भुवनेश्वर का आदिवासी संग्रहालय – एक परिचय

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हम जब भी पर्यटन के लिए किसी गंतव्य में जाते हैं, हमारी पर्यटन क्रियाकलापों की सूची में स्थानीय विशेषताओं एवं आकर्षणों के अंतर्गत वहां स्थित संग्रहालयों का समावेश अवश्य होता है। हमारी भुवनेश्वर यात्रा में भी यही स्थिति थी। हमने भुवनेश्वर के संग्रहालयों एवं कलाक्षेत्रों के दर्शन किये थे। मैंने भुवनेश्वर की कला भूमि के विषय में एक पृथक संस्करण पूर्व में ही लिख कर प्रकाशित कर दिया है। वास्तव में भुवनेश्वर में सर्वप्रथम हमने ओडिशा राज्य आदिवासी संग्रहालय का अवलोकन किया था।

पूर्व में आदिवासी कला एवं कलाकृति संग्रहालय (Museum of Tribal Arts and Artifacts) के नाम से लोकप्रिय इस संग्रहालय के प्रवेशद्वार पर ही यह आभास हो जाता है कि हम आदिवासियों के विश्व में प्रवेश कर रहे हैं। वारली चित्रकारी जैसी आकृतियों से चित्रित परिसर की भित्तियाँ, ऊंचे वृक्षों से घिरी संग्रहालय की संरचना, हरे-भरे घास के मैदान तथा रंग-बिरंगे मौसमी पुष्पों से लदे अनेक पौधे जनवरी मास में हमारा स्वागत कर रहे थे। संग्रहालय में प्रवेश शुल्क नाममात्र है। यहाँ के कर्मचारी अत्यंत आत्मीयता से सब की सहायता कर रहे थे। यह संग्रहालय भुवनेश्वर नगर के भीतर, नगर केंद्र से लगभग ४ किलोमीटर दूर स्थित है।

सन् १९५३ में स्थापित इस आदिवासी संग्रहालय में अनेक कलाकृतियाँ प्रदर्शित हैं जो इस क्षेत्र के आदिवासी जनजातियों के जीवन को दर्शाती हैं, जैसे उनकी वेशभूषा, उनके आभूषण, उनकी परम्पराएं, खान-पान, उनके निवास स्थानों की प्रतिकृतियाँ, कलाकृतियाँ तथा आदिवासी  संस्कृति के उद्भव एवं क्रमिक विकास के विभिन्न चरण आदि। वास्तव में ओडिशा राज्य में ६० से भी अधिक आदिवासी जनजातियाँ हैं। इस अप्रतिम परिसर में एक पुस्तकालय भी है जहां आप राज्य के आदिवासी जीवन के विषय में आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही एक स्मारिका दुकान एवं जलपान के लिए अनेक विकल्प उपलब्ध हैं।

भुवनेश्वर का आदिवासी संग्रहालय

संग्रहालय में अनेक दीर्घाएं हैं जहां स्थानीय व क्षेत्रीय आदिवासी जीवनशैली, संस्कृति, साज सज्जा, औजार, निवास शैलियाँ, कृषि पद्धतियाँ, परिधान, आभूषण, मछली पकड़ने व शिकार करने के यंत्र/औजार तथा अनेक अन्य वस्तुएं प्रदर्शित की गयी हैं।

आदिवासी जनजीवन का चित्रण करते कला एवं कलाकृतियों की दीर्घाएं/कक्ष-

  • संग्रहालय परिसर में संथाल, जुआंग, गदबा, सौरा, कौंध तथा चुक्तिया भुंजिया जनजातियों के विशेष निवास-योग्य आदिवासी झोपड़ियां/आवास को शिल्पकलाकृति के रूप में पुनर्रचित किया गया है।
  • आदिवासियों के वैयक्तिक अलंकरण: आदिवासी जनजातियों की पारंपरिक वेशभूषा, सूक्ष्मता से उत्कीर्णित वैयक्तिक आभूषण जैसे कंगन, केशकाँटा, गले का हार, कमरबंद, कर्णफूल आदि।
ढोकरा शैली में धातु शिल्प
ढोकरा शैली में धातु शिल्प
  • वस्त्र, वैयक्तिक वस्तुएं, चित्र, कला एवं शिल्प।
  • आक्रमण एवं रक्षण अस्त्र-शस्त्र, मछली पकड़ने एवं शिकार करने के औजार/यन्त्र: जैसे शिला प्रक्षेपक, पिजरे, फंदे, जाल, तीर, भाले, कुल्हाड़ी, तलवार, पारंपरिक छुरियाँ आदि। मछलियाँ रखने की टोकरियाँ, एवं जाले भी हैं। जंगल स्वच्छ करने के औजार, बलि के औजार आदि भी प्रदर्शित हैं।
  • घरेलु वस्तुएं एवं कृषि उपकरण: जैसे बर्तन, चाकू, पात्र, वर्षा से रक्षण करने के साधन, बुनी हुई रस्सियाँ, तेल निकालने के कोल्हू आदि। माप पात्र, सूखी लौकी से निर्मित पात्र, खुदाई के औजार, पराली एकत्र करने के औजार, हल, भूमि समतल करने के यन्त्र, धान पछारने के साधन, मूसल आदि भी रखे हुए हैं। गाय के गले की घंटियाँ, डोरी, गुलेल अथवा गोफन, कांवड़ आदि जो विभिन्न आदिवासी जनजातियों की विशेषता दर्शाते हैं।
  • नृत्य मुद्राएँ, ढोकरा कलाकृतियाँ, संगीत वाद्य: पीतल एवं सींगों द्वारा निर्मित तुरही, ढोलक, तबला, झांझ, मंजीरा, तम्बूरा एवं अन्य तार युक्त संगीत वाद्य, नृत्य की वेशभूषाएं आदि। ढोकरा धातु शिल्प-कला में विभिन्न धातुओं द्वारा निर्मित अनेक आकृतियाँ प्रदर्शित की गयी हैं। इनमें मूल रूप से हाथी, ऊँट, घोड़े, भैंस तथा अन्य पशु-पक्षी, बक्से, दीपक तथा देवी-देवताओं की आकृतियाँ होती हैं।

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भुवनेश्वर आदिवासी संग्रहालय की धातु शिल्प कलाकृतियाँ

संग्रहालय में धातु का प्रयोग कर ढोकरा शिल्पकला द्वारा रचित कलाकृतियों को देख आप आश्चर्य में पड़ जायेंगे कि प्राचीन काल से धातुओं का प्रयोग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में किया जाता रहा है। ओडिशा की यह शिल्पकला भी अप्रतिम है, विशेषतः ढोकरा शिल्पकला जिसमें प्राचीन मोम ढलाई तकनीक द्वारा मूर्तियाँ एवं अन्य वस्तुएं बनाई जाती हैं। जैसे

धातु शिल्प में सरस्वती एवं नंदी मुख
धातु शिल्प में सरस्वती एवं नंदी मुख
  • सभी प्रकार के आयुध, क्योंकि बचाव एवं सुरक्षा मानव की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
  • भोजन उपलब्ध करने के लिए कृषि के उपकरण
  • विभिन्न धातुओं में निर्मित भोजन पकाने एवं परोसने के पात्र
  • मछली पकड़ने के उपकरण। मछली उनके भोजन का एक अभिन्न अंग है।
  • विभिन्न देवी-देवताओं एवं उनके वाहनों की प्रतिमाएं।

आभूषण

चांदी के बने उत्कृष्ट गहने - भुवनेश्वर का आदिवासी संग्रहालय
चांदी के बने उत्कृष्ट गहने

भुवनेश्वर आदिवासियों की चित्रकला शैली

इडीताल लांजिया सौरा चित्र

हमने जैसे ही संग्रहालय परिसर में प्रवेश किया, हमारी दृष्टि हमारे चारों ओर स्थित परिसर भित्तियों एवं मुख्य संरचना की भित्तियों पर चित्रित अप्रतिम आदिवासी चित्रों पर पड़ी। पुष्पों से आच्छादित पौधे एवं हरी-भरी दूब से भरे उद्यान इसका सौंदर्य द्विगुणीत कर रहे थे। उन चित्रों को देख खुशी से उदगार फूट पड़े, ‘इतने सारे वारली चित्र!’। संग्रहालय दीर्घा में विचरण करते हुए उन्ही के समान अनेक अन्य आदिवासी चित्रों को देख यह जाना कि ये वारली चित्र नहीं हैं। अपितु ये चित्र दक्षिण ओडिशा में पुट्टासिंग व रायपाड़ा के लांजिया सौरा आदिवासियों द्वारा निर्मित हैं।

लांजिया सौरा चित्रकला
लांजिया सौरा चित्रकला

ऐसा कहा जाता है कि इस प्रकार की चित्रकारी सौर जनजाती के प्रमुख भगवान इडीताल के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करने के लिए, किसी आध्यात्मिक अनुष्ठान के लिए, अपने पूर्वजों की स्मृति में अथवा जन्म, विवाह, खेतों की कटाई जैसे विशेष अवसरों पर आदिवासियों द्वारा की जाती है। पारंपरिक रूप से उनके पुरोहित कुदंग इन चित्रों का चित्रण करते हैं, उनका सार व दर्शन समझते हैं तथा समझाते हैं। लिखित अभिलेखों की अनुपस्थिति में मान्यताओं को प्रदर्शित करने की यह एक मौखिक परम्परा है।

मानवों, पशुओं एवं वृक्षों को दर्शाते ये ज्यामितीय चित्र सामाजिक समारोहों में जीवन चक्र को प्रदर्शित करते प्रतीत होते हैं। किन्तु वास्तव में चित्र अति विशिष्ट दायित्व निभा रहे हैं, आगामी पीढ़ी तक अपनी संस्कृति को पहुँचाना।

लांजिया सौरा चित्रकला
लांजिया सौरा चित्रकला

चिकनी मिट्टी द्वारा बनाई गयी लाल अथवा गहरे पीले रंग की पृष्ठभूमि में प्राकृतिक रंगों का प्रयोग कर ये चित्र बनाए गए हैं। उनमें श्वेत व नीले रंग प्रमुख हैं। पुरातन काल में पारंपरिक रूप से वे इन चित्रों को अपनी कुटिया के भीतर रंगते थे। चिकनी मिट्टी से भित्तियों को सम रंग देकर उन पर पिसा चावल, श्वेत शिला का चूरा, पुष्पों एवं पत्तियों के प्राकृतिक रंगों आदि से बांस द्वारा निर्मित कूची द्वारा चित्र रंगते थे।

ऐसा माना जाता है कि ये आदिवासी जनजाति भारत की प्राचीनतम जनजाति है। रामायण तथा महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी इनका उल्लेख किया गया है।

लांजिया सौरा एवं वारली चित्रों में अंतर

लांजिया सौरा गाँव के आदिवासी चित्रों की वारली चित्रों से समानता अत्यंत आश्चर्यजनक है। कुछ शोधकर्ताओं द्वारा प्रदर्शित शोधकार्यों के अनुसार उनमें कुछ अंतर अवश्य है। लांजिया सौरा चित्रों में चित्रित मानव आकृतियाँ अपेक्षाकृत अधिक लम्बी हैं। मानव आकृतियाँ स्त्री की हैं अथवा पुरुष की, यह स्पष्ट नहीं होता है। त्रिकोण नुकीले ना होकर किंचित गोलाकार होते हैं। इनमें रंगों का प्रयोग अधिक है। जीवन वृक्ष का चित्र अनेक स्थानों पर किया जाता है। चित्रकारी सीमारेखा से भीतर की दिशा में किया जाता है। इन चित्रों में उनके अनुष्ठान/परम्पराएं/श्रद्धा/ विश्वास तथा उनके आसपास के प्राकृतिक/ दैनन्दिनी जीवन के दृश्यों का चित्रण अधिक परिलक्षित होता है।

आदिवासी चित्रकारी से अनभिज्ञ हम जैसे दर्शकों के लिए इन सूक्ष्म अंतरों को पूर्णतः जानना एवं समझना आसान नहीं है। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ मानो ये दोनों चित्रकला शैली एक दूसरे से गर्भनाल द्वारा जुड़े हुए हैं। अथवा कदाचित वारली चित्रकला सौरा आदिवासी चित्रकला से ही प्रेरित हो। मुझे इस विषय में स्पष्ट ज्ञात नहीं है। किन्तु मेरी तीव्र अभिलाषा है कि इन दोनों अप्रतिम पारंपरिक चित्रकला शैलियों को विश्व भर के कला प्रेमियों द्वारा भरपूर प्रोत्साहन मिले तथा उन कारीगरों को भरपूर सम्मान एवं पारिश्रमिक भी प्राप्त हो। अन्यथा सम्पूर्ण विश्व बाजार कृत्रिम कलाकृतियों से भरा हुआ है।

गोंड चित्रकला शैली

गोंद चित्रकला
गोंद चित्रकला

इस प्रकार की चित्रकारी मूलतः भारत के विशालतम आदिवासी समुदाय, गोंड जनजाति द्वारा अपनी झोपडी/कुटिया की भित्तियों पर की जाती थी। ओडिशा के साथ इससे लगे कुछ अन्य राज्यों में भी पाई जाने वाली यह जनजाति अपने प्रकृति प्रेम के लिए लोकप्रिय है, वह चाहे वन्य प्राणियों के प्रति हो अथवा मानसून, पर्वत तथा अन्य प्राकृतिक तत्वों के प्रति हो। उनके द्वारा की गयी पारंपरिक चित्रकारी शैली को गोंड चित्रकला शैली कहा जाता है। उनकी विषयवस्तु सामान्यतः प्रकृति के वे तत्व होते हैं जिनसे उनका दैनिक साक्षात्कार होता है, जैसे वन्य प्राणी, पक्षी, वृक्ष आदि। इन चित्रों का आरम्भ सामान्य रेखाओं से होता है। तदनंतर चल तत्वों को दर्शाने के लिए बिन्दुओं एवं टूटी रेखाओं का समावेश किया जाता है। अनेक प्राकृतिक रंगों का प्रयोग कर प्रकृति के जीवंत दृश्यों को प्रदर्शित किया जाता है।

सभी चित्र ध्यानाकर्षित करते हैं। ये मुझे किंचित आसान भी प्रतीत हुए। मेरे अनुमान से आज के बालक-बालिकाओं को इन्हें चित्रित करने में कठिनाई नहीं आयेगी। वे इस कला को प्रोत्साहित कर सकते हैं। इस संग्रहालय में अनेक गोंड चित्र प्रदर्शित हैं। इन आदिवासियों ने इस प्रकार अपने सहस्त्र वर्षों का इतिहास अभिलेखित किया है।

बांस की वस्तुएं

धान द्वारा निर्मित कलाकृतियाँ

धान कृतियाँ लक्ष्मी गणपति
धान कृतियाँ लक्ष्मी गणपति

धान कला शैली ओडिशा के आदिवासियों की विशेष कला शैलियों में से एक है। वे उनसे साखली, देवी-देवताओं के विग्रह, पशु आकृतियाँ, पुष्प, हार तथा अनेक अन्य वस्तुएं बनाते हैं। इन कलाकृतियों को बनाने में सूक्ष्म कारीगरी एवं एकाग्रता की आवश्यकता होती है। देवी लक्ष्मी, सरस्वती, सुभद्रा, भगवान जगन्नाथ, बालभद्र, गणेश के विग्रहों के अतिरिक्त मोर इत्यादि की कलाकृतियाँ मूलतः यहाँ के कारीगर निर्मित करते हैं। साथ ही दैनिक प्रयोग की वस्तुएं एवं दृश्यों को भी अपनी कलाकृतियों में सजीव करते हैं। यह इस पर निर्भर करता है कि किस वस्तु की कितनी मांग है। इनमें से प्रत्येक कलाकृति को पूर्ण करने में कारीगरों को लगभग ३-४ दिवसों का परिश्रम करना पड़ता है।

धान से बने सरस्वती एवं जगन्नाथ
धान से बने सरस्वती एवं जगन्नाथ

धान, उसकी बालियाँ, सूत एवं बांस की खपच्चियों को प्राकृतिक रगों से रंग कर इस शिल्प में प्रयोग करते हैं। धान की बालियों को सूत से बाँध कर तथा बांस की खपच्चियों के साथ गूंथ कर हार बनाया जाता है। तदनंतर उन्हें मोड़कर तथा कुंडली बनाकर उन्हें अंतिम रूप प्रदान किया जाता है। उन्हें स्थानिक धान मूर्ति अथवा धन मूर्ति कहते हैं क्योंकि एक प्रकार से वे अच्छी फसल, समृद्धि एवं संपत्ति का ही प्रतीक हैं।

धान से बने आभूषण
धान से बने आभूषण

एक काल में यह क्षेत्र कृषि संपन्न होने के कारण तथा इन कलाकृतियों के आध्यात्मिक महत्ता होने के कारण यह एक समृद्ध कला शैली थी। किन्तु वर्त्तमान में यह कला शैली अवनति की ओर अग्रसर हो रही है। अब केवल नाममात्र के शिल्पकार ही इस कला में लिप्त हैं। वे अपनी कलाकृतियों को स्थानीय हाटों एवं बाजारों में विक्री करते हैं। उनमें से कुछ गिनी-चुनी कलाकृतियाँ नगरी शिल्प बाजारों तक भी पहुँच जाती हैं।

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भुवनेश्वर का ओडिशा राज्य आदिवासी संग्रहालय सदा प्रयत्नशील रहता है कि वह ऐसे कार्यशालाओं का आयोजन करे जहां धान शिल्पकार आकर अपनी कला को प्रदर्शित कर सकें तथा अपनी कलाकृतियों की विक्री भी कर सकें।

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यात्रा सुझाव – भुवनेश्वर का आदिवासी संग्रहालय :

भुवनेश्वर का आदिवासी संग्रहालय
भुवनेश्वर का आदिवासी संग्रहालय
  • दर्शन समयावधि: प्रातः १० बजे से संध्या ५ बजे तक
  • राज्य सरकार द्वारा घोषित छुट्टियों के दिन यह संग्रहालय बंद रहता है।
  • यह संग्रहालय बस स्थानक, रेल स्थानक एवं विमानतल, तीनों के समीप स्थित है। आप ऑटोरिक्शा, टैक्सी अथवा सार्वजनिक परिवहन के साधनों द्वारा यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं।
  • दर्शनार्थियों के लिए प्रवेश एवं वाहन खड़ा करना निशुल्क है।
  • व्यवस्थित रूप से अभिलेखित सैकड़ों आदिवासी कलाकृतियाँ यहाँ प्रदर्शित हैं।
  • संग्रहालय में पर्यटकों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि हो रही है। सन् २०१९ में लगभग एक लाख पर्यटक इस संग्रहालय के अवलोकन के लिए आये थे।
  • कलाकृतियों की दीर्घाओं में प्रदर्शित कलाकृतियों के विषय में जानकारी प्रदान करने के लिए डिजिटल तथा टच स्क्रीन इंटरएक्टिव कियोस्क स्थापित किये गए हैं।
  • संग्रहालय एवं कलाकृतियों के विषय में जानकारी बहुमाध्यम से परिसर के भीतर ही अंग्रेजी, हिन्दी एवं ओडिया भाषा में दिया जाता है।
  • कुछ विशेष अवसरों पर कलाकृतियों को बनाने का जीवंत प्रशिक्षण भी पर्यटकों को दिया जाता है।
  • इन दिनों इसका वर्चुअल अवलोकन उपलब्ध है।
  • ओडिशा राज्य के आदिवासी संग्रहालय के विषय में अधिक जानकारी के लिए उनके इस संकेतस्थल पर जाएँ।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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