मुम्बा देवी की मुंबई – नगर के प्राचीन मंदिरों की यात्रा

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अनुराधा गोयल – मुंबई निवासी भरत गोठोसकर मेरे घनिष्ठ मित्र हैं जो मुंबई के धरोहरों से सम्बंधित मेरी सभी जिज्ञासाओं को सहर्ष व अविलम्ब शांत करते रहते हैं। हमारी प्रथम भेंट पर वे मुझे लोअर परेल ले गए थे जहां उन्होंने मुझे मुंबई के प्राचीन इतिहास से सम्बंधित एक अप्रतिम शिल्प दिखाया था। मेरी पिछली मुंबई यात्रा के समय मुम्बा देवी मंदिर के दर्शन की मेरी तीव्र अभिलाषा थी। तब भी भरत ही मुझे वहां ले गए थे। दर्शन के पश्चात वे मुझे मंदिर के समीप के क्षेत्र में पदयात्रा के लिए ले गए। उन्होंने मुझे जो दिखाया, उसने मुझे विस्मित कर दिया था. मैंने मुंबई की परतों के भीतर स्थित वह मंदिर नगरी देखी जिसका अस्तित्व मेरे लिए लुप्त हो चुका था। वे सदा मुझे मुंबई के उन आयामों के दर्शन कराते रहे हैं जिनका मुझे अनुमान तक नहीं होता है। इसीलिए आज मैंने उनसे अनुरोध किया है कि वे हमें मुंबई के उस भाग के विषय में बताएं जिनसे हम अनभिज्ञ हैं। भरत, आज की चर्चा में आपका स्वागत है।

मुंबई के मंदिरों की खोज

अनुराधा – भरत, आज की चर्चा का आरम्भ हम मुम्बा देवी से करते हैं जिन्होंने मुंबई को अपना नाम प्रदान किया है। हमें उनके मंदिर, उसका इतिहास एवं मुंबई से उनके संबंधों के विषय में कुछ जानकारी दें।

मुंबई स्थित मुम्बा देवी मंदिर
मुंबई स्थित मुम्बा देवी मंदिर

भरत – कई लोगों को ऐसा भ्रम है कि सन् १९९५ में बॉम्बे का नाम परिवर्तित कर मुंबई रख दिया है। यह सही नहीं है। यह द्वीप लगभग १२वीं या १३वीं सदी से ही मुंबई के नाम से जाना जाता रहा है। इस नाम की पृष्ठभूमि में एक अत्यंत रोचक कथा है। किवदंतियों के अनुसार यहाँ के निवासियों ने देवी से प्रार्थना की थी कि वे मुम्बारख राक्षस से उनकी रक्षा करें। चूंकि देवी ने मुम्बारख राक्षस से उनकी रक्षा की थी, भक्तगण उन्हें मुम्बा देवी के नाम से पुकारने लगे। अतः मुम्बारख की संहारक मुम्बा देवी कहलाई।

यह अत्यंत रोचक है कि दिल्ली के सुलतान मुबारक शाह को ही स्थानिक मुम्बारख राक्षस मानते थे। अलाउद्दीन खिलजी के पुत्र ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किया था। लोगों की श्रद्धा है कि देवी ने ही उनकी रक्षा की थी। अतः, दिल्ली रियासत का भी मुंबई नाम से कुछ सम्बन्ध अवश्य है।

मूल मुम्बा देवी मंदिर

मुम्बा देवी की मनोहर मूर्ति
मुम्बा देवी की मनोहर मूर्ति

मूल मंदिर लगभग उसी स्थान पर स्थित था जहां अब छत्रपति शिवाजी महाराज रेल स्थानक स्थित है। उस काल में यह औपनिवेशिक बॉम्बे नगर में, बाजार द्वार के ठीक बाह्य भाग में स्थित था। इस क्षेत्र की स्वच्छता के समय उन्होंने इसे वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित किया था जो मूल नगरी है। दुर्ग क्षेत्र श्वेत नगर था जहां अंग्रेज निवास करते थे। स्थानीय निवासी दूसरी ओर निवास करते थे जिसे मूल नगर माना जाता है। अतः, क्रोफर्ड बाजार के उत्तर में मुम्बा देवी ने अपना नवीन स्थान निश्चित किया। मुम्बा देवी का नवीन मंदिर दो सौ वर्ष प्राचीन है।

अनुराधा – जी। तो बॉम्बे अथवा बम्बई नाम कैसे पड़ा?

भरत – इसके पृष्ठभाग में कई अनुमान हैं। कुछ का मानना है कि बम्बई शब्द की युत्पत्ति बोम्बाया शब्द से हुई है जो एक पुर्तगाली शब्द है। इसका अर्थ “अच्छी खाड़ी’ होता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, इस क्षेत्र में बिम्बस्थान नामक एक राजा था जिसका सात द्वीपों पर साम्राज्य था तथा माहिम में उसकी राजधानी थी। कदाचित बिम्बस्थान शब्द ही अपभ्रंशित होता हुआ बॉम्बे में स्थिर हो गया। कुछ प्राचीन पुर्तगाली मानचित्रों में इस नगर को मुम्बईम के नाम से दर्शाया गया है। इस प्रकार बॉम्बे अथवा बम्बई से सम्बंधित अनेक सिद्धांत हैं किन्तु उनसे सम्बंधित लिखित अभिलेख नहीं हैं।

अनुराधा – आपके साथ इस क्षेत्र के भ्रमण के पश्चात मैंने मुंबई से सम्बंधित कुछ शोध किया था। तब मुझे मुम्बा देवी महात्म्य के विषय में ज्ञात हुआ।

भरत – जी हाँ। उसी ग्रन्थ में मुम्बारख राक्षस एवं उसकी कथा का उल्लेख है।

मुम्बा देवी मंदिर के आसपास अन्य मंदिर

अनुराधा –क्या आप मुम्बा देवी मंदिर के आसपास स्थित मंदिरों के विषय में बताएँगे, जो आपने मुझे दिखाए थे?

भरत –  आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि मुम्बा देवी मंदिर से भी अधिक प्राचीन कुछ मंदिर थे जिन्हें अन्यत्र स्थानांतरित किया गया था। गोवा राज्य के समान, उन मंदिरों को भी पुर्तगाली साम्राज्य में नष्ट किया गया था। उसी प्रकार, मुंबई के उत्तर में वसई से लेकर दमन तक तथा दक्षिण में अलीबाग तक के क्षेत्र पुर्तगालियों के अधीन थे। उस काल में अनेक मंदिरों को नष्ट किया गया था तथा अंग्रेजी शासनकाल में उनका पुनर्निर्माण किया गया था।

अधिकाँश मंदिरों का निर्माण ५० वर्ष पूर्व किया गया था जिनमें भूलेश्वर जैसे क्षेत्र के आकर्षण प्राचीन मंदिर भी सम्मिलित हैं। भुलेश्वर तीन सौ वर्ष प्राचीन एक भव्य मंदिर है। इसमें एक सुन्दर नगारखाना है। प्रवेश द्वार पर उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित एक कक्ष है जहां संगीतज्ञ विराजमान होते थे। महल अथवा हवेली का प्रवेशद्वार भव्य होता है। किसी भी अनुष्ठान के समय, गणमान्य व्यक्तियों एवं भक्तगणों के प्रवेश करने से पूर्व नगारखाने में वाद्ययंत्र बजाये जाते थे। भुलेश्वर का नगारखाना भी अत्यंत आकर्षक है जिस पर की गयी शिल्पकारी नासिक, गुजरात अथवा खानदेश की शैली के समान है।

स्थापत्य

मंदिर नागर स्थापत्य शैली में निर्मित है जो एक उत्तर भारतीय स्थापत्य शैली है। सभा मंडप ढलुआ लौह स्तंभों से युक्त है। मुंबई विभिन्न संस्कृतियों तथा व्यक्तित्वों का सर्वदेशीय मिश्रण है। यही उसकी स्थापत्य शैली के विषय में भी कहा जा सकता है। इसका प्रवेश द्वार पुर्तगाली तोरण के समान है जिस पर गुजरात शैली का नगारखाना है। विभिन्न शैलियों का बेमेल सम्मिश्रण ही इस मंदिर की विशेषता है।

जवेरी बाजार में स्थित मुम्बा देवी का मंदिर प्रमुख मंदिर है। समीप ही, कपड़ा मंडी में कालबा देवी अथवा कलिका देवी का मंदिर है। भूलेश्वर में अनेक संकरी तथा अत्यंत भीड़भरी गलियाँ हैं, जैसे फूल गली, चाँदी गली तथा पापड़ गली। किन्तु उनमें कुछ अत्यंत आकर्षक मंदिर हैं।

मोटा मंदिर

इनमें से मेरा सर्वाधिक प्रिय मंदिर है, मोटा मंदिर, जो ढाई एकड़ के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। मुंबई जैसे नगर में ढाई एकड़ की भूमि पर एक मंदिर का होना स्वयं में विशेष है। कृष्ण को समर्पित, ढाई सौ वर्ष प्राचीन यह मंदिर वास्तव में एक राजमहल है जहां उनके बालरूप की आराधना की जाती है। प्रातः से रात्रि तक उन्हें लोरी गाकर सुलाया व उठाया जाता है। उन्हें छप्पन भोग अर्पित किये जाते हैं। उनकी गायों को चराने के लिए घास के मैदान हैं। विशेष आयोजनों में यहाँ कृष्ण भगवान की राजसभा लगती है जहां उनके दरबारी उनसे भेंट करने आते हैं। सम्पूर्ण सभागृह उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित लकड़ी से निर्मित है।

समुद्री माता

समुद्री माता मंदिर भी अतिविशेष है क्योंकि यह दुर्लभ है। पूर्व में मैंने कराची में स्थित, समुद्र देव को समर्पित, वरुण मंदिर के विषय में पढ़ा था। भारत के दक्षिण में भी समुद्र देव का एक मंदिर है।

अनुराधा – दमन में भी एक मंदिर है जिसे समुद्र नारायण वरुण देव मंदिर कहते हैं।

भरत – यह रोचक जानकारी है। समुद्री माता मंदिर भी रोचक है क्योंकि भूलेश्वर चारों ओर से भूमि से घिरा हुआ है। तो, समुद्री माता यहाँ कैसे आयी? मानचित्र देखकर हमें ज्ञात हुआ कि यहाँ पृथक पृथक सात द्वीप थे जिनका हृदयस्थल वर्तमान का दक्षिण बॉम्बे है जो उस काल में दलदल युक्त जलमग्न भूमि थी। एक काल में भूलेश्वर समुद्र के समक्ष था तथा समुद्री माता मंदिर कदाचित समुद्रतट पर स्थित था। दलदली भूमि के पुनरुद्धार के पश्चात सम्पूर्ण दृश्य परिवर्तित हो गया है।

पंचमुखी हनुमान मंदिर मुंबई
पंचमुखी हनुमान मंदिर मुंबई

पंचमुखी हनुमान मंदिर में हनुमानजी की पंचमुखी प्रतिमा है जिनके चार मुख चार दिशाओं की ओर हैं तथा पाँचवाँ मुख आकाश की ओर है। रामायण कथा के अनुसार पाताल का अधिपति अहिरावण भगवान राम एवं लक्ष्मण का अपहरण कर उन्हें पाताललोक ले गया तथा उनका वध करना चाहा। तब अहिरावण का वध करने के लिए हनुमान ने विशेष पंचमुखी अवतार धारण किया जिसमें क्रमशः वराह, अश्व, नृसिंह, वानर तथा गरुड़ के मुख हैं। यह इसलिए क्योंकि अहिरावण को वरदान प्राप्त था कि जो पांच दिशाओं में स्थित पांच दीपकों को एक साथ बुझाए, वही अहिरावण का वध कर सकता है। इस प्रकार हनुमान ने पांच दिशाओं के दीपक एक साथ बुझाए तथा अहिरावण का वध किया। इससे पूर्व मैंने अनेक पंचमुखी हनुमान देखे हैं किन्तु केवल इसी प्रतिमा में हनुमान के पांच मुख वास्तव में पांच दिशाओं में हैं।

अनुराधा – वह प्रतिमा प्राकृतिक शिला दृष्टिगोचर होती है।

भरत – जी। मुंबई की रचना ज्वालामुखी के कारण हुई है। यह प्रतिमा भी एक ज्वालामुखी चट्टान है। यह मंदिर भूलेश्वर मंदिर के समक्ष स्थित है। इसके विषय में अधिक लोगों को जानकारी नहीं है क्योंकि वहां कोई सूचना पटल भी नहीं है। यहाँ अधिकतर स्थानीय भक्तगण ही आते हैं।

अनुराधा – मुंबई जैसे भीड़भाड़ भरे नगर की तुलना में यह एक विशाल मंदिर है।

भूलेश्वर मंदिर

भरत – मुंबई का प्रथम स्वामीनारायण मंदिर भी भूलेश्वर में है जो तीजा भोईवाड़ा में स्थित है। यह आकर्षक मंदिर उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित एवं चित्रित है। इसका दर्शन नेत्रों को तृप्त कर देता है। ऐसा ही एक भव्य स्थान है, सूरजवाड़ी, जहां एक सूर्यनारायण मंदिर है। यह प्रतिदिन प्रातः सूर्योदय के समय खुलता है तथा संध्या सूर्यास्त के समय बंद होता है। यह अत्यंत विशेष है क्योंकि मुंबई में इसके अतिरिक्त कोई अन्य सूर्य मंदिर नहीं है। सबसे निकट कदाचित मोढेरा सूर्य मंदिर होगा।

अनुराधा – अधिक लोग यह नहीं जानते हैं कि दिल्ली में भी अनेक सूर्य मंदिर थे। किन्तु सूरजकुंड के अतिरक्त अन्य सभी मंदिर नष्ट हो गए हैं। आशा है उनका पुनर्निर्माण शीघ्र किया जाएगा। एक प्रश्न मेरे मस्तिष्क में कौंध रहा है। यदि ये सभी मंदिर अधिकतम ३०० से ४०० वर्ष प्राचीन हैं, तो मुंबई का प्राचीनतम वसाहती क्षेत्र कौन सा है?

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भुलेश्वर मंदिर मुंबई
भुलेश्वर मंदिर मुंबई

वाल्केश्वर

भरत – इन सात द्वीपों में से एक मुंबई था। औपनिवेशिक काल में हिन्दू समाज व्यापार द्वारा जीविकोपार्जन करता था। उन्होंने ये मंदिर ब्रिटिश राज में बनाए थे किन्तु इससे पूर्व भी वहां एक प्राचीन तीर्थ उपस्थित था। पुराणों में उसका उल्लेख है। इसे वाल्केश्वर मंदिर कहा जाता है क्योंकि इस क्षेत्र के मुख्य आराध्य वाल्केश्वर देव हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस क्षेत्र में ऋषि गौतम का आश्रम था। भगवान राम नासिक के पंचवटी से लंका की ओर प्रस्थान करते समय यहाँ आये थे। यहाँ गौतम ऋषि ने उन्हें भगवान शिव की आराधना करने का परामर्श दिया जिसके लिए उन्हें काशी से स्फटिक का लिंग लाने के लिए कहा। भगवान राम ने लक्ष्मण को लिंग लाने के लिए भेजा। लक्ष्मण को आने में विलम्ब होता देख भगवान राम ने बालू से लिंग की रचना की। उस लिंग को वालुका कहा जाता है। उस लिंग के कारण भगवान शिव को वालुकेश्वर कहा जाता है। यह एक भव्य मंदिर है।

शिलाहार राजवंश

लगभग सहस्त्र वर्ष पूर्व यहाँ शिलाहार राजवंश का साम्राज्य था जिन्होंने अनेक मंदिरों का निर्माण कराया था। उनमें से एक मंदिर अब भी विद्यमान है जो मुंबई की सीमा पर स्थित है। यह अम्बरनाथ मंदिर है जो एक आकर्षक मंदिर है। ठीक इसी प्रकार का मंदिर उस स्थान पर भी था जहां अब राजभवन है। वह वाल्केश्वर मंदिर था जिसे इस्लामिक आक्रमणकारियों ने तोप के गोलों से नष्ट कर दिया था। पुर्तगाली इस मंदिर को ब्लैक पैगोडा कहते थे। बाणगंगा नामक जलकुंड अथवा तीर्थ के एक कोने में स्थित विभिन्न समाधियों में इस मंदिर के अवशेष अब भी प्राप्त होते हैं।

एक अन्य किवदंती के अनुसार, यहाँ फुटबाल मैदान के आकार की एक बावडी थी। चूँकि इस क्षेत्र के समीप मीठे जल का कोई स्त्रोत नहीं था तथा यह स्थान चारों ओर से खारे समुद्र से घिरा था, भगवान राम ने भूमि पर अपना तीर साधा, जिससे भोगवती अथवा देवी गंगा बाहर आयी तथा मीठे जल का स्त्रोत प्रस्फुटित हुआ। इस जल को एकत्र करने के लिए जलकुंड का निर्माण किया गया। कालांतर में शिलाहार शासनकाल में जलकुंड के भीतर जाने के लिए सीढ़ियों का निर्माण कराया गया। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि ज्वालामुखी के कारण यहाँ गड्ढा हो गया है जहां जल एकत्र होता है। किन्तु समुद्र के इतने समीप मीठे जल का स्त्रोत विद्यमान होना, स्वयं में एक आश्चर्यजनक घटना है।

प्राचीनतम संरचना

वाल्केश्वर मंदिर वास्तव में दक्षिण मुंबई की प्राचीनतम संरचना है। यद्यपि मुंबई नगरपालिका की सीमा की दृष्टि से कान्हेरी गुफाएं प्राचीनतम हो सकती हैं, तथापि मूल सीमा के अनुसार यह मंदिर प्राचीनतम संरचना है। इसके चारों ओर अनेक अन्य मंदिर हैं।

यह भी सत्य है कि मूल मंदिरों के पूर्णतः नष्ट होने के पश्चात ब्रिटिश काल में उनका पुनर्निर्माण कराया गया था। भूलेश्वर मंदिर के समान ये मंदिर भी विभिन्न शैलियों के सम्मिश्रण हैं। नागर शैली के मंदिर होते हुए भी उनके ऊपर गुम्बद हैं। इस्लाम आक्रमणों के पश्चात देश की स्थापत्य शैली में गुम्बद, तोरण एवं सुरक्षा कक्ष का पदार्पण हुआ जिसके कारण संरचनाओं में मस्जिद की शैली का आभास होने लगा। वाल्केश्वर मंदिर के गर्भगृह के ऊपर भी गुम्बद है। उसके समक्ष सभागृह है जिसमें सुन्दर उत्कीर्णन किया गया है।

बालाजी मंदिर में मराठी शैली का उत्कृष्ट काष्टकला की गयी है। कुछ ऐसे मंदिर हैं जिनके गर्भगृह नागर शैली के हैं तथा उनके सभागृह कोंकण शैली के हैं जिनके भीतर मंगलोर टाइलें लगी हुई हैं। ऐसे मंदिर बहुधा कोंकण क्षेत्र में दृष्टिगोचर होते हैं।

एक अन्य भव्य मंदिर है, सिद्धेश्वर मंदिर। मान्यताओं के अनुसार इसका निर्माण पेशवा रघुनाथराव ने करवाया था। पूर्णतः शिलाओं द्वारा निर्मित यह मंदिर दक्खन शैली का मंदिर है जो पुणे एवं कोल्हापुर के मंदिरों से साम्य रखता है।

साधू अखाड़ा

नासिक, उज्जैन, बनारस अथवा कानपूर के अखाड़ों जैसे अनेक अखाड़े यहाँ भी हैं जो मुझे अचंभित करते हैं। ये साधू अखाड़े हैं। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी काल में आक्रमणकारियों से अपने धर्म के रक्षण हेतु साधुओं ने भी कदाचित अस्त्र-शस्त्र उठाये थे। कालांतर में जयराम गीर बाबा अखाड़ा जैसे कुछ अखाड़े मिठाई की दुकानों अथवा वसाहत क्षेत्र में परिवर्तित हो गए हैं। अन्य अखाड़े अब मंदिर बन गए हैं। इन अखाड़ों से सटे हुए साधुओं के समाधि स्थल हैं। आप जानते हैं कि साधुओं का अंतिम संस्कार नहीं किया जाता, अपितु उन्हें पद्मासन की स्थिति में समाधि दी जाती है।

समाधियाँ चौकोर आकार की हैं। यदि समाधि के ऊपर शिवलिंग हो तो वह साधू की समाधि होती है, वहीं, यदि समाधि पर दो पदचिन्ह उत्कीर्णित हो तो वह साध्वी की समाधि होती है। एक काल में यहाँ अनेक अखाड़े तथा समाधिस्थल थे किन्तु अब कुछ ही शेष रह गए हैं।

इन्चगिरी सम्प्रदाय

नवनाथपुर में इन्चगिरी नामक एक सम्प्रदाय है। उनके एक संत सिद्धरामेश्वर जी की समाधि बाणगंगा में है। औपनिवेशिक काल में मालाबार हिल्स में अनेक राजपरिवारों के महल थे। यहाँ अनेक समाधियाँ ऐसी हैं जो उन राजपरिवारों से सम्बंधित हैं, जैसे गोंडल अथवा अंग्रेज राजशाही। लोग बाणगंगा को केवल एक तीर्थ मानते हैं। वे वहां जाकर प्रार्थना अवश्य करते हैं किन्तु उस स्थान के सत्व को जाने बिना ही लौट आते हैं। वे बहुधा किसी परिजन के अंतिम विधियों के लिए जाते हैं किन्तु वहां स्थित धर्मशालाओं, समाधियों, मंदिरों इत्यादि के दर्शन किये बिना वापिस आ जाते हैं।

लक्ष्मीनारायण मंदिर
लक्ष्मीनारायण मंदिर

पंजाबी धर्मशाला अत्यंत विशेष है जिस पर ‘अमृतसर के दुकानदारों की धर्मशाला’ लिखा हुआ है। इस धर्मशाला का निर्माण अमृतसर के दुकानदारों ने निधि एकत्र उन दुकानदारों के ठहरने के लिए बनवाया था जो दर्शन के लिए अमृतसर से मुंबई जाते हैं। सौ वर्ष पूर्व पंजाब से के. एल. सहगल जैसे अनेक चित्रपट कलाकार मुंबई आये थे। उनमें से अनेक कलाकार पंजाबी धर्मशाला में ठहरे थे। बॉलीवुड के अनेक चित्रपटों में होली के जो दृश्य दिखाए जाते हैं, उनका आरम्भ वाल्केश्वर के पंजाबी धर्मशाला में ही हुआ था। समुद्र के समक्ष स्थित यह धर्मशाला अब चिंतनीय स्थिति में है।

कृष्ण मंदिर

कृष्ण का मूल मंदिर समुद्र की लहरों के थपेड़ों के कारण नष्ट हो गया है। किन्तु उन अवशेषों से भी अत्यंत रोचक जानकारी प्राप्त होती है। यहाँ एक जयंत समाधि है। ऐसा माना जाता है कि अनुराग नामक एक भवन में एक साधू ने जीवित समाधि ली थी। मान्यता है कि वे अब भी चिरकालीन ध्यान में मग्न हैं। यहाँ अनेक ऐसे छोटे छोटे किन्तु महत्वपूर्ण तत्व हैं जिन्हें पर्यटकों को देखना चाहिए।

एक मंदिर परशुराम का भी है। किवदंतियों के अनुसार, परशुराम ने सह्याद्री पर्वत श्रंखला पर खड़े होकर समुद्र की ओर अपना परशु फेंका था जिससे समुद्र पीछे चला गया तथा कोंकण क्षेत्र की उत्पत्ति हुई। उन्होंने इस क्षेत्र का नाम अपनी माताजी, रेणुका के नाम पर रखा था जिन्हें कोंकणा भी कहते थे। परशुराम ने अपना परशु किस ओर फेंका था तथा वह कहाँ गिरा था, इस विषय में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार उनका परशु बाणगंगा में गिरा था जिससे बाणगंगा सरोवर की रचना हुई थी। भंसाली परिवार ने एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया है। मेरे अनुमान से संजय लीला भंसाली इसी परिवार से सम्बन्ध रखते हैं।

विट्ठल रुक्मिणी

विट्ठल रुक्मिणी का एक छोटा सा मंदिर है जो चार राज्यों से सम्बंधित है। मंदिर महाराष्ट्र के मुंबई में है। भगवान को कन्नड़ विट्ठल कहते हैं, अर्थात् वे कर्णाटक से सबंधित हैं तथा कन्नड़ भाषी हैं। मंदिर का निर्माण एक गुजरती परिवार ने किया है तथा उन्हें राजस्थान के श्रीनाथजी जैसे वस्त्र एवं आभूषणों से सज्ज किया है। जैसे मुंबई सर्वदेशीय है उसी प्रकार यह मंदिर भी सार्वभौमिक प्रतीत होता है।

यहाँ दो मठ भी हैं। कैवल्य मठ, जिसे कवलम मठ भी कहते हैं, उसकी एक सहायक शाखा मुंबई में है। ३-४ सदियों प्राचीन मठ में माँ शांतादुर्गा की प्रतिमा है। इस प्रकार मुंबई में माँ शांतादुर्गा का निवास वाल्केश्वर है। यह काशी मठ की सहायक शाखा है। इस प्रकार वालकेश्वर में अत्यंत दुर्लभ स्थानों के दर्शन होते हैं।

मालाबार हिल्स

मालाबार हिल्स के विषय में रोचक तथ्य यह है कि इसका नाम मालाबार के आये तीर्थ यात्रियों के कारण पड़ा है। मुंबई के दक्षिण का सम्पूर्ण भाग मालाबार कहलाता था। वहां एक श्री गुंडी थी तथा चट्टान पर एक चाक था जिसे दिव्य योनी कहा जाता था। ऐसी मान्यता है कि वहीं से सभी की उत्पत्ति हुई है। जो वहां से होकर जाए उसका भी पुनर्जन्म हो जाता है तथा वह अपने सभी पापों से मुक्ति पा जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि छत्रपति शिवाजी यहाँ आये थे। कदाचित शिवाजी महाराज मुंबई में केवल इसी स्थान में आये थे। यह चट्टान कदाचित ३० वर्षों पूर्व तक अस्तित्व में थी किन्तु समुद्र के थपेड़ों के कारण क्षतिग्रस्त होकर समुद्र में गिर गयी।

अनुराधा – मैं बाणगंगा को सदा ही मुंबई एवं मीठे जल का उत्पत्ति स्थान मानती हूँ। अन्य सभी तत्व कालांतर में प्रकट हुए थे। मीठे जल का स्त्रोत यह दर्शाता है कि यहाँ सदा से वसाहत रही थी।

भरत – जी हाँ। १२ सदियों से यहाँ वसाहत रही है। उससे पूर्व में भी रही होगी जो उजड़ गयी होगी।

अनुराधा –  भरत, मुंबई की गुफाओं के विषय में भी कुछ बताएं।

कान्हेरी गुफाएं

भरत – मुंबई में विभिन्न समयावधियों की अनेक गुफाएं हैं। मेरे अनुमान से कान्हेरी गुफाएं सर्वाधिक पुरातन हैं, ईसा से भी पूर्व। इसके अतिरिक्त, महाकाली है, जो ५-६वीं सदी में निर्मित गुफा मंदिर है। जोगेश्वरी एवं मंडपेश्वर में भी गुफाएं हैं। मगट्ने गुफाओं की दशा अत्यंत चिंताजनक है। गुफाओं के भीतर ही झुग्गी बस्ती है। उन्हें यह ज्ञात ही नहीं है कि वहां गुफाएं हैं।

एक काल में पुर्तगालियों ने मंडपेश्वर को गिरिजाघर में परिवर्तित कर दिया था। उस पर अनेक ईसाई चिन्ह भी अंकित किये गए थे। महाकाली बौद्ध गुफा है, यद्यपि लोग इसे महाकाली मंदिर मानते हैं। जोगेश्वरी एक हिन्दू गुफा है तथा कदाचित प्राचीनतम जीवंत मंदिरों में से एक है। मुझे विश्वास है कि जोगेश्वरी के अधिकांश निवासियों ने इस मंदिर को नहीं देखा होगा क्योंकि यह झुग्गी-झोपड़ियों से पूर्णतः व्याप्त है।

व्यापार मार्ग

अनुराधा –  मैंने उस मंदिर के दर्शन किये हैं। एक प्रश्न मस्तिष्क में उठता है कि क्या वे व्यापार मार्ग का एक भाग हैं क्योंकि मुंबई के निकट ही प्राचीन बंदरगाह हैं?

भरत – सही कहा आपने। ये मंदिर पूर्ण रूप से प्राचीन व्यापार मार्ग पर थे। उस काल में इस क्षेत्र की राजधानी जुन्नर अथवा पैठन में हुआ करती थी। सम्पूर्ण व्यापार मार्ग पर आप सोपारा, घाट एवं दर्रों के अरितिक्त अनेक गुफाएं भी देखेंगे। जिस काल में, जो धर्म अपनी चरम सीमा पर होता था, वहां का स्थानीय राजा उन्हें तदनुसार संरक्षण प्रदान करता था। यहाँ ब्राह्मण गुफाएं हैं, हिन्दू गुफाएं हैं तथा ब्राह्मण गुफाओं से हिन्दू गुफाओं में परिवर्तित गुफाएं भी हैं। गोमाशी नामक गुफा में बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा में प्रतिमा है जिसे अब लोग भृगु कहते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि कैसे स्थानिक तदनुसार विवेचना करने लगते हैं। दहाणु के समीप एक गुफा है जिसे पारसी गुफा में परिवर्तित किया गया था। आक्रमण के समय दहाणु गुफा के भीतर पवित्र अग्नि उपस्थित थी।

अनुराधा –  ये सब मुंबई की सार्वभौमिक प्रकृति को दर्शाता है।

भरत – सही। यह अन्यंत रोचक है। हम जब मुंबई दर्शन कराते हैं, तब हम इसकी इसी विशेषता से लोगों का परिचय कराते हैं।

मुंबई नगर का भ्रमण

अनुराधा –  यदि मुंबई को जानने का प्रयत्न करें तो इसके अनेक आयाम पायेंगे। इस महानगरी के विषय में चिरकालीन चर्चा की जा सकती है। किन्तु समय की कमी के कारण आज की चर्चा को समाप्त करने पर बाध्य हूँ। इस चर्चा को समाप्त करने से पूर्व मेरे पाठकों को यह जानकारी देना चाहती हूँ कि वे आपके खाकी टूर्स के मार्गदर्शन में मुंबई नगरी की खोज कैसे कर सकते हैं।

भरत – हमारी कंपनी एक आम भ्रमण कंपनी नहीं है। मुंबई की गलियों में इतनी ऐतिहासिक जानकारी लुप्त है कि उसे खोजकर सबके समक्ष लाना अत्यंत आवश्यक है। इसमें हम लोगों की सहायता करना चाहते हैं। यही हमारा ध्येय व लक्ष्य है। हमारी कंपनी का सर्वोत्तम आकर्षण खुली जीप सफारी है जिसे हम अर्बन अथवा शहरी सफारी कहते हैं। कदाचित हमारी कंपनी विश्व की इकलौती कंपनी है जो शहरी सफारी उपलब्ध कराती है। हम वनीय पशु-पक्षी नहीं अपितु शहरी इमारतें व संरचनाएं दिखाते हैं। यह सर्वोत्तम उपाय है जिससे बिना अधिक पदयात्रा किये हम विभिन्न क्षेत्रों का अवलोकन करते हुए १७ किलोमीटर पार कर जाते हैं।

आपकी आवश्यकता एवं इच्छा अनुसार हम सफारी में परिवर्तन करते हैं। यदि आप आयरिश डॉक्टर हैं तो आपकी सफारी जापानी कलाकार की सफारी से भिन्न होगी। यही हमारी विशेषता है जो हमें सामान्य भ्रमण कंपनियों से भिन्न श्रेणी में खड़ा करती है। भ्रमण गाइड भी सामान्य प्रशिक्षित गाइड नहीं हैं। हमारे गाइड आपके साथ आते हैं क्योंकि वे स्वयं खोजकर्ता हैं, उन्होंने यहाँ विस्तृत खोज की है तथा इस विषय में उन्हें विशेष रूचि व लगाव है। इसीलिए उन्हें भ्रमण गाइड नहीं अपितु मुंबई के दूत कहा जाता है।

अनुराधा –  हमारे पाठकों में जिन्हें भी मुंबई व उसके इतिहास से लगाव है तथा वे इस पर शोध करना चाहते हैं, तो वे भरत से संपर्क कर सकते हैं।

भरत – अवश्य।

भरत गोठोसकर के साथ मुंबई के मुम्बा देवी मंदिर एवं अन्य प्राचीन मंदिरों पर हुई चर्चा की लिखित प्रतिलिपि IndiTales Internship Program के अंतर्गत अनुषा सिंह ने तैयार की है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

2 COMMENTS

  1. अनुराधा जी,
    मुंबई स्थित प्रसिद्ध मुम्बा देवी मंदिर के बारे में बहुत ही सुंदर जानकारी युक्त आलेख । यह भी विस्मयकारक है कि यह महानगर सदियों पूर्व से ही मुंबई नाम से जाना जाता है और इससे जुड़ी हुई दंतकथा भी रोचक है । आलेख से मुम्बा देवी मंदिर तथा मुंबई में स्थित अन्य प्राचीन मंदिरों के बारे में भी रोचक जानकारी प्राप्त हुई ।
    मायानगरी तथा देश की वाणिज्यिक राजधानी के नाम से प्रसिद्ध मुंबई में सदियों प्राचीन ऐतिहासिक देवालय भी है यह तथ्य आश्चर्य चकित करता है ।
    ज्ञानवर्धक जानकारी युक्त आलेख हेतु धन्यवाद ।

    • प्रदीप जी – नगरों में हम वही देखते हैं जो देखना चाहते हैं। आपके प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद।

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