पदयनी – केरल में माँ भगवती को प्रसन्न करने का अनोखा अनुष्ठान

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पदयनी केरल के देवी मंदिरों का एक अनुष्ठान है। पदयनी शब्द की व्युत्पत्ति पेदनी से हुई है जिसका अर्थ है, सेना अथवा सैन्य संरचना। आप सोच रहे होंगे कि क्या यह उत्सव युद्ध के वीरों की स्मृति में मनाया जाता है? इस प्रश्न का उत्तर हाँ भी है तथा ना भी! हाँ इसलिए क्योंकि यह युद्ध का उत्सव है। ना इसलिए क्योंकि यह मानव युद्ध से सम्बंधित उत्सव नहीं है। आपको और भ्रम में ना डालते हुए सीधे बताती हूँ। यह उत्सव देवी भद्रकाली का राक्षसों से युद्ध एवं उन पर विजय का उत्सव है। भिन्न भिन्न आकार-विकार के राक्षस जिनमें कुछ हमारे भीतर हैं तथा कुछ बाहर।

पदयनी - केरल के भद्रकाली मंदिरों का अनुष्ठान पदयनी अनुष्ठान मध्य केरल में पम्पा नदी के तट पर स्थित कई भगवती अर्थात् भद्रकाली मंदिरों में मनाया जाता है। मुझे बताया गया कि शास्त्रों में जिन ६४ कलाओं का उल्लेख है उन सभी कलाओं का प्रयोग इस पदयनी अनुष्ठान में किया जाता है।

पारंपरिक रूप से इस अनुष्ठान का आयोजन २१ रात्रियों के लिये किया जाता था। वर्तमान में यह अनुष्ठान केवल ७ अथवा ३ रात्रियों में ही सिमट कर रह गया है। कभी कभी तो इसे केवल एक रात्रि में ही संकुचित कर दिया जाता है।

ऐसे ही एक दिवसीय अनुष्ठान में भाग लेने का सौभाग्य मुझे कुछ समय पूर्व प्राप्त हुआ। अपनी केरल यात्रा के अंतिम दिवस मुझे इस अनुष्ठान का आनंद उठाने का सुअवसर प्राप्त हो रहा था। मेरा उत्साह संभाले नहीं संभल रहा था।

पदयनी की पृष्ठभागीय कथा

देवी भद्रकाली ने राक्षसों के वध हेतु रौद्र रूप धारण किया था। देवी ने अपने इस रूप में दारुक जैसे दानवों का वध किया था जिन्हें मारना अन्यथा असंभव हो गया था। दारुक वध के पश्चात भी देवी का क्रोध शांत नहीं हुआ। क्रोधित अवस्था में ही देवी ने, हिमालय में अपने पिता शिव के निवास, कैलाश की ओर प्रस्थान किया।

देवी के क्रोध की अग्नि को शांत करना आवश्यक था। अतः शिवजी तथा उनके भूतगणों ने स्वयं को पत्तों से अलंकृत कर उनको प्रसन्न करने का प्रयत्न किया। उन्हें शांत करने के लिए उनके समक्ष नृत्य एवं गायन प्रस्तुत किया। इस पर भी देवी का क्रोध शांत नहीं हुआ। तभी देवी की दृष्टी धरती पर बने कोलम अर्थात् रंगोली द्वारा बनी आकृति पर पड़ी। यह उनकी ही क्रोधित अवतार की छवि थी। उसे देख देवी प्रसन्न हुई। ऐसा माना जाता है कि यह सृष्टि की प्रथम कोलम थी जिसकी रचना किसी और ने नहीं बल्कि स्वयं कार्तिकेय ने की थी। इस घटना को कलमेड्त्तुम अनुष्ठान का आरम्भ माना जाता है।

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भगवती अर्थात् भद्रकाली को प्रसन्न करने की इस घटना को पदयनी अनुष्ठान द्वारा पुनः सजीव किया जाता है। भगवती के समक्ष नर्तक नृत्य प्रस्तुत करते हैं। सब नर्तक अपने मुँह पर मुखौटे पहनते हैं जिन पर रंगोली के सामान आकृतियाँ बनी होती हैं। इसीलिए इन मुखौटों को भी कोलम कहा जाता है। जो गीत गाया जाता है उसे थप्पू कहते हैं। मदन, मरुथ, यक्षी, पक्षी, कलां कोलम, भैरवी कोलम इत्यादि नृत्य प्रस्तुत किये जाते हैं। प्रत्येक नृत्य में एक प्रमुख नर्तक होता है। एक नृत्य में मुख्य नर्तक शिव का वेश भी धरता है।

गायन एवं नृत्य इस अनुष्ठान का ही भाग हैं। इस अनुष्ठान के अंत में जो नृत्य प्रस्तुत किया जाता है उसमें भगवती अथवा भद्रकाली शांत अवस्था में नृत्य प्रस्तुत करते हुए सबको आशीर्वाद देती है।

मुझे बताया गया कि आरम्भ में पदयनी अनुष्ठान केरल के गनक समुदाय द्वारा किया जाता था। गनक समुदाय अर्थात् केरल का वैद्य समाज। हो सकता है यह अनुष्ठान मानसिक अथवा आध्यात्मिक चिकित्सा का एक रूप हो। कुछ जानकारों का मानना है कि गनक समुदाय के नागरिक आत्मरक्षण युद्धविद्या का भी अभ्यास करते थे। पदयनी के प्रदर्शन में इस आत्मरक्षण युद्धविद्या की झलक अवश्य देखने को मिलती है।

पदयनी अनुष्ठान मुख्यतः नवम्बर मास से अप्रैल मास के बीच संपन्न किया जाता है। प्रत्येक गाँव के मंदिरों में भिन्न भिन्न तिथियों में यह संस्कार संपन्न किया जाता है।

नृत्य के लिए मुखौटे

संध्याकालीन अनुष्ठान हेतु तैयार होते मुखौटों द्वारा पदयनी से मेरा प्रथम साक्षात्कार हुआ।

पदयनी के मुखौटेएक विशाल कक्ष में पदयनी के सदस्यों ने सम्पूर्ण दिवस लगाकर सुपारी के वृक्ष के विभिन्न भागों का प्रयोग कर कई ताजे मुखौटे बानाए थे। इनमें कुछ मुखौटे तो इतने विशाल थे कि मैं सोच में पड़ गयी, कोई इन्हें पहनेगा कैसे? कक्ष के एक कोने में खड़े होकर मैं शान्ति से उनके दक्ष हाथों द्वारा सुपारी के वृक्ष के विभिन्न भागों को सुन्दर सज्ज मुखौटों में परिवर्तित होते देख रही थी एवं स्तब्ध हो रही थी।

और पढ़ें : कथकली – केरल का पारंपरिक नृत्य

बड़े बड़े सुसज्जित मुखौटे तो अपने विशाल आकार के कारण ध्यानाकर्षित कर ही रहे थे, किन्तु छोटे मुखौटों की सुन्दरता भी कुछ कम नहीं थी। चारों ओर मुखौटों में लगने वाली आँखें, आभूषण तथा अन्य सामग्रियां बिखरी पड़ी थीं। कुछ समय पश्चात मैं मुखौटों एवं इन सामग्रियों को नर्तकों के सर पर सजते देखने वाली थी। उस समय मैं कल्पना करने में असमर्थ थी कि इन मुखौटों को धारण कर नर्तक कैसे लगने वाले थे। उन्हें प्रत्यक्ष देखने की उत्सुकता थी।

पदयनी के मुखौटे बनते हुए
पदयनी के मुखौटे बनते हुए

मुखौटों को बनाने के लिए सुपारी के वृक्षों के हरे पत्तों पर गहरे लाल एवं काले रंग का प्रयोग किया गया था। रंगबिरंगे चित्रों द्वारा भिन्न भिन्न भावों को उभारा गया था। इनमें मुख्यतः रौद्र रूप ही प्रधान दिखा।

ये मुखौटे नर्तक को भिन्न भिन्न रूप प्रदान कर रहे थे। जैसे भिन्न भिन्न देवता, दानव तथा कभी कभी लोगों का मनोरंजन करते विदूषक भी।

इन मुखौटों को कोलम तथा इस मूल कला को कोलम थुल्लल कहा जाता है। इसका अर्थ है मुखौटों के साथ नृत्य करना।

कलमेड्त्तुम पाट्टुम के ही समान, पदयनी के विभिन्न क्रियाकलापों को विभिन्न समुदायों द्वारा संपन्न किया जाता है। जैसे नायर समाज पदयनी का प्रदर्शन करता है, वहीं कनियर समाज पत्तों द्वारा भव्य वस्त्रों, आभूषणों एवं मुखौटों को बनाता है।

केरल के पदयनी अनुष्ठान का विडियो

पदयनी – भद्रकाली को शांत करने का अनोखा अनुष्ठान

पदयनी अनुष्ठान के लिए बहुत सारे लोग एवं उन लोगों की सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। अतः यह स्पष्ट है कि इसके लिए एक बड़े स्थान की भी आवश्यकता होगी। मैंने यह अनुष्ठान अमृता विश्वविद्यालय में देखा था। वहां विश्वविद्यालय का सम्पूर्ण मध्यवर्ती प्रांगण कलाकारों के लिए निश्चित किया गया था। हम जैसे स्तब्ध दर्शकों ने प्रांगण के चारों ओर स्थित गलियारों में डेरा जमा लिया था।

इस अनुष्ठान का आरम्भ दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। दीप जलाने के लिए पवित्र आनुष्ठानिक अग्नि प्रांगण में लाई गयी थी। यह दीप अब सम्पूर्ण रात्रि के लिए अनुष्ठान का केंद्र होने वाला था।

पदयनी नृत्य

माँ भद्रकाली का नृत्य
माँ भद्रकाली का नृत्य

श्वेत व लाल रंग की वेष्टियाँ एवं श्वेत अंगवस्त्र पहने पुरुषों ने अब धीरे धीरे दीप के चारों ओर नृत्य आरम्भ कर दिया था। इन नर्तकों को लय प्रदान करता संगीत प्रांगण के एक छोर से आ रहा था। संगीतकारों का एक समूह वाद्य बजा रहा था, वहीं एक समूह भगवती की प्रशंसा में गीत गा रहा था।

थप्पू – थप्पू एक प्रकार का वाद्ययन्त्र है। पदयनी में बजने वाले वाद्यों में थप्पू प्रमुख वाद्य है। वस्तुतः कई सूत्रों से मुझे ज्ञात हुआ कि अनुष्ठान का आरम्भ थप्पू को गर्म कर किया जाता है। इसे थप्पू चूडक्कल कहते हैं। अन्य वाद्य हैं, चेंडा, परा, कुम्भम एवं कैमनी।

थप्पू बजाते संगीतज्ञ
थप्पू बजाते संगीतज्ञ

दीप के चारों ओर नाचते नर्तकों की गति अब बढ़ने लगी थी। उनके नृत्य मुद्राएँ भी अब जटिल होने लगी थीं। सब नर्तक लगभग अवचेतन अवस्था में पहुँच गए थे।

कुछ क्षण पश्चात सब नर्तक वहां से हट जाते थे एवं उनका स्थान एक अथवा कई मुखौटाधारी पुरुष ग्रहण करते थे। ये पुरुष सर पर मुखौटे उठाये एवं हाथों में तलवार व मशाल उठाये ओजपूर्ण नृत्य करते थे। कभी कभी ये दोनों समूह आपस में संवाद साधते एक दूसरे में प्रवेश भी करते थे। सब कुछ घड़ी के कांटे सा सटीक चल रहा था मानो ये कलाकार प्रतिदिन यह अनुष्ठान ही करते रहते हों।

पदयनी के कोलम

जिस प्रकार पदयनी के मुखौटों को कोलम कहा जाता है, उसी प्रकार नृत्य के एक अंग को भी कोलम कहा जाता है। प्रत्येक कोलम एक भिन्न कथा कहता है तथा एक भिन्न पौराणिक कथानक प्रस्तुत करती है।

प्रज्वलित दीप के इर्द गिर्द नृत्य
प्रज्वलित दीप के इर्द गिर्द नृत्य

पदयनी अनुष्ठान में कई कोलम प्रस्तुत किये जाते हैं। कुछ लोकप्रिय कोलम इस प्रकार हैं:

गणपति कोलम – इस कथानक अर्थात् कोलम में गणेश के जन्म की कथा प्रदर्शित की जाती है। मेरा ऐसा विश्वास है कि इस कोलम का प्रदर्शन सर्वप्रथम किया जाता है।

यक्षी कोलम – इस कोलम में यक्षों की गाथा दिखाई जाती है। यक्ष अच्छे व बुरे दोनों प्रकार के हो सकते हैं।

नर्तकों का श्रृंगार
नर्तकों का श्रृंगार

मादं कोलम – यह कथा है मवेशियों के रक्षक की एवं उसकी है जो अपनी परछाई से किसी का भी वध कर सकता है।

कालं कोलम – यह प्रतीक है समय एवं काल के देवता दोनों का। कालं कोलम कथा है अल्पायु प्राप्त ऋषि मार्कंडेय की। शिव भक्ति द्वारा उन्हें दीर्घायु की प्राप्ति हुई थी। यदि आप ऋषि मार्कंडेय के विषय में और जानना चाहें तो मेरे संस्करण कुरुक्षेत्र में पढ़ सकते हैं। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण कोलम है। वैशिष्ठ्य प्राप्त कलाकार स्वयं इसका प्रदर्शन करते हैं।

कालं कोलम के मुख्य नर्तक
कालं कोलम के मुख्य नर्तक

मरुथ कोलम – यह कोलम चेचक की देवी को शांत एवं प्रसन्न करने के लिए किया जाता है ताकि चेचक का समूल नाश हो सके। चेचक की देवी को मंदोदरी का पुनर्जन्म माना जाता है। मंदोदरी अर्थात् दारुक की पत्नी, जिसका वध स्वयं देवी ने किया था। ऐसी मान्यता है कि मंदोदरी के रूप में चेचक की देवी ने काली की देह में चेचक के बीज बोये थे। तत्पश्चात मरुथ बनकर उसका इलाज भी किया।

पक्षी कोलम – पक्षी कोलम उन पक्षियों की कहानी कहती है जो रोते हुए शिशुओं में रोग फैलाते हैं।

भैरवी कोलम – इस कोलम में देवी का रौद्र रूप दर्शाया जाता है। यह कोलम इस अनुष्ठान के अंत में किया जाता है। इसका मुखौटा सुपारी वृक्ष के १०१ पत्तियों से निर्मित होता है।

गन्धर्व कोलम
मुकिलन कोलम
पिशाचु कोलम
मनुष्य कोलम – साधारण मानव को दर्शाया जाता है।
परदेशी कोलम – अपनी धरती पर उपस्थित परदेशियों से सम्बंधित है यह कोलम।

कलाकार प्रत्येक कोलम में उससे सम्बंधित विशेष मुखौटा धारण करते हैं।

कोलम में विनोद

मैंने देखा कि नृत्यों एवं कोलमों के मध्य कुछ संवाद किये जा रहे थे। विदूषक जैसा दिखने वाला एक कलाकार बीचोंबीच खड़ा होकर गायकों से बातचीत करने लगता। यूँ तो मुझे उस संवाद का कोई ओर-छोर नहीं लगा, किन्तु उस विदूषक के स्वरों को सुनकर इतना अवश्य कह सकती हूँ कि वह किसी प्रचलित सामयिक विषय पर व्यंग कस रहा था। मैं समझ रही थी कि यह पूर्ण प्रदर्शन एक हंसी-ठठ्ठा है जो पदयनी अनुष्ठान की गंभीरता में कुछ मनोरंजक तत्वों का समावेश करने का प्रयत्न कर रहा था।

साधारणतः पदयनी के मध्य प्रदर्शित यह विनोद मनुष्य अथवा परदेशी कोलम का भाग होते हैं।

पदयनी नर्तक अपनी वेशभूषा सवारते हुए
पदयनी नर्तक अपनी वेशभूषा सवारते हुए

पदयनी के अंतिम चरण में एक जीवित वृक्ष की शाखाओं के समन्वय द्वारा एक वृक्ष की रचना की गयी। एक कलाकार ने इस वृक्ष पर चढ़कर वहां से नीचे छलांग लगाई। लोग यहाँ-वहां दौड़ रहे थे मानो किसी जंगल में दौड़ रहे हों। अंत में एक प्रदर्शक ने एक पंक्ति में रखे कई नारियलों को फोड़ा। इसे देख मेरे मष्तिष्क में एक बात आयी। कदाचित इन नारियलों को फोड़ना, किसी समय यहाँ दी जाती बलि का वर्तमान द्योतक है। कुछ क्षण पश्चात यही नारियल हमें प्रसाद के रूप में दिया जाने वाला था। सम्पूर्ण रात्रि इस प्रदर्शन को देखने के पश्चात थोड़ी भूख लग गयी थी। मैं इस प्रसाद का व्याकुलता से प्रतीक्षा करने लगी।

अंत में भगवती आयीं एवं उन्होंने नृत्य प्रस्तुत किया। नर्तक का मुखौटा उसकी ऊंचाई से कहीं अधिक लंबा था। मैंने सभी नृत्यों की भरपूर प्रशंसा की। साथ ही मैं सभी नर्तकों की भरपूर ऊर्जा से अत्यंत प्रभावित थी। सम्पूर्ण रात्रि बिना थके वे अनवरत प्रदर्शन कर रहे थे।

सम्पूर्ण अनुष्ठान में अग्नि का भी भरपूर प्रयोग किया गया था। पदयनी के अंतिम कोलम में भगवती ने हाथों में मशाल पकडे हुए थी।

अनुष्ठान समाप्त होते होते प्रातः ४ बज गए। आश्चर्यजनक रूप से मुझे निद्रा भी नहीं आ रही थी। गीत-संगीत एवं ओजपूर्ण फुर्तीले नृत्यों ने ऐसी ऊर्जा उत्पन्न कर दी थी कि हमारे मष्तिष्क से निद्रा का विचार लुप्त हो गया था। इन सब के पश्चात जब मैं गाड़ी से तिरुअनंतपुरम के विमानतल की ओर जा रही थी, मैं सोचने लगी कि जो मैंने देखा वह एक स्वप्न था अथवा मैंने वास्तव में एक सम्पूर्ण रात्रि कला, संस्कृति, आध्यात्म, तंत्र तथा मानवी उत्साह के अनोखे सम्मिश्रण की अनुभूति में व्यतीत की है।

पदयनी – एक प्राचीन किन्तु जागृत कला

मैंने वापिस आकर पदयनी के विषय में कुछ और जानकारी एकत्र की। मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई कि सन् २००४ से पदयनी को पुनर्जीवित करने के सक्रिय प्रयास किये जा रहे हैं। पदयनी प्रदर्शन के लिए युवकों को कोलम कला में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पदयनी नाम से एक गाँव के विकास की भी योजना है। मेरे विचार से यदि इन प्रयासों को विश्वासपूर्वक सही दिशा दी गयी तो यह केरल पर्यटन को एक विशेष आयाम प्रदान करेगा तथा उसे नयी ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा।

पदयनी पर और अधिक जानकारी के लिए प्राध्यापक कदाम्मनित्त रामकृष्णन द्वारा एकत्रित किया गया साहित्य पढ़ें अथवा इस वेबस्थल पर देखें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

2 COMMENTS

  1. अनुराधा जी,
    पदयनी अनुष्ठान के बारे महत्वपूर्ण जानकारी से परिपूर्ण आलेख और प्रस्तुत विडियो ने अनुष्ठान एवम् पारंपरिक नृत्यो से मानो साक्षात्कार ही करा दिया ! नर्तकों द्वारा पहने जाने वाले आकर्षक मुखौटो को सुपारी के वृक्ष से बनाया जाना आश्चर्यजनक हैं । पदयनी अनुष्ठान को सभी समुदायों द्वारा एकसाथ मिलकर मनाया जाना , सामाजिक सौहार्द एवम् आपसी भाईचारे का प्रतीक हैं । पदयनी की पृष्ठभागीय कथा भी कम महत्वपूर्ण नहीं है ! यह प्रसन्नता की बात है कि इस प्राचीन कला को जीवित रखने के प्रयास किये जा रहे हैं । धन्यवाद !

    • प्रदीप जी – मैंने केरल में जब यह देवी के दो अनुष्ठान देखे तो मैं दंग रह गयी। सोचने की बात है की जब यह अनुष्ठान विधिवत किये जाते होंगे तो कितने भव्य होंगे।

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