कपिलवस्तु – नेपाल में बुद्ध के शाक्य वंश की राजधानी

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कपिलवस्तु नेपाल
कपिलवस्तु नेपाल

लुम्बिनी के २८ की.मी. पश्चिम में स्थित कपिलवस्तु राजा शुद्धोधन की राजधानी थी। शाक्य वंश के राजा शुद्धोधन के ही पुत्र थे गौतम बुद्ध। गौतम बुद्ध की जन्मस्थली, कपिलवस्तु के भौगोलिक निर्धारित स्थल पर मतभेद हैं। वर्तमान में यह निर्धारित करना कठिन है कि कपिलवस्तु नेपाल के तिलौराकोट में स्थित है या भारत-नेपाल सीमारेखा के भारत की तरफ, पिप्राह्वा में। हालांकि यह दोनों स्थल लुम्बिनी के बहुत समीप स्थित है। इसलिए वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय सीमारेखा के अनुसार बुद्ध अर्थात् राजकुमार सिद्धार्थ की जन्मस्थली कपिलवस्तु, इन दोनों स्थलों में एक हो सकती है।

मेरी कपिलवस्तु की यात्रा के पश्चात मैं अपना अनुभव व संस्मरण आपके समक्ष रख रही हूँ। आशा है यह आपकी कपिलवस्तु यात्रा की तैयारी में उपयोगी सिद्ध होगी। मेरी अपनी यात्रा की तैयारी के समय मुझे कपिलवस्तु पर जानकारी हासिल करने में बड़ी कठिनाइयाँ उठानी पड़ीं थीं। इसलिए पूरे मन से मेरी यह कोशिश है कि इंडीटेल के जो पाठक कपिलवस्तु की यात्रा पर जाना चाहतें हैं, उन्हें कपिलवस्तु के आसपास के पुरातात्विक अवशेषों के सम्बन्ध में सही मार्गदर्शन प्राप्त हो सके। एक तथ्य ध्यान में रखने योग्य है कि कपिलवस्तु एक शहर अथवा गाँव नहीं, बल्कि नेपाल का एक जिला है। इसलिए प्राचीन कपिलवस्तु की यात्रा का अर्थ है कई छोटे बड़े दर्शनीय स्थलों का भ्रमण। इनमें ज्यादातर बुद्ध व बौद्ध धर्म के प्रारम्भिक दिनों से सम्बन्ध रखते हैं।

इक्ष्वाकु वंश के राजाओं ने इस स्थान का नामकरण कपिल मुनि के नाम पर किया था। अयोध्या के भगवान् राम भी इसी वंश के वंशज थे।

कपिलवस्तु – कई बुद्धों की जन्मस्थली

तिलौराकोट का उत्तरी द्वार - कपिलवस्तु नेपाल
तिलौराकोट का उत्तरी द्वार – कपिलवस्तु नेपाल

जिन भगवान् बुद्ध से ज्यादातर लोग परिचित हैं वे हैं शाक्यमुनि बुद्ध। परन्तु बौद्ध धर्म के अनुसार ऐसे कई बोधिसत्व हुए जो बुद्ध बनने की राह पर थे। कुछ मूलग्रंथों के अनुसार शाक्यमुनि बुद्ध से पूर्व ५ बोधिसत्व बुद्ध हुए हैं।

कपिलवस्तु में शाक्यमुनि बुद्ध समेत ३ बुद्धों के पुरातत्व प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

आप इस विषय पर और जानकारी ‘प्राचीन वेबसाइट ‘ से प्राप्त कर सकतें हैं।

तिलौराकोट

तिलौराकोट दुर्ग के अवशेष - कपिलवस्तु नेपाल
तिलौराकोट दुर्ग के अवशेष – कपिलवस्तु नेपाल

तिलौराकोट का अर्थ है तीन खम्बों का शहर – लौरा स्थानीय भाषा में स्तम्भ है। यह शहर मौर्य वंश के पश्चात बसाया गया था। क्योंकि यह वही तीन खम्बें हैं जिनकी स्थापना सम्राट अशोक ने अपनी कपिलवस्तु की तीर्थयात्रा के समय की थी। कहा जाता है कि सम्राट अशोक अपनी तीर्थ यात्रा के समय कई अभिलेख खुदे खम्बे अपने साथ लेकर निकले थे। जब भी वे किसी महत्वपूर्ण स्थान पर पहुंचते, वहीं इन खम्बों की स्थापना करवाते थे। इन्हीं अभिलेखों द्वारा ही हमें उस युग व इस स्थान की जानकारी प्राप्त हुई थी।

पुरातत्ववेत्ताओं का निष्कर्ष है कि तिलौराकोट में शाक्य राजाओं का महल था। यहीं भगवान् बुद्ध ने राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के रूप में अपने जीवन के पहले २९ वर्ष बिताये थे। आप आज भी इस शहर के चारों ओर मोटी दीवार और खंदक देख सकतें हैं। २६०० वर्षों से भी पूर्व बना यह दुर्ग अपेक्षाकृत छोटा है। तिलौराकोट के भौगोलिक सर्वेक्षण धरती के भीतर कुछ राजसी भवनों के ढाँचों की ओर इशारा करतें हैं। इनमें कई ढाँचे खुदाई द्वारा बाहर निकाले जा चुकें हैं व कुछ की खुदाई अभी शेष है।

आप जब तिलौराकोट पहुंचेंगे, आपको इस दुर्ग का पश्चिमी द्वार, सभाकक्ष, कुछ तलघर, दो स्तूप, एक मंदिर, कुछ दीवारें और पूर्वी द्वार दृष्टिगोचर होंगें। इस पूर्वी द्वार से ही सिद्धार्थ ने अपना भव्य महल व उससे जुड़े राजसी जीवन का त्याग किया था। इसलिए इसे महाद्वार भी कहा जाता है।

बुद्ध के त्याग की गाथाएँ

महाद्वार - तिलौराकोट का पूर्वी द्वार - जहाँ से गौतम ने कपिलवस्तु से प्रस्थान किया - नेपाल
महाद्वार – तिलौराकोट का पूर्वी द्वार – जहाँ से गौतम ने कपिलवस्तु से प्रस्थान किया – नेपाल

राजकुमार सिद्धार्थ द्वारा किये सांसारिक सुखों के परित्याग की गाथा आप में से कईयों ने सुनी या पढ़ी होंगीं। राजा शुद्धोधन और रानी मायादेवी के पुत्र सिद्धार्थ के जन्म पर संत असिता ने भविष्यवाणी की थी कि राजकुमार, परम ज्ञान प्राप्त कर लोगों के कल्याण हेतु, अपना जीवन समर्पित कर देंगे। अपने इकलौते पुत्र को खोने के भय से राजा ने राजकुमार को चारदीवारों के भीतर रखा। महल के भीतर ही उनका विवाह व पुत्र राहुल का जन्म हुआ। एक दिवस उनकी दृष्टी एक वृद्ध, एक बीमार व एक मृत व्यक्ति पर पड़ी। जीवन के इस रूप से अनभिज्ञ सिद्धार्थ का मन इन दृश्यों ने झकझोर दिया। सभी सांसारिक सुखों का परित्याग कर वे जीवन के मायने खोजने निकल पड़े। और इस विश्व को बुद्ध की प्राप्ति हुई।

तिलौराकोट के भ्रमण के समय मेरे परिदर्शक ने भगवान् बुद्ध के सांसारिक सुखों के परित्याग व संतत्व प्राप्ति के पीछे प्रसिद्ध दो और कथाएं बतायीं।

दूसरी कथा

शाक्य वंश के सिद्धार्थ की माता मायादेवी, उनकी सौतेली माता प्रजापति गौतमी और उनकी पत्नी यशोदा, देवदहा के कौलिया वंश की थी। सिद्धार्थ ने भी अपने बालपन का कुछ समय यहीं बिताया था। परन्तु एक नदी के जल पर स्वामित्व को लेकर शाक्य वंश का कौलिया वंश से बैर उत्पन्न हो गया था। इस विवाद के चलते दोनों में युद्ध सदृश स्थिति पैदा हो गयी थी। राजकुमार सिद्धार्थ ने इस विवाद को सुलझाने की पहल की। यौवन के जोश में उन्होंने प्रतिज्ञा कर दी कि यदि वे इस जल विवाद को सुलझाने में असमर्थ रहे तो वे राजमहल छोड़ जंगल में जीवनयापन हेतु निकल जायेंगे। दुर्भाग्यवश वे विवाद हल करने में असफल रहे और प्रतिज्ञानुसार महल का त्याग कर दिया।

तीसरी कथा

इस कथानुसार अपने पौत्र राहुल के जन्म पर राजा शुद्धोधन ने एक भव्य उत्सव का आयोजन किया था। दूर दूर से सुन्दर नर्तकियों को आमंत्रित किया था। सिद्धार्थ समेत सबने इस उत्सव का सम्पूर्ण रात्र भरपूर आनंद उठाया। प्रातः सिद्धार्थ ने वहां चारों ओर गन्दगी व कुरूपता देखी व उनका मन खिन्न हो उठा। जो नर्तकियां पिछली रात इतनी आकर्षक व सुन्दर प्रतीत हो रहीं थीं, वही श्रृंगार विहीन, शराब के नशे में अभद्रता की सीमा पर कर रहीं थीं। उन्हें बोध हुआ कि सुन्दरता क्षणभंगुर है। उन्हें इस राजसी जीवन से विरक्ति उत्पन्न हुई और उन्होंने सत्य की खोज में महल का त्याग करने का निश्चय किया।

अब यह आप पर निर्भर है कि आप किस कथा पर विश्वास करतें हैं। व्यक्तिगत तौर पर मुझे दूसरी कथा की संभावना ज्यादा प्रतीत होती है। यात्रा के समय मार्ग में स्थानीय लोगों द्वारा कही गयीं कथाएं मुझे बेहद पसंद हैं। स्थानीय निवासियों के आस्था की यह गाथाएँ बहुधा अनजानी होतीं हैं और कई बार इनके सम्बंधित साहित्य भी उपलब्ध नहीं होते। यह पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से जीवित रहतीं हैं।

कपिलवस्तु के तिलौराकोट का भ्रमण

बुद्ध के पिता रजा सुधोधन & माता माया देवी को समर्पित स्तूप - कपिलवस्तु नेपाल
बुद्ध के पिता रजा सुधोधन & माता माया देवी को समर्पित स्तूप – कपिलवस्तु नेपाल

तिलौराकोट को घेरे जो मोटी प्राचीन दीवार के अवशेष हैं उन्हें मेरे परिदर्शक शिवपाल ‘तिलौराकोट की महान दीवार’ कहते हैं। मैंने उस दीवार पर चलने का आनंद उठाया।

दुर्ग के अवशेषों के बीचोंबीच एक कमल तालाब है। एक काल में यह तालाब राज परिवार के आमोद प्रमोद हेतु बनाए बगीचे का हिस्सा था।

तिलौराकोट का समय-माई मंदिर

समय माई मंदिर - तिलौराकोट - नेपाल
समय माई मंदिर – तिलौराकोट – नेपाल

तिलौराकोट में भ्रमण के समय मुझे एक अनोखे मंदिर के दर्शन हुए। यह मंदिर समय-माई अर्थात् समय की देवी को समर्पित है। तिलौराकोट के इन निर्जीव अवशेषों में यही एक जीवित संरचना है। इस मंदिर के चारों ओर, अलग अलग आकार के सैकड़ों हाथी मूर्तियाँ रखीं हुईं हैं। जानकारी प्राप्त करने पर पता चला कि यहाँ मांगी मन्नत पूर्ण होने पर भक्तगण देवी को हाथी की मूर्ति अर्पित करते हैं। मंदिर के भीतर देवी की पिंडी रूप की पूजा की जाती है। तथापि यहाँ हाथी की सवारी करती एक देवी की प्रतिमा भी है। इसी प्रकार के हाथी मुझे यहाँ के अन्य छोटे मंदिरों में भी दिखाई दिए।

मेरे परिदर्शक शिवपाल के अनुसार शाक्य वंश के राजा युद्ध में जाने से पूर्व समय-माई देवी की आराधना किया करते थे। अर्थात् शाक्य वंश के राजा भी, अन्य राजाओं की तरह, युद्ध पूर्व माँ शक्ति का आवाहन करते थे।

तिलौराकोट दुर्ग का बाह्य परिसर

लोहे की कार्यशाला के अवशेष - तिलौराकोट - नेपाल
लोहे की कार्यशाला के अवशेष – तिलौराकोट – नेपाल

तिलौराकोट दुर्ग की दीवारों के बाहर दो रोचक स्थलों के दर्शन हुए। एक था वह स्तूप जो बुद्ध के अश्व कंटक को समर्पित है। कंटक ही वह अश्व था जिस पर सवार होकर राजकुमार सिद्धार्थ अर्थात् बुद्ध ने महल का त्याग किया था। तत्पश्चात उसे महल वापिस भेज दिया था। दूसरा स्थल किसी प्राचीन लोहे के कारखाने के अस्तित्व की ओर इशारा कर रहे थे। हालांकि इस कार्यशाला के अवशेष जिस टीले पर स्थित हैं वहां तक पहुँचने हेतु कुछ दूरी पैदल पार करनी पड़ती है। मेरे परिदर्शक ने मुझे बताया कि उसकी जानकारी अनुसार मैं पहली थी जिसने यह कष्ट उठाया। अन्यथा बाकी पर्यटक केवल जानकारी प्राप्त कर आगे बढ़ जाते थे। मुझे प्रसन्नता है कि मैंने इस ओर प्रयास किया और मुझे इसका फल भी प्राप्त हुआ। मुझे बुद्ध-पूर्व युग के छोटे छोटे लोहे के खांचे देखने का अवसर प्राप्त हुआ। मेरे अनुमान से यह लौह आयुध व अन्य लौह वस्तुएं बनाने का कारखाना था। प्रदूषित वातावरण से बचने हेतु इसका निर्माण शहर से बहुत दूर किया गया था।

वर्तमान में यहाँ केवल मिट्टी मिश्रित लौह अवशेषों का ढेर है। इसी कारण इस इलाके की धरती बंजर हो गयी है। पुरातत्ववेत्ताओं ने यहाँ हज़ारों टनों लौह अवशेषों के होने की आशंका जताई है। इसी से कारखाने की विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है।

यहाँ की एक और बात जिसने मुझे प्रभावित किया वह यह कि हर महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल पर उस स्थान का नक्शा बनाया हुआ है जो पर्यटकों को उस स्थान की जानकारी देता है। हालांकि दिशा-निर्देशों का अभाव महसूस हुआ परन्तु समयाभाव ना होने के कारण मुझे स्थलों को ढूँढने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

तिलौराकोट संग्रहालय

तिलौराकोट संग्रहालय में मृण्मयी गहने
तिलौराकोट संग्रहालय में मृण्मयी गहने

तिलौराकोट दुर्ग से करीब ४०० मीटर दूर एक छोटा पुरातात्विक संग्रहालय है। मेरे देखे सभी संग्रहालयों में यह सबसे मूलभूत संग्रहालय है। दो कक्षों में रखीं कलाकृतियों में मुख्य हैं-
• पाषाणी मूर्तियाँ
• लाल पक्की मिट्टी अर्थात् टेराकोटा की मूर्तियाँ
• सिक्के
• धूसर व लाल कुम्हारी
• मोती
• इतिहास के विभिन्न युगों में उपयोग में लायीं गईं ईंटें
• गुफाओं की खुदाई द्वारा प्राप्त वस्तुएं
• तिलौराकोट में पाए गए छिद्र बनाने के ढाँचे

गोतीहावा

गोतीहावा का अशोक स्तम्भ - नेपाल
गोतीहावा का अशोक स्तम्भ – नेपाल

गोतीहावा का सम्बन्ध क्रकुछंद बुद्ध से है। इसकी जानकारी हमें यहाँ खड़े अशोक स्तम्भ पर लिखे अभिलेखों से प्राप्त होती है। इस स्तम्भ की स्थापना भी सम्राट अशोक ने अपनी तीर्थ यात्रा के समय की थी। चीनी यात्रियों के अभिलेखों से यह पता चलता है कि इस अशोक स्तम्भ के शीर्ष पर सिंहचतुर्मुख स्तंभशीर्ष था। खुदाई के समय पुरातत्ववेत्ताओं ने यहाँ एक स्तूप की खोज की थी। उन्हें यहाँ ९-१० वीं ई. के मानव सभ्यता के भी चिन्ह प्राप्त हुए।

क्रकुछंद बुद्ध स्तूप - गोतीहावा - नेपाल
क्रकुछंद बुद्ध स्तूप – गोतीहावा – नेपाल

वर्तमान में यह स्तूप एक टीले के रूप में है जिस पर एक विशाल वृक्ष खड़ा है। अशोक स्तम्भ इसी स्तूप के बगल में बनाया गया था।

हालांकि अशोक स्तम्भ अपने मूल स्थान पर स्थित है परन्तु वर्तमान में यह भंगित है। इसके आधार का कुछ भाग ही शेष है। परन्तु इसकी महत्ता इसके ऊपर चिपके सोने की पत्तियों व इसके चारों ओर लगे रंगीन ध्वजों से स्पष्ट विदित होती है।

गोतीहावा के स्तूप व अशोक स्तम्भ के दर्शन हेतु एक लम्बा कच्चा रास्ता पार करना पड़ता है। फिर भी इसके आसपास एक संपन्न गाँव बसा हुआ है।

कुदान

कुदान - ताल, स्तूप एवं कुआँ - गोतीहावा - नेपाल
कुदान – ताल, स्तूप एवं कुआँ – गोतीहावा – नेपाल

कुदान प्राचीन काल में निग्रोधाराम नाम से जाना जाता था। गौतम बुद्ध के विश्राम की सुविधा हेतु शाक्यों ने नगर के बाहर, शांत वातावरण में निग्रोधाराम नामक एक विहार बनवाया था। यह वही स्थान है जहां परमज्ञान प्राप्ति के पश्चात गौतम बुद्ध ने सर्वप्रथम परिवारजनों से भेंट की थी। उन्होंने यहाँ अपने माता पिता, सौतेली माता प्रजापति गौतमी, अपनी पत्नी व पुत्र से भेंट की थी। उनकी सौतेली माता ने उन्हें वस्त्र भेंट किये थे। अंत में वे सब गौतम बुद्ध के साथ बौद्ध धर्म के प्रचार में शामिल हो गए थे।

पुरातत्ववेत्ताओं ने कुदान में खुदाई के समय ३ स्तूपों की खोज की थी। इनमें से एक स्तूप के ऊपर, सारनाथ के चौखंडी स्तूप की तरह, अष्टभुजा मंदिर स्थापित है। बुद्ध व अन्य भिक्षुओं की सुविधा हेतु यहाँ एक तालाब भी खुदवाया गया था।
यहाँ ईंटों से बना एक अनोखा कुआं भी है।

ईंटों से बने प्रमुख स्तूप पर चढ़ा जा सकता है। मैंने इस स्तूप के ऊपर एक अनोखा शिवलिंग देखा। इस स्तूप पर लगीं ईंटों को देखकर मुझे नालन्दा में लगीं ईंटों का स्मरण हो आया। ऊपरी सतह की ईंटें विशेष रूप से स्तूप के अलंकरण हेतु बनाए गए थे।

निगलीहावा

निगलीहावा अशोक स्तम्भ - नेपाल
निगलीहावा अशोक स्तम्भ – नेपाल

निगलीहावा एक वीरान रास्ते पर बना एक छोटा आहाता है। इस आहाते के भीतर एक अशोक स्तम्भ दो टुकड़ों में टूटा हुआ रखा है। इनमें से छोटा टुकड़ा जमीन में गढ़ा हुआ, कुछ तिरछा सा खड़ा है जबकि लम्बा निचला हिस्सा आधार से पृथक हो, उसी के समीप पड़ा हुआ है। इस स्तम्भ के लापता शीर्ष की जानकारी यहाँ किसी को नहीं है। इस स्तम्भ की स्थापना भी सम्राट अशोक ने अपने तीर्थयात्रा के समय किया था। इस स्तम्भ पर लिखे अभिलेख के अनुसार यह स्तम्भ एक स्तूप के स्थान पर खड़ा है जिसके भीतर कनकमुनी बुद्ध के पार्थिव अवशेष रखे थे। कालान्तर में इस तथ्य की पुष्टि चीनी यात्रियों ने भी की थी। जिस स्तूप के स्थान पर यह स्तम्भ खड़ा था, उसका अब अस्तित्व नहीं है। मेरे अनुमान से इस स्तूप को, आहाते के पास स्थित तालाब बनाने हेतु ध्वस्त किया गया हो।

मैंने इस स्तम्भ पर कई मोरों की नक्काशी देखी। उस पर लिखे अभिलेख मुझे कुछ नवीन प्रतीत हुए। अभिरक्षक ने इसे प्रथम प्राचीन अभिलेख बताया परन्तु बाद में इस तथ्य पर सहमति जताई कि तालाब से इस स्तम्भ की खोज के पश्चात इस पर अभिलेख खोदे गए थे।

कनकमुनी बुद्ध को कोआगमन बुद्ध और कनकगमन भी कहा जाता है।

आहाते के समीप स्थित एक छोटे मंदिर में कनकमुनि बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है। काले रंग की इस मूर्ति को भक्तगणों ने सोने की पत्तियाँ अर्पित कर अलंकृत किया है। इस मूर्ति की बनावट भी अन्य बुद्ध की मूर्तियों से साम्य रखती है।

अरोराकोट

कनकमुनि बुद्ध की जन्मस्थली अरोराकोट, निगलीहावा से कुछ दो की.मी. दूर स्थित एक प्राचीन शहर है। इस शहर के नाम पर यहाँ केवल एक दीवार के मिटते अवशेष देख सकतें हैं। वह भी ध्यान से ढूँढने पर ही दिखाई देते हैं। मिट्टी से ढका यह अवशेष पुरातत्ववेत्ताओं की खुदाई का इंतज़ार कर रहा है।

सागरहावा

सागरहावा - जहाँ कभी हज़ारों स्तूप थे - नेपाल
सागरहावा – जहाँ कभी हज़ारों स्तूप थे – नेपाल

किवदंतियों के अनुसार शाक्य वंश का, शाक्य सीमा के दक्षिण स्थित कोसल राज से वैर था। प्रतिशोध की मंशा से कोसला सेना ने शाक्यों का नरसंहार किया था। उन्ही मृत शाक्यों की स्मृति में उनके वंशजों ने हज़ारों की संख्या में स्मारक स्तूप बनवाये थे। कहा जाता है कि यह सारे स्तूप सागरहावा में स्थित थे। १८९० में डॉ. फुहरर ने इनमें से कई स्तूपों की खोज की थी।

वर्तमान में यहाँ सिर्फ एक तालाब है। मैंने उस तालाब में तैरते कई सारस पक्षी भी देखे।

जगदीशपुर जलाशय

यह पक्षीदर्शन हेतु सर्वोपयुक्त, एक बड़ा जलाशय है। इसकी स्थापना १९७० में सिंचाई हेतु किया गया था। बाणगंगा के जल से भरा यह जलाशय कृषिभूमि व कुछ छोटे तालाबों से घिरा हुआ है। यह नेपाल का सर्वाधिक बड़ा व प्रमुख जलाशय है।

नेपाल के कपिलवस्तु की यात्रा हेतु सुझाव

• इस संस्मरण में बताये गए दर्शनीय स्थलों के दर्शन हेतु ६-८ घंटों का समय लगता है। इनमे लुम्बिनी से आने-जाने का समय भी शामिल है।
• ज्यादातर स्थलों पर खाने-पीने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। अतः अपने खाने-पीने का सामान साथ रखें।
• तिलौराकोट में पुरातन अवशेषों की जानकारी हेतु परिदर्शक उपलब्ध हैं। परन्तु अन्य स्थलों पर जानकारी देने हेतु कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है।
• तिलौराकोट में उपलब्ध प्रलेख आपको इतनी जानकारी अवश्य देते हैं कि आप बाकी स्थलों के दर्शन परिदर्शन के बिना भी पूर्ण कर सकतें हैं।
• समय का अभाव हो तो कुछ घंटे केवल तिलौराकोट में बिताकर भी आप कपिलवस्तु दर्शन के आनंद से अभिभूत हो सकतें हैं।
• यहाँ केवल संग्रहालय दर्शन हेतु टिकट खरीदना आवश्यक है। बाकी स्थलों का दर्शन मुफ्त है।

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हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

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