कुम्भलगढ़ दुर्ग – राजपूत वीरों की पावन भूमि

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कुम्भलगढ़ दुर्ग राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित अरावली पर्वतों के पश्चिमी श्रंखलाओं में गर्व से खड़ा मेवाड़ का एक किला है। यह दुर्ग राजस्थान के लोकप्रिय पर्यटन सूची में कदाचित ना हो किन्तु इसकी कुछ अद्वितीय विशेषताओं के कारण भारत की यह एक अद्भुत धरोहर है।

कुम्भलगढ़ दुर्ग
कुम्भलगढ़ दुर्ग
  • यह उन दुर्लभ दुर्गों में से एक है जिस पर कभी किसी ने आक्रमण नहीं किया। इसीलिए इस पर कभी किसी शत्रु ने विजय प्राप्त नहीं की है। इसी कारण इसे अजय गढ़ भी कहते हैं।
  • यह दुर्ग अरावली पर्वत श्रंखलाओं के मध्य समुद्र सतह से लगभग ३५०० फीट ऊँचे पर्वत शिखर पर निर्मित है।
  • इस दुर्ग के चारों ओर एक लम्बी भित्त है जिसकी लम्बाई लगभग ३६ किलोमीटर तथा चौड़ाई ७ मीटर है। यह भित्ति कई पहाड़ियों एवं घाटियों के ऊपर से जाती है। इस भित्ति ने अपने भीतर अनेक गढ़ों, मंदिरों, बावडियों, आवासीय इमारतों को समाया हुआ है।
  • चीन की भित्ति के पश्चात यह विश्व की दूसरी सर्वाधिक लम्बी अखंड भित्त है।
  • कुछ वर्षों के पश्चात इस भित्ति पर घोड़ा गाडी की सवारी भी उपलब्ध हो जायेगी।
  • यह मेवाड़ के सर्वाधिक लोकप्रिय महाराजा महाराणा प्रताप का जन्मस्थल है।
  • इस दुर्ग का निर्माण राणा कुंभा ने करवाया था तथा उन्होंने ही इस पर राज भी किया था। राणा कुम्भा सिसोदिया राजपूत के वंशज थे।
  • यह दुर्ग राजस्थान के सर्वाधिक लोकप्रिय पर्यटन स्थल, उदयपुर से लगभग ८५ किलोमीटर दूर स्थित है।
  • १५वीं सदी में निर्मित यह दुर्ग १९वीं सदी के अंतिम चरण तक बसा हुआ था।
  • यह दुर्ग अब एक विश्व धरोहर स्थल है। राजस्थान के पर्वतीय दुर्गों की सूची में इसका नाम अंकित है।
  • निम्न चित्र में दुर्ग की विशाल भित्त एवं राम पोल प्रवेश द्वार दिखाई दे रहे हैं। इसके समक्ष खड़े वाहन एवं लोगों के आकार की तुलना भित्त के आकार से की जाए तो आपको दुर्ग की विशालता का अनुमान हो जाएगा।

कुम्भलगढ़ दुर्ग – विश्व की दूसरी सर्वाधिक लम्बी भित्त

राम पोल कुम्भलगढ़
राम पोल कुम्भलगढ़

कुम्भलगढ़ दुर्ग से संबंधित किवदंतियों में यह कहा गया है कि राणा कुम्भा इस दुर्ग का निर्माण सर्वाधिक विशाल दुर्ग के रूप में करना चाहते थे। साथ ही ऐसा दुर्ग बनवाना चाहते थे जहाँ से वे चित्तौड़गढ़ को देख सकें। किन्तु जैसे ही उन्होंने इस दुर्ग का निर्माण आरंभ कराया, वे अधिक कार्य नहीं करा सके।

कुम्भलगढ़ से जुड़ी लोककथाएं एवं मिथक

ऐसा कहा जाता है कि कारीगर दिवसभर जितना भी निर्माण कार्य करते थे, रहस्यमयी रीति से वह सम्पूर्ण निर्माण कार्य रात्र भर में नष्ट हो जाता था। एक रात्रि में राजा को स्वप्न में उनकी कुलदेवी के दर्शन हुए जो उनसे कह रही थीं कि गढ़ के निर्माण कार्य को अखंडित रूप से कार्यान्वित करने के लिए किसी मनुष्य की बलि देनी पड़ेगी। किन्तु देवी ने यह भी कहा कि बलि देने के लिए उस मनुष्य को स्वेच्छा से आगे आना पड़ेगा। बलि देने के लिए उस पर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं होना चाहिए।

राजा ने सार्वजनिक घोषणा करवाई। मेर (या मेहर) नाम का एक पुरुष स्वेच्छा से अपनी बलि देने के लिए सहमत हो गया किन्तु उसके लिए उसने तीन अंतिम अभिलाषाएं व्यक्त कीं। पहली अभिलाषा थी कि आरंभ में दुर्ग का नाम उसके नाम पर रखा जाए। इसी कारण इस दुर्ग को आरंभ में कुम्भलमेर दुर्ग कहा जाता है। उसकी दूसरी अभिलाषा थी कि बलि के पश्चात जहाँ भी उसका शीष गिरे, वहाँ एक मंदिर का निर्माण कराया जाए। तथा जहाँ भी उसका धड़ गिरे, वहाँ महल का निर्माण किया जाए। उसकी अभिलाषा के अनुसार ही इस दुर्ग का निर्माण कराया गया है।

आप इस दुर्ग पर चढ़ सकते हैं। जैसा कि अन्य पर्वतीय दुर्गों में होता है, यहाँ भी आप जैसे जैसे ऊपर चढ़ते जायेंगे, आपके चारों ओर के परिदृश्य भी परिवर्तित होते जायेंगे। विशेषतः इस दुर्ग में, जब आप ऊपर चढ़ते जायेंगे, दुर्ग के चारों ओर निर्मित भित्त भी अधिकाधिक दृष्टिगोचर होने लगेगी।

इस दुर्ग की विशालता एवं भित्त की लंबाई आपको आश्चर्य चकित करने लगेगी। इसका सही अनुमान आप प्रत्यक्ष दुर्ग के भीतर जाकर ही लगा सकते हैं। दुर्ग के ऊपर बना महल दो भागों में है। एक भाग महल की स्त्रियों के लिए तथा दूसरा भाग पुरुषों के लिए हुआ करता था। प्रत्येक भाग में भीतर अनेक प्रांगण एवं गुंबज हैं।

शिव मंदिर

दुर्ग की सीमा के भीतर एक अप्रतिम प्राचीन शिव मंदिर है। यह तीन तल का विशाल मंदिर दुर्ग में प्रवेश करते ही हमारे दाहिनी ओर स्थित है। इसके दर्शन अवश्य करिए।

शिव मंदिर कुम्भलगढ़
शिव मंदिर कुम्भलगढ़

हमें बताया गया कि दुर्ग की सीमा के भीतर अनेक छोटे छोटे मंदिर हैं किन्तु हम सबके दर्शन नहीं कर पाए क्योंकि हम उदयपुर से कुम्भलगढ़ की एक-दिवसीय यात्रा के अंतर्गत यहाँ पहुंचे थे। आशा है हम शीघ्र ही अधिक समय के साथ यहाँ पुनः आयेंगे। तब इस दुर्ग के विस्तृत रूप से दर्शन करेंगे। साथ ही समीप स्थित वन्यप्राणी अभयारण्य में भी भ्रमण करेंगे।

बादल महल

इस महल को बादल महल कहते हैं क्योंकि इसकी ऊँचाई इतनी अधिक है कि मेघ इसके झरोखों से भीतर प्रवेश कर सकते हैं। आप इसके गुंबजों के किनारे से इसके सर्वोत्तम तल तक चढ़ सकते हैं जहाँ से आपको दुर्ग का विहंगम दृश्य प्राप्त होगा।

सीढियाँ चढ़ते हुए कैसा दिखता है यह दुर्ग
सीढियाँ चढ़ते हुए कैसा दिखता है यह दुर्ग

दुर्ग परिसर में अनेक बावड़ियाँ हैं जिनमें अनेक प्राचीन हैं तथा कुछ का अब भी निर्माण कार्य जारी है। महल का वह भाग जो पुरुषों के लिए निहित था, उसे अब संग्रहालय के रूप में विकसित किया जा रहा है। यदि आप भविष्य में इस महल के दर्शन के लिए यहाँ आयें तो कदाचित आपको संग्रहालय के अवलोकन का भी अवसर प्राप्त हो जाएगा। साथ ही आप दुर्ग की भित्तियों के ऊपर भी जा सकेंगे।

चट्टान के आधार पर निर्माण
चट्टान के आधार पर निर्माण

यहाँ पर एक विजय द्वार भी है जिसे अब तक कोई भी आक्रमणकारी नष्ट नहीं कर पाया। इसी कारण यह दुर्ग अब तक अजेय ही रहा है। एक यज्ञ शाला भी है जहाँ राज परिवार के सदस्य विभिन्न पूजा-अर्चना एवं धार्मिक अनुष्ठान करते थे। शिव मंदिर एवं इस यज्ञ शाला का निर्माण दुर्ग निर्माण के समय ही किया गया था। दुर्ग के ऊपर से आप मंदिरों का एक अन्य समूह भी देखेंगे

कुम्भलगढ़ दुर्ग के आसपास अनेक रिसोर्ट एवं होटल हैं। वन्यजीव अभयारण्य में प्राणियों एवं वन्य समृद्धि का अवलोकन करने के लिए आप जंगल सफारी कर सकते हैं। जंगल के आसपास पदभ्रमण के भी अनेक पर्याय हैं किन्तु आप उन्हें वर्ष में एक सीमित कालावधि के भीतर ही कर सकते हैं क्योंकि यह क्षेत्र अत्यंत शुष्क एवं उष्ण है। आप कुम्भलगढ़ दुर्ग एवं रणकपुर का एक साथ दर्शन, उदयपुर से एक रोचक एक-दिवसीय यात्रा के अंतर्गत कर सकते हैं।

पर्यटकों के लिए आवश्यक सूचनाएं

  • कुम्भलगढ़ दुर्ग पर्यटकों द्वारा अवलोकन के लिए खुला है।
  • यह गढ़ पर्यटकों के लिए सप्ताह के सातों दिवस प्रातः ८ बजे से सायं ६ बजे तक खुला रहता है। केवल राष्ट्रीय अवकाशों पर पूर्व सूचना अवश्य प्राप्त कर लें।
  • प्रवेश शुल्क नाम मात्र है।
  • गढ़ के भीतर छायाचित्रीकरण की अनुमति है। इसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क भी नहीं लिया गया।
  • यदि आपको ऊँचाई से भय लगता हो तो आप गढ़ के ऊपर सावधाने बरतें।
  • इस गढ़ के भीतर उतार-चढ़ाव पर चलना पड़ता है। साथ ही सीढ़ियाँ भी चढ़नी उतरनी पड़ती हैं। यदि आपका स्वास्थ्य अथवा वय इसकी अनुमति ना दे तो गढ़ में कितने भीतर तक जाना है अथवा कितने ऊपर तक जाना है, अपने शारीरिक परिस्थिति के अनुसार इसका निर्णय लें। इन परिस्थितियों में आप गढ़ के प्रवेश द्वार, राम पोल को देख सकते हैं। निकट स्थित शिव मंदिर जा सकते हैं। नीचे से गढ़ का विहंगम दृश्य प्राप्त होता है, उसे निहार सकते हैं।
  • गढ़ में चढ़ने, दुर्ग का अवलोकन करने, अरावली पर्वतमाला के परिदृश्यों को निहारने तथा अन्य पर्वत शिखरों को देखने आदि में आप आसानी से दो घंटे व्यतीत कर सकते हैं।
  • गढ़ के विस्तृत भित्तियों के ऊपर पैदल सैर कर सकते हैं। किन्तु इसके लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता होगी।
  • गढ़ के वसाहती क्षेत्र में स्थित चित्रों के अवशेष अत्यंत रोचक हैं। उन्हें अवश्य देखिये।
  • मरूक्षेत्र होने के कारण दिन के समय यहाँ अत्यंत उष्णता एवं शुष्कता होती है।
  • अपने साथ पेयजल रखना अत्यावश्यक है। साथ ही सूर्य की तीखी किरणों से स्वयं का रक्षण करने के लिए तथा सर ढंकने के लिए आवश्यक प्रबंध करना ना भूलें।
  • कुम्भलगढ़ भ्रमण एवं उसके निवांत अवलोकन के लिए सर्वोत्तम समय शीत ऋतु है।
  • यदि आपके पास समय हो तथा आपकी रूचि हो तो समीप स्थित रणकपुर जैन मंदिर देखना ना भूलें। साथ ही कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में भी अवश्य सफारी करें।
  • उदयपुर में ठहरते हुए, एक टैक्सी किराए पर लेकर कुम्भलगढ़ दुर्ग एवं रणकपुर जैन मंदिर, दोनों का अवलोकन व दर्शन एक-दिवसीय भ्रमण के रूप में आप आसानी से कर सकते हैं।

यदि आप उदयपुर में अथवा उसके समीप जा रहे हों तो इस गढ़ का भ्रमण अवश्य करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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