महुआ के फूलों के रंग – छत्तीसगढ़ यात्रा के कुछ अनुभव

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प्रातः बिखरे महुआ के हलके पीले पुष्प
प्रातः बिखरे महुआ के हलके पीले पुष्प

महुआ के महकते फूल – अब तक इन फूलों के बारे में मैंने सिर्फ कहानियों, गीतों और लोककथाओं में ही सुना था। मुझे कभी भी इन फूलों को प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर नहीं मिला था। लेकिन संयोग से हमारी छत्तीसगढ़ की यात्रा के दौरान मुझे महुआ के फूलों को समीप से देखने का, तथा उनसे जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण और रोचक सी बाते भी जानने का अवसर मिला।

जब हम छत्तीसगढ़ पहुंचे तो वहाँ का पूरा वातावरण ही महुआ के हलके पीले रंग में रंगा हुआ था। फिर हमे पता चला कि यह महुआ की ऋतु चल रही है। हर सुबह होटल से बाहर निकलते ही आँगन में, सड़को पर चारों ओर महुआ के फूल बिखरे हुए होते थे। सूरज निकलते ही यहाँ के लोग, खास कर महिलाएं और छोटी-छोटी लड़कियां अपनी-अपनी टोकरियाँ लेकर गिरे हुए फूल इकट्ठा करने के लिए निकल पड़ती हैं। यहाँ के सभी घरों के आँगन इन पीतवर्णी फूलों से भरे हुए थे।फूलों को धूप में सुखाने के लिए बिछाया गया था। यहाँ की सड़कों से गुजरते हुए, रास्ते में स्थानीय लोगों से बातचीत करते हुए हमे इन मोहक फूलों के बारे बहुत कुछ जानने का अवसर मिला। महुआ के पीत रंग में रंगे ये अनुभव बहुत आनंददायक और ज्ञानवर्धक थे।

महुआ के फूल

फूल बटोर के ले जाती महिलाएं एवं बच्चियां
फूल बटोर के ले जाती महिलाएं एवं बच्चियां

महुआ का पुष्पणकाल 2-3 महीनों तक चलता है जो मार्च अप्रैल के महीने में आता है। इस दौरान पूरे दिन इसके ऊंचे-ऊंचे पेड़ों से उनके फूल झड़ते रहते हैं। फीके से पीले रंग के ये फूल मुह के बल जमीन पर गिरे हुए होते हैं जिन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी ने जमीन पर कालीन बिछा दी हो। अगर आप जंगलों में जाए तो वहाँ पर ये फूल आपको सूखे पत्तों पर गिरे हुए मिलेंगे जो अपने आप में सुंदर आकृतियाँ निर्मित करते हैं।

इन दिनों पुरुष, महिलाएं और बच्चे सभी अपनी-अपनी टोकरियाँ लेकर घर से निकलते हैं और पूरा दिन महुआ के फूल इकट्ठा करने में व्यस्त रहते हैं। वे सिर्फ दोपहर के मध्यांतर के दौरान खाना खाने के समय ही थोड़ा आराम करते हैं और अपनी टोकरियाँ खाली करके फिर से फूल इकट्ठा करने चले जाते हैं। यहाँ की सड़कों से गुजरते हुए आप लोगों को फूलों से भरी टोकरियाँ लेकर रास्ते पर चलते हुए देख सकते हैं। इनके साथ छोटी-छोटी लड़कियां भी होती हैं, जो अपनी छोटी सी टोकरियाँ लेकर फूल इकट्ठा करती हुई नज़र आती हैं।

रात के समय इन पेड़ों के आस-पास गिरे सूखे पत्तों को जलाया जाता है, ताकि अगली सुबह इस काली राख पर बिखरे पीले फूलों को इकट्ठा करने में आसानी हो, नहीं तो हो सकता है कि उन पत्तों की आड़ में कुछ फूल उनकी नज़र से छूट जाए। रात के समय उस काले घने अंधेरे में जब हमने इन पेड़ों के आस-पास पत्तों के जलते ढेरों को देखा तो यह पूरा दृश्य हमे थोड़ा डरावना सा लगा।

महुआ का पेड़                                                                                                      
रात को जलते महुआ के जंगले
रात को जलते महुआ के जंगले

मध्य भारत एवं छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदायों में महुए के पेड़ को बहुत ही पवित्र माना जाता है। इस वृक्ष के लगभग सभी भाग मनुष्य के लिए उपयोगी होते हैं। इसकी छाल में औषधीय गुण होते हैं। इसके बीज से उर्वरक बनाया जाता है और उससे निर्मित तेल ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके तेल को साबुन इत्यादि बनाने के उपयोग में भी लाया जाता है।

महुआ का वैज्ञानिक नाम मधुका लोंगफोलिआ है । इसका एक वृक्ष साल भर में २०० किलो तक तेल दायक बीज दे सकता है। महुआ के पत्ते टसर सिल्क का रेशा बनाने वाले कीटों को खिलाये जाते हैं।

महुआ के फूलों का व्यवसाय

महुआ का फूल
महुआ का फूल

सामान्य तौर पर एक व्यक्ति एक दिन में लगभग 5-6 किलो तक फूल इकट्ठा कर सकता है, जो सुखाने के पश्चात उसके आधे रह जाते हैं। इन फूलों को सुखाने के बाद उन्हें 30-40 रुपया प्रति किलो के हिसाब से बाज़ार में बेचा जाता है।

महुआ का फूल व्यंजन सामग्री तथा औषधीय वनस्पति के रूप में घरेलू नुस्खों में भी इस्तेमाल होता है। जैसे कि व्यंजन सामग्री के रूप में महुआ का फूल खाद्य पदार्थों में वासक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। यानी हो सकता है कि आपको साधारण से उबले हुए चावल की जगह महुआ की भीनी बीनी सुगंध में पकाए हुए चावल परोसे जाए। अचार बनाने के लिए भी इनका उपयोग किया जाता है। पशुओं को भी यह फूल खिलाया जाता है और यो बड़े शौक से इसे खाते हैं। औषधीय वनस्पति के रूप में यह मनुष्य और पशु जाती में स्तनपान कराने वाली माताओं को दिया जाता है। कहा जाता है कि इससे शरीर को ज्यादा दूध उत्पन्न करने में सहायता होती है।

महुआ के फूलों से उत्पादित सबसे प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण वस्तु है देसी मद्य। आखिरकार यह वही फूल है जो हाथियों को भी मदमस्त बना सकता है। स्थानीय जनजातियों के लिए यह उनकी संस्कृति का एक भाग है। उनका कोई भी उत्सव महुआ के मद्यपान के बिना पूरा नहीं होता। आम तौर पर सूखे हुए फूलों के साथ गुड मिश्रित करके यह मद्यपान बनाया जाता है। अब मुझे पता चला कि महुआ नाम के साथ हमेशा एक विचित्र मद्यता क्यों जुडी हुई है।

छत्तीसगढ़ में मैंने जाना की महुआ जैसे फूल न केवल नयनसुख देते हैं, अपितु यह स्थानीय अर्थ व्यवस्था में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। बहुत परिवारों का चूल्हा इनको बीन कर बेचने से चलता है तो बाकि लोगों के अपने मध्य एवं सुगंध से आनंदित करते हैं।

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