द्वारकाधीश मंदिर का वास्तुशिल्प- विलक्षण द्वारका की अद्भुत धरोहर

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वो कहते हैं ना की द्वारका के सभी रास्ते द्वारकाधीश मंदिर की ओर जाते हैं। यह बांका ऊँचा मंदिर भारत के सुदूर पश्चिमी छोर पर स्थित है जहां गोमती नदी का अरब सागर से मिलन होता है। चूंकि द्वारका चारों ओर विस्तृत बंजर धरती से घिरा हुआ है, यह मंदिर मीलों दूर से भी दिखायी पड़ता है। मेरा विश्राम गृह मंदिर से निश्चित रूप से ६ कि.मी. दूरी पर होगा, फिर भी, चारों ओर शहर से घिरे, समुद्र के समक्ष शीष उंचा कर खड़े इस भव्य मंदिर को मैं वहां से देख सकती थी।

द्वारकाधीश मंदिर - द्वारका
द्वारकाधीश मंदिर – द्वारका

मैंने सम्पूर्ण भारत में हजारों मंदिर देखे, वो चाहे वृक्ष के सानिध्य में छोटा सा मंदिर हो या अति विशाल मंदिर परिसर। मैंने अब तक जितने भी प्राचीन मंदिर देखे, उन में द्वारकाधीश मंदिर सबसे जीवंत मंदिर है। यह उन गिने चुने प्राचीन संरचनाओं में से एक है जो अब भी ठीक वैसा ही खड़ा है जैसा कि कुछ सदियों पहले रहा होगा। मंदिर परिसर पहुँचते ही यह विदित होता है कि सारे दैनिक संस्कारों का पालन घड़ी के काँटों सी सूक्ष्मता सा किया जाता है। प्रातःकाल, जब देव जागते हैं, से लेकर जब तक देव सो नहीं जाते, यह मंदिर भक्ति एवं अन्य धार्मिंक कार्यकलापों से निरंतर गूंजता रहता है।

चारों ओर उत्सव का वातावरण रहता है। द्वारकाधीश मंदिर तथा सम्पूर्ण द्वारका श्रृंगार रस से ओतप्रोत प्रतीत होते हैं।

द्वारकाधीश मंदिर कब और किसने निर्मित किया?

श्री द्वारकाधीश मंदिर
श्री द्वारकाधीश मंदिर

यदि आप द्वारकाधीश मंदिर के पंडों से पूछेंगे, वे आपको बताएँगे कि यह ५२४४ वर्ष प्राचीन मंदिर है। इसे श्री कृष्ण के पड़पोते वज्रनाभ ने बनवाया था। यह वही स्थल है जहां किसी समय हरीगृह या हरी अथवा कृष्ण का गृह था, अतः अत्यंत पवित्र है।

मूल मंदिर एवं मंदिर संरचना जो वर्तमान में दिखाई पड़ती है, दोनों भिन्न हैं। जैसा कि द्विवेदीजी ने मुझे समझाया – मंदिर संरचना देह के समान होती है एवं मूर्ति मंदिर की आत्मा। देह बदलता रहता है किन्तु आत्मा वहीं रहती है।

मंदिर की वर्तमान संरचना ८ वीं. से १८ वी. सदी के बीच बने विभिन्न भागों का मिश्रण है। इसका संरक्षण कार्य अब भी जारी है। जब मैं द्वारकाधीश मंदिर के दर्शनार्थ वहां थी, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा अम्बाजी मंदिर के पुनरुद्धार का कार्य जोरों पर था।

द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर का वास्तुशिल्प

श्री द्वारकाधीश मंदिर का शिखर
श्री द्वारकाधीश मंदिर का शिखर

भव्य द्वारकाधीश मंदिर ८० मीटर (या २५० फीट) ऊँचा है जो आज कल की २५ माले की इमारत के समकक्ष है । इस विशाल व ऊंचे मंदिर के ऊपर एक २५ फीट का ध्वजदंड भी है

गर्भ गृह के ऊपर, नागर पद्धति में बना ऊंचा शिखर किसी पर्वत की चोटी सा प्रतीत होता है। शिखर पर ७ परतें स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं। जो पंडित मेरा मार्गदर्शन कर रहे थे, उसके अनुसार ये ७ परतें, भारत में ७ प्राचीन नगरियों अर्थात् सप्तपुरी को दर्शाती है जिनमें से एक द्वारका है। प्राचीन सप्तपुरी ऐसी हैं -अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, अवंतिका, कांचीपुरम व द्वारका। शिखर की परतें इन नगरियों का प्रतीक है जहां सबसे निचली परत अयोध्या से सम्बंधित है। शिखर की इन परतों को एक साथ देखना मेरे लिए सम्पूर्ण भारत के एक ही मंदिर में दर्शन के सामान था।

मंडप

श्री द्वारकाधीश मंदिर का मंडप
श्री द्वारकाधीश मंदिर का मंडप

मंदिर के मंडप पर परतदार शिखर है। ठीक वैसा ही जैसे हम गुजरात के जैन मंदिरों सहित कई मंदिरों में देखते आये हैं। मंदिर ७२ स्तंभों पर टिका हुआ है जिन्हें एक ही पत्थर को काटकर, उन पर नक्काशी कर बनाया गया है। मंडप के चार मंजिल चार-धाम अर्थात् भारत के ४ कोनों में स्थित ४ सबसे महत्वपूर्ण वैष्णव मंदिरों के प्रतीक हैं। चार धामों में से एक, द्वारका भारत के पश्चिमी कोने में स्थित है। अन्य ३ धाम हैं, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथ पुरी तथा उत्तर में बद्रीनाथ।

चौथी मंजिल पर छलती माता को समर्पित एक मंदिर है और पांचवीं मंजिल पर लाडवा मंदिर है। आम जनता को वहां जाने की अनुमति नहीं है। उनके विभिन्न धार्मिक कार्यकलाप निचली मंजिल तक ही सीमित रखे गए हैं।

सोलंकी शैली

मंदिर का वास्तुशिल्प सामान्यतः सोलंकी शैली में है जो लंबे काल तक गुजरात में प्रचलित था। पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार, मुख्य मंदिर १२-१३ वी. शताब्दी की देन हो सकती है जबकि सभा मंडप, जिसे लाडवा मंडप भी कहा जाता है, १५-१६ वीं. शताब्दी में निर्मित हो सकती है। मंदिर परिसर के आसपास खुदाई में उजागर हुआ कि यह इस स्थान का ४था मंदिर है। सबसे प्राचीन मंदिर कम से कम २००० वर्ष पुराना होगा।

द्वारकाधीश मंदिर के बारे में पुरातत्त्व विभाग का विवरण
द्वारकाधीश मंदिर के बारे में पुरातत्त्व विभाग का विवरण

मंदिर की भित्तियाँ उकेरी हुई तो हैं पर उनके ऊपर बहुत अधिक नक्काशी नहीं हैं जैसा कि आप तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर अथवा मोढेरा के सूर्य मंदिर में पायेंगे। कुछ स्थानीय लोगों ने कहा कि इस मंदिर का संरक्षण कार्य करते समय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग खंडित उकेरे पत्थरों के स्थान पर सादे पत्थर लगा रहा है।

छोटे मंदिर पूर्णतः पत्थरों से निर्मित हैं। रानी महल एक भव्य हवेली के सामान निर्मित है। इसके मध्य में एक आँगन है।

द्वारकाधीश मंदिर में ४ शंकराचार्य पीठों में से एक, शारदा पीठ स्थापित है। अन्य तीन पीठ हैं, बद्रीनाथ में ज्योति मठ, कर्नाटक में श्रृंगेरी मठ तथा गोवर्धन मठ पुरी ओडिशा में। मंदिर के जिस भाग में शारदा मठ है वह अपेक्षाकृत नवीन संरचना है। यह आदि शंकराचार्य को समर्पित है। चहरों वेदों को चरों धामों में बांटा गया है और द्वारका शारदा पीठ के हिस्से में है साम वेद। यहां प्रातः एवं संध्याकाल आप विद्यार्थियों को संस्कृत में वैदिक मंत्रोच्चारण करते देख व सुन सकते हैं।

द्वारकाधीश मंदिर समूह

श्री द्वारकाधीश मंदिर गोमती नदी के जल में झलकता हुआ
श्री द्वारकाधीश मंदिर गोमती नदी के जल में झलकता हुआ

बेट द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर के समान, गोमती द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर भी छोटे बड़े मंदिरों का समूह है। गर्भ गृह के भीतर कृष्ण की चार-भुजाधारी विष्णु के रूप में मूर्ति विराजित है। जानकार इसे त्रिविक्रम का रूप कहते हैं।

श्री द्वारकाधीश मंदिर जगत मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

द्वारका के द्वारकाधीश मूर्ति से जुडी किवदंती

२.२५ फीट ऊंची, काले पत्थर में तराशी द्वारकाधीशजी की मूर्ति जो आज हम द्वारकाधीश मंदिर में देखते हैं, वह इस मंदिर में उनकी तीसरी मूर्ति है।

श्री कृष्ण चतुर्भुज विष्णु के रूप में - द्वारकाधीश मंदिर में
श्री कृष्ण चतुर्भुज विष्णु के रूप में – द्वारकाधीश मंदिर में

ऐसा माना जाता है कि यहाँ स्थापित पहली मूर्ति की आराधना, कृष्ण की पहली रानी, रुक्मिणी ने भी की थी। वह मूर्ति अब बेट द्वारका के मंदिर में है। विदेशी आक्रमणकारियों से इसकी रक्षा करने हेतु इसे बेट द्वारका ले जाया गया था।

वहीं दूसरी मूर्ति डाकोर के एक मंदिर में है। यहाँ प्रचलित एक दंतकथा के अनुसार बदना नाम की एक कन्या कृष्ण दर्शन हेतु डाकोर से द्वारका आती थी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन कृष्ण ने उसके साथ जाने का निश्चय किया। किन्तु पुजारियों को शंका हुई कि कन्या ने कृष्ण की मूर्ति चुरा ली। उन्होंने उस कन्या का पीछा किया। कन्या ने अपने पास रखा सोना उन्हें देकर मूर्ति का मूल्य चुकाया और मूर्ति अपने साथ ले गयी। इस प्रकार कृष्ण की मूल मूर्ति डाकोर के मंदिर में पहुँची।

द्वारका के पुजारीगणों को दिव्य दृष्टी प्राप्त हुई थी कि सावित्री तालाव में श्री कृष्ण की एक और मूर्ति है। उन्होंने तुरंत वहां खुदाई की और कृष्ण की अपूर्ण मूर्ति प्रकट हुई। मूर्ति पर उनकी आँखें उकेरी नहीं गयी थीं। यह द्वारका के भगवान् की वही मूर्ति है जिसकी वर्तमान में पूजा अर्चना की जाती है।

सावित्री तलाव - द्वारका
सावित्री तलाव – द्वारका

एक मत यह भी है कि मूर्ति जानबूझ कर सावित्री तलाव में छुपाई गयी थी ताकि निरंतर घुसपैठ करते आक्रमणकारियों से उसकी रक्षा कर सकें।

जहां तक मूर्ति की आँखों का प्रश्न है, मूर्ति पर किया सुन्दर श्रृंगार आपको उनके ना होने का आभास नहीं होने देते।

यहाँ कृष्ण की मूर्ति पश्चिम दिशा की ओर मुख कर खड़ी है जो सामान्य मापदंडों से भिन्न है। कदाचित कृष्ण उस समुद्र की ओर देख रहें हैं जिसकी लहरों के नीचे उनकी जलमग्न नगरी है।

द्वारकाधीश मंदिर समूह के मंदिर

जैसे ही आप मोक्ष द्वार से द्वारकाधीश मंदिर परिसर में प्रवेश करेंगे, अपने दाहिनी ओर इन मंदिरों को देखेंगे: –

कुशेश्वर महादेव – मोक्ष द्वार या उत्तरी द्वार से मंदिर परिसर में प्रवेश कर, मंदिर की भूमि से जब आप एक मंजिल नीचे उतरेंगे, सर्वप्रथम आप शिवलिंग युक्त यह छोटा सा मंदिर देखेंगे। जैसा कि आप जानते ही हैं, द्वारका कुशस्थली के नाम से भी जानी जाती थी। इसी को ध्यान में रखकर मैंने अनुमान लगाया कि कुशेश्वर महादेव यहाँ के पीठासीन देव होंगे। आज तक उनकी आराधना अनवरत की जा रही है।

नवग्रह यन्त्र

काशी विश्वनाथ शिवलिंग, गायत्री देवी का मंदिर और साथ ही कोल्वा भगत को समर्पित एक मंदिर, प्रवेश द्वार के दूसरी ओर हैं।

मुख्य मंदिर के चारों ओर जो मंदिर हैं, वे हैं:

अनिरुद्ध एवं प्रद्युम्न मंदिर

 ऋषि दुर्वासा का मंदिर – ये कृष्ण के कुलगुरु थे।

अम्बाजी का मंदिर – ये कृष्ण की कुलदेवी थी।

देवकी मंदिर – कृष्ण की माता देवकीजी का मंदिर द्वारकाधीश मंदिर के गर्भगृह के ठीक सामने है। मानो वे हर समय कृष्ण को निहार रही हों।

राधा कृष्ण मंदिर

बेनी महादेव, पुरुषोत्तम राय बलराम मंदिर

पटरानी महल – यह एक अलग मंदिर है जिसके मध्य एक खुला प्रांगण है। इसकी सभी भित्तियों पर छोटे छोटे मंदिर हैं जो जाम्बवती, राधिका, सरस्वती, लक्ष्मी, सत्यभामा, महालक्ष्मी नारायण एवं बाल गोपाल को समर्पित हैं।

चौथी मंजिल पर स्थित शक्ति मंदिर या छलती माता मंदिर में सामान्य जनता को जाने की अनुमति नहीं है।  

शंकराचार्य समाधि जो पादुका के रूप में है।

द्वारकाधीश मंदिर के दो द्वार

५६ सीढ़ी वाला स्वर्ग द्वार - द्वारकाधीश मंदिर
५६ सीढ़ी वाला स्वर्ग द्वार – द्वारकाधीश मंदिर

द्वारकाधीश मंदिर के दो द्वार हैं, उत्तरी द्वार जिसे मोक्ष द्वार भी कहा जाता है तथा दक्षिणी द्वार जिसे स्वर्ग द्वार कहा जाता है। यदि आप मोक्ष एवं स्वर्ग, इन दोनों शब्दों के अर्थ जानते हैं तो आप इन दोनों द्वारों को पार करते समय एक अलग ही आनंद की अनुभूति करेंगे। मृत्यु पश्चात मानव या तो जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति अथवा मोक्ष पाना चाहता है या स्वर्ग जाकर निर्मल आनंद भोगना चाहता है।

गोमती घाट से स्वर्ग द्वार के माध्यम से मंदिर जाने के लिए ५६ सीड़ियाँ हैं। कुछ मौखिक कहानियों के अनुसार यह ५६ सीड़ियाँ ५६ करोड़ यादवों का प्रतिनिधित्व करती हैं। किन्तु मुझे शंका है कि यादवों की कुल जनसँख्या कभी इतनी अधिक रही होगी?

द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर के उत्सव

द्वारकाधीश मंदिर में धार्मिक संस्कारों के दैनिक नियमों को दृढ़ता से पालन किया जाता है। आरती, दर्शन तथा भोग लगाना, यह सब समय समय पर किया जाता है। अर्थात् सर्वप्रथम भगवान् की पूजा अर्चना कर मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोले जाते हैं ताकि भक्तगण अपने इष्ट देव को प्रणाम कर सकें, उनसे अपने सुख दुःख कह सकें। समय पर भगवान् को प्रसाद का भोग भी चढ़ाया जाता है।

द्वारकाधीश मंदिर गोमती द्वारकाएक पूरे दिन में भगवान् का कई बार श्रृंगार बदला जाता है। उनके वस्त्र बदले जाते हैं, उनके आभूषण बदले जाते हैं, यहाँ तक कि मूर्ति के पीछे भित्त की सजावट भी बदली जाती है। जब भी भक्तगण उनके दर्शन करने आते हैं, हर बार उन्हें भगवान् नए रूप में दर्शन देते हैं। त्योहारों एवं अन्य विशेष दिनों में श्रृंगार और भी भव्य होता है।

द्वारकाधीश मंदिर के पण्डे चटक रंगों के जाकिट एवं धोती पहने थे। उनके जाकिट एक बाजू सिले होने के बजाय बंधे हुए थे। उनकी धोती भी तिरछे तरीके से बंधी थी। इधर उधर फिरते मुझे वे गोविंदा प्रतीत हो रहे थे।

द्वारकाधीश मंदिर का समयपत्रक

मंदिर दिन के पूर्वार्ध में प्रातः ६:३० बजे से दोपहर १ बजे तक एवं उत्तरार्ध में संध्या ५ बजे से रात्री ९:३० बजे तक खुला रहता है।

द्वारकाधीश मंदिर समयपत्रक – पूर्वार्ध

६.३० मंगल आरती – मक्खन मिश्री का प्रसाद ले जाना ना भूलें

७.०० से ८.००  मंगल दर्शन

८.०० से ९.००  अभिषेक पूजा : इस समयावधि में दर्शन बंद

९.०० से ९.३०  श्रृंगार दर्शन

९.३० से ९.४५  स्नानभोग : इस समयावधि में दर्शन बंद

९.४५ से १०.१५  श्रृंगार दर्शन

१०.१५ से १०.३०  श्रृंगारभोग : इस समयावधि में दर्शन बंद

१०.३० से १०.४५  श्रृंगार आरती

१०.४५ से ११.०५  दर्शन

११.०५ से ११.२० ग्वालभोग : इस समयावधि में दर्शन बंद

११.२० से २०.००  दर्शन

१२.०० से १२.२०  राजभोग : इस समयावधि में दर्शन बंद

१२.२० से १३.०० दर्शन

१३.०० अनोसर :   दर्शन बंद

द्वारकाधीश मंदिर समयपत्रक – उत्तरार्ध

५.०० उथाप्पन प्रथम दर्शन

५.३० से ५.४५  उथाप्पन भोग : इस समयावधि में दर्शन बंद

५.४५ से ७.१५ दर्शन

७.१५ से ७.४५  संध्या आरती

८.०० से ८.१०  शयन भोग : इस समयावधि में दर्शन बंद

८.१० से ८.३०  दर्शन

८.३० से ८.३५  शयनआरती

८.३५ से ९.००  दर्शन

९.०० से ९.२०  बंटाभोग एवं शयन : इस समयावधि में दर्शन बंद

९.२० से ९.३०  दर्शन

९.३०  मंदिर बंद

स्त्रोत – मंदिर वेब स्थल

ध्वजारोहण

द्वारकाधीश मंदिर का प्रसिद्ध ध्वजारोहण
द्वारकाधीश मंदिर का प्रसिद्ध ध्वजारोहण

आप जब भी द्वारकाधीश मंदिर को देखेंगे, आपका ध्यान शिखर के ऊपर फहराते विशाल ध्वज की ओर अवश्य जाएगा। एक और बात आपका ध्यान आकर्षित करेगी। हर बार आप एक नया ध्वज फहरते देखेंगे। जी हाँ! इस ध्वज को एक दिन में ५ बार बदला जाता है, तीन बार सुबह तथा दो बार संध्या में।

यह मात्र ध्वज बदलना नहीं है। अपितु यह एक बड़ा समारोह है। प्रत्येक नवीन ध्वज एक भिन्न परिवार द्वारा अर्पित किया जाता है। यह परिवार द्वारका के सब ब्राम्हणों को भोग लगाता है। तत्पश्चात विस्तारपूर्वक पूजा अर्चना होती है। ध्वज को अपने सर पर रख, नाचते गाते वे इसे मंदिर में लाते हैं। ध्वज भगवान् को अर्पित करने के पश्चात एक ब्राम्हण ऊपर चढ़कर ध्वज बदलता है।

जब यह ध्वज बदला जाता है, नए फहरते ध्वज के दर्शन करने दूर दूर तक सब अपने स्थान पर ही रूक जाते हैं।

आप भी द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर में ध्वज अर्पित करना चाहते हैं? तो अपनी बारी आने के लिए आपको कम से कम २ वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

ध्वजारोहण जितना महत्वपूर्ण समारोह है उसके नियम भी उतने ही पक्के हैं। यह ध्वज ५२ यार्ड अथवा ४० मीटर लम्बा होता है। जी हाँ! यह एक विशाल ध्वज है। ५२ छोटे ध्वजों को बड़े ध्वज में जोड़ा जाता है जो द्वारका के ५२ अधिकारियों तथा यादवों के ५२ उपजातियों को दर्शाता है। एक परिकल्पना के अनुसार ५२ प्रतिनिधित्व करता है १२ राशि चक्र, २७ नक्षत्र, १० दिशाएँ, सूर्य, चन्द्रमा तथा श्री कृष्ण का। एक और मान्यता के अनुसार यह ५२ द्वारों को दर्शाता जो किसी समय द्वारका में थे। आप को याद होगा, द्वारका को द्वारावती भी कहा जाता था, अर्थात् सुन्दर द्वारों की नगरी।

जहां तक ध्वज के रंग का प्रश्न है, यह काले रंग को छोड़कर कोई भी एक या एक से अधिक रंग में बना हो सकता है। इस पर सूर्य तथा चन्द्रमा के चिन्ह हैं। मंदिर के इस ध्वज को सिलकर तैयार करने के लिए यहाँ विशेष दर्जी भी होते हैं।

द्वारकाधीश मंदिर के समारोह

जन्माष्टमी – कृष्ण का जन्म विष्णु के ८ वें. अवतार के रूप में, हिन्दू पञ्चांग के ८ वें. मास के ८ वें. दिन हुआ था। द्वारकाधीश मंदिर में इन दिन सबसे बड़ा त्यौहार होता है।

होली – ब्रज भूमि में खेली जाने वाली होली की स्मृति में यहाँ भी होली का त्यौहार हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

रुक्मिणी विवाह – हिन्दू पञ्चांग के चैत्र मास  की एकादशी को कृष्ण एवं रुक्मिणी का विवाह रचाया जाता है। यह सामान्यतः मार्च के महीने में आता है। रुक्मिणी विवाह, इस मनोरंजक त्यौहार का आनंद उठाने में मैं एक दिन से चूक गयी। पर सम्पूर्ण नगरी में चारों ओर लगे हुए इस विवाह के घोषणापत्र अवश्य देखे।

अन्य समारोह जो यहाँ मनाये जाते हैं उनमें प्रमुख हैं, बसंत पंचमी, राम नवमी, अक्षय तृतीया, दीपावली, शरद पूर्णिमा, धनतेरस, तथा नववर्ष।

द्वारका के गुग्गली ब्राम्हण

द्वारका के कान्हा से दिखते गुग्गली ब्राह्मण
द्वारका के कान्हा से दिखते गुग्गली ब्राह्मण

द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर में सब धार्मिक संस्कार एवं अनुष्टान गुग्गली ब्राम्हण ही करते हैं। ऐसा माना जाता है कि श्री कृष्ण स्वयं इन ब्राम्हण परिवारों को द्वारका लेकर आये थे।

द्वारकाधीश मंदिर के भक्तगण

किसी भी सामान्य दिन में मंदिर भक्तगणों से भरा रहता है। ठीक वैसा ही जिस दिन मैंने दर्शन किया थे। पर वे इतने भी नहीं थे कि धक्का-मुक्की हो जाय अथवा आप गुम हो जाएँ। इसके विपरीत वे इतने कम भी नहीं थे कि मंदिर रिक्त प्रतीत हो। वे संख्या में इतने थे कि सम्पूर्ण मंदिर को अपने मंत्रोच्चारण, भजन गायन तथा भक्ति से सजीव कर रहे थे।

वहां मैं स्त्रियों के कई समूहों से मिली। वे देश के कोने कोने से यहाँ तीर्थ करने आयी थीं। मेरी जानकारी के अनुसार मेरी दादी ने भी इसी प्रकार से देश के सब तीर्थस्थलों की यात्रा की थी। पर उस समय मैं बहुत छोटी थी। यह समझ नहीं पायी कि दादी भी इसी प्रकार से समूह में तीर्थयात्रा कर रही थी।

अंत में यह भक्तों की भक्ति ही है जो किसी भी धार्मिक स्थल को पवित्र एवं जागृत रखती है। सामान्य से सामान्य भक्त भी यदि ह्रदय से भगवान् का स्मरण करे, तो उनकी भक्ति में इतनी शक्ति होती है कि उनके समक्ष भगवान् भी नतमस्तक होने को विवश हो जाते हैं।

कोल्वा भगत का मंदिर इसी का जीवंत उदाहरण है। कहा जाता है कि चारण जाति के होने के कारण कोल्वा भगत को मूर्ति के चरण छूने की अनुमति नहीं थी। एक दिन उसने अपने पाँव काट लिए एवं मंदिर में ही रह गया। दूसरे दिन से मंदिर के द्वारों ने खुलने से मना कर दिया। द्वार तभी खुले जब कोल्वा भगत को द्वारकाधीश मूर्ति  के चरण स्पर्श करने की अनुमति मिली। तो इस प्रकार द्वारकाधीश मंदिर परिसर के भीतर ही कोल्वा भगत का भी मंदिर बनाया गया।

जैसा कि कबीर ने पूछा – राम बड़ा कि राम का भक्त।

द्वारका स्थित द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन सम्बन्धी कुछ जानकारियाँ

  • मंदिर के भीतर छायाचित्रीकरण की अनुमति नहीं है। साथ ही किसी भी प्रकार के इलेक्ट्रोनिक उपकरण मंदिर परिसर के भीतर ले जाने की भी अनुमति नहीं है। परिसर में खिड़कियाँ उपलब्ध हैं जहां तिजोरी में आप फ़ोन व कैमरा जैसे कीमती सामान जमा करा सकते हैं।
  • द्वारकाधीश मंदिर की उपरोक्त दर्शित समय-सारिणी दृड़ता से पाली जाती है।
  • मंदिर का विस्तारपूर्वक दर्शन करने के लिए सामान्यतः ३०-४५ मिनट का समय पर्याप्त है। सही समय आपकी श्रद्धा एवं उस दिन की भीड़ पर निर्भर है।
  • मूर्ति पर तुलसी एवं गेंदे के पुष्पों के हार चढ़ाए जाते है। हार केवल मूर्ति को दिखाकर अपने साथ प्रसाद रूप में वापिस लाया जाता है।
  • सीलबंद प्रसाद के पूड़े परिसर के भीतर ही राधा कृष्ण मंदिर के पीछे स्थित खिड़की से खरीद सकते हैं।
  • भारत के अन्य तीर्थस्थलों के समान, इस मंदिर के चारों ओर भी सदियों पुरानी धर्मशालायें हैं। द्वारका नगरी से थोड़ी दूर पर नये होटल भी बांधे जा रहे हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

4 COMMENTS

  1. अनुराधा जी,अति प्राचीन भव्य द्वारकाधीश मंदिर के बारे में बहुत ही रोचक जानकारी प्राप्त हुई । मंदिर की शिल्पकारी,तत्कालिन शिल्पकारों की कारीगरी का अद्भुत नमुना हैं । मंदिर पर दिन में पांच बार विशाल ध्वज बदलने की परंपरा भी अनुठी है । मंदिर के दैनिक धार्मिक संस्कारों का निश्चित समयानुसार कडाईं से पालन करना भी अचंभित करने हेतू पर्याप्त हैं ।पठनीय रोचक जानकारी हेतू अनेकानेक धन्यवाद ।

    • प्रदीप जी, आपको जब भी समय मिले, द्वारका अवश्य जाइएगा, वहां श्रृंगार रस प्रधान है और सदा आनंद ही आनंद है.

  2. वाकई आपके इस द्वारकधीश मंदिर के आलेख को पढ़ने के बाद यह इच्छा और बलवती हो गई कि इस मंदिर के दर्शन करने जाना ही पड़ेगा।
    श्रीकृष्ण जी के इस मंदिर के बारे में आपने काफी नई और दिलचस्प जानकारी दी है जो अद्भुत है धन्यवाद

    • संजय जी, बस यही हमारा ध्येय है की हम स्वयं अपनी संस्कृति एवं सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ जाएँ और उसके रस का आनंद लें। आशा है आपको शीघ्र ही द्वारका दर्शन का आनंद प्राप्त हो ।

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