श्री चामुंडेश्वरी मंदिर – चामुंडी पहाड़ी मैसूर के निकट

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श्री चामुंडेश्वरी मंदिर आदि शंकराचार्यजी द्वारा बताये गए १८ शक्तिपीठों में से एक है। यह चामुंडी पहाड़ी पर स्थित है जो कर्णाटक के मैसूरू नगरी के निकट है। मैसूरू को पहले मैसूर कहा जाता था। चामुंडी पहाड़ी का देवी की कथा से प्रगाढ़ सम्बन्ध है।

चामुंडेश्वरी देवी की पौराणिक कथा

चामुंडा या चामुंडेश्वरी का नाम देवी की उन कथाओं में प्राप्त होता है जो मार्कंडेय पुराण के अंतर्गत आते देवी माहात्मय अथवा दुर्गा सप्तशती का भाग हैं। इस ग्रन्थ में माँ दुर्गा समय समय पर प्रकट होते विभिन्न असुरों का वध करने के लिए भिन्न भिन्न स्वरूप में अवतरित होती हैं। देवी का वह स्वरूप जिसमें उन्होंने चंड एवं मुंड नामक दो असुर भ्राताओं का वध किया था, चामुंडा कहलाता है।

देवी श्री चामुंडेश्वरी
देवी श्री चामुंडेश्वरी

चामुंडा देवी ने एक ऐसे असुर का भी वध किया था जो आधा मानव व आधा भैंसा था। उस असुर का नाम महिषासुर था। इसीलिए उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि देवी ने इसी चामुंडी पहाड़ी पर महिषासुर का वध किया था। इसीलिए इस पहाड़ी का नाम चामुंडी पहाड़ी पड़ा तथा समीप स्थित मैसूर या मैसूरू का नाम भी इसी असुर के नाम पर पड़ा है। इस प्रकार की नामकरण पद्धति असामान्य नहीं है। महाराष्ट्र में स्थित कोल्हापुर नगरी का नाम भी कोलासुर नामक असुर के कारण पड़ा है जिसका वध महालक्ष्मी ने किया था। पूर्व में कोल्हापुर नगरी को करवीरपुर कहा जाता था।

चामुंडी पहाड़ी के ऊपर विराजमान देवी चामुंडेश्वरी आस पास के विस्तृत क्षेत्र की अधिष्टात्री देवी है। इस क्षेत्र में मैसूरू नगरी भी सम्मिलित है जो कर्णाटक राज्य की सांस्कृतिक राजधानी मानी जाती है। मैसूरू एक राज नगरी होने के कारण देवी चामुंडेश्वरी मैसूरू के राजपरिवार की कुलदेवी भी हैं। वस्तुतः, देवी चामुंडेश्वरी को सम्पूर्ण कर्णाटक राज्य की देवी माना जाता है।

Chamundeshwari Temple Gopuram
Chamundeshwari Temple Gopuram

माँ चामुंडेश्वरी को कर्णाटक में नाद देवी के नाम से भी पुकारते हैं। मैसूरू नगरी का विश्वप्रसिद्ध दशहरा उत्सव देवी की अनुमति से यहीं से आरम्भ किया जाता है। इस दशहरा उत्सव को मैसूरू में नाद हब्बा कहते हैं।

नाग देवता मूर्तियाँ
नाग देवता मूर्तियाँ

यह एक शक्ति पीठ है। आदि शंकराचार्यजी ने इसे क्रौंचपट्टनम कहा जिसे क्रौंच पीठ भी कहते हैं। देवी सती ने अपने पिता दक्ष द्वारा, अपने पति भगवान शिव की अवमानना सहन ना कर पाने के कारण पिता दक्ष के ही यज्ञ कुण्ड में अपने प्राणों की आहूति दे दी थी। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव देवी सती का मृत देह उठाकर तांडव करने लगे थे। उनके क्रोध को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र द्वारा सती की देह का विच्छेद कर दिता था। जहाँ जहाँ उसके भाग गिरे, वहाँ वहाँ देवी के शक्तिपीठ की स्थापना हुई।

ऐसी मान्यता है कि चामुंडी पहाड़ी पर देवी के केश गिरे थे।

श्री चामुंडेश्वरी मंदिर

 चामुंडी पहाड़ी पर स्थित यह पुरातन मंदिर औसत समुद्र सतह से लगभग ३४०० फीट की ऊँचाई पर स्थित है। भारत में अनेक देवी मंदिर हैं जो पहाड़ी के ऊपर स्थित हैं। प्राचीन काल में भक्तगण इन पहाड़ियों पर उगे झाड़-झंखाड़ के बीच से जाते दुर्गम पगडंडियों द्वारा मंदिर तक पहुंचते थे। जैसे जैसे सभ्यता में विकास हुआ, राज्यों में प्रगति हुई, मंदिरों की वैभवता में भी वृद्धि होने लगी। साथ ही मंदिरों की ओर जाते मार्गों को भी अधिक सुगम बनाया जाने लगा।

मंदिर वास्तुशिल्प की ठेठ द्रविड़ शैली में निर्मित इस मंदिर में एक ऊँचा गोपुर अथवा गोपुरम है जो हलके पीले रंग का है। इस मंदिर का निर्माण १२वीं सदी में होयसल राजवंश ने करवाया था। समय के साथ इसमें नवीन संरचनाएं जोड़ी गयीं। जैसे इसका गोपुरम, जिसे कदाचित विजयनगर के महाराजाओं ने बनवाया था। इस पुरातन मंदिर संरचना का एक विशेष भाग है, मंदिर की ओर जाती पत्थर की सहस्त्र सीढ़ियाँ, जिन्हें १७वीं सदी में मैसूरू के महाराजा डोड्डा देवराज ने बनवाया था। मैसूरू के विभिन्न महाराजाओं द्वारा इस मंदिर के दर्शन करने एवं देवी द्वारा विभिन्न रूपों में वरदान प्राप्त करने की अनेक कथाएं प्रचलित हैं।

मंदिर स्वयं में अधिक विशाल नहीं है। भक्तगणों की अधिक भीड़ ना हो तो आप मंदिर के चारों ओर शान्ति से घूम सकते हैं। मंदिर से मैसूरू नगरी का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।

आप सात तल ऊंचे गोपुरम से मंदिर के भीतर प्रवेश करेंगे। गोपुरम इतना ऊँचा प्रतीत होता है कि उसके ऊपर स्थापित स्वर्ण कलश को देखने के लिए अपने शरीर को पीछे झुकाना पड़ता है।

मंदिर में प्रवेश करते ही समक्ष नवरंग मंडप एवं अंतराल मंडप हैं जिनके पश्चात गर्भगृह है। मंदिर के चारों ओर भित्तियाँ हैं जिन्हें प्राकार कहा जाता है।

गणेश, हनुमान और भैरव

मंदिर परिसर के भीतर कुछ लघु मंदिर हैं जो गणेश भगवान, हनुमाजी एवं भैरव को समर्पित हैं। मुख्य द्वार का रक्षण करतीं दोनों ओर द्वारपालिकाएं विराजमान हैं जिनके नाम हैं, नंदिनी और कमलिनी। मैसूरू के महाराजा कृष्णराज वड्यार तृतीय एवं उनकी पत्नियां रामविलासा, लक्ष्मीविलासा एवं कृष्णविलासा भी भक्त के रूप में मंदिर में विराजमान हैं। किन्तु भक्तगणों की अत्यधिक संख्या के कारण में उन्हें नहीं देख पायी।

देवी की मुख्य मूर्ति अष्टभुजा रूप में स्थापित है। आठ भुजाओं वाली इस देवी की प्रतिमा वैसी ही है जैसी मार्कंडेय पुराण में वर्णित है। ऐसी मान्यता है कि कदाचित वे मार्कंडेय ऋषि ही थे जिन्होंने इस मूर्ति का सर्वप्रथम अभिषेक किया था। देवी के ज्यामितीय स्वरूप, श्री चक्र की भी यहाँ पूजा की जाती है।

मंदिर के आसपास अनेक छोटी छोटी दुकानें हैं जो पुष्प एवं अन्य पूजा सामग्री की विक्री करते हैं। मंदिर में मुख्य प्रसाद के रूप में लड्डू का अर्पण किया जाता है जो तिरुपति में भगवान बालाजी को अर्पित लड्डू से साम्य रखता है। परिसर में स्थिर वृक्षों के नीचे मुझे अनेक नाग  प्रतिमाएं दिखीं जो दक्षिण भारत में सर्व-सामान्य है।

चामुंडेश्वरी देवी मंदिर के उत्सव

यह एक देवी मंदिर है। तो स्वाभाविक ही है कि शुक्रवार का दिवस मंदिर के लिए विशेष होगा। शुक्रवार के दिन मंदिर में अधिक संख्या में भक्तगण देवी के दर्शन करने एवं उनका प्रसाद पाने के लिए आते हैं।

इस मंदिर में नित्य प्रातःकाल एवं सांयकाल देवी का दैनिक अभिषेक किया जाता है। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक संध्या को देवी को तोप की सलामी दी जाती है। इस प्रथा का आरम्भ मैसूरू के वड्यार महाराजाओं ने तब किया था जब उन्होंने टीपू सुलतान को मृत्यु के पार पहुंचाकर अपना राज्य उससे वापिस प्राप्त किया था।

आषाढ़ शुक्रवार

आषाढ़ मास के शुक्रवार को मंदिर में विशेष उत्सवों का आयोजन किया जाता है। आषाढ़ मास अंग्रेजी तिथिपत्र के अनुसार जुलाई-अगस्त में आता है।

चामुंडी जयंती

चामुंडी जयंती आषाढ़ मास की कृष्ण सप्तमी के दिन मनाई जाती है। इस दिन देवी अपने उत्सव मूर्ति स्वरूप में अपनी स्वर्ण पालकी में बैठकर मंदिर से बाहर आती हैं। मंदिर परिसर में उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है।

इस पूजा में मैसूरू के राजपरिवार के सदस्य भी भाग लेते हैं तथा देवी से आशीष लेते हैं कि वे उनके मार्गदर्शन में राज्य पर निष्पक्ष रूप से शासन करें।

नवरात्रि और नाडा हब्बा या दशहरा

नवरात्रि वर्ष में दो बार आती है, चैत्र मास में तथा अश्विन मास में। देश भर के अन्य देवी मंदिरों के समान इस मंदिर में भी ये दोनों नवरात्रियाँ बड़ी धूमधाम से मनायी जाती हैं। चामुंडेश्वरी मन्दिर में नवरात्रि के नौ दिवस देवी का विभिन्न स्वरूपों में श्रृंगार किया जाता है, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। इनमें कुछ दिन मैसूरू के राजकोष से आये आभूषणों द्वारा भी देवी का श्रृंगार किया जाता है।

चामुंडी मैसूरू में आयोजित विश्वप्रसिद्ध दशहरा उत्सव का अभिन्न अंग हैं। हम उसके विषय में किसी अन्य दिवस चर्चा करेंगे।

मंदिर के अन्य महत्वपूर्ण दिवस:

  • अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को आयोजित शयन उत्सव
  • अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी को आयोजित मुदी उत्सव
  • चैत्र प्रतिपदा या चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिवस में आयोजित वसंतोत्सव
  • कार्तिक पूर्णिमा के दिन कार्तिकोत्सव
  • अश्विन मास की पूर्णिमा को प्रातः रथोत्सव अश्वयुज
  • अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया की संध्या में आयोजित टेप्पोत्सवा
  • फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को आयोजित श्री महाबलेश्वर रथोत्सव
  • माघ मास के तृतीय रविवार को आयोजित उत्तानहल्ली ज्वालामुखी मंदिर की जत्रा

महाबलेश्वर मंदिर

चामुंडेश्वरी मंदिर से लगभग १०० मीटर की दूरी पर एक छोटा शिव मंदिर है जो शिलाओं द्वारा निर्मित है। इसके स्तम्भ ठेठ होयसल मंदिर वस्तु शैली में निर्मित हैं जो यह संकेत करने हैं कि इस मंदिर का निर्माण कदाचित होयसल राजवंश ने ही करवाया होगा। इस मंदिर परिसर में कन्नड़ भाषा में उकेरा गया एक शिलालेख है।

कन्नड़ भाषा में शिलालेख
कन्नड़ भाषा में शिलालेख

मंदिर का मंडप मूर्तियों से भरा हुआ है। गर्भगृह के एक ओर सप्तमातृकाओं को दर्शाता एक पटल मुझे अब भी स्पष्ट रूप से स्मरण है।

हम मंदिर में दर्शन के लिए प्रातः शीघ्र ही आ गए थे। जिसके फलस्वरूप हमें मंदिर की आरती में सम्मिलित होने का सुअवसर प्राप्त हुआ। प्रातःकालीन आरती के समय गिने-चुने ही भक्तगण थे जिसके कारण वातावरण में एक सम्मोहक शान्ति थी। सम्पूर्ण आरती एक अत्यंत भाव-विभोर कर देने वाला अनुभव था।

महाबलेश्वर मंदिर के स्तम्भ
महाबलेश्वर मंदिर के स्तम्भ

मुझे यहाँ का वातावरण अत्यंत भा गया। चामुंडेश्वरी मंदिर में इतनी बड़ी संख्या में भक्तगण व दर्शनार्थी उपस्थित रहते हैं कि देवी के दर्शन करना भी दूभर हो जाता है। किन्तु यह मंदिर लगभग खाली था। यहाँ शांत वातावरण में भगवान के सान्निध्य में कुछ क्षण व्यतीत करने का अद्वितीय अनुभव प्राप्त होता है।

यह मंदिर चामुंडेश्वरी मंदिर एवं अन्य समकालीन मंदिरों से पुरातन हो सकता है। यह मंदिर जिस पहाड़ी पर स्थित है, उसका नाम है महाबलाद्री पहाड़ी। कालांतर में चामुंडी पहाड़ी अधिक लोकप्रिय हो गयी।

यहाँ से निकट ही एक नारायणस्वामी मंदिर भी है।

नंदी मूर्ति एवं शिव मंदिर

चामुंडी पहाड़ी के ऊपर जाती सहस्त्र सीढ़ियों को चढ़ते समय जब आप ७००वीं सीढ़ी पर पहुंचेंगे, आप शिलाओं को उकेर कर बनाई गयी नंदी की एक विशाल प्रतिमा देखेंगे। नंदी की इस प्रतिमा को एक विशाल एकल शिला को उकेर कर बनाया गया है। इसमें नंदी के विभिन्न अवयव अत्यंत यथोचित, सुडौल तथा सटीक अनुपात में निर्मित हैं। हम जानते हैं इस क्षेत्र में नंदी अत्यंत लोकप्रिय हैं। कभी कभी नंदी की प्रतिमा शिवलिंग से भी विशाल बनाई जाती है। भक्तगण चाहे जिस माध्यम से चामुंडेश्वरी मंदिर जा रहे हों, वे मार्ग में यहाँ ठहर कर नंदी के दर्शन अवश्य लेते हैं।

भव्य नंदी प्रतिमा
भव्य नंदी प्रतिमा

यह स्थान छायाचित्रीकरण के लिए भी अत्यंत लोकप्रिय हो गया है, चाहे वह स्वयं का हो अथवा परिदृश्यों का। यहाँ एक ऐसा चबूतरा है जहाँ से आप नंदी की प्रतिमा के समीप ना जाते हुए भी उत्तम छाया चित्र ले सकते हैं। साथ ही आगे की सीढ़ियाँ चढ़ने से पूर्व भक्तगणों को कुछ क्षण विश्राम करने का भी अवसर मिल जाता है।

नंदी की प्रतिमा लगभग १६ फीट ऊँची तथा लगभग २५ फीट लम्बी है। इसके सामने अपने आकार को देखते हुए नंदी एवं भगवान के समक्ष अपने अस्तित्व की सूक्ष्मता का आभास होता है। नंदी के गले में कई साखलियाँ एवं घंटियाँ हैं जिन्होंने नंदी के सम्पूर्ण पीठ को भी ढँक दिया है। इनको उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित कर बनाया गया है। यह नंदी पर्यटकों को अत्यंत प्रिय है। इसका निर्माण भी डोड्डा देवराज ने करवाया था, जिन्होंने तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए सीढ़ियों का निर्माण करवाया था।

यदि नंदी हैं तो शिव भी आसपास ही होंगे। नंदी के चबूतरे के निकट एक छोटा शिव मंदिर है।

महिषासुर मूर्ति

पहाड़ी के ऊपर महिषासुर की एक विशाल प्रतिमा है जिसके हाथों में एक तलवार एवं एक नाग है। महिषासुर की प्रतिमा अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है। यह इस तथ्य का भी प्रतीक है कि जब धरती पर अधर्म एक सीमा के पार बढ़ा तो देवताओं को धरती पर अवतरित होना पड़ा।

चामुंडी पहाड़ी

चामुंडी पहाड़ी चामुंडेश्वरी मंदिर के लिए तो प्रसिद्ध है ही, साथ ही यह पहाड़ी प्रातः एवं संध्याकालीन पदभ्रमण करने, सूर्योदय एवं सूर्यास्त के दृश्यों का आनंद उठाने व छायाचित्रीकरण करने, यहाँ के सुखमय वातावरण में सराबोर होने के लिए तथा हरियाली भरे परिदृश्यों के दर्शन करने वालों में भी अत्यंत लोकप्रिय है।

मैसूरू नगरी से केवल १३ किलोमीटर दूर होने के पश्चात भी इन पहाड़ियों की श्रंखला लगभग ११ किलोमीटर लम्बी है। इन पहाड़ियों के ऊपर स्थित वन वास्तव में सरकार द्वारा घोषित संरक्षित वन हैं जहाँ वनस्पतियों एवं वन्यप्राणियों की अनेक दुर्लभ प्रजातियाँ पायी जाती हैं। यह एक उष्ण कटिबंधीय कटीला पतझड़ी वन(tropical deciduous thorn scrub forest) है। यहाँ फूलों वाले पौधों के लगभग ४४० प्रजातियाँ पायी जाती हैं। पक्षी प्रेमियों ने यहाँ पक्षियों के लगभग १९० प्रजातियों को ढूंड निकला है जिनमें लगभग १३० प्रजातियाँ स्थानिक हैं।

यहाँ लगभग १५० प्रकार की तितलियों को भी देखा गया है। इस पहाड़ी वन में वानरों, गंधबिलावों(civet), तेंदुओं तथा नेवलों का वास है। चामुंडी पहाड़ी के वनीय प्रदेश में पदभ्रमण के लिए पगडंडियाँ हैं जहाँ भ्रमण कर आप प्रकृति का आनंद उठा सकते हैं। लेकिन यह पदभ्रमण आधिकारिक अनुमति प्राप्त करने के पश्चात किसी परिदर्शक के साथ समूह में ही करिए जो इस प्रकार के रोमांचक गतिविधियों के लिए दक्षता प्राप्त किये हुए हैं।

मैसूरू का विहंगम दृश्य

चामुंडी पहाड़ी के ऊपर से मैसूरू नगरी का अप्रतिम विहंगम दृश्य दिखाई पड़ता है। मैंने इस पहाड़ी के अनेक अवलोकन बिन्दुओं से मैसूरू नगरी को निहारा। वहाँ से मुझे मैसूरू नगरी एक श्वेत नगरी के समान प्रतीत हुई क्योंकि मैसूरू में अनेक प्रमुख संरचनाएं श्वेत रंग की हैं।

चामुंडी पहाड़ी से मैसूर नगर का दृश्य
चामुंडी पहाड़ी से मैसूर नगर का दृश्य

यदि आपके साथ कोई स्थानिक व्यक्ति है अथवा कोई स्थानीय परिदर्शक है तो वह आपको वहीं से मैसूरू नगरी का आकाशीय भ्रमण करा देगा। यदि आकाश स्वच्छ हो तो यहाँ से आप कृष्णराजसागर बाँध तक देख सकते हैं।

ज्वालामालिनी एवं त्रिपुरसुंदरी मंदिर

चामुंडी पहाड़ी से नीचे आते समय आप उत्तानहल्ली गाँव की ओर विमार्ग लें। यह गाँव मुख्य पहाड़ी के लगभग तलहटी पर बसा हुआ है। यहाँ दो मंदिर हैं जो जुड़वा देवियों, ज्वालामालिनी एवं त्रिपुरसुंदरी को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि ये दोनों देवियाँ देवी चामुंडा की बहनें हैं।

ज्वालामालिनी मंदिर
ज्वालामालिनी मंदिर

ये दोनों मंदिर साथ साथ हैं। इस परिसर में एक सुन्दर शिव मंदिर भी है। मुझे यहाँ भैरव की कुछ शैल प्रतिमाएं भी दिखीं जिन्हें किसी भी देवी क्षेत्र का प्रमुख भाग माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ के राजा-महाराजा युद्ध के लिए प्रस्थान करने से पूर्व इस मंदिर में आकर देवी के दर्शन करते थे तथा उनका आशीष ग्रहण करते थे।

यहाँ आसपास के क्षेत्र में आपको देवी के अनेक स्वरूपों को समर्पित कई मंदिर दिखाई देंगे। ठीक वैसे ही जैसे कोल्हापुर में महालक्ष्मी के पास कालिका एवं रेणुका देवी विराजमान हैं।

यात्रा सुझाव:

  • चामुंडेश्वरी मंदिर ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। आप इस पहाड़ी पर सीढ़ियाँ चढ़कर जा सकते हैं अथवा वाहन से भी ऊपर तक जा सकते हैं। मैसूरू नगरी से पहाड़ी के ऊपर तक जाने के लिए नियमित बस सेवायें भी उपलब्ध हैं।
  • चामुंडेश्वरी मंदिर में दर्शन का समय प्रातः ७:२० से दोपहर २ बजे तक, तत्पश्चात दोपहर ३:३० से संध्या ६ बजे तक तथा इसके पश्चात संध्या ७:३० से रात्रि ९ बजे तक है।
  • विशेष दर्शन का भी प्रावधान है जिसमें आप टिकट लेकर एक अन्य द्वार से मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं। इस द्वार पर सामान्यतः कम भीड़ रहती है।
  • दोपहर के भोजन के समय मंदिर का महाप्रसाद निशुल्क उपलब्ध रहता है। यदि आप यहाँ कुछ दान-दक्षिणा करने में समर्थ हैं तो अवश्य करें।
  • यदि आपके पास कुछ खाने-पीने की वस्तुएं हैं तो वानरों से सावधान रहें।
  • मंदिर के भीतर छायाचित्रीकरण की अनुमति नहीं है। बाहर, मंदिर परिसर में आप छायाचित्रीकरण कर सकते हैं।
  • चामुंडी पहाड़ी एक वनीय क्षेत्र है जहाँ अनेक दुर्लभ वन्य प्राणियों का वास है। अतः वनीय प्रदेश में भ्रमण करते समय सावधान रहें।
  • पहाड़ी के ऊपर वाहन खड़ा करने के लिए पर्याप्त स्थान है।
  • पहाड़ी के ऊपर जलपान एवं स्मारिकाओं की दुकानें भी उपलब्ध हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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