अरुणाचल प्रदेश की मंत्रमुग्ध करने वाली टेंगा घाटी की यात्रा

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टेंगा घाटी अरुणाचल प्रदेश
टेंगा घाटी अरुणाचल प्रदेश

टेंगा घाटी – परिदृश्य, झरने, ओर्किड फूल और कीवी फल

पूर्वोत्तर क्षेत्रों में यात्रा करते समय एक बात जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि, आपकी यात्रा कभी भी योजनानुसार पूरी नहीं होती। आपको न चाहते हुए भी परिस्थिति के आगे झुककर अंतिम समय पर अपनी योजनाओं में बदलाव करने पड़ते हैं। यहां पर या तो कोई बन्द होता है या फिर राहबंदी होती है जिसके कारण आपको मजबूरन अपनी पूर्व नियोजित यात्रा स्थितिनुसार बदलनी पड़ती है। ऐसी घटनाओं की ना ही कोई पूर्व सूचना दी जाती है और ना ही उनसे संबंधित कोई भी समाचार आपको आसानी से उपलब्ध होता है। इंटरनेट के जरिये तो, इन घटनाओं से जुड़ी खबरों की अपेक्षा करना व्यर्थ है। इसलिए आपको स्थानीय समाचारों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। ऐसी ही एक घटना हमारे साथ भी घटी। अरुणाचल प्रदेश की टेंगा घाटी पर जाते हुए रास्ते में अरुणाचल – असम की सीमा पर बन्द था और किसी भी वाहन को सीमा पार करने की अनुमति नहीं थी। इस वजह से हमे वहीं पर रुकना पड़ा और अंत में तेज़पुर के चाय बागान में रात गुजारनी पड़ी, जिसके बारे में मैं बाद में लिखूँगी।

अरुणाचल प्रदेश में घूमने के लिए अनुमति की आवश्यकता

आर्किड का खिला हुस फूल
आर्किड का खिला हुस फूल

अरुणाचल प्रदेश में जाने के लिए आपको पहले राज्य से अनुमति प्राप्त करनी पड़ती है। इसके लिए आपको अनुमति पत्र भरकर उसके साथ अपना फोटो और पहचान पत्र की प्रति देनी पड़ती है। इससे संबंधित सारी प्रक्रिया आप दिल्ली, गुवाहाटी और शिलांग में स्थित अरुणाचल प्रदेश के केंद्र से पूरी कर सकते हैं। मैं अपना अनुमति पत्र प्राप्त करने के लिए शिलांग में स्थित अरुणाचल केंद्र में गयी। मैंने जरूरत के सारे कागजात दे दिये और शुल्क भी भर दिया। लेकिन मुझे अनुमति पत्र लेने के लिए तीन दिन बाद आने के लिए कहा गया। मैंने उन्हें समझाया कि मुझे यह अनुमति पत्र आज ही चाहिए, क्योंकि, हम दूसरे दिन ही अरुणाचल प्रदेश जानेवाले थे। तब वहीं की एक औरत और आदमी ने सिर्फ आधे घंटे में ही मेरा अनुमति पत्र मुझे दे दिया। अब मुझे अनुमति पत्र तो मिल गया लेकिन उसके अनुसार आप राज्य में ऐसे ही कहीं पर भी नहीं घूम सकते। इसके लिए आपको पहले से ही स्पष्ट करना पड़ता है कि, उपलब्ध तीनों रस्तों में से आप कौन से प्रवेश मार्ग से जाना चाहेंगे तथा कौन-कौन सी जगहों पर घूमना चाहेंगे और किस दिन जाना पसंद करेंगे। मैंने भी वही किया। आम तौर पर यह अनुमति पत्र 15 दिनों के लिए जारी किया जाता है।

अनुमति पत्र की जाँच पद्धति की आवश्यकता

अरुणाचल के छलछलाते झरने
अरुणाचल के छलछलाते झरने

मैंने भालुकपोंग, बोमड़ीला और तवांग क्षेत्रों में जाने के लिए अनुमति पत्र लिया। अनुमति पत्र प्राप्त करने की अनिवार्यता को मद्दे नज़र रखते हुए मुझे लगा कि शायद हमे राज्य की सीमा पर पहुँचने के बाद अपने आपको सत्यापित करने के लिए इस अनुमति पत्र को पेश करना पड़ेगा। लेकिन जब हमने राज्य की सीमा में प्रवेश किया तो वहां पर मौजूद किसी भी व्यक्ति को ना ही हमसे कोई मतलब था और ना ही हमारी गाड़ी से। सीमा पर हमारे अनुमति पत्रों की जाँच करने लिए कोई भी व्यक्ति नहीं आया। यह देखकर हम थोड़े हैरान से हो गए, कि इतनी लापरवाही कोई कैसे का सकता है। ऐसा भी हो सकता था कि 2 व्यक्तियों के पास ही अनुमति पत्र हो और बाकी दोनों के पास शायद अनुमति पत्र ना हो। लेकिन इसपर कोई कार्यवाही नहीं होती। हमारे ड्राईवर ने अपना ड्राइविंग लाइसेंस और हमारे पास चेक पोस्ट पर ले जाकर दिखाये और अनिवार्यता के तौर पर कुछ पैसे देकर हम वहां से आगे बढ़े। कुछ ही पलों में हम अरुणाचल प्रदेश में पहुँच गए थे।

इन सारी बातों पर विचार करते हुए मुझे लगा कि, अनुमति पत्र प्राप्त करने की आवश्यकता ही क्या थी। पहले तो, इस देश की नागरिक होने के रूप में मुझे इसी देश के एक पूरे राज्य में घूमने के लिए किसी खास अनुमति की जरूरत ही क्या है? मैं समझ सकती हूँ कि अरुणाचल प्रदेश काफी बड़ा राज्य होने के नाते उसमें कुछ संवेदनशील इलाके भी हो सकते हैं। और अगर किसी कारणवश ऐसे क्षेत्रों में जाने के लिए अनुमति पत्र की आवश्यकता है, तो मुझे लगता है कि अनुमति पत्र जारी करने के पीछे का पूरा उद्देश्य ही कहीं ना कहीं कार्यान्वयन के स्तर पर असफल रह गया है।

टेंगा घाटी के मार्ग में उल्लसित झरने

इन झरनों का विडियो देखिये।

भालुकपोंग की सड़कें

भालुकपोंग से आने जाने वाली सड़कों को देखकर ऐसा लगता है, जैसे किसी समय में शायद ही यहां पर ठीक-ठाक मार्ग हुआ करते थे। इन सड़कों की हालत बहुत ही खराब है। लेकिन आस-पास का वातावरण देखकर लगता है जैसे उनके सुधारणीकर का काम जल्द ही शुरू होने वाला है। यहां की कटी हुई पहाड़ियाँ भी इसी बात की ओर संकेत करती हैं कि यहां पर बहुत जल्द पक्की सड़क बनने वाली है। लेकिन कभी-कभी आँखों देखा झूठ भी होता है। हमारे ड्राईवर और वहां के स्थानीय लोग ने हमे बताया कि वहां पर रखे हुए मलबे सालों से वहीं पर पड़े हुए हैं। और आज तक वहां पर सड़क का कोई काम नहीं हुआ है। लेकिन अगर किसी दिन इस सड़क का काम शुरू हो गया और नयी सड़क बन गयी तो उन्हें बहुत आश्चर्य होगा। इस पूरे क्षेत्र की सड़कें देखे तो, सिर्फ सेना बस्तियों के आस-पास की सड़कें ही सुव्यवस्थित हैं। वास्तव में भालुकपोंग की सड़कें देखकर आपको अपने गाँव-शहर की सड़कें याद आती हैं।

अरुणाचल प्रदेश का प्रकृतिक सौंदर्य

अरुणाचल के पर्वत और नदियाँ
अरुणाचल के पर्वत और नदियाँ

जैसा कि कहा जाता है, स्वर्ग का मार्ग नर्क से होकर गुजरता है। भालुकपोंग से जैसे ही आप 20 कि.मी. की दूरी, जो कि 200 कि.मी. जैसी लगती है, पार करते हैं, आप अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों और घाटियों में पहुँचते हैं, जिनकी खाड़ियों से नदियां बहती हैं। स्वर्ग जैसा दिखनेवाला यह अद्भुत दृश्य आपको मंत्रमुग्ध कर देता है। मैंने इससे पहले देवदार के इतने हरे भरे घने जंगलों से आवृत्त पहाड़ियाँ कभी नहीं देखी थी। इन पहाड़ियों पर यहां-वहां से बहते हुए झरने नीचे बह रही नदियों से मिलने के लिए चंचलता से दौड़ते रहते हैं। यहां कदम कदम पर आपको जंगली फूल मिलते हैं, जो पत्थरों से, पेड़ों के तने से और झड़ियों से बाहर झाकते हुए नज़र आते हैं। ये फूल कहीं भी और कभी भी खिलते हैं।

ओर्किड के फूल और उनकी सरकारी फुलवाड़ी

ऑर्किड फूल
ऑर्किड फूल

अरुणाचल प्रदेश ओर्किड फूलों के विभिन्न प्रकारों का घर है। भालुकपोंग की सीमा से लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर बसे हुए टिपि शहर में ओर्किड की सरकारी फुलवाड़ी है। यहां ओर्किड के फूलों पर अनुसंधान किया जाता है और उनके 750 से भी अधिक प्रकार उगाये और उत्पन्न किए जाते हैं। लेकिन जब हम वहां गए तो हमे वहां पर सिर्फ तीन प्रकार के ही ओर्किड देखने को मिले। शायद हमारे वहां जाने का समय ही ठीक नहीं था। हम इन फूलों को प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं देख पाये लेकिन उनके विभिन्न प्रकारों को हमने जरूर देखा। वहां पर एक छोटा सा संग्रहालय है जहां पर ओर्किड के विभिन्न प्रकारों को तस्वीरों और चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।

ओर्किड के इन विविध प्रकारों को देखने के लिए हमे सेस्सा के ओर्किड अभयारण्य में जाने के लिए कहा गया। ये अभयारण्य भालुकपोंग और टेंगा घाटी के बीच रास्ते पर ही पड़ता है। टेंगा घाटी पर जाते समय हम वहां पर नहीं जा पाये लेकिन, घाटी से वापस आते समय हम या अभयारण्य देखने जरूर गए। जहां पर हमने तरह-तरह के ओर्किड देखे, जो एक से बढ़कर एक थे।

सेस्सा का ओर्किड अभयारण्य

इस जगह का प्रवेश द्वार देखते ही आप जान जाते हैं, कि आप ओर्किड के अभयारण्य में प्रवेश कर रहे हैं। इसके आगे आपको ओर्किड के जंगल ही जंगल दिखाई देते हैं। अगर आप इन जंगलों में घूमना चाहते हैं तो अपने बलबूते पे जा सकते हैं। हम लगभग 150 फीट कि दूरी तक इन जंगलों में घूमते रहे, जिसके दौरान हमने ओर्किड के काफी सारे प्रकार देखे। सेस्सा का यह ओर्किड अभयारण्य टीपी के सुव्यवस्थित ओर्किड फुलवाड़ी से ज्यादा अच्छा था।

आर्किड फूल
आर्किड फूल

वहां के एक स्थानीय व्यक्ति जो विनम्रतापूर्वक अरुणाचल की यात्रा के समय हमारे साथ आए थे, हमे एक किसान के पास ले गए जो ओर्किड की खेती करते हैं। वह किसान हमे अपने खेत में ले गए, जहां पर उन्होंने हमे ओर्किड के कुछ दिलचस्प प्रकार दिखाये तथा उनके बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी भी दी और ओर्किड से जुड़ी अर्थव्यवस्था को भी समझाया। जैसे-जैसे आप पहाड़ी के ऊपर जाते हैं, वहां का वातावरण ओर्किड के फूलों के लिए और भी बढ़िया होता जाता है।

आर्किड अभ्यारण
आर्किड अभ्यारण

यहां पर रास्ते के किनारे आपको ओर्किड के बहुत सारे जंगली प्रकार भी देखने को मिलते हैं। जिन्हें देखने के लिए आपको बार-बार गाड़ी रोकनी पड़ती है, जो यहां के घुमावदार और संकीर्ण रास्तों के लिए बहुत ही खतरनाक और चुनौती भरा कार्य है। यह सब देखते हुए मुझे लगा कि, हम इस रास्ते से पैदल क्यों नहीं जा सकते? क्योंकि अगर ऐसा होता तो हम आराम से इन फूलों को देख पाते तथा उनकी तस्वीरें खिचने का इससे बढ़िया मौका आपको नहीं मिलता।

अरुणाचल से जुड़े उपाख्यान

अरुणाचल प्रदेश भारत का एक ऐसा भाग है, जहां तक अंग्रेजों की सत्ता कभी पहुँच नहीं पायी। जिसकी वजह से यह जगह अंग्रेजों के प्रभावों से मुक्त है और यहां पर आपको अंग्रेज़ कालीन कोई भी संरचना नहीं दिखाई देती। लेकिन, आज अगर इस बात पर विचार किया जाए तो यह बात बहुत असामान्य सी लगती है। अरुणाचल से जुड़े उपाख्यान के अनुसार माना जाता है कि, जब पहले पहल अंग्रेज अधिकारियों ने अरुणाचल में प्रवेश करने की कोशिश की थी तब, उस क्षेत्र की स्थानीय आदिवासी जमातीयों ने, जो वहां पर अपना शासन चला रही थीं, अंग्रेजों के सिर धड़ से अलग कर उन्हें वापस असम भेज दिया था। इस घटना से आस-पास के गांवों में यह मिथक फैल गया कि उस क्षेत्र के आदिवासी लोग मनुष्यों का भक्षण करते हैं। इसके बाद घने जंगलों से आवृत्त इस क्षेत्र में प्रवेश करने का साहस किसी ने नहीं किया। अंग्रेजों की सत्ता असम की परिधि पर बसे बालिपारा गाँव तक ही सीमित थी। इसके आगे के क्षेत्रों को अंग्रेजों द्वारा बालिपारा सीमा-प्रदेश कहा जाता था।

अरुणाचल प्रदेश पहले असम का ही एक भाग हुआ करता था, लेकिन बाद में 1971 में उसे केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया। उसके बाद 1987 में अरुणाचल प्रदेश एक स्वतंत्र राज्य बन गया। क्षेत्रीय रूप से देखे तो आज यह उत्तर पूर्वीय भारत का सबसे बड़ा राज्य है जो 16 जिलों में विभाजित है।

अरुणाचल की भाषा

भाषा के संदर्भ में बात करें तो अरुणाचल प्रदेश की सबसे अनपेक्षित बात यह थी कि, हिन्दी भाषा के साथ अंग्रेजी भाषा भी यहां की राजभाषा है। यहां के लोग बहुत अच्छी हिन्दी बोलते हैं। लेकिन उनकी यही शिकायत रहती है कि, जब भी वे भारत के अन्य भागों में घूमने जाते हैं, तब उन्हें चीनी कहकर पुकारा जाता है। जबकि वे स्पष्ट हिन्दी बोलते हैं और इसके साथ दिल्ली की भाषा भी ठीक-ठाक बोल लेते हैं। मुझे बताया गया कि हिन्दी यहां की प्रमुख संपर्क भाषा है, क्योंकि, यहां पर प्रत्येक आदिवासी प्रजाति की अपनी बोली होती है। इन बोलियों की संख्या 50 से भी अधिक है। अरुणाचल की इन आदिवासी प्रजातियों के प्राचीन जड़ों की ज्यादा जानकारी तो नहीं मिलती, यद्यपि महाभारत में इस जगह का संदर्भ जरूर मिलता है।

अरुणाचल में कृष्ण – रुक्मिणी

अरुणाचल प्रदेश के पूर्वीय भाग में स्थित मालिनीथान में हाल ही में हुए उत्खनन के दौरान कुछ प्राचीन हिन्दू मंदिरों का उद्घाटन हुआ है, जो कृष्ण-रुक्मिणी के उपाख्यानों से जुड़े हैं। यहां के अधिकतर आदिवासी लोग डोनियो पोलो को अपने धर्म के रूप में अपनाते हैं, जिसमें वस्तुतः सूर्य और चंद्रमा को पूजा जाता है। या फिर सामान्य तौर पर प्रकृति के तत्वों को पूजा जाता है। दीर्घ काल तक उनके पास धर्म का कोई भी सुव्यवस्थित रूप नहीं था। लेकिन अब वे आधिकारिक धर्म की ओर बढ़ते जा रहे हैं, जिनमें से अधिकतर व्यक्ति हिन्दू धर्म या बौद्ध धर्म का चुनाव करते हैं। अरुणाचल प्रदेश के उत्तर पश्चिमी भाग में, जहां पर तवांग मठ स्थित है, मूलतः बौद्ध धर्म के लोग रहते है। यहां पर ईसाई धर्म के भी कुछ लोग मानते हैं।

अरुणाचल के व्यवसाय

कीवी के बाग़
कीवी के बाग़

अरुणाचल प्रदेश के लोग आज भी खेती का व्यवसाय करते हैं, जो यहां का मूल व्यवसाय है। ऐसा लगता है जैसे बड़े लंबे समय तक लकड़ी बेचना यहां का प्रमुख व्यवसाय रहा है। इसके चलते बहुत से पहाड़ अपने पेड़ों की कुर्बानी देते-देते नंगे होते जा रहे थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में सरकार ने पेड़ों की कटाई पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है। जिसके कारण अब ये पहाड़ फिर से हरे-भरे होते जा रहे हैं। यहां का पहाड़ी वातावरण विभिन्न प्रकार के फूलों और फलों की खेती के लिए बहुत अच्छा है। टमाटर यहां की प्रमुख नकदी फ़सल है। हमने यहां पर कीवी और सेब के बड़े-बड़े बागान भी देखे। तथा टेंगा घाटी में गुलाब और ओर्किड के बाग भी देखे। टेंगा घाटी अरुणाचल प्रदेश की एक छोटी सी नगरी है। यहां पर सेना की विशाल बस्तियाँ हैं, जिनमें से ज़्यादातर घर इस घाटी से बहती हुई नदी के किनारे पर ही बसे हुए हैं। यहां के हमारे मेज़बान मित्र का घर भी बहुत सुंदर है जो इसी नदी के मोड पर बसा हुआ है। ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य भी टेंगा घाटी के नजदीक ही स्थित है, लेकिन वहां पर घूमने के लिए आपको सही मौसम का इंतेजर करना पड़ता है।

श्रीमान और श्रीमती ग्लोव की मैं बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने टेंगा घाटी में हमारे मेज़बान के रूप में हमारी बहुत अच्छी आव-भगत की।

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