श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर की उत्कृष्ट विशेषताएं एवं दर्शनीय स्थल

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जगन्नाथ पुरी भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है। भारत के पूर्वी तट पर स्थित यह धाम भगवान विष्णु के अखिल ब्रम्हांड नायक स्वरूप को समर्पित है। उन्हे भगवान विष्णु का वह स्वरूप माना जाता है जो वर्तमान में व्याप्त कलयुग के लिए उत्तरदायी हैं। यह तथ्य इस तीर्थ को वर्तमान समय में और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। आदि शंकराचार्यजी ने भी पूर्वी गोवर्धन मठ की स्थापना करने के उद्देश्य से इसी स्थान का चयन किया था। पूर्वी गोवर्धन मठ उन ४ मठों में से एक है जिनकी स्थापना आदि शंकराचार्यजी ने भारत के चार दिशाओं में की थी।

रथ यात्रा के समय जगन्नाथ पुरी  मंदिर
रथ यात्रा के समय जगन्नाथ पुरी मंदिर

अनेक मापदंडों के अनुसार जगन्नाथ पुरी भारत के विशालतम जीवंत मंदिरों में से एक है। कलिंग वास्तु शैली का यह सबसे बड़ा मंदिर है। आकार में कोणार्क का सूर्य मंदिर भले ही इससे स्पर्धा करता हो किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से वह मंदिर हम खो चुके हैं। जगन्नाथ पुरी मंदिर का रसोईघर सम्पूर्ण विश्व में किसी भी मंदिर परिसर में स्थित रसोईघर से अधिक विशाल है। जगन्नाथ जी का अन्न क्षेत्र, इसका यह नाम सही मायने में इसे शोभता है तथा अपने वाच्यार्थ का सत्य स्वरूप है।

अनंतकाल से पुरी नगरी का जीवन जगन्नाथ मंदिर के चारों ओर ही केंद्रित है। यूँ तो इस मंदिर में वर्ष भर भक्तों का तांता लगा रहता है, किन्तु आषाढ़ मास में यहाँ भक्तगणों की संख्या चरम सीमा पर रहती है जब जगन्नाथ जी की जगप्रसिद्ध रथयात्रा निकाली जाती है। इस मंदिर नगरी में जब मैंने कुछ दिवस व्यतीत किए थे तब मैंने दो बार मंदिर के दर्शन किए थे तथा पुरी नगरी के अन्य दर्शनीय स्थलों का भी भ्रमण किया था। इस यात्रा संस्मरण में मैं मुख्यतः मंदिर के विषय पर ही केंद्रित रहना चाहती हूँ। पुरी नगरी के अन्य दर्शनीय स्थलों के विषय में भिन्न संस्करण प्रस्तुत करूंगी।

जगन्नाथ मंदिर का संक्षिप्त इतिहास

ऐसी मान्यता है कि जगन्नाथ के मूल मंदिर का निर्माण सतयुग में राजा इंद्रद्युम्न ने करवाया था। सतयुग काल के प्रमाण खोजना व्यर्थ है। किन्तु इंद्रद्युम्न सरोवर नामक एक सरोवर अब भी पुरी नगरी में स्थित है।

श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर
श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर

जगन्नाथ मंदिर से संबंधित कथा सर्वविदित एवं सर्वस्वीकृत है। इस कथा के अनुसार भगवान विष्णु इस क्षेत्र के वनों में मूलतः नील माधव के नाम से पूजे जाते थे। इंद्रद्युम्न मालवा के राजा थे। उन्होंने विद्यापति नामक एक ब्राह्मण को नील माधव को खोजने की आज्ञा दी। ब्राह्मण ने उस क्षेत्र के मुखिया की पुत्री से विवाह कर उस स्थान की जानकारी प्राप्त कर ली जहां नील माधव थे। किन्तु भगवान की लीला निराली है। उन्हे यह स्वीकार्य नहीं था कि ब्राह्मण उन्हे खोजे।

अंततः भगवान विष्णु की आज्ञा पाकर राजा इंद्रद्युम्न यहाँ आए तथा उनका बताया हुआ लकड़ी का लठ्ठा प्राप्त किया। इस लठ्ठे से जगन्नाथ, बलराम एवं सुभद्रा की प्रतिमाएं बनायी गईं। एक सुदर्शन चक्र भी उत्कीर्णित किया गया। तत्पश्चात राजा ने पहाड़ी के ऊपर मंदिर की स्थापना की।

एक अन्य किवदंती के अनुसार देवलोक के शिल्पकार विश्वकर्मा ने मूर्ति गढ़ने की स्वीकृति दी किन्तु उस समयावधि में कार्यशाला में किसी के भी प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि किसी भी बाधा की स्थिति में मूर्तियाँ अपूर्ण रह जाएंगी। किन्तु अधीर राजा ने भीतर झाँककर विश्वकर्मा के कार्य में विघ्न उत्पन्न किया जिससे मूर्तियाँ अपूर्ण रह गईं। विश्वकर्मा ने तब तक विग्रहों के बाहु नहीं बनाए थे।

प्राप्त अभिलेखों के अनुसार कम से कम १२वीं शताब्दी से मंदिर अस्तित्व में था। उत्कल क्षेत्र के सभी राजवंशों ने अपने अपने शासनकाल में इसकी देखरेख एवं अनुरक्षण किया।

इस मंदिर पर विभिन्न आक्रमणकारियों ने बारम्बार आक्रमण किये। औरंगजेब के आदेशानुसार यह मंदिर १५ वर्ष बंद रखा गया था। उसकी मृत्यु के उपरांत ही यह मंदिर पुनः खुल पाया था।

जगन्नाथ पुरी मंदिर की वास्तुकला

जगन्नाथ पुरी मंदिर कलिंग वास्तुकला की देउल शैली पर आधारित है। जगमोहन तथा गर्भगृह के ऊपर एक ऊंचा शिखर इसका प्रमाण है। जब आप गर्भगृह से बाहर आकर मंदिर परिसर में प्रवेश करेंगे तो शिखर का विशाल आकार सहसा आपको अचंभित कर देगा।

अन्य प्राचीन मंदिरों के समान जगन्नाथ मंदिर भी अद्वितीय कलाकृतियों का अप्रतिम संग्रह है जिसके दर्शन कर आप अत्यंत आनंदित हो जाएंगे। इस अद्भुत संग्रह में से कुछ अतुलनीय रत्नों से आपको अवगत कराना चाहती हूँ ताकि जब भी आप इस मनमोहक व नयनाभिराम मंदिर के दर्शन करें तब इन कलाकृतियों के दर्शन करना ना भूलें।

सिंहद्वार का अरुण स्तंभ

यदि आप सिंहद्वार से मंदिर के अन्तः भाग में प्रवेश करेंगे तब आप प्रवेश द्वार के समक्ष एक ऊंचा स्तंभ देखेंगे। यह अरुण स्तंभ है जो मूलतः कोणार्क के सूर्य मंदिर में स्थापित था। कोणार्क मंदिर नष्ट होने के पश्चात इस स्तंभ को यहाँ लाकर पुनः स्थापित किया गया था। भूमि पर खड़े होकर आप देख नहीं पाएंगे किन्तु इस स्तंभ के शीर्ष पर सूर्य देव के सारथी, अरुण की एक प्रतिमा है। ऐसा प्रतीत होता है मानो अरुण भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे उत्कल की धरती पर सूर्य देव की प्रतिष्ठा एवं गौरव को पुनः स्थापित करें।

जगन्नाथ पूरी मंदिर के सिंह द्वार पर अरुण स्तम्भ
जगन्नाथ पूरी मंदिर के सिंह द्वार पर अरुण स्तम्भ

सिंह द्वार मंदिर का पूर्वी प्रवेश द्वार है जो बड़ा डंडा अर्थात् ग्रांड मार्ग पर स्थित है। इसी मार्ग पर प्रत्येक वर्ष रथ यात्रा निकाली जाती है। इसे सिंह द्वार कहने का कारण है, द्वार पर सज्ज दो सिंह। साथ ही द्वार के दोनों ओर भगवान विष्णु के द्वारपाल, जय एवं विजय खड़े हैं। पतित पावन की मूर्ति इस प्रवेश द्वार के दाहिनी ओर देखी जा सकती है। यही तथ्य इस द्वार को अन्य तीन द्वारों से अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। जिन्हे मंदिर में प्रवेश प्राप्त नहीं होता वे इस द्वार से पतित पावन के दर्शन करते हैं।

अश्व द्वार
अश्व द्वार

मंदिर की ओर अग्रसर, प्रसिद्ध २२ सीढ़ियाँ इस द्वार से अपेक्षाकृत अधिक निकट है। ये सीढ़ियाँ भक्तों को मुख्य मंदिर तक ले जाती हैं। इसीलिए भक्तों के हृदय में इन सीढ़ियों के प्रति अत्यंत श्रद्धा का भाव रहता है। रथ यात्रा का आरंभ एवं समापन भी सिंहद्वार पर ही होता है। अतः यह द्वार मंदिर के विभिन्न अनुष्ठानों का प्रवेश द्वार माना जाता है। अन्य तीन प्रवेश द्वार हैं, अश्व द्वार, गज द्वार एवं व्याघ्र द्वार।

जगन्नाथ, बलराम व सुभद्रा

यह तथ्य सर्वविदित है कि हम जगन्नाथ पुरी मंदिर इन तीन बंधु-भगिनी के दर्शन करने ही जाते हैं। किन्तु उन तीनों के विषय में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि उनकी विशाल प्रतिमाएं नीम की लकड़ी का प्रयोग कर बनाई गयी हैं। आप जब भी इनकी प्रतिमा देखें तो यह तथ्य अवश्य ध्यान में रखें। यदि आप प्रत्येक वर्ष जगन्नाथ मंदिर नहीं जाते हैं तो संभव है आपकी प्रत्येक पुरी यात्रा में आप तीनों की भिन्न प्रतिमाएं देखेंगे। हो सकता है आप प्राचीन एवं नवीन प्रतिमाओं में अंतर ना कर पाएं क्योंकि नवीन प्रतिमाएं भी ठीक उसी प्रकार उत्कीर्णित की जाती हैं।

जगन्नाथ सुभद्रा एवं बलभद्र
जगन्नाथ सुभद्रा एवं बलभद्र

आप में से अनेक पाठकों को यह ज्ञात होगा कि जगन्नाथ मंदिर में प्रत्येक १२ – १९ वर्षों में तीनों प्राचीन मूर्तियों के स्थान पर उसी प्रकार की नवीन मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। यह उस वर्ष किया जाता है जिस में अधिक मास अथवा पुरुषोत्तम मास पड़ता है। पुरुषोत्तम मास प्रत्येक १२ से १९ वर्षों के मध्य अधिक मास के रूप में आषाढ़ मास में आता है। नवीन मूर्तियों को एक विस्तृत अनुष्ठान द्वारा स्थापित किया जाता है जिसे नबकलेबर या नवकलेवर कहा जाता है।

मूर्तियों को देखते ही सर्वप्रथम आपकी दृष्टि उनके बड़े बड़े गोलाकार नेत्रों पर पड़ती है। यूँ तो इनकी प्रतिकृतियाँ आपको पुरी नगरी में सर्वत्र दृष्टिगोचर होंगी किन्तु दूर से ही सही, गर्भगृह में प्रत्यक्ष विग्रहों के दर्शन करना किसी दैवी अनुभव से कम नहीं होता। अतः उनकी छवियों को अपने नेत्रों एवं हृदय में अमर कर लें।

गर्भगृह में तीनों भगवानों को जिस पीठिका पर स्थापित किया गया है उसे रत्नवेदी कहते हैं। रत्नवेदी का अर्थ है रत्नों का सिंहासन। रत्नवेदी पर सुदर्शन चक्र, श्री देवी, भू देवी तथा मदन मोहन की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं।

मंगल आरती

प्रातः काल भगवान जगन्नाथ की जो प्रथम आरती की जाती है वह मंगल आरती है। तीनों बंधु-भगिनी को प्रातः निद्रा से उठाने का यह एक विस्तृत अनुष्ठान है। मंदिर के पट खोलने से पूर्व गीत गाकर उन्हे निद्रा से जगाया जाता है। भगवान के प्रथम दर्शन पाने के लिए प्रातःकाल से ही मंदिर में भक्तों की भीड़ लग जाती है। जैसे ही गर्भगृह के पट खुलते हैं, भक्तगण द्वार के समक्ष झुंड लगा देते हैं। भगवान के दर्शन के पश्चात ही वे अपने दिवस का आरंभ करते हैं।

रथ यात्रा के समय जगन्नाथ
रथ यात्रा के समय जगन्नाथ

प्रातःकालीन मंगल आरती में भाग लें अथवा नहीं, यह मेरे जैसे दर्शनार्थियों के लिए अत्यंत कठिन चयन था। अंततः मैंने मंगल आरती में सम्मिलित होने का निर्णय लिया जिसके लिए ब्रह्म मुहूर्त में, प्रातः ४ बजे उठकर मैं अपने अतिथिगृह से सिंहद्वार की ओर चल पड़ी। प्रवेश द्वार पर अपना फोन जमा कर मैंने भीतर प्रवेश किया। मेरी सहायता करने के लिए एक पुरोहित जी आए जो मुझे मुख्य मंडप तक ले गए तथा प्रथम पंक्ति में मुझे खड़ा कर दिया। उषाकाल की उस बेला में भी मंदिर में भक्तों का विशाल समूह उपस्थित था। उस समय मुझे रत्ती भर भी आभास नहीं था कि मंदिर के पट खुलते ही उमड़ते जनसमूह के मध्य खड़ा रहना दूभर होने वाला था।

उषाकाल में मंदिर में उपस्थित दर्शनार्थियों में अधिकतर स्थानीय दर्शनार्थी होते हैं जो यहाँ नियमित रूप से आते हैं, कदाचित प्रत्येक दिवस। उन्हे उमड़ते जनसमूह से आगे जाकर भगवान के दर्शन कैसे पाना है, उसका उत्तम अभ्यास होता है। किन्तु हमारे जैसे अनभिज्ञ दर्शनार्थियों का दम घुटने अथवा कुचले जाने का अंदेशा सदा बना रहता है। बाहर आने का भी कोई मार्ग नहीं रहता। प्रथम पंक्ति में खड़ी होने के कारण मेरी भी यही स्थिति हो गई थी। मंदिर के पट खुलते ही भक्तगणों की भीड़ ऐसी उमड़ी कि कुछ क्षण मेरी बुद्धि निष्क्रिय हो गयी। कुछ क्षणों पश्चात मैने स्वयं को नियंत्रित किया। अतः, यदि आप मंगल आरती में सम्मिलित होना चाहते हैं तो सावधान रहिए तथा सुरक्षित दूरी पर खड़े होइए।

मंदिर के अन्नक्षेत्र में महाप्रसाद

चारों धामों में से पुरी को भगवान का अन्न क्षेत्र कहा जाता है जहां भोजन करना उन्हे अत्यंत भाता है। बद्रीनाथ धाम में भगवान ध्यान करते हैं, रामेश्वरम में वे स्नान करते हैं तथा द्वारका में वे निद्रामग्न होते हैं। इसमें आश्चर्य नहीं है कि सम्पूर्ण विश्व में भगवान के लिए विशालतम रसोईघर जगन्नाथ पुरी मंदिर में ही है। आप यह रसोईघर देख सकते हैं किन्तु लंगर के विपरीत, यहाँ आप सेवा नहीं कर सकते। रसोईघर के दर्शन करने के लिए नाममात्र का प्रवेश शुल्क देना पड़ता है।

पुरी का प्रसिद्द खाजा
पुरी का प्रसिद्द खाजा

रसोईघर के दर्शन का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल है जब मिट्टी के पात्रों में अन्न पकाया जाता है। धोती धारण कर अनेक पुरोहित भाजियों को काटते हैं तथा पंक्तियों में बने पारंपरिक चूल्हों में पक्वान्न बनाते हैं। भगवान के लिए ५६ प्रकार के विभिन्न भोजन पकाये जाते हैं जो बिना प्याज एवं लहसुन के सर्व-शुद्ध सात्विक भोजन होता है। रसोईघर में प्रयोग के लिए जल दो कुओं से लाया जाता है जिनके नाम गंगा एवं यमुना रखे गए हैं। विश्व के किसी भी मंदिर के सबसे बड़े रसोईघर में विभिन्न कार्यकलापों के दर्शन का आनंद उठाना एक अद्वितीय अनुभव है।

प्रातः से रात्रि के मध्य, दिवस भर में छः बार भगवान को भोग चढ़ाया जाता है। जगन्नाथ मंदिर के महाप्रसाद के विषय में अधिक जानकारी यहाँ से प्राप्त करें।

पुरी के जगन्नाथ मंदिर के महाप्रसाद से भरे घड़े सम्पूर्ण दिवस नगर में भिन्न भिन्न स्थानों में ले जाए जाते हैं। यदि आप पुरी नगरी के वासी हैं तो किसी भी पारिवारिक आयोजन के लिए आप मंदिर से भोजन मँगवा सकते हैं। वह चाहे विवाह का उत्सव हो या जन्मदिवस का आशीर्वाद समारोह हो अथवा घर आए किसी अतिथि के लिए भोजन की आवश्यकता हो। मेरा अनुमान है कि महत्वपूर्ण आयोजनों के समय भगवान जगन्नाथ के आशीर्वाद को अपने निवासस्थान में तथा अपने जीवन में आमंत्रित करने की यह पुरी नगरी की रीत हो।

आनंद बाजार

आनंद बाजार वह स्थान है जहां मंदिर की रसोईघर में बना प्रसाद बिक्री के लिए रखा जाता है। यहाँ आने का सर्वोत्तम समय दोपहर है। मेरा विश्वास है कि इससे पूर्व आपने इतनी मात्रा में भोजन अपनी आँखों के सामने सम्पूर्ण विश्व में कहीं नहीं व कभी नहीं देखा होगा। लोग प्रसाद क्रय कर सीधे उस मिट्टी के पात्र से ही खाते हैं जिसमें वह पकाया गया है। यहाँ आप हर प्रकार के मिष्ठान देख सकते हैं। यह एक भीड़भाड़ भरा, कोलाहलपूर्ण एवं अव्यवस्थित बाजार होता है। यह अपने आप में एक निराला बाजार है।

आनंद बाजार के अंतिम छोर पर पहुँचने पर, वहाँ से आप जगन्नाथ पुरी मंदिर का विहंगम रूप देख सकते हैं। उसकी सम्पूर्ण वास्तुकला निहार सकते हैं।

नील चक्र अथवा श्री चक्र

जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर नील चक्र
जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर नील चक्र

मंदिर के शिखर के ऊपर अष्टधातु में बना एक विशाल चक्र है जिसे नील चक्र अथवा श्री चक्र कहते हैं। यह चक्र उतना ही श्रद्धेय है जितना कि गर्भगृह में स्थापित स्वयं भगवान। चक्र के ऊपर फहराते ध्वज को पतित पावन कहते हैं। प्राचीन काल में पुरी की यात्रा के लिए निकले श्रद्धालुओं को सर्वप्रथम इस ध्वज के ही दर्शन होते थे। इस ध्वज की एक झलक उन्हे यह जानकारी देती थी कि वे पुरुषोत्तम क्षेत्र में पहुँच गए हैं तथा उनका गंतव्य तीर्थ स्थल अब निकट ही है। इस क्षेत्र में अनेक यात्रा गीत प्रचलित हैं जिनमें इस ध्वज के प्रथम दर्शन प्राप्त करते ही तीर्थयात्रियों का उमड़ता आनंद स्पष्ट झलकता है।

नव ध्वज आरोहण

मंदिर के शिखर पर फहराता पतित पावन ध्वज एक दिन में अनेक बार बदला जाता है। उस समय सभी दर्शक गर्दन ऊंची कर टकटकी लगाए नवीन ध्वज फहराने के अनुष्ठान को देखते हैं। हम मंदिर में एकादशी के दिवस उपस्थित थे। हमने इसी नवीन ध्वज फहराने के अनुष्ठान को सहस्त्रों भक्तों के संग में देखा था। जगन्नाथ मंदिर का यह भी एक अविस्मरणीय अनुभव है। अतः इसका दर्शन अवश्य कीजिए।

देखें: द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर में नव ध्वज आरोहण

इस ध्वज की एक आश्चर्यजनक विशेषता है कि यह ध्वज वायु के प्रवाह के विपरीत दिशा में फहरता है। यह कैसे संभव होता है कोई नहीं जानता।

जगन्नाथ पुरी संकुल के अन्य मंदिर

जगन्नाथ मंदिर परिसर में अनेक छोटे छोटे मंदिर हैं। लोगों का मानना है कि इनकी संख्या १०८ है। ऐसी मान्यता है कि भारत के सभी तीर्थों के लघु रूप इस परिसर में उपस्थित हैं।

विमला देवी मंदिर – विमला देवी मंदिर इस क्षेत्र का शक्ति पीठ है। उनका मंदिर जगन्नाथ मंदिर के निकट स्थित है। यहाँ स्त्रियाँ देवी को कुमकुम व चूड़ियाँ अर्पित करती हैं। आपके पुरी यात्रा के समय इस मंदिर के दर्शन अवश्य करें। देवी का एक नवीन मंदिर समुद्र तट के समीप स्थित पुरी शंकराचार्य मठ के भीतर भी है।

दैनिक अनुष्ठान के अंतर्गत मंदिर रसोईघर में बना भोग जगन्नाथ के साथ विमला देवी को भी अर्पित किया जाता है। इस भोग को तब तक महाप्रसाद नहीं माना जाता जब तक देवी उस भोग को आशीष ना दे।

महालक्ष्मी मंदिर – ऐसी मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर के रसोईघर में महालक्ष्मी ही भोजन बनाने की प्रक्रिया की निगरानी करती हैं। इस परिसर में उनका अत्यंत सुंदर मंदिर है। विमला देवी के समान ही महालक्ष्मी को भी चूड़ियाँ एवं कुमकुम अर्पित किया जाता है।

मंदिर परिसर के कुछ अन्य मंदिर हैं, कांची गणेश, काशी विश्वनाथ, सूर्य मंदिर, सरस्वती मंदिर, विष्णु के विभिन्न अवतारों को समर्पित मंदिर, हनुमान मंदिर इत्यादि।

मंदिर परिसर में स्तंभों पर आधारित अनेक खुले मंडप हैं। उनमें से मुक्ति मंडप सर्वाधिक लोकप्रिय है। मेरे अनुमान से इनका प्रयोग भक्तों द्वारा विभिन्न अनुष्ठान करने एवं विश्राम करने के लिए किया जाता है। अत्यंत सुंदर तोरण युक्त एक डोला मंडप है जिसका प्रयोग डोला यात्रा के लिए किया जाता है। स्नान वेदी का प्रयोग वार्षिक स्नान उत्सव के समय स्नान यात्रा के लिए किया जाता है।

जगन्नाथ पुरी मंदिर के उत्सव

मंदिर में अनेक विस्तृत दैनिक अनुष्ठान किए जाते हैं जो मंदिर एवं यहाँ के पुरोहितों को सम्पूर्ण दिवस व्यस्त रखते हैं। अनेक उत्सव वार्षिक स्तर पर भी आयोजित किये जाते हैं जिसके लिए विश्व भर से दर्शनार्थी यहाँ आते हैं। उस समय यहाँ का हर्षोल्हास अपनी चरम सीमा पर होता है।

रथ यात्रा के लिए रथ का निर्माण
रथ यात्रा के लिए रथ का निर्माण

रथ यात्रा – पुरी का सर्वाधिक लोकप्रिय उत्सव रथ यात्रा है। अनेक लोग पुरी नगरी को जगन्नाथ मंदिर एवं इस रथ यात्रा से ही जानते हैं जिसमें सैकड़ों भक्तगण तीन अतिविशाल रथों को खींचते हैं। यह उत्सव आषाढ़ मास में आयोजित किया जाता है जो अंग्रेजी पांचाग के जुलाई मास में पड़ता है। प्रत्येक वर्ष इन तीन रथों को नवीन रूप से बनाया जाता है जो स्वयं में एक महत्वपूर्ण व विस्तृत उत्सव है। अनेक प्रकार के कारीगर इसमें भाग लेने के लिए आते हैं। यह यात्रा ९ दिवसों तक चलती है जब तीनों बंधु-भगिनी ३ किलोमीटर की दूरी पर गुंडिचा उत्सव में अपना वार्षिक अवकाश मनाते हैं।

रथ यात्रा के अंतिम दिवस को नीलाद्री बिजे कहते हैं। इस दिन महालक्ष्मी जगन्नाथ को तब तक मंदिर में प्रवेश नहीं करने देती जब तक वे उन्हे एक रसगुल्ला ना खिला दें।

चंदन यात्रा – यह उत्सव अक्षय तृतीया के दिन आयोजित किया जाता है। इस दिन का एक महत्व यह भी है कि इस दिन से तीन रथों की निर्मिती का कार्य भी आरंभ किया जाता है।

स्नान यात्रा एवं अनसरा – वार्षिक स्नान उत्सव ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन आयोजित की जाती है। स्नान के पश्चात तीनों बंधु-भगिनी की मूर्तियों को १५ दिवसों के लिए अनसरा घाट ले जाया जाता है। उस समय जगन्नाथ मंदिर के भीतर, रत्नवेदी पर उनके स्थान पर उनके पट्टचित्र रखे जाते हैं तथा उनकी पूजा अर्चना की जाती है।

और पढ़ें: रघुराजपुर के पट्टचित्र

डोला यात्रा – यह यात्रा होली के पर्व के आसपास आयोजित की जाती है।

पंचका – इस उत्सव में तीनों देवों को भिन्न वेश एवं रूप दिया जाता है।

गुप्त गुंडिचा – विमला देवी का यह १६ दिवसीय उत्सव है जो आश्विन नवरात्रि के आसपास पड़ता है।

जगन्नाथ मंदिर के पुजारियों या पुरोहितों को सेवायत कहते हैं। वे ओडिशा के रंगबिरंगे मनभावन इक्कत के उत्तरीय धारण करते हैं।

जगन्नाथ पुरी के यात्रा सुझाव

केवल हिंदुओं को ही मंदिर के भीतर प्रवेश करने की अनुमति है। इनमें बौद्ध धर्म, जैन धर्म एवं सिख धर्म का पालन करने वाले भक्त भी सम्मिलित हैं। अन्य पतित पावन मूर्ति के दर्शन कर सकते हैं जिसे मंदिर के बाहर से देखा जा सकता है।
मंदिर प्रातः ५ बजे से मध्य रात्रि तक खुला रहता है।

आप मंदिर एवं यहाँ की विभिन्न गतिविधियों के दर्शन करते हुए एक सम्पूर्ण दिवस व्यतीत कर सकते हैं। समय के अभाव में इसे १ से २ घंटों में भी देखा जा सकता है।

आप मंदिर के भीतर फोन जैसे किसी भी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण नहीं ले जा सकते। मंदिर के भीतर प्रवेश करने से पूर्व अपना फोन एवं जूते-चप्पल जमा करना पड़ता है। आप केवल अपना बटुआ ले जा सकते हैं। इन वस्तुओं को जमा करने के लिए एक अधिकारिक खिड़की है। यदि आप आसपास स्थित किसी दुकान से कुछ क्रय करें तो वह भी आपकी जमावस्तु रखने के लिए तत्पर हो जाएगा।

जूते-चप्पल जमा करने की खिड़की के निकट पुस्तकों की एक दुकान है जहां से आप मंदिर एवं पुरी पर आधारित कुछ पुस्तकें क्रय कर सकते हैं।

अधिक जानकारी के लिए मंदिर का यह वेबस्थल देखें।

जगन्नाथ मंदिर में पंडित हरेकृष्ण महापात्रा जी ने मेरा मार्गदर्शन किया था। यदि आप भी उनकी सहायता चाहते हैं तो ९८६११ १०९०५ पर उनसे संपर्क करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

5 COMMENTS

  1. Hello team inditales
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  2. अनुराधा जी, प्राचीन तीर्थ स्थल श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर तथा इसके इतिहास की जानकारी प्रदान करता उत्कृष्ट आलेख । मंदिर की वास्तुकला भी अद्भुत तथा अद्वितीय हैं।आलेख में विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा और स्थापित धार्मिक परम्पराओं का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया हैं ।यह पढ़कर आश्चर्य हुआ कि विश्व में भगवान के लिये विशालतम रसोईघर यहीं पर हैं ।मंदिर के शिखर के ध्वज को बदलने का अनुष्ठान सही में अविस्मरणीय होता हैं,इस अनुष्ठान के प्रत्यक्ष साक्षी होने का सौभाग्य हमें प्रसिद्ध द्वारका धाम में प्राप्त हुआ था ।लेकिन यहां का शिखर ध्वज वायु प्रवाह के विपरीत दिशा में फहराता हैं यह विस्मयकारक हैं, आपने अवश्य ही इसे अनुभव किया होगा ।
    ज्ञानवर्धक जानकारी युक्त आलेख हेतू धन्यवाद !

  3. अनुराधाजी और मीताजी
    आपकी किदवंतियों के साथ अभिव्यक्ति की जो शैली है वह प्रशंसनीय,है आस्तीक होनेकी आपकी भावना आपके लेख मे झलकती है.
    जगन्नाथजी के मंदिर का इतना सुंदर वर्णन दिलको छुने वाला है.मुझेभी जगन्नाथजी,बलराम,और सुभद्राजी के सामने मस्तक झुकाने का सौभाग्य प्राप्त हुवा पर हम वहां बहुत कम समय के लिये और वहभी सुर्यास्त के पश्चात गये थे.
    मंदिर की भव्यता के दर्शन और बारिकी वर्णन हेतु आपको बहुत बहुत धन्यवाद.

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