बांद्रा की गली चित्रकारी के दर्शन, मुंबई के शहरी परिदृश्य

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बांद्रा मुंबई की गलियों में मधुबाला का एक मनमोहक चित्र
बांद्रा मुंबई की गलियों में मधुबाला का एक मनमोहक चित्र

मुंबई में स्थित बांद्रा के उपनगर आपको पारंपरिक गाँव और बॉलीवुड के ठाठ-बाट का एक अनोखा मेल प्रदान करते हैं। एक तरफ वहाँ के गांवठन हैं – जैसा कि मुंबई के गांवों को बुलाया जाता है, तथा वहाँ का कोली समुदाय जो आज भी इस द्वीप के कुछ हिस्सों पर अपना प्रभुत्व जमाए हुए है; तो दूसरी तरफ बांद्रा के नए निवासी हैं जिन्होंने यहाँ अपना बसेरा बना लिया है।

इस बार जब मैं मुंबई गयी तो मुंबई मैजिक की कार्यकर्ता दीपा कृष्णन ने मुझे बांद्रा की सैर करवाई। दीपा बे इधर उधर की बातें करते हुए, मुझे बांद्रा के कुछ महत्वपूर्ण स्थानों के दर्शन भी करवाए। इस बार मैंने मुंबई का वह रूप देखा जिससे मैं अब तक अपरिचित थी।

हमने अपनी यात्रा का आरंभ पहाड़ी रास्ते पर स्थित एलको बाज़ार की सबसे स्वादिष्ट पानी-पूरी के साथ किया – एक मजेदार पदयात्रा शुरू करने का इससे अच्छा शगुन कोई हो ही नहीं सकता। उसके बाद हम महिलाओं के कपड़े बेचनेवाले बाज़ार में गए, जहाँ पर आरामदायक रात्री के पहनावे से लेकर समारोह में पहनने योग्य सुशोभित कपड़ों तक सभी प्रकार के कपड़े मिलते हैं। इस चमक-दमक से आकृष्ट होकर कुछ पलों के लिए मुझे लगा जैसे मुझे भी थोड़ी खरीदारी कर लेनी चाहिए। लेकिन एक मार्गदर्शित सैर का आनंद उठाने के विचार से मैंने इस ख्याल को अपने दिमाग से झटक दिया।

अगले आधे घंटे तक दीपा और मैं हम दोनों ही सड़क के किनारे खड़ी दुकानों और मनोरंजक खिड़की प्रदर्शनों की तस्वीरें खींचते रहे। यहाँ पर मुझे फुटकर बिक्री का सबसे छोटा स्वरूप देखने को मिला जहाँ पर विक्रेता वास्तव में अपनी दुकान अपने साथ लेकर घूमते हैं। मैंने उनकी कुछ तस्वीरें भी ली। बांद्रा में मैंने बहुत से बच्चों को यह काम करते हुए देखा और वे अपने काम से जरा भी व्यथित नहीं थे। उल्टा उन्हें तो इस काम में काफी मज़ा आ रहा था, लोगों का मज़ाक उड़ाना और उनके साथ बड़े भोलेपन से पेश आना। देखा जाए तो इस तरह का व्यवहार इन बच्चों से बेहतर और कोई नहीं कर सकता था।

बांद्रा की गली चित्रकारी, मुंबई  

कहानी कहते बंदर के पुराने घरों के कलात्मक जंगले
कहानी कहते बंदर के पुराने घरों के कलात्मक जंगले

बांद्रा के भीड़ भरे बाज़ारों का अनुभव लेने के पश्चात हम उसके विरासती क्षेत्र में पहुंचे जो आज भी एक गाँव की भांति दिखाई दे रहा था। यहाँ ली शांति आपको अचानक से महानगरों की चहलपहल से कहीं दूर ले जाती है। बांद्रा की ऊंची-ऊंची इमारतों की तुलना में यहाँ के चमकीले घर बहुत सुंदर लग रहे थे। इन घरों के जंगलों के विविध आकार या फिर उनकी असामान्य रूप से बनाई गयी सीढ़ियाँ या फिर लोहे के छड़ की आड़ में झलकती उनकी प्राचीनता, सबकुछ बहुत ही रोचक था। रास्ते में हम थोड़ी देर के लिए एक अनूठे आकार के कॉफी घर में रुके। मुझे बताया गया कि इस प्रकार के कॉफी घर और भोजनालय आज बांद्रा में हर कहीं उभरने लगे हैं, जो युवा वर्ग में उसे काफी प्रचलित बना रहा है। इस कॉफी घर की खिड़की के उस पार खड़ी भीड़ और भीतर की व्यवस्था में एक प्रकार का सान्निध्य सा नज़र आ रहा था, जो कि भारत को इतना अनोखा बनाता है।

गली चित्रकारी - बांद्रा मुंबई
गली चित्रकारी – बांद्रा मुंबई

बांद्रा में गाँव की सड़कों के किनारे खड़े क्रॉस ने मुझे गोवा की याद दिला दी – जहाँ की आड़ी-तिरछी संकरी गलियों के हर मोड पर एक क्रॉस जरूर है। मुझे बताया गया कि इन में से अधिकतर क्रॉस प्लेग महामारी के दौरान स्थापित किए गए थे, जिसने 19वी शताब्दी के अंतिम दशक में इस पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया था। ऐतिहासिक रूप से पुर्तगाली लोग इस द्वीप पर आनेवाले पहले घुसपैठी थे। यहाँ के माउंट मेरी जैसे गिरजाघर उन्हीं के द्वारा स्थापित किए गए थे।

बांद्रा द्वीप का नामकरण   
बंदर वर्ली समुद्र सेतु - मुंबई
बंदर वर्ली समुद्र सेतु – मुंबई

प्राचीन काल में इस द्वीप को वान्द्र के नाम से जाना जाता था, लेकिन समय के साथ उसका विपथन होता गया और वह बंदोरा, बंदेराम आदि नामों में परिवर्तित होते-होते अंत में 19वी शताब्दी के अंतिम दशक के दौरान किसी रेल परियोजना के चलते बांद्रा नाम से जाना जाने लगा। मुझे लगता है कि हमे रेल्वे का विशेष रूप से आभारी होना चाहिए, क्योंकि, इसी के कारण भारत के कई जगहों का, जिनके नाम की वर्तनी भी सही नहीं होती थी, ठीक-ठीक नामकरण हो पाया है। हमने सेंट एंड्रूस चर्च में थोड़ा समय बिताया, जहाँ पर हमने उनके पारिवारिक स्मृति-लेख पढे। यह सब देखकर मैं इसी सोच में पड़ गयी कि न जाने कैसे इनके परिवार इतनी छोटी सी जगह में समाते होंगे। यह मुंबई के सबसे पुराने गिरजाघरों में से एक है जो आज भी सुव्यवस्थित रूप में है और जिसके बगीचे में लकड़ी का बना सबसे पुराना और बहुत ही सुंदर सलीब है।

बांद्रा द्वीप से जुड़े उपाख्यान   
बांद्रा के एक कॉफ़ी हाउस की रोचक दीवार
बांद्रा के एक कॉफ़ी हाउस की रोचक दीवार

बांद्रा से जुड़ा एक बहुत ही दिलचस्प उपाख्यान है जो माहिम सेतु के निर्माण की कथा को बताता है। इस सेतु के द्वारा बांद्रा द्वीप को मुख्यभूमि मुंबई से जोड़ा गया था। श्रीमति अवबाई जमशेदजी जीजीभोय के अनेक पुत्र थे लेकिन उन्हें हमेशा से एक पुत्री चाहिए थी। उन्हें बताया गया कि अगर वे माउंट मेरी चर्च जाकर उनसे प्रार्थना करेंगी तो उनकी यह मनोकामना जरूर पूरी होगी।

माउंट मेरी चर्च बांद्रा द्वीप पर स्थित थी, जहाँ पर पहुँचने के लिए अवबाई ने एक नाव ली और बड़ी मुश्किलों का सामना करते हुए आखिर वे अपनी इच्छा पूर्ति हेतु वहाँ पर पहुँचने में सफल रही। भारत जैसे पुत्र-प्रेमी देश में कोई पुत्री की कामना भी कर सकता है यह जानकर मैं हैरान भी हुई और प्रस्सन भी। उससे भी अधिक मैं अवबाई की दृढ़ता से प्रभावित थी जो पुत्री पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी। उन्होंने संकल्प किया था कि अगर उनकी इच्छा पूरी हुई तो आगे से किसी को भी इस द्वीप तक पहुँचने के लिए नाव का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। उपाख्यानों के अनुसार उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और इसी की खुशी में उन्होंने माहिम सेतु का निर्माण करवाया।

मैं ठीक-ठीक तो नहीं जानती कि मुंबई के कितने लोग हर रोज़ इस सेतु का प्रयोग करते हैं, पर इतना जरूर जानती हूँ कि यह सेतु ‘पुत्री की कामना’ की इच्छापूर्ति के परिणाम स्वरूप बनवाया गया था। यह भारत की कुछ गिनी-चुनी सार्वजनिक सड़कों में से एक है जो व्यक्तिगत तौर पर बनवाई गयी थी और वह भी एक महिला द्वारा। इससे यह पता चलता है कि महिलाओं के पास जब सामर्थय होता है तब न केवल वो अपनी इच्छाएं पूर्ण करती हैं, वो समाज कल्याण के कार्य भी करती हैं।

बांद्रा में बॉलीवुड चित्रकारी  
दीवार के अमिताभ बच्च्चन - बांद्रा की एक दीवार पर
दीवार के अमिताभ बच्च्चन – बांद्रा की एक दीवार पर

बांद्रा में हर दीवार रंजीत दहिया के ‘बॉलीवुड आर्ट प्रोजेक्ट’ (बी.ए.पी.) से सजी हुई थी। इसके द्वारा बॉलीवुड को बांद्रा की दृश्य कला संस्कृति का हिस्सा बनाने की कोशिश की जा रही है। यह सब देखकर मेरे मन में यही प्रश्न उठा कि मुंबई के बाकी हिस्सों में ऐसा क्यों नहीं होता। वहाँ पर मधुबाला जी का उनकी प्रसिद्ध मुद्रा में बना हुआ चित्र था, तथा अनारकली का भी एक सुंदर चित्र था। तो एक और दीवार पर थे अमिताभ बच्चन जी और राजेश खन्ना जी के दो प्रतिष्ठित चित्र।

जब भी मैं मुंबई की इस चहलपहल भरी जिंदगी को देखती हूँ तो मुझे लगता है जैसे इस शहर को बॉलीवुड को सौंपकर बाकी सब को यहाँ से बाहर निकल जाना चाहिए ताकि वे जहाँ चाहे वहाँ आराम से काम कर सके। बांद्रा की दीवारों पर चित्रित बॉलीवुड के प्रसिद्ध चित्र देखते हुए मुझे ये एहसास हुआ कि बॉलीवुड तो हमेशा अपनी बंद स्टूडियोज के पीछे छिपा रहता है, और बड़ी मुश्किल से अपना घर माननेवाले इस शहर की संस्कृति का भाग बनता है।

बॉलीवुड आर्ट प्रोजेक्ट’ के बारे में थोड़ा-बहुत पढ़ने के पश्चात मुझे ये एहसास हुआ कि वस्तुतः दीवारों पर चित्रकारी करने का जुनून होने के अलावा भी ऐसी बहुत सी बाते हैं, जो उसे वास्तविकता का रूप देने हेतु आवश्यक होती हैं। यह सब देखकर और जानकर मेरे मन में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था, कि अब तक बॉलीवुड के संपन्न व्यक्तियों में से किसी ने भी इस प्रोजेक्ट के लिए निधि देने की पहल क्यों नहीं की है। उनके लिए तो यह एक छोटी सी बात होगी लेकिन इससे, इस शहर में बहुत से बदलाव लाये जा सकते हैं। और इस प्रकार से वे अपने ही व्यवसाय और उससे जुड़े प्रतिष्ठित व्यक्तियों को और भी कीर्तिमय कर सकते हैं।

हमने अपनी यात्रा के अंतिम पल मुंबई के हाल ही में निर्मित बांद्रा-वर्ली समुद्र सेतु को निहारते हुए बिताये; जो बांद्रा के प्राचीन दुर्ग से बहुत ही सुंदर दिखाई दे रहा था।

बांद्रा की सैर  

अगर आपके पास बांद्रा घूमने के लिए लगभग 2 घंटे का समय है तो इनमें से एक या दो जगहों पर जरूर जाईएगा।

  • यहाँ के चित्ताकर्षक बाज़ारों में खरीदारी करना।
  • पुराने घरों की वास्तुकलात्मक विशेषताओं का अवलोकन।
  • दीवारों पर किए गए भित्तिचित्र।
  • बॉलीवुड आर्ट प्रोजेक्ट के भित्तिचित्रों के दर्शन।
  • गिरजाघरों के दर्शन।
  • कोली गांवों के दर्शन।
  • यहाँ के चमक-दमक वाले कॉफी घरों के स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ उठाना।

इस चित्तरंजक यात्रा के लिए मैं दीपा की बहुत आभारी हूँ। मैं आशा करती हूँ कि आगे भी आपके साथ ऐसी ही मंत्रमुग्ध यात्राओं पर जाने के अनेक मौके प्राप्त हो।

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