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बराबर गुफाएँ – भारत की सबसे प्राचीन गुफाएँ – बिहार का ऐतिहासिक स्थल

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बराबर गुफाएँ - एक मानचित्र
बराबर गुफाएँ – एक मानचित्र

बिहार की मेरी प्रथम यात्रा के रूप में मुझे बराबर गुफाएँ देखने का मौका मिला। चट्टानों को काटकर बनाई गयी गुफाएँ भारत भर की कई पहाड़ियों पर फैली हुई हैं। इन गुफाओं का प्रयोग विविध संप्रदायों जैसे – जैन संप्रदाय, बौद्ध संप्रदाय और आजीविका संप्रदाय के संन्यासियों द्वारा होता था। ये संन्यासी वर्षा ऋतु के दौरान बारिश से अपना रक्षण करने हेतु इन्हीं गुफाओं में आश्रय लेते थे। गुजरते दौर के साथ इन गुफाओं की वास्तुकला अपने आप में चित्रकारी के अद्भुत नमूने के रूप में उभरी जिसका विकसित रूप आप अजंता और एलोरा की गुफाओं के रूप में देख सकते हैं।

गुफाओं के निर्माण का आरम्भ

बराबर गुफाओं को जाने का रास्ता
बराबर गुफाओं को जाने का रास्ता

भारत से जुड़ी अन्य कई बातों की तरह गुफाओं के निर्माण का आरंभ भी बिहार में ही हुआ था, जिसका जीता-जागता स्वरूप बराबर गुफाओं के रूप में खड़ा है। बिहार में स्थित ये गुफाएँ गया शहर से कुछ ही कि.मी. की दूरी पर बसी बराबर और नागार्जुनी पहाड़ियों में पायी जाती हैं। बराबर पहाड़ी में स्थित 3 गुफाएँ हैं तो नागार्जुनी पहाड़ी में स्थित 4 गुफाएँ हैं। इन सातों गुफाओं को समूह में सातघर के नाम से जाना जाता है। ये गुफाएँ भारत की सबसे प्राचीन गुफाएँ हैं, जिनका निर्माण सम्राट अशोक और उनके पोते दशरथ के शासनकल के दौरान किया गया था। ये बराबर गुफाएँ चैत्य गृहों और सभागृहों का प्रारंभिक स्वरूप मानी जाती हैं, जिन्हें समय के साथ कुछ जटिल विकास कार्यों से गुजरना पड़ा।

सुदामा, कर्ण और लोमांस ऋषि की गुफाएँ  – बराबर गुफाएँ

चट्टान जिसे काट बनायो गयी - बराबर गुफाएँ
चट्टान जिसे काट बनायो गयी – बराबर गुफाएँ

बराबर पहाड़ियों में बसी इन तीन गुफाओं को सुदामा, कर्ण और लोमांस ऋषि की गुफाओं से जाना जाता है। इन में से सुदामा और लोमांस ऋषि की गुफाएँ चैत्य के सभागृह हैं और कर्ण की गुफा एक आवास गृह है। इन गुफाओं की छत और दीवारों पर उच्च स्तरीय पॉलिश देखी जा सकती है। माना जाता है कि, यह पॉलिश अशोक स्तंभो पर पायी जानेवाली पॉलिश के समान है। लेकिन मुझे लगता है कि, अपनी यात्राओं के दौरान मैंने जीतने भी अशोक स्तंभ देखे हैं उनपर पायी गयी पॉलिश की तुलना में इन गुफाओं की आंतरिक सतहों पर पायी गयी पॉलिश क कहीं ज्यादा अच्छी है। इसके पीछे का एक कारण यह हो सकता है कि, ये गुफाएँ हमेशा इन पहाड़ियों के आवरण में संरक्षित थीं, जबकि उन स्तंभों को हर प्रकार की हानि से गुजरना पड़ता है, चाहे वह प्रकृतिक हो या मनुष्यों द्वारा पहुंचाई गयी हानि हो।

जब आप इन गुफाओं की दीवारों पर हाथ फेरते हैं, तो लगता है जैसे उन्हें कल ही पॉलिश किया गया हो। यह पॉलिश एकदम नयी सी लगती है। इसे देखकर आपके लिए यह मानना कि, ये गुफाएँ 2400 साल पुरानी हैं, थोड़ा मुश्किल सा हो जाता है। जब आप इन गुफाओं के गोलाकार चैत्य भाग को देखते हैं तो आप इसी सोच में पड़ जाते हैं, कि इन गुफाओं के कारीगरों ने इतनी बड़ी चट्टान को काटकर, उसे तराशकर इतना अच्छा और सुंदर गुबंद न जाने कैसे बनाया होगा।

लोमांस ऋषि की गुफा 

लोमांस ऋषि गुफा - बराबर पहाड़ी - बिहार
लोमांस ऋषि गुफा – बराबर पहाड़ी – बिहार

लोमांस ऋषि की गुफा एकमात्र ऐसी गुफा है जिसके प्रवेश द्वार पर उत्कीर्णन का काम देखा जा सकता है। इस  द्वार पर वास्तुकला के कुछ अलंकृत विवरण हैं, जो बाद में चट्टानों से खुदी गयी गुफाओं के लिए चलन बन गया। इस प्रवेश द्वार पर बने मेहराब पर एक के ऊपर एक ऐसे दो अर्धवृत्त हैं, जिन में से ऊपरी अर्धवृत्त पर जाली का काम किया गया तो निचले अर्धवृत्त पर बारीकी से उत्कीर्णित हाथियों की पंक्ति है जो स्तूपों को श्रद्धांजलि दे रहे हैं। पत्थर पर किया गया यह नक्काशी काम लकड़ी की कारीगरी से प्रेरित है। पत्थर की कारीगरी से पहले लकड़ी की कारीगरी ही चित्रकला का प्रसिद्ध माध्यम थी। जब इन गुफाओं का निर्माण हो रहा था तब पत्थर की कारीगरी चित्रकला की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने के मार्ग पर अपने कदम बढ़ा रही थी। इसकी उच्च स्तरीय पॉलिश और बारीक उत्कीर्णन इसे चित्रकारी का एक अप्रतिम नमूना बनाती है।

पहाड़ी की यात्रा 

बराबर गुफाओं की दीवारें - आज भी चमकती हुई
बराबर गुफाओं की दीवारें – आज भी चमकती हुई

पटना-गया की प्रमुख सड़क से विमार्ग होकर जब आप चक्करदार रास्ते से जाते हैं, तो आपको वहां दूर-दूर तक कुछ नज़र नहीं आता, जैसे कि वह मार्ग किसी भी मंजिल की ओर नहीं जाता हो। लेकिन जैसे-जैसे आप आगे बढ़ते हैं, आपको खेतों के बीच खड़ा इकहरा पहाड़ दिखाई देने लगता है। उस पहाड़ी को देखकर आपके मन में यही सवाल उठता है कि यह पतला और नाजुक सा मार्ग आपको उस पहाड़ी तक कैसे ले जाएगा। ऐसे समय में हमारे साथ एक बहुत ही अच्छे गाइड थे जिन्होंने पूरी यात्रा के दौरान हमारा अच्छे से मार्गदर्शन किया था। इसके बावजूद भी मैं इसी चिंता में थी कि अगर किसी को अकेले ही इस सुनसान से रास्ते से उस सुनसान सी पहाड़ी पर जाना हो तो न जाने इसके लिए उसे कितनी हिम्मत चाहिए होगी। मुझे तो इस पहाड़ी की तरफ जाता एक भी सार्वजनिक परिवाहन नहीं दिखा। लेकिन पहाड़ी के पास पहुँचते ही आपको कुछ उचित आधारिक संरचनाएं नज़र आती हैं, जैसे अतिथिगृह, एक परित्यक्त संग्रहालय और चौड़े रास्ते जो पहाड़ी पर स्थित गुफाओं की ओर जाते हैं।

शिव मंदिर    

बराबर पहाड़ी का परिदृश्य
बराबर पहाड़ी का परिदृश्य

बराबर पहाड़ी के उस पार वाली पहाड़ी पर एक शिव मंदिर है। हमे बताया गया कि शिवरात्रि के दिन इस मंदिर में बहुत सारे शिव भक्त भगवान के दर्शन के लिए आते हैं। इसके अलावा यहां पर लगभग एक महीने के लिए मेले का भी आयोजन होता है, जिसमें भी भक्तों की बहुत भीड़ होती है। इस मंदिर तक जाने के लिए सीढ़ियाँ भी हैं।

हमे नागार्जुनी पहाड़ी के दर्शन करने का मौका नहीं मिला लेकिन मेरा मानना है कि, ये गुफाएँ भी बराबर गुफाओं की तरह ही बहुत आकर्षक होंगी।

अगर आप कभी पटना और बोधगया के बीच यात्रा कर रहें हो तो इन पहाड़ियों की यात्रा जरूर कीजिये, जहां पर आप वास्तुकला के सबसे आरंभिक उदाहरण प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं।

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