जंतर मंतर जयपुर की अद्भुत सवाई जयसिंह वेधशाला

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क्या आपकी गणित एवं आकलन इत्यादि विषयों में रूचि है? क्या विज्ञान एवं खगोलशास्त्र आपको प्रेरित करते हैं? तो मेरे पास आपके लिए एक अति उत्तम दर्शनीय स्थल का सुझाव है। जंतर मंतर। जी हाँ! जंतर मंतर जयपुर ऐसा स्थान है जो आपको अपने विद्यार्थी जीवन का स्मरण करा देता है।

यहाँ आते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो आपके ज्यामिति मंजूषा के छोटे छोटे यंत्र, विशाल अवतार ग्रहण कर आपके समक्ष उपस्थित हो गए हैं। एक ओर यहाँ की अर्धवृत्त संरचनायें चांद का स्मरण कराती हैं, तो दूसरी ओर त्रिकोणीय संरचनाएं गुनिया सदृश प्रतीत होती हैं। यंत्रों के ऊपर स्थिन चिन्हांकन मापक-पट्टी का स्मरण कराते हैं तो कुछ यंत्र घूमती पृथ्वी प्रतीत होते हैं। हो सकता है कि विद्यालय की ज्यामिति मंजूषा में उपस्थित यंत्र, जंतर मंतर के यंत्रों का ही लघु रूप हों! आखिरकार जंतर अर्थात् यंत्र तथा मंतर अर्थात् मंत्रणा या गणना, इन्ही के द्वारा ही तो ज्यामिति मंजूषा, अध्ययन में हमारी सहायता करती थी।

जंतर मंतर क्या है?

लघु सम्राट यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
लघु सम्राट यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

जयपुर का जंतर मंतर, राजा सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित कराये गए ५ वेधशालाओं में से एक है। अन्य वेधशालाएं दिल्ली, वाराणसी, उज्जैन एवं मथुरा में स्थापित हैं। जयपुर की वेधशाला इस कड़ी की अंतिम, अतः कदाचित सर्वोत्तम वेधशाला है। इसका निर्माण सन १७२८ के आरंभिक कालावधि में किया गया था एवं २० वीं सदी के अंत में इसका पुनरुद्धार किया गया था। वेधशाला की सूचना पटलों पर इसके निर्माण एवं पुनरुद्धार का सम्पूर्ण विवरण अंकित है। साथ ही उन ज्योतिषाचार्यों के नाम भी अंकित हैं जिन्होंने इन यंत्रों के चिन्हित संख्याओं को प्रमाणित किया था।

जंतर मंतर के यंत्रों के निर्माण में पत्थर, संगमरमर एवं पीतल का उपयोग किया गया है।

जयपुर का जंतर मंतर यहाँ के प्रसिद्ध सिटी पैलेस के निकट एवं हवा महल के पृष्ठ स्थान में स्थापित है। सिटी पैलेस अर्थात् जयपुर के मुख्य राजनिवास के ऊपर गर्व से फहराते, राजा सवाई जयसिंह के ध्वज को आप जंतर मंतर में कहीं भी खड़े होकर निहार सकते हैं। सम्पूर्ण ध्वज के साथ साथ एक चौथाई ध्वज भी फहराया जाता है यदि राजा राजमहल में उपस्थित हों।

जंतर मंतर देखने क्यों जाएँ?

• यह भारत में उपस्थित कुछ ही वेधशालाओं में से एक है।
• इसके निरिक्षण द्वारा खगोलशास्त्र के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष रूप से जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
• यह आपको वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सम्पूर्ण पृथ्वी के दर्शन कराता है। यहाँ यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह जंतर मंतर कवियों को वैज्ञानिक एवं वैज्ञानिकों को कवि प्रतीत कराने में सक्षम है।
• आप सम्पूर्ण ब्रम्हांड के परिप्रेक्ष्य में अपनी स्थिति का आंकलन कर सकते हैं।
• जंतर मंतर विज्ञान एवं खगोलशास्त्र के आधारभूत सिद्धांतों को इतनी सरलता से आपके समक्ष प्रस्तुत करता है कि आप अपने घर में इसे स्वयं निर्मित करने हेतु प्रेरित हो जाते हैं।

जयपुर के स्थानीय ज्योतिषविद, आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन, सूर्यास्त के समय जंतर मंतर के दर्शन अवश्य करते हैं। वे यहाँ आकर आगामी वर्षा ऋतू के आगमन बेला का आकलन करते हैं।

जयपुर जंतर मंतर के यंत्रों के मूलभूत सिद्धांत

आईये इस जंतर मंतर में भ्रमण करते हुए यहाँ स्थापित विभिन्न यंत्रों के मूलभूत सिद्धांतों एवं उनकी कार्यप्रणालियों को समझने का प्रयत्न करें।

सम्राट यंत्र

वृहत सम्राट यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
वृहत सम्राट यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

सम्राट यंत्र अर्थात् यंत्रों के सम्राट! जंतर मंतर में दो सम्राट यंत्र अथवा धूप-घड़ियाँ हैं, एक लघु एवं एक विशाल अर्थात् वृहत्। जंतर मंतर में प्रवेश करते ही आपकी दृष्टि लघु सम्राट यंत्र पर जा टिकती है, जबकि वृहत् सम्राट यंत्र यहाँ से समक्ष स्थित विकीर्ण कोने में स्थापित है। वृहत सम्राट यंत्र की विशेषता यह है कि वह इस परिसर का सर्वाधिक विशाल यंत्र होते हुए सूक्ष्मता एवं उत्कृष्टता का बेजोड़ उदाहरण है।

लघु सम्राट यंत्र एवं वृहत सम्राट यंत्र, ये दोनों धूप घड़ियाँ हैं जिनकी कार्यप्रणाली सामान है। इन यंत्रों में एक त्रिकोणीय भित्त की परछाई इसके पूर्वी तथा पश्चिमी दिशाओं में स्थित चतुर्थांश चापों पर पड़ती है जिससे जयपुर के स्थानीय समय की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इस भित्त का भीतरी कोण २७ अक्षांश उत्तर में होने के कारण यह भित्त उत्तर-दक्षिण दिशा के समानांतर स्थित है। पश्चिम एवं पूर्व चतुर्थांश क्रमशः प्रातः एवं अपरान्ह के समय की जानकारी देते हैं। सही समय की जानकारी हेतु चतुर्थांश चापों को घंटा, मिनट एवं सेकण्ड दर्शाने हेतु योग्य खण्डों में विभाजित किया गया है। लघु सम्राट यंत्र २० सेकंड की सूक्ष्मता एवं वृहत सम्राट यंत्र २ सेकंड की सूक्ष्मता से समय बता सकती है।

कुछ परिदर्शकों का कहना है कि वृहत् सम्राट यंत्र के निर्माण पूर्व, लघु सम्राट यंत्र का प्रायोगिक निर्माण किया गया था।किसी भी धुप भरे उजले दिन, इन यंत्रों पर गिरती सूर्य की परछाई को चतुर्थांश चापों के खण्डों पर निर्विघ्न रूप से सरकते देखने का आनंद अतुलनीय है।

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सम्राट यंत्र का नामकरण पंडित जगन्नाथ सम्राट को समर्पित है जिन्होंने महाराजा सवाई जय सिंह को खगोलशास्त्र के अध्ययन हेतु सहायता की थी। इस कार्य में पंडित केवल रामजी का भी योगदान माना जाता है। खगोलशास्त्र में पांडित्य प्राप्त करने हेतु इन पंडितों ने प्राचीन संस्कृत ग्रंथों एवं वेदांगों के अध्ययन के साथ साथ यूनान, अरब, पुर्तगाल, ब्रिटेन इत्यादि देशों का भी भ्रमण किया था।

ध्रुवदर्शक पट्टिका

ध्रुवदर्शक पट्टिका - जंतर मंतर जयपुर
ध्रुवदर्शक पट्टिका – जंतर मंतर जयपुर

जयपुर के जंतर मंतर में स्थापित सर्व यंत्रों में सर्वाधिक सरल यंत्र है, ध्रुवदर्शक पट्टिका। जैसा की इसका नाम दर्शाता है, यह यंत्र ध्रुव तारे की स्थिति की जानकारी प्रदान करता है। समलम्ब संरचना के इस यंत्र के ऊपर एक पट्टिका है जो समतल के साथ वेधशाला के अक्षांश, २७ अंश उत्तर, का कोण बनाती है। पट्टिका का ऊपरी तल उत्तर ध्रुव की ओर इंगित करता है जहां ध्रुव तारा स्थित है। रात्रि के समय, नीचे के तल में आँख लगा कर यंत्र की ऊपरी सतह की सीध में देखने पर ध्रुव तारा आसानी से देखा जा सकता है। ध्रुवदर्शक चक्र को प्राचीनकाल का दिशा सूचक यंत्र भी कहा जाता था।

जय प्रकाश यंत्र

जय प्रकाश यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
जय प्रकाश यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

यह जयपुर जंतर मंतर का सर्वाधिक विचित्र एवं पहेली सदृश यंत्र है। इस यंत्र में संगमरमर के गोलार्धों की एक जोड़ी धंसी हुई है। श्वेत संगमरमर में बने ये गोलार्ध एक दूसरे के पूरक हैं। यदि इन्हें जोड़ दिया जाय तो ये सम्पूर्ण अर्धगोला बना लेंगे। संगमरमर में कटी प्रत्येक पट्टी एक घंटे को दर्शाती है। अर्थात् प्रत्येक घंटे के पश्चात आप बारी बारी से अर्धगोला बदल कर खड़े हो जाते हैं एवं माप लेते हैं।

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इस विलक्षण यंत्र का केंद्र एक लघु धातु का टुकड़ा है जिसके मध्य एक छिद्र है। इस छिद्र के द्वारा इसे अर्धगोले के मध्य में लटकाया हुआ है। इस टुकड़े के द्वारा अर्धगोले पर बनायी गयी परछाई ही इसके सर्व मापों का आधार है। किनारे को क्षितिज मानकर यह अर्धखगोल का परिदर्शन कराता है।

जय प्रकाश यन्त्र - जयपुर
जय प्रकाश यन्त्र – जयपुर

मुझे यह यंत्र इस जंतर मंतर का सर्वाधिक आकर्षक यंत्र प्रतीत हुआ। लाल पत्थर की पृष्ठभूमि में अर्धगोलाकार बनाती श्वेत संगमरमर की कटी पट्टियां अत्यंत मनमोहक प्रतीत होती हैं। परिदर्शक द्वारा आसान शब्दों में दिए गए व्याख्या को सुन खगोलशास्त्र अत्यंत मनोरंजक एवं रोचक प्रतीत होता है।

कपाली यंत्र

यह जय प्रकाश यंत्र के ही समान यंत्र है। इसमें किनारे को क्षितिज मानकर प्रकाशगोले का परिदर्शन प्राप्त किया जाता है।

नाड़ी वलय यंत्र

नाड़ी वलय यन्त्र - जयपुर
नाड़ी वलय यन्त्र – जयपुर

इस विशेष यंत्र में दो वृत्ताकार सतहें हैं। एक का मुख उत्तर दिशा की ओर तथा दूसरे का मुख दक्षिण दिशा की ओर है। यह सतहें इस यंत्र की अंकपट्टिकाएं हैं। यह सतहें दक्षिण की ओर इस अंश में झुकी हैं कि वे भूमध्य रेखा की सतह के समान्तर हो जाती हैं। अतः इसके केंद्र से निकलती एक छोटी कील सदृश छड़ी पृथ्वी की धुरी के समान्तर हो जाती है। इसी छड़ी की परछाई हमें समय की जानकारी देती है। प्रत्येक सतह तीन वृत्ताकार अंकपट्टिकाओं में विभाजित है, जिनमे दो अंकपट्टिकाएं पाश्चात्य पद्धति से घंटा व मिनट बताती हैं तथा तीसरी हिन्दू समयानुसार घटी एवं पल दर्शाती है।

इस यंत्र की दक्षिणी सतह सूर्य द्वारा शरद ऋतु के विषुव से बसंत ऋतु के विषुव तक प्रकाशित रहती है तथा उत्तरी सतह बसंत ऋतू के विषुव से शरद ऋतू के विषुव तक प्रकाशित होती है। अर्थात् प्रत्येक सतह की कार्यक्षमता वर्ष के छः महीने तक उपयोग में लाई जाती है।

नाड़ी वलय यन्त्र पर संस्कृत अभिलेख - जंतर मंतर जयपुर
नाड़ी वलय यन्त्र पर संस्कृत अभिलेख – जंतर मंतर जयपुर

यंत्र की दक्षिणी सतह पर लिखे संस्कृत के अभिलेख इस नाड़ीवलय यंत्र के संरक्षण एवं नवीनीकरण की कथा कहती हैं। इतने व्यवस्थित तरीके से लिखे इस अभिलेख को पढ़कर अत्यंत प्रसन्नता हुई। आरम्भ में भगवान् गणेश का नमन किया गया है, तत्पश्चात इस यंत्र के उद्देश्य की व्याख्या की गयी है। इसके उपरांत इसके निर्माता पूर्वज की यंत्र सम्बंधित जिज्ञासा का उल्लेख किया गया है। अंत में इसके नवीनीकरण का विवरण अंकित है। इसे देखकर मेरी तीव्र अभिलाषा हुई कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग सरल भाषा में इसका अनुवाद दर्शनार्थियों हेतु उपलब्ध कराये।

राज यंत्र

यहाँ अष्टधातु से बनी एक विशाल लटकती चकती है जिस पर नभमंडल के सर्व नक्षत्र अंकित है। यह एक सम्पूर्ण तारेक्ष अथवा तारक्षवेधयंत्र है।

राज यन्त्र और उसपे लिखा मेरा नाम - अनुराधा
राज यन्त्र और उसपे लिखा मेरा नाम – अनुराधा

हम सब ने राज यंत्र के समीप बहुत आनंद उठाया। हम सब इस यन्त्र पर अंकित नक्षत्रों को ढूँढने का आखेट करने लगे। ज्यों ही मेरी दृष्टी इस यंत्र पर पड़ी, मुझे देवनागरी में लिखा हुआ रोहिणी नक्षत्र दृष्टिगोचर हुआ। कुछ क्षणों के शोध के उपरांत मैंने कई और नक्षत्रों के नाम ढूंढ निकाले। चूंकि मेरा नाम, अनुराधा, भी एक नक्षत्र का नाम है, मैंने इस यंत्र पर उसकी खोज आरम्भ की। गूगल से किंचित सहायता लेने के पश्चात मैंने उसे इस चकती के ऊपरी दायें भाग में खोज निकाला। अपना नाम इस राज यंत्र पर खुदा देख मेरी प्रसन्नता की सीमा न रही। मैं खुशी से झूम उठी।

हमारी जिज्ञासा से हमारे परिदर्शक श्री दिनेशजी अत्यधिक प्रभावित हो गए एवं उन्होंने हमारी जिज्ञासा शांत करने का मानो बीड़ा उठा लिया। इसके पश्चात उन्होंने तीन घंटे लगाकर सम्पूर्ण जंतर मंतर के विषय में हमें समझाने की कड़ी मेहनत की।

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राजयंत्र में उपरोक्त चकती के अलावा लोहे में बनी एक और चकती लटकी हुई है जो संभवतः मुख्य यंत्र का प्रारूप है।
भारतीय तिथिपत्र के आंकलन हेतु प्रत्येक मास में एक बार राजयंत्र का अवलोकन किया जाता है।

राशि वलय यंत्र

राशी वलय यन्त्र का वृश्चिक यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
राशी वलय यन्त्र का वृश्चिक यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

राशिवलय यंत्र द्वारा खगोलीय अक्षांश व देशांतर रेखाओं को मापा जाता है। इसमें उपस्थित १२ यंत्र, १२ राशियों को प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक यंत्र का उपयोग उस समय किया जाता है जब उससे सम्बंधित राशि मध्यान्ह रेखा से पार होती है। यद्यपि प्रत्येक यंत्र की रचना सम्राट यंत्र के सामान है, तथापि ये १२ यंत्र शंकु के आकार एवं कोण के आधार पर भिन्न हैं। राशिवलय यंत्र जयपुर वेधशाला के अतिरिक्त अन्य किसी वेधशाला में उपलब्ध नहीं है।

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इस यंत्र के दर्शन के समय मैं किंचित स्वार्थी हो गयी और केवल स्वयं की जन्म राशि वृश्चिक के यंत्र को ही विस्तार से समझने का प्रयत्न किया।

राम यंत्र

राम यंत्र अत्यंत आकर्षक यंत्र है। दिल्ली के जंतर मंतर में देखा राम यंत्र मुझे अब भी स्मरण है। वहां यह यंत्र चटक लाल रंग में निर्मित है।

राम यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
राम यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

इस यंत्र का उपयोग किसी खगोलीय पिंड की ऊंचाई (उन्नतांश) एवं दिगंश के स्थानीय निर्देशांकों को मापने में किया जाता है। क्षितिज से किसी पिंड की कोणीय ऊंचाई को उन्नतांश कहा जाता है तथा उत्तरी दिशा से पूर्वी दिशा में उस पिंड की कोणीय स्थिति को दिगंश कहा जाता है।
• दिगंश यंत्र – खगोलीय पिंड के दिगंश को मापने वाला यह बेलनाकार यंत्र है।
• क्रान्ति वृत्त यंत्र – यह यंत्र खगोलीय पिंडों के अक्षांश एवं देशांतर मापने में उपयोग में आता है।

षष्ठांश यंत्र

वृहत सम्राट यंत्र के समीप एक ६० अंश का वृत्तखंड है। यदि आप इस वृत्तखंड के भीतर प्रवेश करें, आप देखेंगे कि सूर्य प्रकाश इस अन्धकोष्ठ के भीतर एक छिद्र के द्वारा प्रवेश करता है। इसी का उपयोग कर सूर्य से दूरी नापी जाती है।

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इस यंत्र के भीतर खड़े होकर, उस छिद्र को निहारते, इस जंतर मंतर के वास्तुकार व निर्माता के समक्ष नतमस्तक होने की अभिलाषा होती है।

चक्र यंत्र

चक्र यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
चक्र यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

चक्र यंत्र एक विशाल धातुई चक्र है। इसकी कार्यप्रणाली एवं उद्देश्य की जानकारी मुझे नहीं मिल पायी।

यंत्रों के प्रारूप

जयपुर जंतर मंतर के भ्रमण में मुझे अवश्य अत्यंत आनंद आया था। यद्यपि जिसने मेरा ध्यानाकर्षित किया वे थे यंत्रों के प्रारूप, अर्थात् आरंभिक अवस्था। इन प्रारूपों को देखकर हम जान सकते हैं कि यहाँ उपस्थित सर्व अचूक एवं सटीक यंत्रों पर, उनकी अंतिम अवस्था प्राप्त होने से पूर्व, अविष्कारक द्वारा कितने ही प्रयोग किये गए थे। प्रत्येक यंत्र का कम से कम एक लघु प्रारूप यहाँ उपलब्ध है। उदाहरणतः धातु में बने सर्व यंत्रों के प्रारूपों में भिन्न भिन्न धातुओं का उपयोग प्रायोगिक तौर पर किया गया था। तत्पश्चात सर्वोपयुक्त धातु सुनिश्चित किया गया था। यहाँ खड़े होकर ऐसा प्रतीत होता है मानो हम किसी प्रयोगशाला में आ गए हों।

कपाली यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
कपाली यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

प्रत्येक यंत्र के सूक्ष्मता से मापन हेतु सीड़ियाँ बनायी गयी हैं जिन पर चढ़कर शोध-अधिकारी चिन्हित संख्या का निरिक्षण करते हैं। यद्यपि यंत्रों की सुरक्षा एवं संसाधन हेतु दर्शनार्थियों एवं पर्यटकों को इन सीड़ियों पर चढ़ने की अनुमति नहीं है।

जयपुर जंतर मंतर के यंत्रों के दर्शन एवं जानकारी प्राप्त करते समय मुझे स्मरण हुआ कि मैंने भौतिक शास्त्र में ही अध्ययन कर स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। मैं सोच में पड़ गयी कि भौतिक शास्त्र पर आधारित व्यवसाय का चुनाव मेरे हेतु अत्यंत रोचक होता!

जंतर मंतर की सर्व विशाल भित्तियों पर चापाकार झरोखे कटे हुए थे। ये भित्तियों का भार तो उठा ही रहे थे, तथापि सपाट सादी भित्तियों को सुन्दरता प्रदान कर रहे थे। अन्यथा यंत्रों हेतु आवश्यक ये ऊंची भित्तियाँ किंचित उबाऊ हो सकती थीं।

अंततः मैं यह कहना चाहूंगी कि जयपुर के जंतर मंतर ने मेरा मन मोह लिया था। मेरे मष्तिष्क की दबी परतों को झाड़ पोछ कर सचेत कर दिया था। सर्व यंत्रों की कार्यप्रणाली अत्यंत सरल होते हुए भी सुचारू रूप से सटीक खगोलीय मापन करने में सक्षम थी। प्राचीन काल से हमारे देश के वैज्ञानिक इतने बुद्धिमान एवं निपुण थे । तभी तो इतने जटिल मापन को सरल यंत्रों द्वारा कितनी आसानी से प्राप्त करते थे। जंतर मंतर इसी तथ्य का जीता जागता उदाहरण है।

जयपुर जंतर मंतर के भ्रमण हेतु कुछ सुझाव

ज्यामितीय संरचनाएं - जंतर मंतर जयपुर
ज्यामितीय संरचनाएं – जंतर मंतर जयपुर

• जयपुर का जंतर मंतर यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व विरासत स्थल है। यह सूर्योदय से सूर्यास्त तक दर्शनार्थ खुला रहता है। वेधशाला के यन्त्र भी इसी समयावधि में कार्यशील रहते हैं।
• इस वेधशाला में प्रवेश शुल्क ५० रुपये भारतवासियों के लिए तथा २०० रुपये विदेशी पर्यटकों के लिए निश्चित है।
• यह वेधशाला जयपुर के मधोमध स्थित है। अतः किसी भी साधन द्वारा यहाँ तक सरलता से पहुंचा जा सकता है।
• साधारणतः पर्यटक जंतर मंतर के यंत्रों के दर्शन ४५ मिनट से १ घंटे के समयावधि में पूर्ण कर लेते हैं। यद्यपि मुझे इनके निरिक्षण हेतु ३ घंटों का समय लगा। वह भी अनुमानतः मेरे द्वारा कुछ यंत्रों के दर्शन चूकने के पश्चात! अतः अपनी इच्छा एवं विज्ञान के प्रति आपकी रूचि के अनुरूप आप स्वयं अपनी समयावधि निश्चित करें।
• जिस तरह मैं उत्तेजित होकर अपना नाम, अनुराधा, राज यंत्र में खोज रही थी, आप भी अपना पसंदीदा नक्षत्र इस यंत्र में ढूंढ सकते हैं। आपकी सुविधा हेतु मैं यहाँ नक्षत्रों की सूची प्रदान कर रही हूँ।
• जंतर मंतर के सर्वोत्तम दर्शन हेतु तेज धूप आवश्यक है। अतः खुले आकाश में सूर्य की चमक तेज हो तभी इसके दर्शनों का अनुभव अविस्मरणीय होगा।
• इन यंत्रों को जानने एवं समझाने हेतु परिदर्शक आवश्यक है। श्री दिनेश शर्मा (८५५९८ ९३३९९), हमारे परिदर्शक अत्यंत निपुण थे। उन्होंने इन यंत्रों की कार्यप्रणाली को सरल शब्दों में हम तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोडी थी।
• जंतर मंतर के सम्बन्ध में और जानकारी इस वेबसाईट से पायें।
• बच्चों के ज्ञानवर्धन एवं मनोरंजन हेतु यह स्थल अत्यंत उपयुक्त है।

स्वर्णिम त्रिकोण पर्यटन समूह में उपस्थित एवं यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित अन्य पर्यटन स्थल हैं-
• ताजमहल – विश्व का सर्वाधिक छायाचित्रण योग्य स्मारक
• फतहपुर सीकरी
• दिल्ली का लाल किला
• दिल्ली का हुमायूं दरगाह

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

8 COMMENTS

  1. अनुराधा जी,
    बहुत बहुत सुंदर,ज्ञानवर्धक आलेख ! वर्षों पूर्व की गई , जंतर मंतर जयपुर यात्रा की यादें ताज़ा हो गई । महाराजा सवाई जयसिंह (द्वितीय),जो स्वयम् एक विख्यात खगोलविद् थे, के द्वारा १८वीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत वर्ष में बनाईं गई पाचों वेधशालायें उस काल की गणितीय वास्तुकला का अद्भुत नमुना है ! मेरी जानकारी के अनुसार वर्तमान मे इनमे से केवल जयपुर और उज्जैन की वेधशालाओं मे ही खगोलीय गणनानुसार हिन्दु पंचांग बनायें जाते है । वेधशाला के विभिन्न भित्ती यंत्रो द्वारा बताई गई ग्रहों की स्थिती,स्थानीय समय की गणना आदि ,वर्तमान वैज्ञानिक दौर में सच मे विस्मयकारक हैं ।उस समय के वास्तुविदों को सलाम !
    ज्ञानवर्धक आलेख हेतू धन्यवाद !

    • प्रदीप जी – दिल्ली में भी जंतर मंतर अच्छी हालत में है पर अब वो केवल धरनों के लिए जाना जाता है. उज्जैन के जंतर मंतर को देखने की इच्छा है, देखिये कब अवसर मिलता है.

      • अनुराधा जी,
        जरूर आईयेगा.उज्जैन एक प्राचीन पौराणिक नगर होने से यहां अनेक दर्शनीय स्थल हैं । मै भी यहीं का निवासी हूॅं । आपका स्वागत हैं !

  2. मधुमिता जी करीब 25 – 30 साल पहले मैं उज्जैन, जयपुर और दिल्ली घूमने गए था तभी यह जंतर मंतर देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था तब जैसा कि आम तौर पर पर्यटक देखकर निकल जाता है वैसा मैंने भी किया था, पर यह आलेख पड़ने के बाद एक बार फिर जंतर मंतर देखने की इच्छा जागृत हुई है तथा ऐसी ऐतिहासिक धरोहर देखने के बाद हमे गर्व होता है कि हमारा भारत सदियोँ से ज्ञान विज्ञान विशाल भंडार रहा है आपका हिंदी के शब्दों का चयन भी अद्वितीय है

    • संजय जी – हमारी चेष्ठा यही है की हम अपनी धरोहर को जान सकें, और यह जान सकें की हम किन के वंशज हैं.

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