चिटनवीस वाड़ा नागपुर की एक अद्भुत धरोहर

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वाड़ा, यह शब्द आप सबने सुना होगा। पुणे का शनिवार वाड़ा एक लोकप्रिय दर्शनीय स्थल है जिसे आप में से अनेक पाठकों ने देखा भी होगा । महाराष्ट्र में राजा – महाराजा तथा अन्य कुलीन परिवारों के भव्य निवासों को वाड़ा कहा जाता है। पुणे स्थित शनिवार वाड़ा पेशवाओं का निवास स्थान था। महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे भव्य वाड़ों के लिए प्रसिद्ध है। वहीं महाराष्ट्र का एक अन्य नगर, नागपुर भी अपने भव्य वाड़ों के लिए जाना जाता है। नागपुर के पुरातन क्षेत्र में अनेक सुंदर वाड़े हैं। नागपुर से मेरा प्रथम परिचय चिटनवीस वाड़े के द्वारा ही हुआ था जो नागपुर के महल क्षेत्र में चिटनवीसपुरा में स्थित है।

चिटनवीस वाड़ा उन कुछ वाड़ों में से एक है जो अपनी भव्यता एवं पुरातन आकर्षण को अखंडित रखने में सफल रहा है।

नागपुर के चिटनवीस वाड़े का भ्रमण

अपने नागपुर भ्रमण में मैं सर्वप्रथम चिटनवीस वाड़े का दर्शन करने निकल पड़ी। मैंने वाड़े में जिस मुख्य द्वार से प्रवेश किया, वह काष्ठ का विशाल किन्तु सामान्य द्वार था। द्वार का ऊपरी भाग तोरण के समान अर्धगोलाकार था। द्वार के ऊपर लगे पटल पर वाड़े का नाम एवं पता अंकित था।

चिटनवीस वाड़ा का प्रवेश द्वार
चिटनवीस वाड़ा का प्रवेश द्वार

मुख्य द्वार से वाड़े के भीतर प्रवेश करते ही मुझे एक मुक्ताकाश परिसर में अनेक संरचनाएं दृष्टिगोचर होने लगीं। मेरे मस्तिष्क में प्रश्न उत्पन्न होने लगे कि मैंने वाड़े में प्रवेश कर लिया है अथवा अब भी वाड़े के बाहर ही हूँ। मुख्य द्वार की ओर स्थित संरचना पर औपनिवेशिक काल का आभास हो रहा था। औपनिवेशिक काल के कलकत्ता में इमारतों पर जिस प्रकार के लकड़ी के पटल हुआ करते थे, वैसे ही लकड़ी के पटल इस संरचना में भी थे।

औपनिवेशिक काल का वाडा
औपनिवेशिक काल का वाडा

परिसर में सघन ऊँचे वृक्ष हैं जो कदाचित इन संरचनाओं से भी अधिक प्राचीन हैं। मैंने एक भवन के भीतर प्रवेश किया जो यहाँ का कार्यालय कक्ष है। इस कक्ष में काष्ठ द्वारा निर्मित पुरातन भवन साज-सज्जा की अनेक वस्तुएं रखी हुई हैं, जैसे पालकी, सन्दूक, लेखन मंजूषा, बैलगाड़ी आदि। मुझे ज्ञात हुआ कि यह भवन वास्तव में वाड़े का मुख्य भाग है। अर्थात् यह मुख्य वाड़ा है। इसके बाह्य क्षेत्र में जो अन्य भवन मैंने देखे, वे इस वाड़े के अतिरिक्त अंग हैं जिनका उपयोग औपनिवेशिक काल में अतिथि गृह के रूप में किया जाता था।

एक सज्जन जो इस स्थान का प्रबंधन करते हैं, उन्होंने मुझे इस वाड़े की विवरणिका दी तथा एक कर्मचारी को इस वाड़े के द्वार मेरे लिए खोलने का निर्देश दिया। वाड़े का बाह्य दर्शन करने के पश्चात मैं इस वाड़े के भीतर अधिक कुछ देखने की आशा नहीं कर रही थी। मैं कल्पना कर रही थी कि इसके भीतर अधिक से अधिक कुछ उत्कीर्णिक काष्ठ स्तंभ होंगे। मैंने अनेक काष्ठ स्तंभ देखे भी। वाड़े में प्रवेश करते ही मेरी दृष्टि प्रांगण के चारों ओर स्थित अनेक काष्ठ स्तंभों पर पड़ी। किन्तु वास्तव में असीम अचरज तो इन स्तंभों एवं मेरी कल्पना, दोनों के परे छुपा था।

चिटनवीस वाड़ा तीन-चौक हवेली अथवा वाड़ा है । इसका अर्थ है कि इस हवेली में एक के पश्चात एक, तीन प्रांगण हैं। हमने ऐसी ही योजना शेखावटी हवेलियों में भी देखी थी। प्रथम प्रांगण साधारणतः सार्वजनिक स्थल होता है जहाँ सामान्य अतिथि अथवा व्यापार संबंधी व्यक्ति भेंट के लिए आते हैं। इस वाड़े में मैं जहाँ सर्वप्रथम पहुँची थी, वह यही बाह्य प्रांगण है जहाँ वर्तमान में इस परिवार के मुखिया का कार्यालय है।

चिटनवीस कौन थे?

चिटनवीस वास्तव में एक पद का नाम है। चिटनवीस का अर्थ है, मुख्य प्रलेखीकरण अधिकारी जो राजा की सेवा में कार्यरत होता है। इस वाड़े का निर्माण रखमाजी गणेश रणदिवे ने किया था जो नागपुर के भोंसले राजाओं के चिटनवीस थे। वे सर्वप्रथम सन् १७४४ में रघुजी (द्वितीय) भोंसले के संग नागपुर आए थे। इस वाड़े की रचनात्मक सूक्ष्मताओं को देख ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि यह वाड़ा लगभग २०० वर्ष प्राचीन होगा।

चिटनवीस वाड़े का देवघर चौक

जैसे ही मैंने प्रथम प्रांगण में प्रवेश किया, मेरे चारों ओर स्थित अनेक बहुरंगी भित्तिचित्रों को देख मैं कुछ क्षण स्तंभित रह गयी। सुध आने पर चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। इस मुक्ताकाश प्रांगण की भूमि को अब काष्ठ फलकों से आवरणित किया गया है लेकिन इसके चारों ओर स्थित गलियारों में मिट्टी की सुखद भूमि है।

देवघर चौक में कृष्ण लीला
देवघर चौक में कृष्ण लीला

गलियारों की भित्तियों पर अनेक उत्कृष्ट चित्र हैं जिनमें कृष्ण की जीवनी पर आधारित दृश्य प्रमुखता से प्रदर्शित हैं। मुझे बताया गया कि कृष्ण इस परिवार के कुल देवता हैं। भित्तियों पर महाभारत जैसे महाकाव्यों से संबंधित चित्र हैं। राजा रवि वर्मा द्वारा रचित शिलामुद्रित चित्र (Lithographs ) हैं जिन्हे चौखटों के भीतर संरक्षित कर प्रदर्शित किया गया है।

राजस्थानी शैली का देवघर
राजस्थानी शैली का देवघर

प्रांगण के एक कोने में काष्ठ निर्मित एक सुंदर मंदिर है। उसे देख मुझे राजस्थान के मंदिरों का स्मरण हो आया। कृष्ण भगवान को समर्पित यह एक मनमोहक मंदिर है। जब आप इस मंदिर के समक्ष बैठेंगे, आप स्वयं को चारों ओर से कृष्ण से घिरा पाएंगे। यह अनुभव इस चौक के नाम, देवघर चौक को पूर्ण रूपेण सार्थक करता है। देवघर चौक का अर्थ है, देवता का प्रांगण।

पारिवारिक चौक अथवा फव्वारा चौक

प्रथम चौक का एक द्वार हमें दूसरे चौक में ले गया। इस चौक अथवा प्रांगण के मध्य में एक सोता अथवा फव्वारा है। इस प्रांगण के चारों भी गलियारे हैं तथा उनकी भूमि भी मिट्टी की सुखद भूमि है।

फ़व्वारा चौक
फ़व्वारा चौक

हमने इस फव्वारे के निकट बैठकर कुछ क्षण विश्राम किया तथा बैठकर वाड़े के इस भाग को मन भरकर निहारा। यह परिवार का निजी क्षेत्र है जहाँ परिवार के सदस्य एकत्र बैठते हैं, भोजन आदि करते हैं। मैं कल्पना करने लगी कि परिवार की स्त्रियाँ अपने दैनंदिनी कार्य समाप्त कर धूप सेंकने अथवा बतियाने के लिए यहाँ अवश्य बैठती होंगी।

रसोईघर चौक

एक अन्य द्वार हमें अंतिम चौक में ले गया जिसका प्रयोग कदाचित परिवार के कर्मचारी अधिक करते हैं। यहाँ परिवार का रसोईघर है। आप यहाँ उनकी चक्की देख सकते हैं। यहाँ एक कुआँ तथा तुलसी का पौधा भी है। उजले चटक रंगों में रंगी कुछ पालकियाँ भी रखी हुई हैं।

भित्ति पर स्थित एक छिद्र मुझे अत्यंत कौतूहलस्पद प्रतीत हुआ। मुझे बताया गया कि यह छिद्र धान्यागार से जुड़ा हुआ है। आप इस छिद्र का द्वार खोलिए तथा आवश्यक धान्य वहाँ से ले लीजिए! आप इस चौक को सेवा चौक भी कह सकते हैं। वास्तव में यह चौक इस वाड़े के कार्यान्वयन में आवश्यक सभी सेवाएं प्रदान करता है।

मुरलीधर मंदिर

मुरलीधर मंदिर
मुरलीधर मंदिर

तीसरे चौक के पार्श्वभाग में स्थित एक द्वार से हम परिवार के मंदिर पहुँचे। जी हाँ, अधिकांश बड़े वाड़ों में परिवार का निजी मंदिर होता है जिसमें उनके कुलदेवता का विग्रह होता है। इस वाड़े में स्थित यह मुरलीधर मंदिर है। यह मंदिर नागर शैली में निर्मित है जिसके अंतर्गत इसमें एक छोटा गर्भगृह है। उसके ऊपर शिखर है। समक्ष स्थित मंडप काष्ठ स्तंभों से भरा हुआ है। ऐसे मंडप मैंने अपनी नागपुर यात्रा के आगामी चरणों में नागपुर के अनेक मंदिरों में देखे। हनुमान एवं गरुड के भी छोटे छोटे मंदिर हैं।

चिटनवीस वाड़े की काष्ठ कलाकृतियाँ

वाड़े के आंतरिक भागों के सौन्दर्य का अवलोकन करने के पश्चात हम वाड़े के अग्र भाग में आ गये। वहाँ की काष्ठ कलाकृतियों ने हमारा मन मोह लिया था। काष्ठ के स्तंभों पर तथा भित्तियों के कोनों पर उत्कृष्ट कलाकृतियाँ की गई थीं। उनमें मोर एवं तोते की आकृतियों की विपुलता थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मोर एवं तोते की कलाकृति महाराष्ट्र के इस क्षेत्र के काष्ठ उत्कीर्णकों की लोकप्रिय शैली है। कई स्थानों पर केले के पुष्प भी उत्कीर्णित हैं, ठीक वैसे ही जैसे पुणे के पेशवा वाड़े में हैं।

काष्ठ में तोते, मोर और केले के फूल की आकृतियाँ
काष्ठ में तोते, मोर और केले के फूल की आकृतियाँ

वाड़े के ऊपरी तल बाह्य अतिथि गृहों से जुड़े हुए हैं। जैसा कि मैंने पूर्व में लिखा है, वाड़े के अतिथि गृह क्षेत्र का प्रमुख भाग औपनिवेशिक शैली में निर्मित है। कदाचित इनका प्रयोग यूरोपीय अतिथियों के स्वागत सत्कार के लिए किया जाता था। यह भाग मुख्य वाड़े से जुड़ा होकर भी अपना पृथक अस्तित्व रखता है।

काष्ठ के खिलोने और मूर्तियाँ
काष्ठ के खिलोने और मूर्तियाँ

इस प्रकार ऊपरी तल पारिवारिक क्षेत्र एवं अतिथि क्षेत्र के मध्य पृथकता स्पष्ट करते हैं। वाड़े के समक्ष चारभाग शैली में एक उद्यान है। इसके भीतर स्थित पगडंडियाँ उद्यान को चार भागों में बांटती हैं। यह उद्यान अपने उत्तम काल की एक धुंधली छवि प्रस्तुत करता है। यहाँ स्थित एक प्राचीन हस्तचालित पंप मुझे अत्यंत रोचक प्रतीत हुआ। यह पंप अब भी क्रियाशील है।

वाड़े की छत

वाड़े की छत से आप वाड़े के भीतर के प्रांगणों को देख सकते हैं। वहाँ से मुरलीधर मंदिर भी दृष्टिगोचर होता है। वाड़े की छत से आप चारों ओर स्थित नागपुर नगरी का विहंगम क्षैतिज दृश्य देख सकते हैं। जब हम वाड़े की छत पर पहुँचे, सूर्यास्त हो रहा था। वाड़े की ढलुआ छत पर लगे लाल रंग के कवेलुओं की पृष्ठभूमि में  सूर्यास्त का दृश्य अद्भुत प्रतीत हो रहा था।

काष्ठ के स्तम्भ, चौखटें और छज्जे
काष्ठ के स्तम्भ, चौखटें और छज्जे

कालांतर में वाड़े के वंशजों ने वाड़े में शौचालय आदि जैसे अनेक आधुनिक सुविधाओं का निर्माण कराया। वाड़े के एक भाग का उपयोग विविध संस्थाएं अपने कार्यालय के रूप में करती हैं। वाड़े को विवाह तथा अन्य छोटे-बड़े आयोजनों के लिए किराये पर भी दिया जाता है। आप देख सकते हैं कि यहाँ पारंपरिक रूप से भोजन परोसने की व्यवस्था है।

यात्रा सुझाव

मेरी जानकारी तक यह वाड़ा सामान्य जनता के अवलोकन के लिए खुला नहीं है। वाड़े का अवलोकन करने के लिए आपको श्री गंगाधर राव चिटनवीस न्यास कार्यालय से संपर्क करना होगा। वास्तुविद निकिता रमानी वाड़े का भ्रमण आयोजित करती हैं। उनके द्वारा वाड़े का भ्रमण आयोजित करवाना उत्तम होगा।

वाड़े में भ्रमण करने तथा उसका अवलोकन करने के लिए १-२ घंटे पर्याप्त हैं। अवलोकन समयावधि आपकी रुचि पर निर्भर करती है।

आप चिटनवीस वाड़े के आसपास के क्षेत्रों में पदभ्रमण अवश्य करें। चिटनवीस वाड़े के चारों ओर स्थित गलियों में आपको अनेक मंदिर एवं अन्य वाड़े दृष्टिगोचर होंगे।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

1 COMMENT

  1. चिटनवीस वाड़ा नागपुर का आपका यह आलेख पढ़कर और वीडियो देखकर इंदौर में राजवाड़ा और गोपाल मंदिर की याद आ गई, क्योंकि पहले काष्ठ मतलब मजबूत लकड़ियों से ही महल या मकान के छत, फर्नीचर व स्तम्भ बनाये जाते थे जो अब याद आते है तो लगता है वे काफी सुंदर व मनभावन लगते थे। खेर चिटनवीस वाड़ा भी वीडियो में बहुत ही सुन्दर दिख रहा था और 200 साल पुराने अतिसुन्दर भित्तिचित्र भी एकदम अभी के बने प्रतीत हो रहे थे। क्योंकि उन चित्रों में कहीं रंग भदा या उखड़ा हुआ नही दिख रहा था। स्तम्भ व छत भी सुंदर लग रहे थे। एक अच्छी जगह का भ्रमण करवाने के लिए साधुवाद। 🙏🙏

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