होरी ठुमरी – रंगों में सराबोर करते होली के चंचल गीत

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होली! जी हाँ रंगों, अठखेलियों तथा उत्साह से भरपूर वसंत का पर्व जो सबके अन्तरंग तथा बहिरंग को रंगों भरी खुशियों से भर देता है। यह पर्व हमारे जीवन के विभिन्न आयामों जैसे संस्कार,धर्म, परंपरा, प्राचीनता तथा साथ ही प्रफुल्लता का मनमोहक सम्मिश्रण है। रंगों के इस पर्व को विभिन्न कलाकारों ने अनेक वैभवशाली कलाकृतियों द्वारा अभिव्यक्त किया है। इन्ही में से एक अप्रतीम कलाकृति है ठुमरी।

होरी ठुमरी यूँ तो होली भारत के हर क्षेत्र में विभिन्न स्तर पर मनाई जाती है। तथापि भारत के उत्तरी भागों में यह अत्यधिक धूमधाम से मनाई जाती है। रंगों का मानो सैलाब सा छा जाता है। परिजनों, मित्रों तथा पड़ोसियों संग बैठकर नमकीन, मिष्टान तथा ठंडाई का स्वाद लिया जाता है। कुछ लोग ठंडाई को भांग से भी लैस कर  लेते हैं। और फिर आरम्भ होती है, ढोलक की थाप पर, रंगों में डूबे होली के गीतों की श्रंखला।

उपरोक्त उल्लेख को पढ़कर आप के समक्ष कई चित्रपटों में चित्रित होली के गीतों की कड़ी उभर कर आ गयी होगी। चित्रपटों में इन गीतों की आवश्यकता हो या न हो, ये गीत चित्रपटों को चार चाँद अवश्य लगा देते हैं। डॉन, सिलसिला, कटी पतंग, शोले, ऐसे कई चित्रपट हैं जिनमें होली के रंगों में सराबोर गीतों को अत्यंत सुन्दरता से चित्रित किया गया है। इन गीतों से आप भलीभांति परिचित होंगे। अतः मैं इस संस्मरण में चित्रपटों में चित्रित होली के गीतों का उल्लेख नहीं करना चाहती। अपितु मैं होली के गीतों के उस भण्डार की यहाँ चर्चा करना चाहूंगी जिनसे आप में से कई अनभिज्ञ होंगे। ठुमरी!
जी हाँ ठुमरी!

इस अर्ध-शास्त्रीय गायन शैली में भी कई रचनाएँ हैं जो होली के विभिन्न आयामों को सुन्दरता से प्रस्तुत करती है। ठुमरी एक ऐसी गायन शैली है जो प्रेम के भिन्न भिन्न अभिव्यक्तियों से सम्बंधित है, जैसे प्रणय, छेड़छाड़, श्रृंगार, कामुकता, रूठना, मनाना, ईर्ष्या, तड़प, विछोह इत्यादि।

ख़याल जैसे शुद्ध शास्त्रीय गायन शैली से विपरीत, ठुमरी शैली में प्रस्तुति की काव्यात्मकता पर अधिक महत्त्व दिया जाता है। अधिकतर ब्रज अथवा अवधी भाषा में छंदबद्ध ठुमरी में काव्य तथा उसकी अलंकृति को गायक चार चाँद लगा देते हैं जब वे छंदों के भागों की विभिन्न भावनाओं तथा सुरों द्वारा पुनरावृत्त करतें हैं। शब्दों के अर्थ तथा पृष्ठभागीय भावनाओं को अलंकारों द्वारा पिरोते हैं तथा एक भिन्न परिवेश से हमारा परिचय कराते हैं।

होरी के रंग - ठुमरी के संग
होरी के रंग – ठुमरी के संग

ठुमरी गायकी में अधिकतर सरल रागों का प्रयोग किया जाता है। उदाहरणतः मेरा प्रिय राग खमाज, काफी, सर्वप्रिय राग देस, पीलू, गारा, पहाड़ी, भैरवी इत्यादि। अधिकांशतः ठुमरी शैली पूर्णतः किसी एक राग पर आधारित नहीं रहती। अतः इसे मिश्र राग भी कहा जाता है। इसे मध्यम तथा द्रुत लय में अभिव्यक्त किया जा सकता है। गायक प्रस्तुति के समय सुरों से अठखेलियाँ करते तत्काल नवीन रचनाएँ भी प्रस्तुत कर देते हैं। रूपक, दीपचंडी, दादरा इत्यादि अधिकतर उपयोग में लाये जाने वाले ताल हैं।

होली अथवा होरी ठुमरी अधिकांशतः राधा एवं कृष्ण की रासलीलाओं पर आधारित हैं। किस प्रकार कृष्ण राधा तथा गोपियों के संग रास रचाते, अठखेलियाँ करते थे तथा बालक्रीडाओं द्वारा उन्हें सताते भी थे। सम्पूर्ण ठुमरी में प्रेम के प्रत्येक आयाम को सुन्दरता से छुआ जाता है। कभी प्रेम की अभिव्यक्ति तो कभी लज्जा, कभी रूठना मनाना तो कभी ईर्ष्या, प्रेम में कभी विछोह तो कभी मिलन!

होरी ठुमरी – होली पर आधारित कुछ उत्तम शास्त्रीय प्रस्तुति

१. होली की ठुमरियों में होली के रंग

आईये होली पर आधारित इन ठुमरियों का आरम्भ हम बनारस घराने की पंडिता सिद्धेश्वरी देवी द्वारा राग काफी में प्रस्तुत एवं दीपचंडी ताल में निबद्ध ठुमरी से करते हैं। उड़त अबीर गुलाल, लाली छाई रे…

इस ठुमरी में होली का परिदृश्य प्रस्तुत किया गया है। चारों ओर उड़ाए लाल रंग के अबीर/गुलाल ने सर्व परिवेश को लालिमा से ढँक दिया है। विशाल अम्बर, यमुना का जल, श्याम वर्ण कृष्ण, उनके आभूषण, यहाँ तक की उनके श्वेत मोतियों का हार भी लालिमा में सराबोर हैं।

उड़त अबीर गुलाल, यही ठुमरी पंडिता सिद्धेश्वरी देवी की सुपुत्री एवं शिष्या सविता देवीजी ने भी गायी है। उनकी गायकी की शैली सिद्धेश्वरीजी की शैली से मेल खाते हुए भी तात्कालिक आशुरचनाओं में भिन्नता लिए हुए होती है।

ठुमरी की चर्चा हो तो पंडिता गिरिजा देवी का नाम सहज ही मानसपटल पर उभर कर आ जाता है। समकालीन शास्त्रीय गायन में ठुमरी शैली की वरिष्ठ तथा सर्वप्रतिष्ठित गायिका हैं गिरिजा देवीजी। उन्होंने इसी ठुमरी उड़त अबीर गुलाल को राग गारा में अत्यंत सुमधुर प्रकार से प्रस्तुत किया। उन्ही की गाई इस ठुमरी का अभूतपूर्व आनंद प्रदान करने हेतु प्रस्तुत है यह विडियो.

साथ ही आनंद उठाईये पंडिता गिरिजा देवी की प्रसिद्ध एवं पांडित्य-प्राप्त शिष्या मालिनी अवस्थी द्वारा ठुमरी प्रस्तुति।

होली एक सर्वप्रिय बहुआयामी विषय होने के कारण इस पर आधारित कई ठुमरियां हैं। प्रस्तुत उन्ही में से एक और अतिप्रसिद्ध ठुमरी जिसे प्रस्तुत किया है बनारस घराने की महारथी पंडिता शोभा गुर्टूजी। होली के रंगों की छटा बिखेरती इस ठुमरी का मुखड़ा है आज बिरज में होली रे रसिया..

२. होली पर्व में आनंदोत्सव मनाते कृष्ण पर ठुमरी

कैसी ये धूम मचायी कन्हैय्या, इस ठुमरी में कृष्ण राधा एवं गोपियों संग होली खेलते धूम मचा रहे हैं। गोपी राधा के मुख से कृष्ण के गुणगान थम नहीं रहें हैं। इस सुन्दर दृश्य को राग जिला काफी में सुन्दरता से प्रस्तुत किया है सुरों की देवी सुश्री बेगम अख्तर ने।

इसी ठुमरी की विस्तृत एवं जीवंत प्रस्तुति पंडित जसराजजी के सुमधुर सुरों में यहाँ प्रस्तुत है। यह प्रस्तुति उन्होंने सुश्री बेगम अख्तर जी के सम्मान में की थी।

आईये अब आनंद उठाते हैं एक अत्यंत मनोहारी जुगलबंदी की। राग जिला काफी में इसी होरी ठुमरी की जुगलबंदी प्रस्तुति की है जहां पंडिता गिरिजा देवीजी की गायकी को उस्ताद अमजद अली खान अपने सरोद द्वारा चार चाँद लगा रहे हैं।

३.राधा संग होली खेलने आगे आते कृष्ण

यह मेरे प्रिय होरी ठुमरियों में से एक है जिसे राग खमाज में जयपुर-अत्रौली घराने की सुरश्री उपाधि प्राप्त केसरबाई केरकर ने अपने सुरों से अलंकृत किया है। आये श्याम मोसे खेलन होली, इस ठुमरी में राधा बखान कर रही है कि किस प्रकार कृष्ण अपनी पिचकारी को रंगों से भरकर उनकी ओर आ रहे हैं। वे राधा को रंगों में सराबोर करने हेतु आतुर हैं।

४.कृष्ण संग होली खेलने आतुर राधा

सुश्री बेगम अख्तर की होरी खेलन कैसे जाऊं, यह राग पीलू पर आधारित एक सुमधुर प्रस्तुति है जहां राधा कृष्ण संग होली खेलने हेतु आतुर हैं। किन्तु लज्जा वश वे आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। वे अपनी यह व्यथा सखी सम्मुख रखती उससे पूछ रही हैं कि..

प्रस्तुत है इसी होली ठुमरी का एक और रूप पंडिता शोभा गुर्टू के स्वरों में-

पंडिता शुभा मुद्गल की इस होरी ठुमरी कन्हैय्या घर चलो मोरी में राधा, कृष्ण संग होली खेलने की इच्छा के कारण अपनी सखियों की मनुहार कर रही हैं कि वे उनके संग कृष्ण के घर चलें।

५. कृष्ण संग होली खेलती राधा

रंग डारूंगी डारूंगी नन्द के लालने पे, राधा अत्यधिक उत्साहित है अपने पिया संग होली खेलने हेतु। वे कृष्ण को चुनौती पूर्ण आमंत्रण दे रही हैं। इसी भाव प्रस्तुत कर रहे हैं बनारस घराने के पंडित छन्नूलाल मिश्राजी

यहाँ मालिनी अवस्थीजी ने भी इसकी अत्यंत मनोहारी प्रस्तुति की है।

६.रंग में सराबोर राधा

राग पहाड़ी में पंडिता शोभा गुर्टूजी का गाया सुमधुर होली गीत, रंगी सारी गुलाबी चुनरिया रे, राधा की चिंता दर्शाता है। उन्हें कृष्ण ने पहले ही गुलाबी रंग से भिगो दिया है तथा उनका जी अब भी भरा नहीं है। वे और अधिक रंग लिए उनकी ओर बढ़ रहे हैं।

अद्भुत प्रतिभा की धनी सुश्री कौशिकी चक्रबर्ती ने भी इस ठुमरी की अत्यंत मनोहारी प्रस्तुति की है। यद्यपि राग वही है, तथापि अत्यंत भिन्न रस लिए हुए है यह ठुमरी।

मालिनी अवस्थी द्वारा प्रस्तुत यही ठुमरी लोकगीत की शैली में है।

इस जीवंत चित्रीकरण में पंडित शुजात खान ने ठुमरी गाते हुए अपना ही साथ सितार पर दिया है।

७.होली खेलते राधा कृष्ण

सारी डार गए मो पे रंग की गागर, इस ठुमरी में राधा कृष्णा के अन्तरंग होली के दृश्य को सुन्दरता से प्रस्तुत किया गया है। पंडित ज्ञान प्रकाश घोष द्वारा रचित इस द्विभाषी ठुमरी को राग खमाज में उन्ही के शिष्य पंडित अजय चक्रबर्ती अत्यंत मधुरता से गाया है। दुर्भाग्य से यह प्रस्तुति अकस्मात् ही अंत हो गयी है।

तत्पश्चात इसी ठुमरी की दूसरी आवृत्ति अर्थात् इसका बंगाली संस्करण, केनो भिजाले रोंगों, भी एक होरी ठुमरी है।

८.त्रस्त राधा कृष्ण से और ना रंगने की प्रार्थना करती है।

कृष्णा द्वारा ओजपूर्ण होली खेलने के पश्चात राधा थक चुकी है तथा कृष्ण से प्रार्थना कर रही है कि वे उन्हें और अधिक ना रंगें।

इन्ही भावों को दर्शाती ठुमरी का एक मधुर ध्वन्यालेखन किया गया है सोलापुर की मेहबूबजान के मधुर स्वरों में। ना मारो पिचकारी गोपाल, राग खमाज पर आधारित है। यह ध्वन्यालेखन सन १९३६ में किया गया था जहां राधा कृष्णा को और रंग खेलने से रोक रही है।

इन्ही भावों को पंडिता सिद्धेश्वरी देवी ने भी इस ठुमरी में मधुरता से प्रस्तुत किया है, जी ना मारो पिचकारी रंग की.

उसी प्रकार से पंडित कुमार गन्धर्वजी ने भी राग भैरवी में एक अत्यंत भिन्न रचना अपने सुमधुर सुरों में सजा कर यहाँ प्रस्तुत किया है, ना मारो भर पिचकारी.

९.होली में दंग मोहन

होली खेलने में दंग मोहन की लीलाओं की राग अदाना में सुन्दरता से व्याख्या करती ग्वालियर घराने की स्व. पंडिता वीणा सहस्रबुद्धे का अनुभव लेने हेतु सुनें, होरी होरी खेलत नंदलाल

मेवाती घराने के पंडित संजीव अभ्यंकर के विषय में तो आपने अवश्य ही सुना होगा। वे कदाचित सुर महारथी पंडित जसराज जी के सर्वप्रिय शिष्य है । आईये उन्ही के सुमधुर स्वरों का आनंद उठायें राग तिलंग पर आधारित इस होरी ठुमरी का, मोहन खेलत होरी

१०.विशुद्ध शास्त्रीय होरी ठुमरी

पटियाला घराने के एक वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित गायक हैं उस्ताद बड़े गुलाम अली खान साहिब। जितनी मजबूत पकड़ उनकी ख़याल गायकी में है उतनी ही महारथ उन्हें होरी ठुमरियों में भी हासिल है। अपनी अद्भुत घुमावदार तानों द्वारा उन्होंने इस होरी को सर्वोच्च स्तर पर पहुंचा दिया है। आईये सुनते हैं राग देस पर आधारित उनकी गाई ठुमरी, होरी खेलन जाऊं

किराना घराने के पंडित भीमसेन जोशीजी से कोई हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत प्रेमी अनभिज्ञ नहीं है। हमारा सौभाग्य है कि अपने जीवन में उनकी गायकी का आनंद उठाने का अवसर हम सब को प्राप्त हुआ है। आईये प्रस्तुत है राग काफी पर उनकी ठुमरी, होरी खेलत नंदकुमार

पारितोषिक: होरी गायकी के विभिन्न प्रकार

निम्न विडियो में पंडित छन्नूलाल मिश्र होरी गायकी के भिन्न भिन्न प्रकारों की व्याख्या कर रहे हैं।

यूँ तो सुमधुर होरी ठुमरियों की सूची अनंत है। तथापि कुछ ही ठुमरियां जिव्हा पर सहज उपलब्ध हैं। कईयों के विडियो भी उपलब्ध नहीं हैं।

आईये यहाँ आनंद उठाते हैं एक अनोखी होरी की। पंडित छन्नूलाल मिश्राजी प्रस्तुति, खेले मशाने में होली दिगंबर – शिव की होरी।

तो पाठकों, कैसे रही होली! इन सर्व ठुमरियों में से कौन कौन सी ठुमरियां आपकी प्रिय होरी है? निम्न टिप्पणी खंड में अवश्य लिखें।

यदि यह ठुमरियों का संग्रह आपके ह्रदय को छूने में सक्षम हो जाय तो इसे अन्य रसिकों, मित्रों व परिजनों तक पहुंचाने में अवश्य किंचित कष्ट करें।

होली की शुभकामनाएं!!


यह आदित्य सेनगुप्ता द्वारा प्रदत्त अथिति संस्करण है। मेरे मित्र आदित्य की वाचन, संगीत, पाकशास्त्र, इतिहास तथा विरासती धरोहरों में विशेष रूचि है। इन रुचियों की आपूर्ति हेतु वे विभिन्न स्थलों की यात्रा करते रहते हैं। व्यावसायिक रूप से वे एक बंगलुरु निवासी वैज्ञानिक हैं।


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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