चाय के अनेक रूप – देश विदेश की यात्राओं से बटोरे

0
399

चाय भारत का राष्ट्रीय पेय है। यह वो बंधन है जो एक परिवार को एक मेज पर लेकर आता है। मित्रों को जोड़ कर रखता है। घर आये अतिथि को चाय का आग्रह किये बिना विदा नहीं किया जाता। सड़क यात्रा कर रहे हों तो उसे आनंदमयी बनाने के लिए समय समय पर चाय के लिए अवश्य रुका जाता है, चाहे वह महामार्गों के किनारे स्थित जलपान गृह हों या ग्रामीण भागों की छोटी छोटी दुकानें। सभी प्रकार के सम्मेलनों में भिन्न भिन्न प्रकार की चाय, जलपान का आवश्यक अंग होती  हैं। चाय हमारे जीवन का एक ऐसा अभिन्न अंग है जिसके बिना किसी भी समारोह की कल्पना करना असम्भव है।

चाय - केतली से कुल्हड़ में
चाय – केतली से कुल्हड़ में

चाय के विषय में गोवा एक अपवाद है। गोवा में ढूँढने पर भी मुझे नुक्कड़ चाय की दुकान नहीं दिखती है। भारत के अन्य क्षेत्रों की तुलना में गोवा की एक विशेष भिन्नता है, चाय की चुस्कियों की अनुपस्थिति, जो मुझे अत्यंत खलती है। आशा है, गोवा में भी इस व्यवसाय के विकास की ओर उद्यमियों का ध्यान जाए। गत सम्पूर्ण वर्ष महामारी के कारण यात्रा का अवसर प्राप्त नहीं हुआ। साथी यात्रियों के संग बैठकर चाय की चुस्कियां लेते अपने अपने यात्रा संस्मरणों को बांटना, नए नए मित्र बनाना, ढाबों में बैठकर चाय पीते हुए कुछ क्षण विश्राम करना, इन सब की स्मृतियाँ मुझे भावुक कर देती हैं।

भारत में प्रचलित चाय के प्रकार

भारत में मैंने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की है। वहां की चाय का आस्वाद लिया है। अधिकतर स्थानों पर उपलब्ध चाय उस क्षेत्र की विशेषता होती है। कहीं सामग्री भिन्न होती है तो कहीं बनाने की प्रणाली, कहीं कहीं के जल का स्वाद ही चाय को विशेष बना देता है।

आसाम का लाल चा

भारत में उपलब्ध भिन्न भिन्न प्रकार की चाय पर चर्चा का आरम्भ करते हैं एक ऐसे स्थान से, जहां से हमारी प्रत्येक सुबह की चाय आती है। जी हाँ, यह सम्मान जाता है, आसाम को। किन्तु हम यहाँ चर्चा कर रहे हैं उस चाय की, जो आसाम में पी जाती है। आसाम तथा सिक्किम सहित भारत के अधिकाँश उत्तर-पूर्वी भागों में लाल चा पी जाती है। यह बिना दूध की सादी चाय है जिसमें मन भर के शक्कर डाली जाती है। इस चाय का रंग ताम्बे के समान लाल होता है जिसके कारण इसे लाल चा कहते हैं। आसाम, अरुणांचल, मेघालय तथा सिक्किम की यात्रा करते समय आप को यही चाय सभी गुमटियों में मिलेगी।

असम की लाल चा
असम की लाल चा

ऐसी चाय हम अपने घर पर बनाएं तो वह किंचित कड़वी प्रतीत होती है। कदाचित उस क्षेत्र में वे चाय की विशेष पत्तियों का प्रयोग करते हैं। एक-दो चाय पीने के पश्चात आपको यह चाय अत्यंत भाने लग जायेगी। आप जब भी इन क्षेत्रों की यात्रा करें तो यह चा अवश्य पियें।

और पढ़ें: आसाम के चाय बागान

नाथद्वारा की फुदिना चाय

नाथद्वारा राजस्थान का एक छोटा नगर है जो श्रीनाथ जी की हवेली के चारों ओर बसा एक तीर्थ स्थल है। श्रीनाथजी के मंदिर की ओर जाती गलियों में आप ताजे पुदीने के गुच्छों से भरे अनेक ठेले देखेंगे। यहाँ पुदीने के पत्ते सामान्य पुदीने से किंचित बड़े होते हैं तथा इसे वे फुदिना कहते हैं। ये वास्तव में चाय के ठेले हैं जहां वे चाय में पुदीने के पत्ते डालते हैं तथा मिट्टी के छोटे छोटे कुल्हड़ों में परोसते हैं। इस चाय की एक चुस्की आपको स्फूर्ति से भर देगी। पुदीने के स्वाद तथा सुगंध से ओतप्रोत चाय आपकी प्रातः काल की नींद भगा कर आपको उर्जावान बना देगी।

नाथद्वारा की फुदीना चाय
नाथद्वारा की फुदीना चाय

यहाँ मुझे ज्ञात हुआ कि पुदीने की यह प्रजाति इसी क्षेत्र में पायी जाती है। वैसे भी, किसी भी प्रकार के पुदीने का, इतनी बड़ी मात्रा में, दूध वाली चाय में प्रयोग मैंने इसी क्षेत्र में देखा है। अतः आप जब भी नाथद्वारा आयेंगे, तब श्रीनाथजी का प्रसाद तो ग्रहण करेंगे ही, साथ ही फुदिना चाय का आस्वाद भी अवश्य लीजिये।

लद्दाख की गुड गुड चाय

लद्दाख की गुड गुड चाय
लद्दाख की गुड गुड चाय

गुड गुड चाय, जिसे बटर टी भी कहते हैं, उन सभी पहाड़ी क्षेत्रों में लोकप्रिय है जहां बौद्ध मठ बहुतायत में हैं। इस प्रकार की चाय का स्वाद लेने के लिए बौद्ध मठ सर्वाधिक उपयुक्त स्थान है। यदि आप प्रातः किसी बौद्ध मठ में जाएँ तो आप सभी भिक्षुओं को भाप निकलती गर्म चाय की चुस्की लेते हुए मंत्रोच्चारण करते देखेंगे। यह स्वाद में नमकीन होता है तथा उसमें मक्खन का स्वाद आता है। यद्यपि यह मेरी प्रिय चाय नहीं है, तथापि आप इसका आस्वाद कम से कम एक बार अवश्य लें ताकि आप निश्चित कर पायें कि यह आपको भायी अथवा नहीं।

लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, अरुणाचल तथा भूटान के जलपानगृहों में यह चाय उपलब्ध होती है।

कश्मीर का काहवा

कश्मीर की यात्रा तब तक अपूर्ण है जब तक आपने वहां की प्रसिद्ध काहवा चाय का आनंद ना लिया हो। यह एक सौम्य चाय है जिसमें विशेष मसालों एवं सूखे मेवों का स्वाद आता है। कश्मीर के अनेक अतिथिगृहों में जैसे ही आप पहुंचेंगे, वे आपके समक्ष यह चाय प्रस्तुत करेंगे। कश्मीर के शीत वातावरण में, सूर्य की कोमल किरणों के नीचे धूप सेंकते, बर्फ से आच्छादित पहाड़ों के मनोरम दृश्यों का आनंद उठाते हुए, इस काहवा चाय की चुस्की लेना, कश्मीर में स्वर्ग का आनंद उठाने जैसा है। इसमें दूध का प्रयोग नहीं किया जाता। अतः यह हल्का होता है। आप इसे जितना चाहें पी सकते हैं। यह सुगन्धित एवं स्वादिष्ट उष्ण जल पीने के समान है जो शीत वातावरण में आपको उष्णता देता है।

इस चाय में कुछ विशेष पत्तियों के अतिरिक्त अखरोट, बादाम, इलायची, दालचीनी, केसर इत्यादि मुख्य सामग्री हैं।

इस विडियो में काहवा चाय बनाने की सामग्री एवं विधि देखें:

मसाला चाय – कभी भी, कहीं भी

यह चाय निसंदेह सर्वाधिक लोकप्रिय चाय के प्रकारों में से एक है। कुछ आधुनिक कैफ़े में इसका नाम ट्रक वालों की चाय रखा गया है। आप जानते ही हैं कि ट्रक चालकों का अधिकाँश समय महामार्गों पर बीतता है। उन्हें बिना विश्राम किये लम्बी दूरी तक ट्रक चलाना पड़ता है। अतः स्वयं को स्फूर्तिवान एवं उर्जावान रखने के लिए उन्हें कड़क मसाला चाय की आवश्यकता होती है। इसीलिए यह चाय स्वादिष्ट होनी ही चाहिए। मुझे मसाला चाय अत्यंत प्रिय है।

मसाला चाय - कभी भी, कहीं भी
मसाला चाय – कभी भी, कहीं भी

मसालों के आधार पर इस चाय के अनेक प्रकार हैं। आप इसमें काली मिर्च, इलायची, लौंग, तुलसी, दालचीनी, नींबू घास, सौंफ, अदरक इत्यादि मसाले अपनी आवश्यकतानुसार डाल सकते हैं। मुझे अदरक वाली चाय अत्यंत प्रिय है। आप इनमें से अपनी इच्छा से मसालों का चुनाव कर सकते हैं। दूध की पर्याप्त मात्रा होने के कारण यह भूख को शांत करती है। साथ में गर्म गर्म पकोड़े तथा समोसे भी हों तो स्वाद में चार चाँद लग जाए।

उत्तर एवं पूर्वी भारत में यह चाय कुल्हड़ में परोसी जाती है। अधिकतर ढाबों में यह चाय चूल्हे पर रखे एल्युमीनियम की केतली में बनती है तथा चूल्हे से सीधे कुल्हड़ में गर्म गर्म परोसी जाती है। अनेक ढाबों एवं चाय के ठेलों में यह कांच के छोटे छोटे ग्लासों में दिया जाता है। इन ग्लासों को देखते ही हमें ढाबों की चाय का स्मरण हो जाता है। विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के बाहर यही चाय इसी ग्लास में कम मात्रा में परोसी जाती है जो कट चाय के नाम से लोकप्रिय है। एक चाय एक से अधिक लोगों में बांटी जाती है।

हैदराबाद की ईरानी चाय

हैदराबाद की ईरानी चाय
हैदराबाद की ईरानी चाय

मैं नहीं जानती कि कितने इरानी मूल के निवासी चाय के इस प्रकार को अपना पेय मानते हैं। किन्तु हैदराबाद के निवासी इसे इरानी चाय के नाम से बड़े चाव से पीते हैं। इसे बनाने के लिए बड़ी बड़ी देगचियों का प्रयोग किया जाता है जिसमें वे इस चाय को उबालते हैं तथा विलंबित समय के लिए पकाते हैं। यह पूर्णतः दूध वाली चाय है। कभी कभी शंका होने लगती है कि इस चाय में जल की एक बूँद भी डाली जाती है अथवा नहीं। यह एक हलके भूरे रंग की, मीठी तथा गाढ़ी चाय होती है। हैदराबाद के लोगों को इस चाय के साथ उस्मानिया बिस्कुट खाना भाता है। हैदराबाद के अंतिम नवाब के नाम पर इस बिस्कुट का नाम रखा गया है जिसमें चुटकी भर नमक भी होता है। मुझ जैसे कड़क चाय पीने वालों को यह चाय नहीं भाती किन्तु एक चाय का स्वाद चखने में कोई हानि नहीं है। कदाचित आपको यह भा जाए। वैसे भी, ऐसी चाय सभी नगरों में उपलब्ध नहीं होती है। अतः हैदराबाद आयें तो इस चाय का स्वाद अवश्य चखें।

मेरे विद्यार्थी जीवन में हमारी कक्षा में इरान का एक विद्यार्थी था जो प्रयोगशाला के बीकर में अपनी प्रिय इरानी चाय बनाता था जो ऐसी नहीं होती थी। वह मेरी अब तक की सर्वाधिक प्रिय काली चाय है। एक दिवस उसने हमें उसकी विधी भी सिखाई। एक प्याला जल उबाल कर, उसमें आधा चम्मच चाय पत्ती तथा सामान्य भारतीय चाय से अपेक्षाकृत दुगुनी मात्रा में शक्कर डालकर उसे कुछ क्षण पकाया तथा सुन्दर रंग उतरने पर उसे आंच पर से उतार दिया। मुझे प्रतीत होता है कि ये इरानी चाय वास्तव में इरानी है। मुझे तो यह चाय ही अत्यंत प्रिय है।

हैदराबाद की केसर चाय

केसर चाय
केसर चाय

हैदराबाद के चारमीनार क्षेत्र की गलियों में मुझे यह विशेष प्रकार की चाय मिली। चारमीनार की गलियों में लम्बे समय से पैदल भ्रमण करने के पश्चात हम जलपान के लिए नायाब की दुकान में पहुंचे। दुकान के स्वामी ने जब मुझे ईरानी चाय को नकारते देखा तो उसने मुझे इस चाय का प्रस्ताव दिया। चाय की पत्तियों एवं पर्याप्त मात्रा में केसर का प्रयोग कर काली चाय बनाई जाती है। ग्राहक को परोसने से एक क्षण पूर्व इसमें दूध मिलाया जाता है। वह भी ग्राहक की पसंद के अनुसार। मैं उनसे केवल एक छोटा चम्मच दूध मिलाने का आग्रह करती थी। इस चाय का एक विशेष स्वाद होता है। आप अपनी पसंद से इसमें दूध की मात्रा कम-अधिक कर सकते हैं।

हैदराबाद के यात्रियों व पर्यटकों से इस चाय को चखने का मेरा तीव्र आग्रह है।

तमिल नाडु की मीटर चाय

तमिल नाडू एक कॉफ़ी बहुल राज्य है जहां की स्वादिष्ट कॉफ़ी अवश्य चखनी चाहिए। किन्तु यहाँ सड़कों के किनारे व बस स्थानकों पर चाय की अनेक ठेले एवं दुकानें हैं जहां चाय बनायी जाती है। विशेष यह है कि यहाँ चाय भी काफी की भांति बनाई व परोसी जाती है। पीतल की हांडी में चाय पत्ती को जल में उबालकर धीमी आंच पर रखा जाता है। जब आप उनसे अपने लिए चाय का कप्पा मांगे तो वे स्टील के एक पात्र में चाय एवं दूसरे पात्र में थोड़ा दूध एवं शक्कर डालते हैं। तत्पश्चात वे एक पात्र के मिश्रण को दूसरे पात्र में ऊंचाई से डालते हैं। ये प्रक्रिया निहारने योग्य होती है। चाय एक पात्र से दूसरे पात्र में चार से पांच बार स्थानांतरित होने के पश्चात आपके हाथों में वह कप्पा आता है। वे पात्र को लगभग एक मीटर ऊँचाई तक भी ले जाते हैं। इसीलिए इसे मीटर चाय कहते हैं। उसे देख ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे वस्त्र की लम्बाई माप रहे हों।

यहाँ ‘एक कप चाय देना’ नहीं, अपितु ‘एक मीटर चाय देना’ ऐसे आग्रह किया जा सकता है।

पुणे की अमृततुल्य चाय

सुनहरी केतली में अमृतुल्य
सुनहरी केतली में अमृतुल्य

अमृततुल्य का अर्थ है अमृत के सामान। वास्तव में, चाय पीने वालों के लिए एक प्याली चाय अमृत से कम नहीं होती। पुणे की प्राचीन पेठों की गलियों में जिस चाय की बिक्री होती है उसे चमचमाते पीतल की केतलियों में रखा जाता है। चाय की सामान्य छलनी के स्थान पर उसे कपड़े द्वारा छाना जाता है। आपकी पूना यात्रा अधूरी है यदि आपने इस चाय का स्वाद ना लिया हो।

आइस चाय – नवीन युग की शीतल चाय

आइस चाय एक नव-युगीन चाय है। यह चाय आधुनिक जलपानगृहों एवं कैफ़े में उपलब्ध होती है। इस शीतल चाय में अनेक प्रकार के फलों के स्वाद उपलब्ध हैं। मुझे उनमें से नींबू के रस वाली शीतल चाय प्रिय है। ग्रीष्म ऋतु की चिलचिलाती धूप में विचरण करने के पश्चात यह चाय तन-मन को शीतलता से सराबोर कर देती है।

कुछ विशेष चाय चखें – हरी/श्वेत/काली/ऊलोंग चाय

चाय के ये प्रकार सर्वाधिक फीके होते हैं। इनकी पत्तियाँ भी भिन्न होती हैं। इन पत्तियों में उबलते जल को डालकर कुछ क्षण सत छोड़ने के लिए रख देते हैं। आपकी हल्की चाय तैयार है। जब यात्राओं में मुझे मेरी प्रिय चाय उपलब्ध नहीं होती तब मैं इसी चाय का चुनाव करती हूँ।

रंग बिरंगी रस भरी चाय
रंग बिरंगी रस भरी चाय

हरी चाय भी अनेक स्वादों में उपलब्ध है, जैसे सेब, पुदीना, जैस्मिन अथवा चमेली इत्यादि। इनमें आम का भी स्वाद उपलब्ध है जो मुझे अचंभित करता है। आपकी जैसे मनःस्थिति हो आप वैसी चाय चुन सकते हैं।

गोवा एक पर्यटन राज्य होने के कारण इस प्रकार की चाय उन स्थानों में उपलब्ध हैं जहाँ पर्यटकों की भीड़ अधिक होती है, जैसे गोवा का फ्ली मार्किट। भारत के अन्य पर्यटन क्षेत्रों में भी इस प्रकार की चाय उपलब्ध होती है, जैसे मनाली, धर्मशाला इत्यादि।

तंदूरी चाय

यह खाने-पीने में आनंद प्राप्त करने वालों की नवीनतम खोज है। इसे कुल्हड़ में बनाई जाती है। कुल्हड़ को सर्वप्रथम एक तंदूर की भट्टी में ऊंचे तापमान पर तपाया जाता है। तत्पश्चात उसमें उबलती हुई दूध वाली चाय डाली जाती है। इससे चाय में मिट्टी की सौंधी गंध समा जाती है। इसे बनते देखना भी अत्यंत रोमांचक होता है।

विदेशों में प्रचलित कुछ चाय के प्रकार

हांगकांग की नू चा

हिंग कोंग की नू चा
हिंग कोंग की नू चा

यह दूधवाली वाली चाय होती है किन्तु शीतल होती है। यह हांगकांग की अत्यंत लोकप्रिय चाय है जिसे आप किसी भी कैफ़े से अथवा स्वचालित यंत्र से ले सकते हैं। यह गाढ़ी एवं मीठी होती है तथा एक बड़ी प्याली में मिलती है। मुझे ज्ञात नहीं था कि मुझे भी दूधवाली ठंडी चाय प्रिय लग सकती है। किन्तु हांगकांग में मैंने इसका भरपूर आस्वाद लिया। इस के अन्य रूप भी प्रचलित हैं, जैसे पर्ल चाय। यहाँ पर्ल का तात्पर्य मोती से है जो वास्तव में मोती सदृश सब्जा के बीज हैं। एक अत्यंत स्वादिष्ट चाय दोंख्वा चा भी है। दोंख्वा का अर्थ है, लौकी। कभी अवसर मिले तो निश्चित पीजिये.

मलेशिया एवं इंडोनेशिया का तेह तरीक

यह एक दूध वाली सामान्य गर्म चाय है जिसके ऊपर बड़ी मात्रा में झाग होता है। यह दक्षिण-पूर्वी एशिया में सामान्य है। मलेशिया एवं इंडोनेशिया यात्रा के समय मैंने अपने दिवस इसी पर व्यतीत किये थे। इसी चाय का एक शीतल प्रकार भी उपलब्ध है किन्तु मुझे गर्म चाय ही प्रिय है।

मा चा – सिंगापूर की हरी चाय

यह एक जापानी चाय है जो वास्तव में हरे रंग की होती है। मैंने सिंगापूर में इसका स्वाद चखा था। इसे पसंद करने के लिए किंचित समय लगता है। इसके स्वाद से अभ्यस्त होने पर आपको पूर्वी एशिया की यात्रा में आसानी होगी। वहां यह चाय बहुतायत में उपलब्ध होती है।

मेरी वाली चाय

दार्जीलिंग रेलवे स्टेशन पर चाय की दूकान
दार्जीलिंग रेलवे स्टेशन पर चाय की दूकान

यह वो चाय है जो हम सामान्यतः घरों में बनाते हैं। इस संस्करण को लिखते हुए भी मैं उसी चाय की चुस्कियां ले रही हूँ। इसमें प्रयुक्त सामग्री भी वही हैं, जल, दूध, शर्करा तथा चाय की पत्तियाँ। घर घर की चाय में किंचित भिन्नता आ ही जाती है। उसका कारण है सामग्री की मात्रा तथा उसे बनाने की विधि में किंचित भिन्नता। अखिल विश्व की भिन्न भिन्न चाय का स्वाद लेने के पश्चात हमें अपने घर की चाय का स्मरण होता है।

घर से बाहर निकालने पर चाय का उत्तम स्वाद रेल स्थानकों, बस स्थानकों, विश्वविद्यालयों के बाहर स्थित गुमटियों तथा उनके कैंटीनों में उपलब्ध होता है, इसमें संशय नहीं है।

इनमें से आपकी प्रिय चाय कौन सी है? क्या वह इनके अतिरिक्त है? यदि हाँ, तो हमें उसके विषय में अवश्य बताईये।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here