल्मोड़ा से अधिक दूर नहीं है, परन्तु उनकी ऊंचाईयों में अंतर है। अतः अल्मोड़ा से बिनसर पहुँचने के लिए धीमी गति से प्रवास करने की आवश्यकता है। अल्मोड़ा से बाहर निकलते ही पहाड़ियों के परिदृश्य आपको मंत्रमुग्ध कर देते हैं। उन परिदृश्यों को आत्मसात करना तथा कैमरे द्वारा उन्हें स्थायी स्मृतियों में परिवर्तित करना हो तो  आप मार्ग में रुकते रुकते ही चल पाएंगे। ऊंचे ऊंचे देवदार के वृक्षों से छन छन कर आती धूप का आनंद लेने आप कई बार अपनी गाड़ी से नीचे उतरेंगे। संक्षेप में यह कहना चाहती हूँ कि अधिक दूरी पर स्थित ना होते हुए भी बिनसर पहुँचने में समय लग ही जाता है। और सच कहिये तो पहाड़ों में घूमने का यही तो आनंद है।

अब हमारा ही उदहारण ले लीजिये – सुनिए एक मनोरंजक घटना जो हमारे साथ घटी। मार्ग के मनोरम परिदृश्यों में हम इतना तल्लीन हो गए कि हम कब बिनसर को पार कर अगले गाँव तक पहुँच गए पता ही नहीं चला। हालांकि मार्ग के प्राकृतिक दृश्य इतने रमणीय हैं कि मार्ग भटकने में भी आनंद ही प्राप्त होता है। लगभग एक घंटे के पश्चात हम बिनसर के प्रवेश द्वार पहुंचे जहां से हमने बिनसर वन्यप्राणी अभ्यारण्य के भीतर प्रवेश करने का अनुज्ञा पत्र प्राप्त किया। अनुज्ञा पत्र के साथ साथ उन्होंने हमें इस क्षेत्र को स्वच्छ रखने के निर्देश भी दिए।

बिनसर में हमने ठहरने के लिए कुमाऊँ मंडल विकास निगम के अथिति गृह में प्रबंध किया था जो बिनसर पहाड़ी के लगभग शिखर पर स्थित है। बिनसर वन्य जीव अभ्यारण्य के प्रवेशद्वार से इस अतिथि गृह तक पहुँचने में गाड़ी से हमें लगभग ४५ मिनट लगे।

बिनसर जंगले के भीतर जाते ही हमें ऊंचे वृक्षों की छाँव में धरती पर नाचते काले तीतर दिखाई पड़े। उसे उछल उछल कर नाचते देख हम सब की आँखें बस उसी पर टिक गयी। तीव्र ढलान वाले मार्ग से होते हुए अंततः हम अतिथि गृह पहुंचे। अंत के कुछ भाग को छोड़ मार्ग बाधारहित व सपाट था।

बिनसर “जीरो पॉइंट” पदयात्रा

बिनसर जीरो पॉइंट के जाता रास्ता
बिनसर जीरो पॉइंट के जाता रास्ता

कुमाऊँ मंडल विकास निगम के अथिति गृह में सामान रख, अधिक समय ना गंवाते हुए हम “जीरो पॉइंट” की ओर पैदल चल पड़े। बिनसर यात्रा से पूर्व मैंने यहाँ के विषय में अध्ययन किया था। उससे प्राप्त जानकारी के अनुसार यह एक मनोरम पदयात्रा होने वाली थी। इस पदयात्रा के अंत में हम ऐसे स्थान पर पहुँचने वाले थे जहां से हिमालय की नंदादेवी पर्वत श्रंखला का बेजोड़ दृश्य दिखाई पड़ता है। सही अर्थों में यह अत्यंत सुहावनी पदयात्रा थी। हम एक चौड़ी पगडंडी पर चल रहे थे जिसके एक ओर गहरी खाई थी तथा दूसरी ओर घने जंगली वृक्ष थे। हमारी बिनसर यात्रा के समय यहाँ बुरुंश के पुष्पों की छटा अपनी चरम सीमा पर थी। सम्पूर्ण पगडंडी पर लाल पुष्पों की चादर बिछी हुई थी। हमें यहाँ कई श्वेत पुष्प भी दिखाई दिए।

बिनसर घटी में बुरुंश के फूल
बिनसर घटी में बुरुंश के फूल

पदयात्रा पर निकलने से पहले, अथिति गृह के बाहर स्थित चाय की दूकान पर हमें कुछ परिदर्शक दिखाई दिए थे। यद्यपि उनकी सेवा गृहण करने की बाध्यता नहीं थी, फिर भी हमने एक परिदर्शक की सेवा लेने का निश्चय किया। हम इस वन एवं यहाँ के पक्षियों के विषय में और अधिक जानकारी के इच्छुक थे। लेकिन हमारा यह निर्णय हमारी बड़ी भूल सिद्ध हुआ क्योंकि हमारे परिदर्शक के पास ना तो वन संबंधी जानकारी थी ना ही बताने की इच्छा या भावना। वह हमें तुरंत ही जीरो पॉइंट तक ले जाकर तुरंत वापिस लाने की शीघ्रता व्यक्त करने लगा था। अतः हम अधिक पक्षियों को नहीं ढूँढ पाए। जिन्हें देखा उनके नाम भी परिदर्शक को ज्ञात नहीं थे। अधिक झेल न पाने के कारण हमने उसे अकेले ही वापिस भेज दिया एवं अपनी वापिसी यात्रा आनंद लेते हुए स्वयं ही धीरे धीर की।

बिनसर एक घना वन्य जीव अभ्यारण्य है जहां राह भटकना अत्यंत आसान है। यहाँ हमें कई वानर भी स्वच्छंद विचरते एवं कूद-फांद करते दिखाई पड़े। अतः इस अभ्यारण्य में अकेले विचरण करना उचित नहीं होगा। आप टोली में ही इस वन में पदयात्रा करें।

“जीरो पॉइंट” से बिनसर घाटी का परिदृश्य

जीरो पॉइंट बिनसर से देखने की मछान
जीरो पॉइंट बिनसर से देखने की मचान

“जीरो पॉइंट” शिखर पर एक अवलोकन दुर्ग यानि एक मचान का निर्माण किया गया है जो आसपास के वृक्षों से ऊंचा है। इसके ऊपर चढ़ कर हिमालय श्रंखला के दर्शन होते हैं बिना किसी अवरोध के। आवश्यकता है तो सौभाग्य की। पर्वत श्रंखलाओं को साफ़ देखने के लिए आवश्यक है सही मौसम। अत्यंत पारदर्शी तथा निर्मल वातावरण की आवश्यकता है। सांझ बेला में हमें इन पर्वत श्रंखलाओं के दर्शन तो हुए किन्तु धुंध के कारण दर्शन स्पष्ट नहीं थे।

बिनसर घटी के घने जंगल
बिनसर घटी के घने जंगल

पर्वत श्रंखलाओं के दर्शन तो वातावरण पर निर्भर है, पर घाटी की सुन्दरता के दर्शन आप निर्विरोध कर सकते हैं। ऊंचे ऊंचे पहाड़ों पर घने जंगल, घाटियों में हरे भरे खेत, रमणीय प्राकृतिक दृश्य इत्यादि के दर्शन बिनसर यात्रा को सफल कर देते हैं।

बिनसर घटी में इक्का दुक्का घर
बिनसर घटी में इक्का दुक्का घर

अवलोकन दुर्ग से नीचे उतरते ही मेरी दृष्टी एक बावड़ी सदृश संरचना पर अटक गयी। इसके भीतर मिट्टी भरी हुई थी। अतः यह स्पष्ट नहीं था कि यह एक बावड़ी थी अथवा किसी का घर। घने जंगल के मध्य इस प्रकार की संरचना अचंभित कर देती है।

बिनसर जंगलों के पक्षी

“जीरो पॉइंट” पर आते जाते हमें चारों ओर से पक्षियों की चहचहाहट सुनायी पड़ रही थी। कुछ पक्षियों को ढूंढ निकालने में हमें सफलता मिली किन्तु घने जंगलों एवं कम रोशनी के कारण हम उनके चित्र नहीं ले सके।

कुमाऊँ के जंगलों से अपेक्षाकृत अधिक पक्षियों को हमने कुमाऊँ की झीलों, जैसे भीमताल, के आसपास देखा था।

और पढ़ें:- कुमाऊँ के पक्षी

बुरुंश पुष्पों की छटा

सुर्ख लाल रंग के बुरुंश पुष्प
सुर्ख लाल रंग के बुरुंश पुष्प

बिनसर की यह यात्रा हमने मार्च माह के अंतिम दिनों में की थी। यही समय है जब बुरुंश के वृक्षों की टहनियां लाल लाल पुष्पों से लदी रहती हैं। मार्ग के किनारे खड़े बुरुंश के वृक्षों के कारण मार्ग के कई भागों पर लाल पुष्पों की चादर सी बिछी प्रतीत होती है। उन मार्गों पर चलाना तथा उन पुष्पों पर से गाड़ी हांकना हमें असमंजस में डाल देता है। वृक्षों पर पत्तियाँ अधिक थीं या पुष्प, यह कहना कठिन था। लाल बुरुंश के पुष्पों से भरे जंगलों के मध्य से जाना एक अत्यंत रोमांचक अनुभूति थी।

लाल बुरुंश फूलों से लादे पेड़
लाल बुरुंश फूलों से लादे पेड़

यह सम्पूर्ण पदयात्रा हमारे हेतु किसी स्वप्न से कम नहीं था। चारों ओर लाल पुष्पों की छटाओं के मध्य से धीरे धीरे पदयात्रा करना, घने जंगलों के सन्नाटों को चीरती पक्षियों की चहचहाहट सुनना, घने वृक्षों से भरी घाटियों के दर्शन करना और इन सब को चार चाँद लगाती हिमालय पर्वत श्रखलाओं के परिदृश्यों को निहारना! यह एक सुखद स्वप्न सदृश ही था।

बिनसर घाटी की प्रातःकालीन आभा

सूर्योदय से पहले की लालिमा - बिनसर
सूर्योदय से पहले की लालिमा – बिनसर

बिनसर यात्रा का सर्वोत्तम आकर्षण अर्थात् मणियों में मणी है इसकी पर्वत श्रंखलाओं का प्रातःकालीन दृश्य। इसका आनंद उठाने के लिए दूसरे दिन हम पौ फटने से पूर्व ही जाग गए तथा अतिथिगृह की छत पर डेरा जमा कर बैठ गए। इस अतिथिगृह की सबसे बढ़िया बात है कि यहाँ से हिमालय पर्वत श्रंखला का दृश्य निकटतम तथा निर्विरोध प्राप्त होता है। अतिथिगृह के अन्य यात्री भी  धीरे धीरे छत पर इकट्ठे होने लगे। कुछ ही समय में सारी छत पर्यटकों के भर गयी।

सूर्य के प्रथम दर्शन - बिनसर
सूर्य के प्रथम दर्शन – बिनसर

अचानक सूर्य की पहली किरण पर्वत श्रंखला की एक चोटी पर पड़ी। श्वेत बर्फ की चोटी अचानक सुनहरे रंग में परिवर्तित हो गयी। जैसे जैसे सूर्य उगने लगा, पर्वत श्रंखला की भिन्न भिन्न चोटियाँ अपना रूप प्रकट करने लगीं। यह एक बेजोड़ दृश्य था। छत पर उपस्थित एक एक पर्यटक मन्त्रमुग्ध सा इस दृश्य को निहार रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे अम्बर ने सब पर जादू सा कर दिया हो। अचानक मुझे आभास हुआ कि इस प्रातःकालीन समय को छायाचित्रीकरण में स्वर्णिम काल क्यों कहा जाता है।

बिनसर सूर्योदय
बिनसर सूर्योदय

यह अप्रतिम दृश्य लगभग ४० मिनट तक क्षितिज पर उपस्थित था। फिर हाथों में चाय की प्यालियां लिए हम प्रातःकाल का आनंद उठाने बैठ गए। जो अप्रतिम दृश्य कुछ क्षण पूर्व देखा, उसके विषय में चर्चा करने लगे। पर्वत श्रंखलाओं की चोटियों द्वारा सूर्य की किरणों का ऐसा स्वागत देख पाना जीवन की एक अद्वितीय उपलब्धि ही है।

बिनसर के पर्वत शिखर

हिमालय की नंदा देवी श्रंखला
हिमालय की नंदा देवी श्रंखला

बिनसर के हिमालय पर्वत श्रंखला की विलक्षण चोटियों को देखना हो तो सर्वोत्तम प्रातःकाल है। २०० से ३००कि.मी. की दूरी तक फैले हिमालय पर्वत शिखर के अवलोकन हेतु दूरबीन तथा स्वच्छ धुंधरहित वातावरण की आवश्यकता है। इन पर्वत श्रंखला की चोटियों को पहचानने के लिए कुमाऊँ मंडल विकास निगम के अथिति गृह की स्मारिका दुकान में उपलब्ध कासद का भी उपयोग किया जा सकता है। इसमें सभी पर्वत शिखरों के नाम, स्थिति व उनके विषय में संक्षेप में जानकारी दर्शाई गयी है। बिनसर से दृष्टिगोचर कुछ पर्वत शिखर इस प्रकार हैं-

नंदा देवी पर्वत शिखर

हिमालय पर्वत की नन्दा देवी श्रंखला
हिमालय पर्वत की नन्दा देवी श्रंखला

आप सब जानते हैं कि भारतीय स्थित हिमालय पर्वत श्रंखला के भाग का सर्वोच्च शिखर कंचनजंगा है जो सिक्किम नेपाल सीमा पर पड़ता है। इसका सर्वोत्तम दर्शन सिक्किम के रिन्चेंपोंग से प्राप्त होता है। इसी तरह भारतीय धरती पर दूसरी सर्वोच्च पर्वत चोटी है यह नंदा देवी पर्वत शिखर जिसका सर्वोत्तम दर्शन यहाँ बिनसर से प्राप्त होता है। नंदा देवी को इस क्षेत्र की संरक्षक तथा अधिशासी देवी माना जाता है। नंदा देवी पर्वत पूर्व-पश्चिम दिशा में स्थित है तथा इसकी ऊंचाई लगभग २०००० फीट है। इतनी ऊंचाई के अन्य पर्वतों से इसकी तुलना की जाय तो यह सर्वाधिक ढालुआँ पर्वतों में से एक है। नंदा देवी पर्वत के विषय में आपको विकिपीडिया से और अधिक जानकारी प्राप्त हो सकती है।

बिनसर से दिखने वाले अन्य हिमालय पर्वत शिखर
1. कामेट
2. नंदा गुंटी
3. त्रिशूल १, २, ३
4. मृगतुनी
5. मैक्तोली
6. नंदा देवी
7. पन्वाली द्वार
8. नंदा देवी पूर्व अथवा सुनंदा देवी
9. नंदा खाट
10. छंगुच
11. लप्सा धुर
12. दांगथल
13. रालाम दर्रा
14. राजरम्भा
15. नाग लाफु
16. पन्छुली समूह
17. नाम्पा
18. पोरबंदी
19. केदारनाथ
20. कर्चा कुंड
21. चौखंबा (बद्रीनाथ) – ४ शिखर
22. नीलकंठ
23. पिंडारी हिमनद

बिनसर में ‘होटल्स’ एवं ‘रिसॉर्ट्स’- कुमाऊँ मंडल विकास निगम का अथिति गृह

कुमाऊँ मंडल विकास निगम विश्राम गृह - बिनसर
कुमाऊँ मंडल विकास निगम विश्राम गृह – बिनसर

यूँ तो बिनसर पहाड़ी के तल पर कई उच्च तथा माध्यम श्रेणी के अतिथिगृह एवं ‘रिसॉर्ट्स’ उपलब्ध हैं। तथापि हिमालय पर्वत श्रंखला का सर्वोत्तन दृश्य कुमाऊँ मंडल विकास निगम के अथिति गृह से ही प्राप्त होता है। यह अतिथिगृह बर्फीली चोटी युक्त नंदादेवी पर्वत के समक्ष स्थित पहाडी की चोटी पर निर्मित है।

अत्यंत मूलभूत सुविधाओं युक्त यह अथितिगृह थोडा जीर्ण अवस्था में है जिसे रखरखाव की आवश्यकता है। प्रकृति से जोड़ने के प्रयत्न में पहले यहाँ बिजली की सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी। रोशनी के लिए प्रत्येक कक्ष में मोम अथवा तेल के दीपक दिए जाते थे। वर्ष भर ठण्ड रहने के कारण पंखों की आवश्यकता नहीं पड़ती। अब शाम के समय कुछ घंटों के लिए बिजली दी जाती है। स्नान के लिए गर्म जल केवल प्रातः बाल्टियों में मिलता है। भोजन कक्ष नया बना विशाल कक्ष है जिसके ऊंचे झरोखों से प्रकृति का मनोरम दृश्य दिखाई पड़ता है। अधिकतर कमरों से भी हिमालय तथा घाटियों के मनोरम दृश्यों का आनंद उठाया जा सकता है।

यहाँ उपलब्ध भोजन सादा तथा स्वादिष्ट था। इस अतिथिगृह के आस पास अन्य कोई भोजन की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

प्रातःकाल छत पर बैठकर प्रकृति का आनंद चौगुना हो जाता है जब कडकडाती ठण्ड में बैरा आपके हाथ में गर्म गर्म चाय की प्याली थमा जाता है। अथितिगृह से कोई शिकायत रही भी तो वह उस समय छू मंतर हो जाती है। गर्म चाय की चुस्की लेते हिमालय की बर्फीली चोटियों को निहारने का आनंद केवल यहीं प्राप्त होता है।

बिनसर में हिमालय पर्वत श्रंखला को निहारने तथा जंगल में पदयात्रा करने के अतिरिक्त अन्य कोई मनोरंजन उपलब्ध नहीं है। अतः यहाँ समूह में यात्रा करना अधिक मनोरंजक होता है। यहाँ ठहरने के लिए १-२ दिन पर्याप्त हैं। यद्यपि वनस्पति शास्त्र, पशु-पक्षियों तथा प्रकृति में विशेष रूचि रखने वाले पर्यटक अधिक दिनों तक यहाँ रहकर अपनी ज्ञान पिपासा को पोषित कर सकते हैं।

बिनसर के लिए यात्रा सुझाव

हिमालय की चोटियाँ
हिमालय की चोटियाँ

• बिनसर पहाडी अधिक ढालुआँ होने के कारण चढ़ने हेतु “ ४ व्हील ड्राइव” युक्त मोटर का ही इन्तेमाल करें।
• “ जीरो पॉइंट” तक की पदयात्रा हेतु परिदर्शक की आवश्यकता नहीं है। हमारे परिदर्शक ने ३०० रुपये भी लिए और कुछ जानकारी भी नहीं दी। इसके विपरीत वह यह पदयात्रा जल्द से जल्द पूर्ण करने हेतु हमारे ऊपर जोर डाल रहा था।
• यदि आप कुमाऊँ मंडल विकास निगम के अथिति गृह में ठहरना चाहते हैं तो आप कई दिवस पूर्व ही कक्षों का आरक्षण करावा लें।
• यदि आपको पैदल चलने में असुविधा है तो आप“ जीरो पॉइंट” तक की पदयात्रा की योजना त्याग सकते हैं। अथितिगृह की छत से हिमालय का सर्वोत्कृष्ट दृश्य का आनंद अवश्य उठा सकते हैं।
• यदि आप अन्य किसी अथितिगृह में ठहरना चाहते हैं तो आपके अथितिगृह के समीप हिमालय अवलोकन हेतु सर्वोत्तम स्थल की जानकारी उनसे प्राप्त कर लें।
• बिनसर में शीत ऋतू में कडाके ठण्ड तो होती ही है, ग्रीष्म ऋतू में भी वातावरण ठंडा प्रतीत होता है, विशेषतः प्रातःकाल की बेला में। अतः ऋतु के अनुसार पर्याप्त ऊनी कपडे साथ लेकर जाएँ।
• हिमालय की बर्फीली चोटियों के अवलोकन हेतु दूरबीन साथ रखना अत्यंत सहायक होगा।
• हिमालय की बर्फीली चोटियों के अवलोकन हेतु सूर्योदय पूर्व, प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। तत्पश्चात धुंद तथा आर्द्रता के कारण चोटियाँ स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ती।
• बिनसर में तन्तुरहित प्रक्षेपण कमजोर होने के कारण मोबाइल कार्य नहीं करते। अतः अल्मोड़ा से आगे जाने से पूर्व ही अपने बंधू-बांधवों को अपने सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्रदान करें।

उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में पर्यटन हेतु अन्य स्थलों के विषय में अधिक जानकारी प्रदान करते मेरे अन्य संस्मरण-
1. कुमाऊँ घाटी की रहस्यमयी झीलें-भीमताल, सातताल, नौकुचिया ताल
2. मुक्तेश्वर धाम – कुमाऊँ पहाड़ों के न भूलने वाले दृश्य

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

4 COMMENTS

  1. अनुराधा जी,
    बहुत ही सुंदर आलेख। वैसे भी कुमाऊॅं क्षेत्र अपने नैसर्गिक सौंदर्य ,पर्यावरण, हिमालय की मीलों लंबी पर्वत श्रंखला के चित्ताकर्षक परिदृश्यों के लिये विश्व विख्यात हैं ।आलेख पढ़ते हुए , वर्षों पूर्व की गई अल्मोड़ा-कौसानी-रानीखेत यात्रा के दृश्य जिवंत हो उठे। हिमालय की पर्वत श्रंखलाओं के बीच से निकलता हुआ सूर्य , बर्फीली चोंटीयों पर जो स्वर्णिम आभा बिखेरता हैं वह दृश्य वास्तव में अविस्मरणीय होता हैं ।
    सुंदर अनुवादित आलेख,बरबस ही कुमाऊॅं परिक्षेत्र की पुन: यात्रा की ईच्छा को प्रबल करता हैं ।
    धन्यवाद.

  2. धन्यवाद प्रदीप जी. अब इच्छा जागृत हुई है तो हिमालय में बैठे देवतागण अवश्य आपको निमंत्रण देंगे एक बार फिर हिमालय की गोद में आने का।

  3. लगभग मैं पूरा हिमाचल घूम चुका हूँ, पर उत्तराखंड में सिर्फ मैं मुक्तेश्वर तक ही जा पाया हूँ, यह सब पढने के बाद मुझे जल्द से जल्द इच्छा हो रही है बिनसर जाने की..
    धन्यवाद !

    • निशांत, अगर आपको हिमाचल और उत्तराँचल के पहाड़ प्रिय हैं, तो बिनसर जाना तो बनता है। इस यात्रा में हम बिनसर तक ही जा पाए थे, अगली बार उसके आगे जाने की इच्छा है।

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