चिक्कल कालो – गोवा में वर्षा ऋतू का उत्साहपूर्ण माटी उत्सव

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चिक्कल कालो उत्सव - गोवागोवा के अनेक ऐसे उत्सव हैं जिन्हें केवल गोवा में ही मनाया जाता है। चिक्कल कालो ऐसा ही एक उत्सव है। यह त्यौहार आषाढ़ मास १२वीं तिथि को मनाया जाता है। अंग्रेजी दैनन्दिनी अनुसार यह जुलाई माह के दूसरे अथवा तीसरे सप्ताह में पड़ता है। ऋतु के अनुसार देखा जाय तो यह गोवा की मुख्य ऋतु, वर्षा ऋतु के मध्य आता है। यह मानसून का एक अति उत्साहपूर्ण पर्व है। मैंने इस उत्सव के सम्बन्ध में बहुत सुन रखा था। इसमें भाग लेने की सदैव इच्छा थी। पिछले दो वर्षों से मुझे समाचार पत्रों द्वारा इस पर्व के मनाये जाने की जानकारी, पर्व के अगले दिन प्राप्त होती थी। अतः इस वर्ष मैंने इस उत्सव में भाग लेने की ठान ली और निर्धारित दिवस व समय पर मार्शेल के देवकी कृष्ण मंदिर में जा पहुंची।

देवकी कृष्णा मंदिर - मार्शेल गाँव - गोवा
देवकी कृष्णा मंदिर – मार्शेल गाँव – गोवा

हालांकि मार्शेल के देवकी कृष्ण मंदिर का उल्लेख मैंने अपने संस्मरण ‘गोवा के सारस्वत मंदिर’ में पहले से ही किया हुआ है। उपरोक्त संस्मरण द्वारा इस मंदिर के इतिहास व किवदंतियों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। अतः इतिहास इत्यादि पर समय नष्ट ना करते हुए, मैं सीधे इस मंदिर में मनाये जाने वाले चिक्कल कालो उत्सव व उससे सम्बंधित अनुष्ठानों के बारे में आपको बताना चाहती हूँ।

हिंदी पंचांग के आषाढ़ी एकादशी के दिन देवकी कृष्ण मंदिर में २४ घंटों का अखंड सत्संग आयोजित किया जाता है। एकादशी के दूसरे प्रहर ११ बजे आरम्भ किये गए इस सत्संग की समाप्ति द्वादशी के दिन दोपहर ११ बजे होती है। मंदिर के भीतर, बालकृष्ण को गोद में उठाये देवकी माता की स्थापित प्रतिमा के समक्ष, अखंड ज्योत जलाई जाती है। मैं द्वादशी के दिन दोपहर १० बजे ही मंदिर पंहुच गयी थी। अतः मुझे १ घंटा मार्शेल के स्थानीय कीर्तनकारों द्वारा गाये भजनों का आनंद उठाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। उनके द्वारा गाया गया एक भजन आप इस चलचित्र में सुन सकते हैं।

मार्शेल का देवकी कृष्ण मंदिर मूलतः शराव द्वीप पर स्थित था। पुर्तगालियों के शासन काल में इसके अस्तित्व के संरक्षण हेतु मंदिर को मार्शेल में स्थानांतरित किया गया। अतः यह चिक्कल कालो उत्सव भी मार्शेल में ही मनाया जाने लगा। वहां उपस्थित श्रद्धालु इस उत्सव के इतिहास से अनभिज्ञ प्रतीत हुए। उल्हास में डूबे लोगों को देख ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे इतिहास की जानकारी प्राप्त करने की अपेक्षा, इसे मनाने में उन्हें ज्यादा आनंद आ रहा था।

चिक्कल कालो उत्सव

बालकृष्ण चिक्कल कालो के दिन
बालकृष्ण चिक्कल कालो के दिन

यह उत्सव भगवान कृष्ण के बाल्यावस्था की चंचलता व नटखट क्रियाकलापों की स्मृति में मनाया जाता है। हिन्दू धर्मग्रंथों व पौराणिक कथाओं के जानकार भगवान् कृष्ण की बाल लीलाओं से भलीभांति परिचित होंगे। बालकृष्ण द्वारा अपनी माता व बृज वासियों के साथ किये चंचल खेलों को मनाने का ही उत्सव है यह चिक्कल कालो। यह एक पुरुष प्रधान उत्सव रहा है जिसमें बालकों से लेकर वृध्दों तक, सभी बालकृष्ण का रूप धर लेतें है। वे किस तरह बालकृष्ण के स्वरुप को आत्मसात करते हैं, इसका अनुमान इन्हें देखने के पश्चात ही लगाया जा सकता है।

पीपल का पेड़ - चिक्कल कालो का साक्षी
पीपल का पेड़ – चिक्कल कालो का साक्षी

मंदिर के समक्ष स्थित जिस प्रांगण में सर्व ग्रामवासी एकत्र होकर चिक्कल कालो उत्सव मन रहे थे, वहां एक विशाल पीपल का वृक्ष खड़ा था। इस वृक्ष को देख ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह यहाँ घटित होते सर्व क्रियाकलापों का निरिक्षण कर रहा हो। सारे प्रांगण की जमीन वर्षा ऋतु के निरंतर बरसते पानी से भीगी हुई थी। तटीय प्रांत गोवा में बरसते पानी का प्रमाण इतना अधिक होता है कि माटी से मिलकर चिक्कल अर्थात् कीचड़ का रूप ले लेता है। इसी गीली माटी में यहाँ हर उम्र के पुरुष, कृष्ण रूप धर कर खेलतें हैं। यहाँ जो खेल खेले जातें हैं यह वही हैं जिन्हें बालकृष्ण अपने मित्रों के साथ बृज भूमि में खेला करते थे।

देवकी कृष्ण मंदिर का प्रांगण पूरी तरह बृज भूमि में परिवर्तित प्रतीत हो रहा था। इसके पूर्व ऐसा रूपांतरण देखने का अवसर मुझे केवल नाथद्वारा में ही प्राप्त हुआ था।

चिक्कल कालो की दिनचर्या

खेल शुरू होने से पहले एक फोटो हो जाये - चिक्कल कालो - गोवा
खेल शुरू होने से पहले एक फोटो हो जाये

दोपहर १०.३० बजे से ग्रामवासी धीरे धीरे देवकी कृष्ण मंदिर के मार्ग पर प्रकट होने लगे थे। उन्होंने अपने खुले शरीर पर केवल कच्छा पहने हुए थे। गीली मिट्टी में खेलने को आतुर छोटे छोटे बच्चे किसी की प्रतीक्षा ना करते हुए प्रांगण में कूद पड़े थे। मिट्टी में ओतप्रोत नन्हे गोपालों को देख, उत्सव का चित्रीकरण करने आये फोटोग्राफरों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। रस्मों की चर्चा की जाय तो इस त्यौहार की शुरुआत सम्पूर्ण शरीर पर तेल लगा कर की जाती है। समीप ही स्थित श्री लक्ष्मीकांत गोवेंकर की किराने की दुकान इनकी इस आवश्यकता की पूर्ती करती दिखाई पड़ी। लक्ष्मीकांतजी स्वयं इन युवा व वृद्ध गोपालों के शरीर पर तेल लगा रहे थे। कुछ लोग मिट्टी में खेलते नन्हे गोपालों के शरीर पर तेल लगाने प्रांगण पहुँच गए थे।

तेल का भण्डार

तेल मालिश - चिक्कल कालो - गोवा
तेल मालिश

मुझे श्री लक्ष्मीकांत गोवेंकर से चर्चा कर उनके अनुभव के विषय में जानने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि चिक्कल कालो का उत्सव मनाते गोपालों के शरीर पर तेल लगाना उन्हें भगवान् का वरदान स्वरुप प्रतीत होता है। उनका मानना है कि यह तेल, माटी में स्थित किसी अनचाहे संदूषण से, गोपालों की काया की रक्षा करता है। उन्होंने दुकान में इतना तेल एकत्रित कर रखा था कि चाहे जितने गोपाल प्रकट हो जाएँ, तेल के भण्डार में कमी नहीं आनी चाहिए। उनका परिवार कई पीढ़ियों से इस प्रथा का पालन कर रहा है। यह और बात है कि यह प्रथा कब और क्यों आरम्भ हुई कोई नहीं जानता और ना ही जानने की इच्छा रखता दिखाई पड़ा।

शुभ काम से पहले - तिलक - चिक्कल कालो - गोवा
शुभ काम से पहले – तिलक

शरीर पर तेल लगाने के पश्चात सब पुरुष, देवकी कृष्ण मंदिर के समक्ष स्थित, दाड सखाल को समर्पित एक छोटे मंदिर के सामने एक कतार में खड़े हो गए। नगाड़ों के नाद के बीच, पुजारीजी ने इन पुरुषों के माथे पर तिलक लगाया। सब “हरी विट्ठल” “जय विट्ठल” का जयजयकार कर रहे थे। सारा वातावरण उनके मंत्रोच्चारण से गुंजायमान हो रहा था। इसी उल्हास से भरे सारे गोपाल रुपी पुरुषों ने एकत्र बैठ कर चित्र खिंचवाए, तत्पश्चात विट्ठल का नाम जपते मुख्य मंदिर की तरफ बढ़ गए।

देवकी कृष्ण मंदिर में पूजा अर्चना

देवकी कृष्णा मंदिर में उत्साहपूर्ण नृत्य
देवकी कृष्णा मंदिर में उत्साहपूर्ण नृत्य

मंदिर के भीतर प्रवेश करने से पूर्व, तेल में सराबोर सर्व गोपालों ने विट्ठल नाम जपते हुए मंदिर की परिक्रमा की। मंदिर के भीतर प्रवेश करते ही सर्व गोपालों के मुख से निकले हरी विट्ठल के उच्चारण , मंदिर के चार भित्तियों के भीतर अतिगुंजायमान हो उठे। मंदिर के भीतर सबने प्रज्ज्वलित दीप की परिक्रमा की। उन्हें देख ऐसा लग रहा था जैसे वे किसी शक्ति के वश में हों। इतने सारे भक्तों को ढोल की थाप पर नाचते गाते देख मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे। उनके द्वारा उत्पन्न ऊर्जा व उसकी उत्तेजना केवल यहाँ खड़े होकर ही अनुभव की जा सकती है। मैं भी मंदिर के एक कोने में खड़े होकर इस अनुभूति का आनंद लेने लगी। अनेक चित्र भी खींचे। कुछ समय पश्चात इन गोपालों ने दीप से किंचित तेल ले कर अपने माथे पर लगाया व मार्ग के उस पार स्थित प्रांगण की ओर प्रस्थान किया। इस तरह उन्होंने इस उत्सव का शुभारम्भ किया।

चिक्कल कालो उत्सव के व्यंजन

मिठाई बांटते ग्रामवासी - चिक्कल कालो
मिठाई बांटते ग्रामवासी

सर्व क्रियाकलापों का केंद्र अब वह पीपल का वृक्ष था जो मंदिर के समक्ष स्थित था। वृक्ष के चबूतरे पर कई ग्रामवासी स्वादिष्ट व्यंजन लिए खड़े थे। सर्व गोपाल व अन्य भक्तगण उनके समक्ष धरती पर इंतज़ार कर रहे थे कि कब ग्रामवासी इन व्यंजनों को उनकी तरफ उछालेंगे। जो व्यक्ति जिस व्यंजन को लपक ले, वह व्यंजन उसका हो जाता था। अत्यंत अनोखा प्रतीत होता है परन्तु यही पहला खेल था।

लडडू, जलेबी और पूरण पोली
लडडू, जलेबी और पूरण पोली

तत्पश्चात गाँव के कई ज्येष्ठ नागरिक, हाथों में लड्डू, जलेबी, पूरनपोली, पूरियां इत्यादि कई स्वादिष्ट व्यंजन लिए, लोगों में बाँटते दिखाई दिए। मैं यह देख गदगद हो उठी क्योंकि वे, सब लोगों से आग्रह कर, अत्यंत प्रेम से व्यंजन खिला रहे थे। कहीं कोई दुकानदारी नहीं, कोई लाभ की मंशा नहीं, कोई छल नहीं। चिक्कल कालो के खेल में प्रवेश के पहले पेट भर भोजन कर शक्ति अर्जित करने में मदद कर रहे थे यह ज्येष्ठ नागरिक। एक हाथ में लड्डू और दूसरे हाथ में जलेबी उठाकर मैंने भी उनकी प्रेम व ममता का प्रत्यक्ष अनुभव लिया।

चिक्कल कालो का माटी खेल

माटी और झंकार - चिक्कल कालो - गोवा
माटी और झंकार

व्यंजनों का आस्वाद लेकर मैं भी प्रांगण की ओर रवाना हो गयी। प्रांगण में बजाते ढोल व झांझों से निकालता संगीत मेरे कानों तक पहुँच रहा था। इसी संगीत की लय पर, चिक्कल कालो की तैयारी करते सारे गोपाल सादा व्यायाम कर रहे थे। लय बद्ध तरीके से अपने हाथों पैरों का व्यायाम कर रहे थे। अचानक मेरे पीछे हलचल मचने लगी। मुड़ कर देखा कि कुछ युवा पुरुष एक गोपाल को उठाकर पानी से भरपूर मिट्टी की ओर ले जा रहे थे। उन्होंने उस गोपाल को गीली मिट्टी में गिरा दिया और उस पर पंक, अर्थात कीचड उछालने लगे। इसी तरह हर तरफ पंक की होली होने लगी। इस उत्सव में मिट्टी ने पूरी निष्पक्षता से सबको अपने पंक में सराबोर कर दिया था। माटी की इस नटखटता से मैं कैसे अछूती रह पाती। पंक के छींटों का आनंद लेते समय मुझे केवल एक चिंता थी। मेरे कैमरे के कांच को क्षति ना पहुंचे। क्योंकि मुझे इस पूरे उत्सव को कैमरे में उतारना था।

चिक्कल कालो में खेले गए अन्य खेल

मिट्टी में उठा-पटक - चिक्कल कालो - गोवा
मिट्टी में उठा-पटक
कीचड में लत-पथ हो आनंद लेते युवा - चिक्कल कालो - गोवा
कीचड में लत-पथ हो आनंद लेते युवा

मेंढ्रानी  या भेड़ और बकरियों का खेल

आँख मिचौली – जहां आँखों पर पट्टी बाँध कर एक खिलाड़ी, झांझ बजाते अन्य खिलाडियों को पकड़ने की कोशिश करता है। भीड़ में खड़े अन्य दर्शक शोर मचाते उस खिलाड़ी की हिम्मत बढ़ाते हैं। उसे कभी लक्ष्य की ओर आकर्षित करते और कभी उसका ध्यान बटाते हैं। यह एक मनोरंजन से भरा खेल है।

चक्र -इस खेल में सब खिलाड़ी अपने पांवों को एक स्थान पर केन्द्रित कर चक्र का आकार देते हैं। चक्र, विष्णु अवतार कृष्ण का एक प्रतीक है।

धरच्यानी -यहाँ के स्थानीय भाषा कोंकणी में इसे धरच्यानी कहा जाता है। आप सब ने अपने बाल्यावस्था में यह खेल अवश्य खेला होगा। सब खिलाड़ियों को दो वर्गों में बांटा जाता है। दोनों वर्गों के खिलाड़ियों में से एक एक खिलाड़ी आगे आकर बीच में रखी वस्तु, एक दूसरे से बचाकर, उठाने का प्रयत्न करता है। चिक्कल कालो में इसी खेल को मिट्टी से लथपथ इस प्रांगण में खेलते हैं।

रस्साखींच – गीली मिट्टी में लथपथ शरीर और धरती पर फिसलते पाँव रस्साकशी के खेल को एक नया आयाम प्रदान करतें हैं।

कबड्डी  – रस्साखींच खेल की तरह कबड्डी का भी आनंद गीली मिट्टी द्वारा दुगुना हो जाता है।

सुरंग – कुछ खिलाड़ी एक दूसरे का हाथ पकड़ कर ऊपर उठाते हैं और हाथों के नीचे सुरंग तैयार हो जाती है। बाकी खिलाड़ी इस सुरंग को पार करने की कोशिश करतें हैं, वह भी पकड़ाई में आये बिना। हम इसे छुटपन में पोशम्पा कहते थे। यहाँ इस चिक्कल कालो उत्सव में यह सुरंग थोड़ी लम्बी हो जाती है क्योंकि सम्पूर्ण खिलाड़ियों का झुण्ड इस खेल में भाग लेने को आतुर रहता है।

मेंढक खेल – कुछ खिलाड़ी मेंढक की तरह झुक कर बैठते हैं और अन्य खिलाड़ी उनके ऊपर से छलांग लगाते हैं। पंक में भीगे खिलाड़ियों को इस तरह छलांग लगाते देखना मनोरंजक होता है।

तू तू मैं मैं – यह चिक्कल कालो में खेले गए सब खेलों में मेरा सर्वाधिक प्रिय खेल है। पूरा जनसमूह दो भागों में बंट कर आमने सामने बैठ जाता है। झूठा विवाह समारोह का स्वांग रच कर एक समूह वर पक्ष व दूसरा समूह वधु पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है। दोनों पक्ष एक दूसरे का उपहास करतें हैं। कुछ समय नोकझोंक करने के उपरांत वे विवाह हेतु सहमति व्यक्त करतें हैं। यह सही अर्थ में चिकल कालो खेल है, अर्थात् एक दूसरे पर कीचड़ उछालना!

दही हांडी - चिक्कल कालो - गोवा
दही हांडी

दही हांडी – दही हांडी खेल बहुधा कृष्ण जन्माष्टमी के सन्दर्भ में ही जाना जाता है। गोवा में यह खेल चिक्कल कालो उत्सव की पराकाष्ठा है। पीपल वृक्ष के ऊपर बंधी दही की हांडी ही खिलाड़ियों का लक्ष्य होती है। सर्व खिलाड़ी शुण्डाकार स्तम्भ बनाते हुए एक दूसरे पर चढ़ते हैं और हांडी तक पहुंचते हैं। हांडी टूटने पर दही नीचे खड़े खिलाड़ियों पर बिखर जाती है। सारा जनसमूह इन खिलाड़ियों पर और दही उछालता है। सारे खिलाड़ियों पर प्रथम तेल, तत्पश्चात पंक और अब दही का लेप! बड़ा ही अनोखा है यह चिक्कल कालो उत्सव। निःशुल्क त्वचा का रखरखाव!

तेल, मिट्टी और दही में लिपटे बालकृष्ण - चिक्कल कालो - गोवा
तेल, मिट्टी और दही में लिपटे बालकृष्ण

इन सारे खेलों के पश्चात सम्पूर्ण खिलाड़ियों का समूह धोबी तालाब की ओर कूच करता है। धोबी तालाब में स्वयं को स्वच्छ कर सारे खिलाड़ी तैयार होते हैं। वहां के कई परिवार इन्हें भोजन कराते हैं।

चिक्कल कालो की संस्कृति

चिक्कल कालो का प्रांगन
चिक्कल कालो का प्रांगन

मैंने इस उत्सव का प्रारम्भ से अंत तक बहुत आनंद उठाया। जहां एक तरफ पुरुष वर्ग, पंक में लथपथ, खेल रहा था, वहीं महिलायें चारों ओर खड़ी होकर उन्हें देख कर आनंद उठा रहीं थीं। बच्चे अपने प्रथक समूहों में खेल रहे थे। चारों ओर उन्मत्त मस्ती का वातावरण था तब भी, कहीं भी, किसी के द्वारा दुर्व्यवहार की एक झलक भी दिखाई नहीं दी। खिलाड़ियों के बीच जाकर चित्रीकरण करते समय कभी असुरक्षा का अनुभव नहीं हुआ। सब एक परिवार के रूप में इस त्यौहार का आनंद उठा रहे थे।

गोवा के चिक्कल कालो उत्सव का एक विडियो

२०१६ के चिक्कल कालो उत्सव का एक विडियो आपके समक्ष प्रस्तुत है

चिक्कल कालो का उत्सव गोवा के कई मंदिरों के प्रांगणों में छोटे प्रमाण में आयोजित किया जाता है। क्रूर व्यवसायीकरण से अछूते इस समारोह को देख अनुभूति हुई कि किसी बाहरी आकर्षण के बिना, निर्मल, निष्कपट और निष्छल आनंद की प्राप्ति ही हमारी मूल संस्कृति है। मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि व्यवसायीकरण से पूर्व मुझे इस उत्सव का आनंद पाने का अवसर प्राप्त हुआ।

यदि आप चिक्कल कालो उत्सव के समय गोवा में उपस्थित हों तो इस उत्सव का आनंद अवश्य उठायें। यह एक अद्वितीय अनुभव है जो आपको अन्यथा उपलब्ध नहीं होगा।

गोवा पर मेरे अन्य संस्मरण-
गोवा की देव दीपावली
गोवा के शांतादुर्गा व अन्य सारस्वत मंदिर
• शिगमो – गोवा का सांस्कृतिक होली उत्सव
• पणजी गोवा कार्निवाल २०१५ की मुखाकृतियाँ

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

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