फर्स्ट नेशन्स – ब्रिटिश कोलम्बिया के मूल निवासियों को जानें

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‘फर्स्ट नेशन्स’, कनाडा में ब्रिटिश कोलम्बिया के मूल आदिवासियों का समकालीन नाम है। इससे पूर्व उन्हे कई अन्य नामों से भी जाना जाता था जैसे इंडियन, मूल निवासी, अमेरिकी मूल निवासी, अमेरिकी इंडियन अथवा अमेरिण्डियन इत्यादि। आप इन्हे जिस भी नाम से संबोधित करें, अंततः ये उस धरती के मूल निवासी हैं जिसे अब हम कनाडा के नाम से जानते हैं। कुछ सदियों पूर्व उन्हे अपनी धरती एवं अपनी पहचान गँवानी पड़ी जब यूरोपवासियों ने उनकी धरती पर पाँव रखा। आज ब्रिटिश कोलम्बिया के फर्स्ट नैशन निवासी अपनी पहचान पुनः अर्जित करने के लिए सार्वजनिक स्थलों का उपयोग कर अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं।

बिल रीड की फर्स्ट नेशन्स को समर्पित कलाकृति वन्कुवर विमानतल पर
बिल रीड की फर्स्ट नेशन्स को समर्पित कलाकृति वन्कुवर विमानतल पर

वे अपनी उन सभी भाषाओं के आलेख तैयार कर रहे हैं जिनका प्रयोग बोलचाल के लिए सदैव किया जाता था किन्तु कभी लिखा नहीं गया। वे अपने मौखिक ऐतिहासिक तथ्यों का संकलन कर रहे हैं। कनाडा में मैं जहां भी गई, मुझे हर ओर उनकी छाप स्पष्ट दृष्टिगोचर हुई। अधिकांशतः ये छाप भित्तिचित्रों के रूप में तथा लकड़ी के उत्कीर्णित व रंगबिरंगे टोटेम पोल्स अर्थात गणचिन्ह स्तंभ या कुलदेवता के स्तंभ के रूप में दृष्टिगोचर हैं। यहाँ की स्मारिका विक्री की दुकानें भी इसी प्रकार के आदिवासी कलाकृतियों से भरे हुए हैं।

किसी भी स्थान का प्राचीनतम अस्तित्व, चिन्ह अथवा इतिहास मुझे सदैव आकर्षित करता रहा है। अतः स्वाभाविक है, ब्रिटिश कोलम्बिया की इस आदिवासी जनजाति ने भी मुझे मंत्रमुग्ध किया हुआ था। मैं उनके इतिहास, उनकी संस्कृति, उनके धर्म, उनके विश्वास, उनकी प्रथाओं एवं उनकी कला के विषय में जानने के लिए अत्यन्त उत्सुक थी। उत्कीर्णित व रंगबिरंगे टोटेम पोल्स अर्थात कुलदेवता के स्तंभों में छुपी कथाओं को समझना चाहती थी।

ब्रिटिश कोलम्बिया के मूल निवासी या फर्स्ट नेशन्स कौन हैं?

फर्स्ट नेशन्स समुदायों  के पुरुषों के चित्र
फर्स्ट नेशन्स समुदायों के पुरुषों के चित्र

हम सब जानते हैं कि वे वहाँ के मूल आदिवासी निवासी हैं तथा उन्हे पूर्व में इंडियन कहा जाता था। किन्तु ये कौन लोग हैं? क्या वे एक ही जाति के आदिवासी हैं अथवा उनमें भी भिन्न भिन्न जातियाँ हैं? उनका विश्व के अन्य भागों से संबंध है या नहीं? यदि है तो किस प्रकार का संबंध है? क्या वे सदा से यहीं निवास करते थे या वे किसी अन्य स्थान से यहाँ स्थानांतरित हुए थे? उस समय क्या परिवर्तन आए जब १८ वीं. शताब्दी में यूरोपीय आक्रांता यहाँ पहुंचे? उनमें आपस में किस प्रकार की प्रतिक्रियाएं हुईं?

अब मैं आपको आश्चर्यचकित करने जा रही हूँ। कनाडा में लगभग ६०० से अधिक फर्स्ट नेशन्स आदिवासी जनजातियाँ हैं जिनमें से लगभग २०० जनजातियाँ केवल ब्रिटिश कोलम्बिया फर्स्ट नैशन में ही हैं।

फर्स्ट नेशन्स समुदायों की महिलाओं के चित्र
फर्स्ट नेशन्स समुदायों की महिलाओं के चित्र

फर्स्ट नेशन्स की उत्पत्ति के विषय में प्रचलित अनुमानों में एक के अनुसार सहस्त्रों वर्षों पूर्व ये जनजातियाँ सिबेरिया से यहाँ आई थीं। थल मार्ग एवं जल मार्ग से होते हुए वे अलास्का के किसी स्थान पर पहुंचे थे। वहाँ से वे चारों दिशाओं में प्रस्थान करते हुए कई स्थानों में जाकर बस गए। इन निवासियों के गोल-मटोल गालों एवं छोटी छोटी आँखों को देखें तो यह सिद्धांत संभव प्रतीत होता है। यद्यपि कई आदिवासी लोगों का मानना है कि वे यहाँ सदा से निवास करते थे।

कनाडा के ओंटारिओ में इन आदिवासी जनजातियों की सर्वाधिक जनसंख्या है। इसके पश्चात ब्रिटिश कोलम्बिया का स्थान है। ब्रिटिश कोलम्बिया में प्रथम आदिवासी समूहों को उनकी विशेष बोलचाल की भाषा द्वारा परिभाषित किया जाता है। विभिन्न आदिवासी जनजातियाँ एवं उनकी बोलचाल की भाषा एक नक्शे द्वारा संस्करण के अगले भाग में दर्शाई गई हैं।

कनाडा का उत्तर-पश्चिमी तट प्रचुर मात्रा में उपलब्ध खाद्य पदार्थों के कारण वसाहत से परिपूर्ण था। विभिन्न भाजियों के साथ मछलियाँ भी भरपूर मात्रा में उपलब्ध थीं। प्रत्येक वर्ष ४ मास की शीत ऋतु के लिए वे ७-८ मास घूम घूम कर खाद्य पदार्थ एकत्र करते थे। शीत ऋतु के इन ४ मासों में उन्हे किसी सुरक्षित स्थान पर रुकना पड़ता था। इस समय का सदुपयोग वे लकड़ियों पर सुंदर नक्काशी कर आकर्षक कलाकृतियाँ निर्मित करने में करते हैं। इसका प्रयोग वे व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक उपयोगों के लिए करते थे।

यूरोपीय उपनिवेश

जब यूरोपवासियों ने कनाडा के उत्तर-पश्चिमी तट पर प्रवेश किया, तब दोनों दलों ने एक दूसरे का स्वागत किया। किन्तु जैसे जैसे यूरोपवासी वहाँ बसने लगे, उन्होंने ब्रिटिश कोलम्बिया के फर्स्ट नेशन्स वासियों को वहाँ से खदेड़ना आरंभ कर दिया। उनकी दृष्टि उस स्थान पर थी जहां ब्रिटिश कोलम्बिया के फर्स्ट नेशन्स वासी निवास करते थे। अतः इन निवासियों को वहाँ से विस्थापित होना पड़ा।

दुर्भाग्य से ये यूरोपवासी अपने साथ ऐसे रोगों को लाए थे जिनके प्रति उनमें तो रोग प्रतिरोधक शक्ति थी किन्तु स्थानीय निवासियों में वांछित प्रतिरक्षित तत्व उपस्थित नहीं थे। इसके फलस्वरूप चेचक व खसरा जैसे संचारी रोगों के कारण भारी मात्रा में स्थानीय निवासियों की मृत्यु हुई थी। एक संक्रमित रोगी सम्पूर्ण गाँव नष्ट कर देता था। अतः उन्होंने अपने खेत-खलिहान एवं जीविका से तो हाथ धोया ही, साथ ही नये-नये रोगों से ग्रस्त होकर प्राण भी गँवाएं।

यूरोपवासियों ने इसका निष्कर्ष यह निकाला कि स्थानीय निवासी आधुनिकता को आत्मसात करने में असमर्थ थे। वे स्थानीय निवासियों से उनकी कलाकृतियाँ एकत्र करने लगे तथा उन्हे अपने मूल निवासस्थान यूरोप पर पहुंचाने लगे। वास्तव में वे उन्हे अपनी भावी पीढ़ी के लिए संचय कर रहे थे।

देवदार के वृक्ष

देवदार की छाल से बनी चूड़ी
देवदार की छाल से बनी चूड़ी

लाल देवदार के वृक्ष उत्तर-पश्चिमी प्रशांत तट के आदिवासी निवासियों के हृदय में बसते हैं। यह एक वृक्ष ही उनकी सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करने की क्षमता रखता है, दैनिक आवश्यकताओं से लेकर अनुष्ठानिक आवश्यकताओं तक। प्रचुर मात्रा में उपलब्ध लाल देवदार के वृक्षों का उपयोग वस्त्र, आवास, परिवहन इत्यादि में किया जाता था। उदाहरणतः देवदार के वृक्ष की छाल से वे टोकरियाँ बुनते थे।

लाल देवदार के वृक्ष को उत्तर-पश्चिमी प्रशांत तट के आदिवासी जीवनदायिनी वृक्ष कहते हैं। यह हल्का एवं मुलायम होता है जिसके कारण कम से कम औजारों द्वारा भी इन पर शिल्पकारी की जा सकती है। मशीनीकरण से पूर्व इसका भरपूर उपयोग किया जाता था। इस वृक्ष से एक प्रकार का तेल निकाला जाता था जो जल एवं कीट दोनों का प्रतिरोधक है। अतः यह बाहरी उपयोग के लिए सर्वोत्तम सामग्री है। जी हाँ, यह एक प्राकृतिक कीटनाशक है।

देवदार के वृक्ष का चुनाव

पीले देवदार की तने से बनी नौका
पीले देवदार की तने से बनी नौका

व्हिसलर के स्क्वामिष एवं लीलावत सांस्कृतिक केंद्र में जो पर्यटन गाइड थी वह स्वयं लीलावत समुदाय की थी। उन्होंने मुझे बताया कि किस प्रकार देवदार वृक्ष की छाल निकालने से अथवा उसे काटने से पूर्व वे उनका चुनाव करते थे। उन्होंने बताया कि सर्वप्रथम वृक्ष का आलिंगन किया जाता है। यदि आलिंगन करते समय आपकी उँगलियाँ आपस में छू जाएँ तो आप इस वृक्ष से वस्तुएं ले सकते हैं। अन्यथा आपको उसे बढ़ने के लिए छोड़ना पड़ेगा। यदि उँगलियाँ आपस में छू जाएँ तो उसके समक्ष प्रार्थना कर उससे केवल २ हाथ लंबी छाल ले सकते हैं। तत्पश्चात जीवन दायिनी वस्तु प्रदान करने के लिए वृक्ष का आभार माना जाता है।

उनके साथ संवाद करते समय मुझे छत्तीसगढ़ के अचानकमार का स्मरण हो आया। यहाँ के निवासी भी वृक्षों की इसी प्रकार आराधना करते हैं। सम्पूर्ण विश्व के आदिवासियों की परंपराएँ भी कितनी समान है!

मैंने देवदार वृक्ष के कई चित्र देखे जिनमें से कुछ हाथ लंबा छाल का टुकड़ा निकाला हुआ था। वृक्ष का शेष भाग अछूता था। इन्हे कल्चरली मॉडिफ़ाइड अर्थात सांस्कृतिक रूप से संशोधित वृक्ष कहा जाता है।

देवदार की लकड़ी से बने बक्से
देवदार की लकड़ी से बने बक्से

उसी केंद्र में मैंने भी भीगे हुए देवदार की छाल से एक कंगन बनाया तथा स्मृति स्वरूप उसे अपने साथ ले आई।

वैंकोवर में ऐन्थ्रपालजी अर्थात मानव संग्रहालय में मैंने देवदार के परिपक्व छाल से बना एक बक्सा देखा जिसे बनाने में एक भी कील का प्रयोग नहीं किया गया था। इसे एक परिपक्व छाल को केवल मोड़कर तथा एक दूसरे में फँसाकर बनाया गया था। केवल एक ओर सिलायी लगायी गई थी। सम्पूर्ण मंजूषा जल प्रतिरोधक थी। यहाँ के लोग इसमें धन से धान्य तक सब का भंडारण करते हैं। आप विश्वास नहीं करेंगे, यह इतना जल प्रतिरोधक होता है कि लोग इसमें जल का भी भंडार रखते हैं। है ना अद्भुत!

पीले देवदार के तन्तु अत्यन्त महीन होते हैं। अतः इनका प्रयोग कलाकृतियाँ निर्मित करने में किया जाता है। इसका एक उदाहरण, बिल रीड आप कुछ समय पश्चात यहीं देखेंगे।

ब्रिटिश कोलम्बिया के फर्स्ट नेशन्स क्षेत्रों का मानचित्र

सम्पूर्ण ब्रिटिश कोलम्बिया के नक्शे में विभिन्न जनजातियाँ, उनके नाम तथा उनके निवास क्षेत्रों को दर्शाया गया है।

फर्स्ट नेशन्स का मानचित्र
फर्स्ट नेशन्स का मानचित्र

व्हिसलर में मैंने जाना कि यह लीलावत जातियों के अधिकार क्षेत्र में आता है जो व्हिसलर के किंचित उत्तरी क्षेत्र में रहते हैं। व्हिसलर के दक्षिणी भाग में स्क्वामिष जनजाति निवास करते हैं। वेंकूवर नगर मुसकुएयम लोगों की नगरी है जबकि विक्टोरिया में सोंघी, सानिच तथा एसकिमॉल्ट लोगों का निवास है। आप सोच रहे होंगे कि मैं यह सब आपको क्यों बताया रही हूँ! मैंने इन सभी क्षेत्रों की यात्रा की थी। अतः उन सबका उल्लेख करना आवश्यक समझती हूँ।

यहाँ के स्थानीय जनजाति निवासी विश्व के अन्य भागों में अपनी वस्तुओं का व्यापार करते थे। यहाँ से पाई गई सीपियाँ, जो यहाँ की वस्तु नहीं है, इसका प्रमाण है।

हाईदा ग्वाई की कथा

एक हैदा घर - वन्चुवर के एक संग्रहालय में
एक हैदा घर – वन्चुवर के एक संग्रहालय में

हाईदा ग्वाई द्वीप से मुझे एक अनोखे सत्य के विषय में जानकारी प्राप्त हुई। इस द्वीप को महारानी शेर्लोट द्वीप कहा जाता था। जब ब्रिटिश कप्तान जॉर्ज डिक्सन १७९० के दशक में इस द्वीप पर उतरा था, उसके एक जहाज का नाम महारानी शेर्लोट था। वह इंग्लैंड के महाराज जॉर्ज ३ की महारानी भी थी जिनके नाम पर कप्तान ने इस द्वीप पर आधिपत्य स्थापित किया था। तथापि २०१० में हाईदा जनजाति ने एक समारोह में इसका नाम परिवर्तित कर एक बार फिर इस द्वीप का नाम हाईदा ग्वाई अथवा हाइदियों की धरती कर दिया था।

विचित्र तथ्य यह है कि इस जनजाति ने औपनिवेशिक शक्तियों के साथ किसी भी संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। उन्होंने ना तो अपनी धरती का कोई भाग उन्हे विक्रय किया था ना ही उन्हे दान में कुछ दिया था, जैसा कि कई अन्य जनजातियों को उस समय करना पड़ा था। इसी कारण इस धरती के एक बड़ा भाग पर उनका स्वामित्व शेष है। इस धरती के कई अन्य भाग सुनवाई हेतु न्यायालय में हैं जहां इस जनजाति के कई नागरिक अपनी धरती, अपने नाम तथा विश्व नक्शे में अपने यथोचित स्थान के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं।

फर्स्ट नेशन्स की धार्मिक निष्ठा

विश्व के कई अन्य प्राचीन जनजातियों के समान यह जनजाति भी प्रकृति की आराधना करती है। मैंने व्हिसलर सांस्कृतिक केंद्र में एक विडिओ देखा था जिसमें बताया गया था कि किस प्रकार इस जनजाति के लोग पर्वतों, नदियों, धरती तथा अपने पूर्वजों की आराधना करते हैं। उनका मानना है कि सज्जन व्यक्ति मृत्यु पश्चात पर्वत में परिवर्तित हो जाता है। अतः पर्वत उनका एक पूर्वज है। वे नदियों, वनों तथा पर्वतों से अपने जीवंत संबंधों के विषय में चर्चा करते हैं।

इन सब में सबसे अधिक प्रचलित है पूर्वजों की आराधना। उनका मानना है कि उनके पूर्वज स्वर्ग से धरती पर उतरते हैं, उनके अनुष्ठानों में भाग लेते हैं तथा उन्हे आशीष देते हैं। अपने अनुष्ठानिक नृत्यों एवं समारोहों में वे अपने इस विश्वास का प्रदर्शन करते हैं। इसके लिए वे भव्य मुखौटों का प्रयोग करते हैं जिसे धारण कर वे नृत्य करते हैं। रामनगर की रामलीला के समान वे उस व्यक्ति अथवा उस पवित्र आत्मा को स्वयं में आत्मसात कर लेते हैं जिनको वे प्रदर्शित कर रहे हैं।

इसी प्रकार वे पशुओं के भी मुखौटे धारण कर उनकी भावनाएं व्यक्त करते हैं। तथापि धर्म उनका व्यक्तिगत विषय है जिसका उल्लेख वे सार्वजनिक रूप से अधिक नहीं करते। धार्मिक अनुष्ठान एवं समारोह घरों के भीतर सम्पन्न किए जाते हैं अथवा किसी विशेष दैवी स्थल पर किए जाते हैं।

फर्स्ट नेशन्स कथाएं

उनके पास उनकी दंतकथाओं का विस्तृत भंडार है जिनमें से मैं कुछ ही सुन पाई। सर्वाधिक प्रचलित कथा एक काले कौए के विषय में है जो सूर्य से कुछ प्रकाश चुराकर धरती पर लाया था। भिन्न भिन्न जनजाति के लोगों से इस एक कथा के कई प्रारूप आप सुनेंगे। एक अन्य कथा जूनूक के विषय में है जो बच्चों को चुराता था। यह कथा प्रायः माताएं अपने शिशुओं को सुलाने के समय उन्हे कहती हैं। कदाचित उन्हे किंचित डराकर उनके भटके ध्यान को निद्रा की ओर केंद्रित करने के लिए यह कथा सुनाई जाती हो।

ब्रिटिश कोलम्बिया के प्रथम आदिवासियों की कला

ब्रिटिश कोलम्बिया के फर्स्ट नेशन्स की कलाकृतियों के दो स्पष्ट युग थे। एक प्रकार की कलाकृतियाँ औपनिवेशिक युग के पूर्व काल से संबंध रखती हैं। इनमें मूल टोटम पोल अर्थात गणचिन्ह स्तंभ या कुलदेवता के स्तंभ, लकड़ी के उकेरे हुए फलक, दैनिक उपयोग की वस्तुएं, बुनाई किए हुए कंबल, अनुष्ठानिक वस्तुएं इत्यादि सम्मिलित हैं। आज आप ये सर्व वस्तुएं विश्व के विभिन्न संग्रहालयों में देख सकते हैं। ये सर्व प्राचीन कलाकृतियाँ अज्ञात कालाकारों द्वारा निर्मित हैं। कदाचित वे कुलीन परिवारों द्वारा अधिकृत कलाकार संघ का भाग थे।

प्रसिद्धि प्राप्त कलाकार

बिल रीड की प्रथम मानव कलाकृति
बिल रीड की प्रथम मानव कलाकृति

दूसरे प्रकार की कलाकृतियाँ आधुनिक कलाकारों द्वारा निर्मित पुनुरुत्थानवादी कलाकृतियाँ हैं जिनमें उन्होंने बूटियाँ एवं आकृतियाँ तो वही रखीं किन्तु उसे एक आधुनिक रूप प्रदान किया। इस आधुनिकीकरण का पूर्ण श्रेय एक कलाकार, मूँगों मार्टिन को जाता है जो ब्रिटिश कोलम्बिया के प्रथम आदिवासियों की क्वाक्वाकवाक्व जाति से संबंध रखते हैं। वे एक निपुण शिल्पकार, कवि तथा संगीतज्ञ थे जिन्होंने टोटम पोल अर्थात गणचिन्ह स्तंभ की शिल्पकारी की थी, यहाँ तक कि पॉटलेच प्रतिबंध के समय भी। उन्होंने ब्रिटिश कोलम्बिया के प्रथम आदिवासियों की नवीन पीढ़ी के कलाकारों को भी प्रशिक्षण दिया। इसके लिए उन्हे सदा स्मरण किया जाएगा। उन्होंने सदा इस तथ्य पर भी भार दिया कि गणचिन्ह स्तंभ की शिल्पकारी एक देवकार्य है तथा इनकी शिल्पकारी पूर्वजों की स्मृति एवं सम्मान में की जाती है। एक प्रकार से उनकी इन कलाकृतियों एवं उनके विचारों ने उन्हे समाज में पुनः प्रतिष्ठा प्राप्त करने में सहायता की।

एक अन्य कलाकार हैं बिल रीड जो अपने ननिहाल की ओर से आधे प्रथम आदिवासी हैं। उन्होंने कुछ विशाल कलाकृतियाँ बनाई हैं जिनमें उन्होंने अपनी वंशावली के दोनों पक्षों की विशेषताओं का अद्भुत सम्मिश्रण किया है। जेड अर्थात हरिताश्म में बनी उनकी एक उत्कृष्ट रचना आप वेंकूवर विमानतल में देख सकते हैं। इस कलाकृति में मानवों एवं पशुओं से भरी एक नौका दर्शाई गई है।

उनकी अनेक अद्भुत कलाकृतियों का एक नमूना आप कनाडा के २० डॉलर के मुद्रा नोट पर देख सकते हैं। यह एक कलाकार के लिए अत्यन्त ही सम्मान का विषय है।

वेंकूवर के मानव संग्रहालय में उनकी एक कलाकृति है जिसमें काला कौआ तथा कुछ प्रथम आदिवासी हैं। आप जब भी वहाँ जाएँ, इस कलाकृति को अवश्य खोजें।

एमिली कार्र ब्रिटिश कोलम्बिया की सर्वाधिक प्रसिद्ध आधुनिक कलाकार हैं। उन्होंने भी अपनी कलाकारी का आरंभ टोटम पोल अर्थात गणचिन्ह स्तंभ पर चित्रकारी से किया था। आप उनकी कलाकृतियाँ वेंकूवर के कला संग्रहालय तथा व्हिसलर के औडैन संग्रहालय में देख सकते हैं।

आईए मैं आपका परिचय इस जनजाति के कुछ प्रचलित कलाकृतियों से कराती हूँ:

टोटम पोल अर्थात गणचिन्ह स्तंभ

टोटम पोल लकड़ी के ऊंचे स्तंभ होते हैं। ये मौखिक कथा वाचक स्तंभ होते हैं जो उन परिवारों की कथा कहते हैं जिन्होंने उन्हे खड़ा किया है। ये उन परिवारों की धन-संपदा एवं उनकी प्रतिष्ठा की कथाएं कहती हैं।

एमिली कार की कलाकृति टोटेम पोल दर्शाती
एमिली कार की कलाकृति टोटेम पोल दर्शाती

अधिकांशतः टोटम पोल पर मानव आकृतियाँ, पशु आकृतियाँ तथा कुछ काल्पनिक तत्व होते हैं। फर्स्ट नेशन्स परिवारों अथवा समुदायों को भालू, मेंढक अथवा कौओं जैसे प्राणियों द्वारा पहचाना जाता है। चुना हुआ प्राणी उन परिवारों से संबंधित सभी सामग्री तथा साज-सज्जा का भाग होता है। टोटम पोल भी उसी का ही एक भाग है।

प्रथम आदिवासी समुदायों के प्रत्येक समुदाय की शिल्पकारी एवं रूपांकन की एक विशेष शैली होती है। उदाहरणतः हाईदा कलाकृति को उसकी आँखों के आकार द्वारा पहचाना जाता है। उनकी आंखों की गोलाई अंडाकार अथवा चौकोर गोलाई लिए हुए होती हैं। यहाँ तक कि समकालीन कलाकार भी इन विशेष तत्वों का प्रयोग कर अपनी धरोहरों को दर्शाते हैं।

टोटम पोल अर्थात गणचिन्ह स्तंभ
टोटम पोल अर्थात गणचिन्ह स्तंभ

टोटम पोल केवल मुखिया, सरदार अथवा प्रतिष्ठित परिवार के सदस्य ही निर्मित करवा सकते हैं। फर्स्ट नेशन्स के साधारण परिवार इसे नहीं बनवा सकते।

उत्कीर्णित लकड़ी की पट्टियाँ साधारणतः घरों की भित्तियों पर लगी होती हैं।

आदिवासी डोंगे

डोंगों का प्रयोग मछली पकड़ने तथा नदी में परिवहन के लिए किया जाता था। यह प्रथम आदिवासी समुदाय के लोगों की अतिविशेष संपत्ति होती थी। ये संकरी लंबी नौकाएं एक एकल देवदार के वृक्ष पर शिल्पकारी कर निर्मित की जाती थी। इसके लिए अधिकतर लाल देवदार तथा कभी कभी पीले देवदार के वृक्ष का प्रयोग होता था। वे एक देवदार के वृक्ष का तना लेकर उसका मध्य भाग उकेर कर रिक्त स्थान प्राप्त किया जाता था।

तत्पश्चात इस रिक्त किए गए तने को भाप में पकाया जाता था। भाप देने की प्रक्रिया नौका के आकार पर निर्भर होती है। यह प्रक्रिया एक से दो सप्ताह से लेकर कुछ मास तक चल सकती है। सम्पूर्ण लकड़ी मुलायम हो जानी चाहिए। तब ही कारीगर उस पर कार्य कर सकते हैं। कुछ कारीगर इस नर्म मुलायम तने को दोनों छोर से पकड़ कर खींचते हैं ताकि उस की इच्छित चौड़ाई प्राप्त हो सके।

डोंगी पर कलाकृति किस प्रकार की जाए, यह उस जल पर निर्भर है जिस पर यह तैरने वाली है। जैसे, हाईदा ग्वाई के द्वीप के आसपास का जल अत्यन्त अशांत होता है। अतः उन्हे एक शक्तिशाली एवं बड़े डोंगी की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत वेंकूवर के मुसकीम, जो फ्रेजर नदी पर मछली पकड़ने के लिए डोंगी का उपयोग करते हैं, समतल-तले की साधारण डोंगी का उपयोग करते हैं। इसी प्रकार स्क्वामिष लोगों की डोंगी ७५ फीट तक लंबी हो सकती है।
डोंगियों पर बैठने के लिए जो पटिये जुड़े होते हैं, उन पर पवित्र चिन्ह उकेरे होते हैं।

जैसे ही मोटर मशीन का आविष्कार हुआ, मछुआरों ने मोटर लगी नौकाओं का प्रयोग आरंभ कर दिया। डोंगियों की निर्मिती अब विशेष समारोह के लिए ही की जाती है।

मैंने एक विशेष डोंगी विक्टोरिया की विधान सभा इमारत में देखी थी।

मुखौटे – फर्स्ट नेशन्स की अनमोल धरोहर

फर्स्ट नेशन्स के मुखौटे
फर्स्ट नेशन्स के मुखौटे

प्रत्येक मुखौटे का एक आध्यात्मिक अर्थ होता है। संग्रहालय का निरीक्षक आपको अवश्य सावधान करेगा कि आप इन मुखौटों को दोनों हाथों से आदर के साथ उठायें। ये मुखौटे उनके धार्मिक अनुष्ठानों एवं समारोहों का अभिन्न अंग होने के कारण वे उनके साथ सावधानी बरतते हैं।

कुछ प्रचलित मुखौटे जो आप यहाँ देखेंगे, वे हैं:
• कौए का मुखौटा – यह पूर्वजों का प्रतीक है। इसे धारण करने का अर्थ है कि पूर्वजों को समारोह में आमंत्रित किया जा रहा है।
• भालू का मुखौटा – यह पूर्वज का रूप हो सकता है अथवा पॉटलैच समारोह का निरीक्षक करने वाले उस व्यक्ति का जो यह सुनिश्चित कर रहा है कि समारोह में प्रत्येक व्यक्ति अपना कार्य भलीभाँति कर रहा है तथा अपना पदचिन्ह ठीक प्रकार से धारण किया है या नहीं।
• गरुड मुखौटा – यह गरुड समुदाय के व्यक्ति धारण करते हैं।

जुनूक्वा मुखौटा
एक कहानी कहता जुनूक्वा मुखौटा
  • जुनूक्वा मुखौटा अर्थात जंगली स्त्री का मुखौटा – प्रत्येक प्रथम आदिवासी समुदाय में एक कथा प्रचलित है जो पीठ पर टोकरी उठाए एक स्त्री के विषय में है। यह स्त्री छोटे शिशुओं को उठाकर अपनी टोकरी में रखकर अपने घर ले जाती है तथा उनका भोजन करती है। जुनूक्वा के मोठे मोठे लाल होंठ हैं जिनसे घूम घूम कर वह ऊंचा व भयावह स्वर निकालती है। यह विडंबना है कि यह स्त्री धन एवं समृद्धी का भी प्रतीक है।
    • बकवास – यह एक जलचर है जो जल में डूबे व्यक्तियों को ले जाता है। इसके पास सम्मोहन की भी शक्ति होती है।
    यहाँ ध्यान रखने योग्य तथ्य यह है कि ब्रिटिश कोलम्बिया के प्रत्येक प्रथम आदिवासी समुदाय का इन मुखौटों के प्रयोग के विषय में पृथक व विशेष शैली होती है। मैंने जो यहाँ उल्लेख किया है, उसका उद्देश्य केवल आपको इसके प्रयोग की किंचित कल्पना देना है।

बुनी हुई टोकरियाँ

प्रत्येक संग्रहालय में आप विभिन्न प्रकार की टोकरियाँ देखेंगे जिन्हे लाल देवदार वृक्ष की छाल अथवा जड़ों को बुनकर बनाया जाता है। किसी की बुनाई ढीली होती है तो किसी की बुनाई इतनी कड़ी होती है कि आप उसमें जल भरकर भी रख सकते हैं। कितनी अद्भुत कला है वृक्ष की भीगी छाल को इस प्रकार बुनना कि वह जल को भी आरपार न जाने दे!

बुनाई

अधिकांश प्राचीन आदिवासियों के समान, ब्रिटिश कोलम्बिया के प्रथम आदिवासी समुदाय भी उत्कृष्ट बुनकर होते थे। वे स्थानीय भेड़ तथा अब लुप्तप्राय ऊनी बालों वाले श्वेत कुत्तों से प्राप्त ऊन बुनते थे। रंगने के लिए वनस्पति रंगों का प्रयोग करते थे।

ऊन की बुनाई
ऊन की बुनाई

मैंने यहाँ के संग्रहालयों में जितनी भी बुनाई की वस्तुएं देखीं, उन पर ज्यामितीय आकृतियाँ थीं। यह प्राचीन आदिवासी समुदायों में अत्यन्त प्रचलित शैली थी। प्रयोग में लिया हुआ वस्त्र खुरदुरा होता था। यदि यह बुनाई किसी समुदाय प्रमुख के लिए किया गया हो तो उस पर समुदाय का चिन्ह अवश्य होता था।

१९ वीं. सदी के अंत तक मशीनों द्वारा बनी कंबलों से भरे जहाज वेंकूवर पहुँचने लगे। दुर्भाग्यवश यह हाथों द्वारा बने वस्त्रों का अंत था। एक कला का अंत था। मशीनों द्वारा बनी वस्तुएं सस्ती तथा आसानी से उपलब्ध होने लगी। तो क्यों कोई ऊन एकत्र करने तथा उसकी कताई व बुनाई में अपनी ऊर्जा नष्ट करे?

धार्मिक अनुष्ठानों के लिए बुनी हुई चादर
धार्मिक अनुष्ठानों के लिए बुनी हुई चादर

ब्रिटिश कोलम्बिया के फर्स्ट नेशन्स की बुनाई शैली को नवीन प्राण वायु प्राप्त हुई जब १९७० में कुछ स्त्रियों ने बुनाई की इस शैली का प्रशिक्षण प्राप्त करना आरंभ किया।

बुनाई के लिए जिस चरखे का प्रयोग किया जाता था उसे विक्टोरिया के आंतरिक बंदरगाह पर स्मृति चिन्ह के रूप में लगाया गया है।

फर्स्ट नेशन्स के पोशाक एवं आभूषण

ब्रिटिश कोलम्बिया के प्रथम आदिवासी पोशाक एवं मुखौटों का प्रयोग कर एक अन्य ही विश्व में प्रवेश कर जाते हैं। उनकी पोशाकें अत्यन्त विस्तृत होती हैं। जैसे पारिवारिक चिन्ह जड़े हुए भारी कंबल परिधान अर्थात चिलकत। स्क्वामिष परिधानों में हड्डियों का कंबल खूंटा मुझे अत्यन्त भाया। आभूषण बहुधा पशुओं की हड्डियों एवं चांदी से निर्मित होते हैं। वास्तव में प्रकृति से ली गई प्रत्येक वस्तु का प्रयोग किया जाया है। कोई भी वस्तु व्यर्थ नहीं जाने दी जाती।

इन आदिवासियों में तांबे का प्रयोग भी प्रचलित था। किन्तु मुझे तांबे से निर्मित प्राचीन कलाकृतियाँ अधिक नहीं दिखाई दीं।

पॉटलैच

पॉटलैच कनाडा के प्रथम आदिवासी समुदायों या फर्स्ट नेशन्स का एक पवित्र समारोह है। पॉटलैच का शाब्दिक अर्थ है ‘देना’। इस पवित्र अनुष्ठान के आर्थिक, राजनीतिक तथा आध्यात्मिक परिणाम होते हैं। पॉटलैच तब किया जाता था जब कोई परिवार टोटम पोल खड़ा करती थी तथा सभी आदिवासियों को इस अनुष्ठान के दर्शन करने के लिए आमंत्रित करती थी।

पॉटलाच में मुखिया का परिधान
पॉटलाच में मुखिया का परिधान

लिखित इतिहास की अनुपस्थिति में, पॉटलैच समारोह में परिवार की गाथाएं सुनाई जाती थीं तथा पॉटलैच में आमंत्रित सभी अतिथियों को उपहार बांटे जाते थे। किसी भी समुदाय प्रमुख की प्रतिष्ठा इस तथ्य पर निर्भर रहती थी कि वह इस अनुष्ठान में अतिथियों को कितना दे सका। यह ध्यान देने योग्य है कि उपहार अतिथियों की सामाजिक पद के अनुसार दिया जाता था। बड़े पद के लोगों को बड़ा उपहार। उपहार देने की इस प्रथा से मुझे सहज ही भारत के विवाह समारोहों का स्मरण हो आया।

मुखिया के सिर का पहनावा
मुखिया के सिर का पहनावा

ब्रिटिश कोलम्बिया में १८८४ से १९५१ तक पॉटलैच समारोहों पर प्रतिबंध लगाया दिया गया था। प्रथम आदिवासी समुदायों द्वारा पालन किये जाने वाली सामूहिक स्वामित्व की संकल्पना ब्रिटेन के लोगों को समझ नहीं आती थी। इसके अतिरिक्त, ब्रिटिश सरकार यहाँ शासन का यूरोपीय आदर्श स्थापित करना चाहती थी। उसे लागू करने के लिए उन्होंने पॉटलैच जैसे धार्मिक समारोहों पर प्रतिबंध लगा दिया था। उन्होंने प्रथम आदिवासी समुदाय के बच्चों को बलपूर्वक अंग्रेजी सीखने तथा ईसाई नामों को स्वीकारने के लिए बाध्य किया। उनकी ये कार्रवाइयाँ जाने-अनजाने प्रथम आदिवासी समुदायों की संस्कृति नष्ट कर रही थीं। सौभाग्य से अब यह प्रतिबंध हटा दिया गया है। यदि आप इस समुदाय के किसी व्यक्ति से परिचित हैं तो आप इस पॉटलैच समारोह का आधुनिक रूप देख सकते हैं।

पॉटलैच समारोह

पॉटलैच समारोह का आरंभ एक तीव्र सीटी बजाकर किया जाता है। एक प्रकार से इसके द्वारा समारोह के औपचारिक शुभारंभ की घोषणा की जाती है। पॉटलैच समारोह में विशाल मुखौटे धारण कर मुखौटा नृत्य करते हैं। इसके द्वारा वे अपने पूवजों की आत्मा को पुनः जीवित करने का प्रयास करते हैं। समुदाय प्रमुख एक विस्तृत शीश सज्जा एवं पारिवारिक चिन्ह युक्त बटन कंबल धारण कर नृत्य करते हैं। बटन कंबल केवल समुदाय के उच्च पदाधिकारी व्यक्ति ही धारण कर सकते हैं। किन्तु कभी कभी बच्चे भी इन्हे धारण कर सकते हैं।

पॉटलैच समारोह का निरीक्षण परिवार की स्त्रियाँ करती हैं। इस समारोह में हुई किसी भी प्रकार की अनदेखी अथवा चूक को अत्यन्त गंभीरता से लिया जाता है तथा कभी कभी इसके लिए दंड भी दिया जाता है। इस समारोह से परिवार की प्रतिष्ठा जुड़ी होती है। अतः किसी भी चूक का यहाँ कोई स्थान नहीं होता।

पॉटलैच समारोह में प्रमुख भोजन सालमन मछली तथा अन्य जलचरी खाद्य पदार्थ होते हैं।

पॉटलैच पर अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया  पर जाएँ।

इस विडिओ में आधुनिक पॉटलैच समारोह देखें।

आज यह पॉटलैच समारोह उतना भव्य नहीं होता जैसे किसी काल में होता था। तथापि इससे जुड़े संस्कार अब भी जीवित हैं। यह समारोह आज भी परिवार, आभार तथा अपने पूर्वज एवं वंशावली के प्रति आदर की अभिव्यक्ति का उत्सव मनाता है।

पॉटलैच समारोह का आयोजन टोटम पोल अर्थात गणचिन्ह या कुलदेवता स्तंभ स्थापित करने के लिए किया जाता है। इसका आव्हान मुखिया परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु के पश्चात अथवा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को नाम स्थानांतरित करने के लिए भी किया जाता है।

आदिवासी पर्यटन

एक ओर प्रथम आदिवासी या फर्स्ट नेशन्स अपनी ही धरती पर अपना यथोचित स्थान प्राप्त करने में प्रयासरत हैं, वहीं वे आदिवासी पर्यटन में भी प्रवेश कर रहे हैं। यहाँ उनका वेबस्थल देखें। ब्रिटिश कोलम्बिया का पर्यटन ढांचा अपनी ओर से उनकी पूर्ण सहायता कर रहा है। वह हर संभव संग्रहालयों एवं संबंधित स्थलों पर उनकी संस्कृति का प्रदर्शन कर रहा है।

ब्रिटिश कोलम्बिया के फर्स्ट नेशन्स को जानने हेतु सर्वोत्तम स्थान

ब्रिटिश कोलम्बिया के प्रथम आदिवासी लोगों को जानने एवं समझने के लिए तथा आदिवासी पर्यटन के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए इन स्थानों पर जाएँ:

वेंकूवर के ब्रिटिश कोलम्बिया विश्वविद्यालय में स्थित मानव संग्रहालय

मानव संग्रहालय - वेन्कुवर
मानव संग्रहालय – वेन्कुवर

मेरी तीव्र अनुशंसा है कि आप इस संग्रहालय का गाइडेड टूर अवश्य लें। वे प्रथम आदिवासी लोगों के विषय में सभी जानकारी इस प्रकार देते हैं कि आपके समक्ष उनकी जीवनी एवं संस्कृति सजीव हो जाती है। वे आपको यह भी बताएंगे कि न्यूयॉर्क, बर्लिन, लंदन इत्यादि स्थानों में स्थित कुछ संग्रहालयों में प्रथम आदिवासी कलाकृतियों का इससे भी अधिक संग्रह है किन्तु वे सब भूतकाल से संबंधित हैं। यह संग्रहालय उनकी अपनी धरती पर स्थित है। इसके फलस्वरूप कारीगरों एवं कलाकारों से उनका संबंध सतत बना रहता है। वे समुदाय के बड़े-बूढ़ों तथा नवीन पीढ़ी दोनों से सदैव चर्चा करते रहते हैं तथा उनसे सलाह लेते रहते हैं। उनसे इन कलाकृतियों के विषय में जानकारी प्राप्त करते हैं तथा इन कलाकृतियों से उनके भावनात्मक संबंधों को समझने का प्रयास करते हैं ताकि इन जानकारियों को वे पर्यटकों तक पहुँच सकें।

इस संग्रहालय के पृष्ठभाग में आप पारंपरिक हाईदा निवासस्थान देख सकते हैं। इसके भीतर कई प्रकार की प्रथम आदिवासी कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं।

मेरा सुझाव है कि आप आरामदायक लाल कुर्सी पर बैठ जाएँ तथा उनसे उनकी लोक कथाएं सुनें। मेरे पास अधिक समय नहीं था। अतः मैंने लगभग १० मिनटों तक उनसे एक दंतकथा सुनी। यदि मेरे पास असीमित समय होता तो मैं आराम से बैठकर घंटों उनसे उनकी गाथाएं सुनती, वह भी समझने में अत्यन्त सहायक तथा उनकी गाथाओं को सजीव करतीं उनकी कलाकृतियों के मध्य बैठकर।

विक्टोरिया का राजसी बी सी संग्रहालय

यह एक अत्यन्त मनभावन संग्रहालय है जो आदिवासियों के विभिन्न वस्तुओं द्वारा उनके सम्पन्न इतिहास से आपका परिचय कराता है। मुझे उनकी टोटम पोल दीर्घा अत्यन्त भा गई। इस दीर्घा ने मुझे उनके आदिवासी गाँव के प्रत्यक्ष दर्शन करा दिये। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मैं उनके आदिवासी परिप्रेक्ष्य में पहुँच गई हूँ।

विक्टोरिया के राजसी बी सी संग्रहालय का सर्वोत्तम भाग है आदिवासी समुदायों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं पर आलेखन। आप देख सकते हैं कि कैसे वे अपनी बोलचाल की भाषा को बड़े-बूढ़ों के स्वर में स्वरबद्ध कर उसे सदा के लिए अमर करने का प्रयास कर रहे हैं। बोलचाल की भाषा होने के कारण उनकी भाषाओं की लिपि उपलब्ध नहीं है। अतः रोमन लिपि एवं बोली के स्वरों की सहायता से वे अपनी आदिवासी भाषाओं की लिपि तैयार कर रहे हैं। आप प्रदत्त खंडों में शब्दों को भरकर उनके स्वरों को समझ सकते हैं। बटन दबाकर आप प्रथम आदिवासी के विभिन्न भाषाओं में अभिवादन सुन सकते हैं।

सोचती हूँ कि हमें विश्व की अन्य विलुप्त होती भाषाओं को भी इसी प्रकार पुनर्जीवित करना चाहिए।

व्हिसलर का स्क्वामिष तथा लिलवत सांस्कृतिक केंद्र

यह छोटा किन्तु नयनरम्य केंद्र मेरे लिए इस आदिवासी समुदाय से प्रथम परिचय था। यह केंद्र दो आदिवासी समुदायों के विषय में चर्चा करता है। व्हिसलर के किंचित दक्षिणी भाग में निवास करते स्क्वामिष तथा किंचित उत्तरी भाग में निवास करते लिलवत।

मुझे गाइडेड टूर में अत्यन्त आनंद आया। उनकी संस्कृति एवं परंपरा का परिचय देता विडिओ देखना भी मुझे अत्यन्त भाया। मैं जान गई थी कि इनके विषय में जानने के लिए अब मैं अपनी शेष यात्रा कार्यक्रम में परिवर्तन करने वाली हूँ। मैंने ठीक ऐसा किया भी।

व्हिसलर का औडैन आदिवासी कलाकृति संग्रहालय

यह संग्रहालय प्रथम आदिवासी कलाकृतियों के प्राचीन एवं आधुनिक स्वरूप से आपका परिचय कराता है। यहाँ मैंने एक अद्भुत आकर्षण युक्त उत्कीर्णित लकड़ी का फलक देखा जिसका प्रयोग प्रदर्शनों के समय किया जाता है। इसने मुझे महाबलीपुरम में स्थित ‘अर्जुन का पश्चाताप’ का स्मरण कर दिया। यह दृश्य प्रदर्शन मंच के पृष्ठभाग में स्थित कथाएं कहता पटल का एक भाग है।

नाट्य मंच का काष्ठ परिपेक्ष
नाट्य मंच का काष्ठ परिपेक्ष

इस पटल के चारों ओर सालमन मछली उत्कीर्णित है। आप जानते हैं कि सालमन मछली आदिवासियों के जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह मछली इनके भोजन का अतिआवश्यक अंग जो है। उनका सम्पूर्ण जीवन इसके चारों ओर सिमट जाता है। पटल के मध्य में वे प्राणी हैं जो भोजन के लिए सालमन पर निर्भर हैं। पटल के एक ओर मादा मांसाहारी व्हेल है तथा दूसरी ओर नर मांसाहारी व्हेल है। ऊपर दो मानवों को पकड़े एक कौआ है। मध्य में एक शमन है जिसे द्वार पटल पर बैठा दर्शाया गया है। नर्तक इस पटल से बाहर आते हैं मानो वे प्रेतों के विश्व से आ रहे हों तथा शमन उनके नृत्य का साक्षी है।

ब्रिटिश कोलंबिया के फर्स्ट नेशन्स अथवा मूल आदिवासी
ब्रिटिश कोलंबिया के फर्स्ट नेशन्स अथवा मूल आदिवासी

ब्रिटिश कोलम्बिया के इन प्रिय आदिवासियों के विषय में मैं और भी अधिक जानने के लिए इच्छुक हूँ।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

4 COMMENTS

  1. फर्स्ट नेशन्स – ब्रिटिश कोलम्बिया के मूल निवासियों के जीवनयापन और उनके इतिहास पर वाकई आपने बहुत खूबसूरत तरीके एक अलग ही दुनिया की सैर करवा दी, यह मूल आदिवासी ही सही मायने में धरतीपुत्र है जो प्रकृति का बड़ी शिद्दत से ध्यान रखते हैं क्योंकि वह पूरा पेड़ नहीं काटते हैं जितना उन्हें चाहिए उतना ही लेते हैं और वह भी उसकी आज्ञा से जो हम नासमझ पर्यावरण प्रेमियों के लिए सीखने की बात है और उन लोगों की कलाकृतियां भी उतनी ही अद्वितीय है एक सुंदर दुनिया की सैर कराने के लिये धन्यवाद🙏🙏

    • संजय जी, अंत में हमें इन्ही मूल मन्त्रों को अपनाना होगा, जितना चाहिए उतना लो, जिससे लो उसका सम्मान करो।

  2. अनुराधाजी, फर्स्ट नेशन्स-ब्रिटिश कोलम्बिया के मूल आदिवासीयों के बारें बहुत ही विस्तृत जानकारी ….पढते हुए इन्ही के बीच पहुॅंचने का अहसास हुआ । इनके द्वारा बनाईं गईं कलाकृतियां बेहद सुंदर एवम् अनुठी है । अपने पूर्वजों को पर्वतो,नदियों , वनों में देख कर इनकी आराधना करना तथा प्रकृति से ली गई प्रत्येक वस्तु का उपयोग कर कोई भी वस्तु व्यर्थ न करना ,प्रकृति के प्रति इनके प्रेम और कर्तव्यबोध को दर्शाता है….वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हम सभी के लिये इनका यह एक महत्वपूर्ण एवम् सामयिक संदेश है ।सुंदर आलेख हेतू साधुवाद !

    • धन्यवाद प्रदीप जी, विश्व भर में जहाँ भी जाएँ, आदिवासी सभ्यता में एक समानता दिखाई देती है, यह संयोग भी हो सकता है पर लगता नहीं ऐसा है।

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