गोवर्धन परिक्रमा – वह पर्वत जिसे कृष्ण ने अपनी कनिष्ठिका पे उठाया था

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गोवर्धन पर्वत, यमुना एवं ब्रज भूमि – केवल यही तीन मूल धरोहर कृष्ण के समय से अब तक अस्तित्व में हैं। कम से कम उस नाविक की दृष्टि में तो यही सनातन सत्य है जो मुझे मथुरा में यमुना नदी पर नौका की सवारी करा रहा था। इसके पश्चात ब्रज भूमि में जिस भी पुजारी से मैंने विचार विमर्श किया, जिस भी सुशिक्षित व्यक्ति से मैंने चर्चा की, सबने यही तथ्य दोहराया। इन तीन धरोहरों को छोड़कर अन्य जो भी आप देखेंगे, सब राधा-कृष्ण के भक्तों का है। ब्रज में तो कहते हैं भक्त भी पूजनीय हैं।

गोवर्धन पर्वत शिला
गोवर्धन पर्वत शिला

गोवर्धन पर्वत एवं इस पर्वत का प्रत्येक पत्थर पवित्र है। यहाँ आपको चारों ओर इन पत्थरों की पूजा होती दिखाई देगी। कहीं इन पत्थरों को सजाया गया है, आँखें एवं अन्य श्रृंगार देकर इन्हें देवता का प्रतिरूप दिया गया है तो कहीं इन पत्थरों को अपने मूल रूप में ही पूजा जा रहा है। यहां के पुजारी आपको इन पत्थरों पर चरणों के चिन्ह, गौमाता अथवा राधा-कृष्ण की छवि दिखा देंगे। उनका विश्वास है कि ये पत्थर राधा-कृष्ण की लीलाओं के साक्षी हैं। उनके अनुसार इन पत्थरों पर राधा-कृष्ण के पदचिन्हों की छाप है। ब्रज में प्रत्येक पत्थर को राधा एवं कृष्ण का रूप माना जाता है।

ब्रजवासियों का मानना है कि इन पत्थरों को ब्रज भूमि से कभी पृथक नहीं किया जाना चाहिए। आपको यहाँ कई ऐसे लोगों की कथाएं सुनायी जायेंगी जो इन पत्थरों को ब्रज भूमि से चोरी छुपे बाहर ले गए तथा वे महाविपदाओं की बलि चढ़ गए। इन कथाओं को सुनकर मुझे प्रतीत हुआ, कदाचित परम्पराओं एवं संस्कारों द्वारा पर्यावरण का संरक्षण सर्वोत्तम पद्धति से किया जा सकता है।

गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा भक्तों में अत्यंत प्रचलित है। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने के लिए भक्तों का वर्ष भर यहाँ तांता लगा रहता है। मेरी इस ब्रज भूमि की यात्रा के समय मैंने भी गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने का निश्चय किया। यद्यपि मैंने यह परिक्रमा इ-रिक्शा में बैठकर पूर्ण की थी। अपनी इस परिक्रमा के समय जो तथ्य मुझे सर्वप्रथम ज्ञात हुआ, वह था विभिन्न प्रकार की परिक्रमाएं जो आप कर सकते हैं।

गोवर्धन पर्वत परिक्रमा के विभिन्न प्रकार

१०८ दंडवत गोवर्धन पर्वत परिक्रमा
१०८ दंडवत गोवर्धन पर्वत परिक्रमा

१. पद-परिक्रमा – पदचाप करते हुए गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करना सर्वाधिक प्रचलित एवं कदाचित सर्वाधिक सरल पद्धति है। आप किसी भी बिंदु से यह परिक्रमा आरम्भ कर सकते हैं। गोवर्धन पर्वत को अपनी दायीं ओर रखते हुए एवं घड़ी की दिशा में दक्षिणावर्त चलते हुए लौट कर आरम्भ बिंदु पर पहुँचने पर परिक्रमा पूर्ण होती है। अविरत आप यह परिक्रमा ६-८ घंटों में पूर्ण कर सकते हैं। विश्राम हेतु लिए गए पड़ाव तथा पद-भ्रमण की गति इस समयावधि में परिवर्तन कर सकते हैं।

२. दुग्ध परिक्रमा – इस परिक्रमा में भक्त अपने हाथों में दूध का घड़ा लिए हुए पैदल अथवा गाड़ी द्वारा गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं। मार्ग में वे सतत दुग्ध अर्पण करते रहते हैं। अधिकांशतः लोग अपने घड़े में एक छोटा छिद्र बना देते हैं तथा घड़े को दुग्ध से भर देते हैं। जैसे जैसे वे परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ते हैं, दुग्ध की महीन धार बहती रहती है। आप परिक्रमा पथ पर ऐसी कई धारायें देख सकते हैं।

३. सोहनी सेवा परिक्रमा – इस परिक्रमा में भक्त अपने हाथ में झाडू ले कर चलते हैं तथा परिक्रमा के साथ सफाई कार्य भी करते हैं। इस परिक्रमा का नाम में ही इसका अर्थ छुपा है। अर्थात् ऐसे परिक्रमा जो स्थल को स्वच्छ एवं सुन्दर बना दे। कितनी सुन्दर परंपरा है। दर्शन एवं आराधना के साथ साथ सम्पूर्ण स्थल भी स्वच्छ हो जाता है।

४. दंडवत परिक्रमा – दंडवत परिक्रमा का अर्थ है सम्पूर्ण देह द्वारा परिक्रमा। भक्तगण साष्टांग (स+अष्ट+अंग ) प्रणाम की मुद्रा में धरती पर लेट जाते हैं। उनके दोनों हाथ, दोनों पैर, दोनों घुटने, छाती तथा माथा ( अर्थात अष्ट अंग ) धरती का स्पर्श करते हैं। जहां उनके हाथों का अग्रभाग धरती का स्पर्श करता है, उस बिंदु को वे छोटे पत्थर से चिन्हित करते हैं। तत्पश्चात चिन्हित बिंदु पर खड़े होकर अगले साष्टांग प्रणाम की मुद्रा में धरती पर लेट जाते हैं। इस प्रकार वे अपनी परिक्रमा पूर्ण करते हैं। यह एक कठिन परिक्रमा है। जो भक्तगण इस प्रकार की परिक्रमा करते है उन्हें परिक्रमा पूर्ण करने में ८-१० दिनों का समय लगता है। साधारणतः भक्त प्रत्येक दिवस परिक्रमा का एक भाग पूर्ण करते हैं।

५. पति-पत्नी दंडवत प्रणाम – कई विवाहित जोड़े एक दूसरे के साथ दंडवत परिक्रमा करते हैं। पति पत्नी बारी बारी से साष्टांग प्रणाम करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक का श्रम आधा हो जाता है। मैंने स्वयं देखा कि जहां पति के हाथ धरती को स्पर्श करते हैं, वहां से पत्नी साष्टांग प्रणाम आरम्भ करती है तथा जहां पत्नी के हाथ धरती को स्पर्श करते हैं, वहां से पति साष्टांग प्रणाम आरम्भ करता है। इस परिक्रमा को देख कर अर्धनारीश्वर का साक्षात् आभास होता है।

६. १०८ दंडवत परिक्रमा – यह परिक्रमा आपको अचरज में डाल देगी। इस परिक्रमा में भक्त १०८ पत्थर साथ लेकर चलता है। परिक्रमा आरम्भ करने से पूर्व वह एक ही स्थान पर १०८ दंडवत प्रणाम करता है, तत्पश्चात वह उस स्थान पर खडा होता है जहां उसके हाथों ने धरती का स्पर्श किया। वहां वह एक बार फिर १०८ दंडवत प्रणाम करता है। इस प्रकार वह अपनी परिक्रमा पूर्ण करता है। यह अत्यंत ही कठिन परिक्रमा है। इस परिक्रमा में भक्तगण ५-१० मीटर प्रतिदिन से अधिक नहीं जा सकते। एक परिक्रमा सम्पूर्ण करने में वर्षों लग जाते हैं। इसका अर्थ है, भक्त अपना अधिकतम जीवन परिक्रमा को समर्पित कर देता है। आपको सहसा विश्वास नहीं हो रहा होगा। प्रत्यक्ष देखने पर ही आप इसकी कठिनता का अनुमान लगा सकते हैं। सम्पूर्ण परिक्रमा पथ पर आपको ऐसे छोटे छोटे पत्थरों के कई ढेर दिख जायेंगे। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि कई भक्तगण ऐसी परिक्रमा करते है। मैंने कई साधुओं को गोवर्धन पर्वत पर इस प्रकार की परिक्रमा करते देखा। कहाँ देखने मिलेगी ऐसी भक्ती एवं समर्पण!

गोवर्धन परिक्रमा कितनी लम्बी है?

कई मंदिरों, कुंडों तथा वृक्षवाटिकाओं के समीप से जाते गोवर्धन परिक्रमा पथ की पूर्ण लम्बाई लगभग २१ की.मी. है।

गोवर्धन पर्वत की हर शिला पूजनीय है
गोवर्धन पर्वत की हर शिला पूजनीय है

परिक्रमा पथ का अधिकाँश भाग कच्ची मिट्टी का है जिस पर चलना आसान है। चप्पल-जूतों के बिना चलना भी कष्टकारक नहीं है। सम्पूर्ण परिक्रमा पथ स्वच्छ है। परिक्रमा पथ का अधिकतर भाग चौड़ा है। केवल गाँवों के भीतर इस पथ का डामरीकरण किया गया है।

मेरे अनुभव से मैं कह सकती हूँ कि गोवर्धन परिक्रमा आपकी कल्पना से अपेक्षाकृत कही अधिक सरल है। यह उतार-चढ़ाव से रहित एक सपाट पथ है। पथ के कई भागों में आपके समक्ष यह विकल्प प्रकट हो जाता है कि आप पथ पर चलें अथवा समीप स्थित वृक्षों के झुरमुट के मध्य से जाएँ।

गोवर्धन परिक्रमा पथ

यह गोवर्धन पर्वत को घेरता एक गोलाकार पथ है। आप अपने संकल्प के अनुसार इस परिक्रमा का आरम्भ एवं समापन, पथ के किसी भी बिंदु से कर सकते है। मैंने यह परिक्रमा कैसे पूर्ण की, आपको अवश्य बताउँगी।

दानघाटी मंदिर

मथुरा से आये अधिकतर भक्त दानघाटी मंदिर से परिक्रमा आरम्भ करते हैं। मंदिर के अग्रभाग पर गोवर्धन पर्वत को छोटी उंगली, कनिष्ठिका पर उठाकर गांववासियों की प्राण रक्षा करते कृष्ण का अप्रतिम दृश्य प्रदर्शित है। मंदिर का यह भाग अपेक्षाकृत नवीन है।

ब्रज भूमि के गोवर्धन का दान घाटी मंदिर
ब्रज भूमि के गोवर्धन का दान घाटी मंदिर

दानघाटी मंदिर के नाम की व्युत्पति दान शब्द से हुई है जो बालक कृष्ण उन सब गोपिकाओं से एकत्र करते थे जिन्हें गोवर्धन पर्वत पूजने की इच्छा रहती थी। एक बार गोपिकाओं ने राधा को ही दान स्वरूप कृष्ण को सौंप दिया था।

दानघाटी मंदिर वास्तव में कई छोटे मंदिरों का एक संकुल है। एक गोवर्धन पत्थर को इस प्रकार अलंकृत किया जाता है कि वह जागृत एवं मानवी प्रतीत होता है। गोवर्धन में चहुँ ओर ऐसे ही पत्थरों की आराधना की जाती है।

लक्ष्मी नारायण मंदिर

लक्ष्मी नारायण मंदिर - गोवर्धन
लक्ष्मी नारायण मंदिर – गोवर्धन

दानघाट मंदिर के समक्ष एक अप्रतिम पाषाणी मंदिर है- लक्ष्मीनारायण मंदिर,जिसे १९०३ ई. में हाथरस के एक धनसंपन्न परिवार ने निर्मित करवाया था। पुलिस स्थानक के समीप एक छोटे से क्षेत्र को गोवर्धन पूजा के लिए निहित किया गया है जहां प्रत्येक प्रातः एवं संध्या को पूजा अर्चना की जाती है। यह अपेक्षाकृत आधुनिक वास्तु प्रतीत होती है।

मानसी गंगा

गोवर्धन गाँव के मध्य स्थित मानसी गंगा एक पवित्र जलाशय है। ऐसा कहा जाता है कि एक समय श्री कृष्ण के पालक माता पिता नन्द एवं यशोदा गंगा दर्शन के इच्छुक थे। गंगा की ओर जाते समय एक रात्रि उन्होंने गोवर्धन में पड़ाव किया। प्रातः होने से पूर्व ही कृष्ण मानसिक इच्छाशक्ति द्वारा गंगा को यहाँ ले आये थे। उसी समय से इस जलाशय का नाम मानसी गंगा पड़ा।

मानसी गंगा - गोवर्धन
मानसी गंगा – गोवर्धन

मैंने जलाशय के चारों ओर भ्रमण कर वहां के घरों एवं मंदिरों को निहारना आरम्भ किया। मानसी गंगा के चारों ओर कई छोटे बड़े मंदिर थे। कुछ मंदिरों के वृत्ताकार तोरणों के नीचे सूक्ष्म चित्रकारियाँ की हुई थीं। मानसी गंगा के चारों ओर स्थित गलियों में छोटे छोटे सुन्दर घर थे जो मुझे प्राचीन काल में ले गए थे। मैंने देखा, प्रत्येक घर, प्रत्येक मंदिर तथा प्रत्येक वृक्ष के नीचे गोवर्धन पत्थरों की पूजा अर्चना हो रही थी। जलाशय के चारों ओर स्थित सुन्दर मंदिरों ने मुझे मोहित कर लिया था।

उन में से कुछ मंदिरों का उल्लेख यहाँ कर रही हूँ:

ठाकुर हरिदेव जी महाराज मंदिर - गोवर्धन
ठाकुर हरिदेव जी महाराज मंदिर – गोवर्धन

ठाकुर हरि देव जी मंदिर – एक संकरी सी गली मुझे ठाकुर हरी देव जी के मंदिर तक ले गयी। लाल बलुआ पत्थर में निर्मित इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि इसी स्थान पर श्री कृष्ण अपनी कनिष्का पर गोवर्धन पर्वत को उठाये खड़े थे।
ब्रह्मा कुण्ड – मानसी गंगा के किनारे एक छोटा जल कुण्ड था। इसे देख ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कुछ दिन पूर्व ही इसका पुनरुद्धार किया गया था, तदनंतर इसे उपेक्षित छोड़ दिया था।

गोवर्धन के भवनों में चित्रकारी
गोवर्धन के भवनों में चित्रकारी

चक्रेश्वर महादेव मंदिर – यह मंदिर मेरी सम्पूर्ण गोवर्धन पर्वत परिक्रमा का सर्वाधिक अविस्मरणीय एवं अविश्वसनीय मंदिर था। यह एक शिव मंदिर है। इसके भीतर चक्र के आकार में ५ शिवलिंग स्थापित हैं। इसके पृष्ठ भाग में एक उत्कीर्णित शिला पर कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा पर उठाने की कथा प्रदर्शित है। इस कथा के अनुसार भारी वर्षा से गाँववासियों की रक्षा करने के लिए कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा पर उठा लिया था। सभी गाँववासियों ने पर्वत के नीचे शरण ली। किन्तु कुछ क्षण पश्चात, पर्वत को उठाने से बने गड्ढे में वर्षा का जल भरने लगा। तब भगवान् शिव चक्र के रूप में अवतरित हुए तथा सम्पूर्ण जल को बाहर निकाल दिया। यह मंदिर उसी घटना का कीर्तिगान करता है।

चक्रेश्वर महादेव मंदिर के पांच शिवलिंग
चक्रेश्वर महादेव मंदिर के पांच शिवलिंग

मुझे ५ प्राचीन शिवलिंगों द्वारा बना चक्र अत्यंत अद्भुत जान पड़ा। उसी प्रकार पृष्ठभागीय उत्कीर्णित शिला भी उतनी ही अनोखी प्रतीत हुई। शिला पर बनी छवि को मैं पूर्णतः समझ नहीं पायी, किन्तु मुझे ९ डिबियों का यन्त्र, ब्रम्हा की छवि तथा उपरी भाग में गोवर्धन पर्वत की घटना के चित्रण का स्मरण है। इनके साथ एक शंख तथा हनुमान सदृश आकृति भी थीं।

चक्रेश्वर महादेव मंदिर की शिला
चक्रेश्वर महादेव मंदिर की शिला

काले पत्थर में बनी नंदी की प्रतिमा अपने वय की व्यथा कह रही थी। चक्रेश्वर महादेव के चारों ओर देवी की पीतल में बनी प्रतिमाएं हैं।

गोवर्धन पर्वत के चारों ओर निर्मित जलकुंड

ब्रज भमि के अन्य स्थलों के समान, गोवर्धन में भी कई कुण्ड हैं। कुण्ड का अर्थ है छोटे मानव-निर्मित जलाशय। ऐसा कहा जाता है कि सम्पूर्ण ब्रज भूमि में २५० से अधिक कुण्ड हैं। इनमें से कई आप इस गोवर्धन परिक्रमा के समय देख सकते हैं। प्रत्येक कुण्ड की अपनी एक कथा है जो किसी न किसी प्रकार से कृष्ण से सम्बंध रखती है। आईये इनमें से कुछ कुण्डों की कथा मैं आपके समक्ष प्रस्तुत करती हूँ।

संकर्षण कुंड - गोवर्धन परिक्रमा पथ
संकर्षण कुंड

१. संकर्षण कुण्ड – कृष्ण के बड़े भ्राता दाऊ बलराम को संकर्षण नाम से भी पुकारा जाता है। इस कुण्ड के एक छोर पर बलराम की एक सुन्दर प्रतिमा है। प्रवेश द्वार के दोनों ओर द्वारपाल की सुन्दर प्रतिमा है। बलुआ पत्थर द्वारा निर्मित सूचना फलकों पर इस कुण्ड की कथा दर्शाई गयी है। इसके अनुसार, इस कुण्ड का सम्बन्ध पाताल लोक एवं शेष नाग से है। कुण्ड के समीप बलराम का एक छोटा सा मंदिर भी है।
२. गौरी कुण्ड – मन में कृष्ण मिलन की आस लिए, गोपिका चन्द्रावली यहाँ आकर कुण्ड की पूजा अर्चना करती थी।
३. नीप कुण्ड – यहाँ कृष्ण एवं उनके सखा दही भक्षण के लिए पलाश के पत्तों द्वारा दोने तैयार करते थे।
४. गोविन्द कुण्ड – कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा पर उठाकर इंद्र के प्रकोप से गांववासियों की रक्षा की तथा इंद्र का अभिमान नष्ट किया था। जब इंद्र को आत्मग्लानि हुई, उन्होंने कामधेनु गऊ के दूध एवं आकाशगंगा के जल से यहीं भगवान् कृष्ण का अभिषेक किया था तथा उन्हें गोविन्द नाम प्रदान किया था।
५. गन्धर्व कुण्ड – जब कृष्ण का अभिषेक किया जा रहा था, तब दिव्य गन्धर्व यहाँ उनकी स्तुति गान कर रहे थे।
६. अप्सरा कुण्ड – यहाँ दिव्य सुंदरियां एवं अप्सराएं स्नान करती थीं।

ऐरावत कुंड - गोवर्धन परिक्रमा पथ
ऐरावत कुंड – गोवर्धन परिक्रमा पथ

७. नवल कुण्ड – प्राचीनकाल में इसका नाम, पूंछरी गाँव के नाम पर पूंछ कुण्ड था। भरतपुर की रानी द्वारा इसके पुनरुद्धार के पश्चात इनका नवीन नामकरण नवल कुण्ड किया गया।
८. सुरभि कुण्ड – इंद्र द्वारा कृष्ण के अभिषेक हेतु दिव्य गऊ कामधेनु अर्थात् सुरभि ने यहाँ आकर इंद्र को दूध दिया।
९. इंद्र कुण्ड – यहाँ इंद्र ने कृष्ण की आराधना की थी।
१०. ऐरावत कुण्ड – यहीं इंद्र के वाहन ऐरावत ने, कृष्ण के अभिषेक हेतु, आकाशगंगा का जल लाया था।

रूद्र कुंड - गोवर्धन पर्वत परिक्रमा पथ
रूद्र कुंड – गोवर्धन पर्वत परिक्रमा पथ

११. रूद्र कुण्ड – यहाँ रूद्र रुपी शिव ने कृष्ण के दर्शन हेतु उनसे प्रार्थना की थी।
१२. माड़ कुण्ड अथवा उदर कुण्ड – यह माड़ समुदाय का कुण्ड है।
१३. सूरज अथवा सूखता कुण्ड
१४. बिछलुकुंड – यहाँ राधा एवं कृष्ण लुका-छुपी का खेल खेलते थे।
१५. उद्धव कुण्ड – मैंने सीधे ही मान लिया कि यह कुण्ड कृष्ण के चचेरे भाई एवं सखा उद्धव का है।
१६. ललिता कुण्ड – राधा कुण्ड के समीप स्थित इस कुण्ड का नाम राधा की कई सखियों में से एक सखी, ललिता के नाम पर रखा गया है। शाक्त समुदाय की मान्यताओं के अनुसार, ललिता सर्वशक्तिमान देवी हैं। इस कुण्ड के समीप उन्हें समर्पित एक मंदिर भी है।
१७. राधा कुण्ड एवं श्याम कुण्ड – राधा कुण्ड सर्वाधिक महत्वपूर्ण कुण्ड है क्योंकि राधा ब्रज की अधिष्ठात्री देवी हैं। राधा-श्याम कुण्ड जुड़वा कुण्ड हैं जिनके बीच एक पथ है। इस पथ के दोनों ओर पौडियां अर्थात् सीड़ियाँ बनी हुई हैं। इस पथ के नीचे श्याम कुण्ड द्वारा राधा कुण्ड का पोषण होता है।

राधा कुंड एवं श्याम कुंड
राधा कुंड एवं श्याम कुंड

ऐसा कहा जाता है कि राधा ने स्वयं अपने कंगन द्वारा राधा कुण्ड की खुदाई की थी। किन्तु कुण्ड में जल प्राप्त नहीं हुआ। जबकि कृष्ण कुण्ड में सभी पवित्र नदियों एवं सागरों का जल था। तब कृष्ण कुण्ड का यही जल राधा कुण्ड में भी भरने लगा। इन सबके पृष्ठभाग में एक सुन्दर प्रेमकथा है। इस कथा को सुनने का निर्मल आनंद राधा कुण्ड एवं कृष्ण कुण्ड के बीच स्थित संकरे पथ पर खड़े होकर ही आता है।

१८. कुसुम सरोवर – कुसुम सरोवर गोवर्धन का सर्वाधिक सुन्दर एवं सर्वोत्तम रखरखाव का जलाशय है। कुण्ड के दूसरे छोर पर छत्रियां हैं जिनकी परछाई कुण्ड के शांत जल पर पड़ती हैं तथा मनोरम व आनंददायक दृश्य उत्पन्न करती हैं। इस कुण्ड का एक राजसी एवं विनम्र आयाम भी है। मैं यहाँ दोपहर के समय थी। सूर्य देवता मेरे शीश के ठीक ऊपर, अपने पूर्ण तेज से चमक रहे थे। जल पर पड़ती किरणें कुण्ड को अप्रतिम रूप प्रदान कर रही थी।

कुसुम सरोवर
कुसुम सरोवर

राजस्थान के राजसी परिवार ने सरोवर के समक्ष एक शिवलिंग की स्थापना करवाई थी।

इन सब के बाद भी एक प्रश्न अनुत्तरित था। अंततः कुसुम नामक इस कुण्ड का किसी कुसुम अथवा पुष्प से क्या सम्बन्ध था? यह जानना अभी शेष है।

१९. चन्द्र सरोवर – यह कुण्ड मुख्य परिक्रमा मार्ग से किंचित दूरी पर है। ऐसा माना जाता है कि श्री कृष्ण की लीलाओं को निहारने के लिए चन्द्र यहीं रूक गए थे। यह स्थान दर्शन हेतु इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह १६वी. सदी के संत व कवि भक्त सूरदास का स्थान है।

कवि सूरदास की समाधि - चन्द्र सरोवर के पास
कवि सूरदास की समाधि – चन्द्र सरोवर के पास

यहाँ संत कवि सूरदास की समाधि एक छोटे मंदिर के रूप में है। आपको यहाँ आज भी उनकी रचनाएँ गाते विद्यार्थियों के स्वर सुनायी देंगे। सूरदास के इस स्थान के दर्शन कर मेरे मन मष्तिष्क में उनकी स्मृतियाँ उभर आयीं। मुझे उनकी कई रचनाएँ स्मरण हो आयीं। उनमें एक प्रसिद्ध रचना थी – मैय्या मोरी मैं नहीं माखन खायों!

गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर स्थित गाँव

गोवर्धन पर्वत पथ पर परिक्रमा करते समय आप कई गाँवों के मध्य से जायेंगे। प्रत्येक गाँव की अपनी एक कृष्ण कथा है। इनमें से कुछ कथाएँ इस प्रकार हैं-

आन्योर – यह नाथद्वार के श्रीनाथजी का मूल गाँव था। उनका मूल मंदिर एवं प्रतिमा यहाँ गोवर्धन पर्वत पर ही था। मुगल आक्रमण के समय इस मूर्ति को यहाँ से आगरा, तत्पश्चात वहाँ से उदयपुर के निकट नाथद्वार स्थानांतरित कर दिया गया था। नाथद्वार में एक लघु ब्रज सदृश स्थान है जहां श्रीनाथजी अब भी बसते हैं।

आन्योर शब्द आन + और को संयुक्त कर बना है।

श्री कृष्णजी ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा पर ७ दिवसों तक उठाये रखा था। इसके पश्चात उन्हें बहुत भूख लगी। ब्रज के निवासियों ने उनके लिए ५६ भोग बनाए। ५६ भोग की संकल्पना इन ७ दिनों से सम्बन्ध रखती है। भारतीय पञ्चांग के अनुसार एक दिवस में ८ प्रहर होते हैं। अतः श्रीकृष्ण जी ८ x ७ = ५६ प्रहर भूखे रहकर पर्वत को उठाये रखे। इसलिए ब्रज के निवासियों ने उनके लिए ५६ प्रकार के व्यंजन बनाए, एक व्यंजन प्रत्येक प्रहर के लिए। किन्तु इससे भी उनकी क्षुधा शांत नहीं हुई। वे और भोजन की मांग करते रहे। अर्थात् ब्रज भाषा में आन और। ये है आन्योर गाँव की कथा।

पूंछरी – आन्योर से ३कि.मी. की दूरी पर एक गाँव है पूंछरी। यह गाँव पूंछरी के लौठा जी के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इस नाम ने आपको भी असमंजस में डाल दिया होगा। अंततः यह लौठाजी कौन है?

पूंछरी का लौठा मंदिर - पूंछरी गाँव
पूंछरी का लौठा मंदिर – पूंछरी गाँव

लौठाजी श्री कृष्णजी के मित्र थे। बालपन में वे एक साथ कुश्ती का अभ्यास करते थे।

जब कृष्ण को ब्रज भूमि छोड़कर द्वारका जाना पड़ा, तब उन्होंने लौठाजी को भी साथ चलने का आमंत्रण दिया था। किन्तु कृष्ण के मोह में विव्हल लौठाजी ब्रज भूमि भी छोड़ना नहीं चाहते थे। उन्होंने कहा कि वे कृष्ण के द्वारका लौटकर आते तक बिना अन्न व जल के जीवन व्यतीत करेंगे। कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि बिना अन्न व जल के भी वे एक स्वस्थ जीवन व्यतीत करेंगे।

हम सब जानते हैं कि मथुरा छोड़ने के पश्चात कृष्ण कभी वापिस लौट नहीं पाए थे। लोगों का विश्वास है कि वह दिवस अवश्य आएगा जब कृष्ण अपने लौठा के लिए ब्रज वापिस आयेंगे। कृष्ण के भक्तगण लौठाजी को भी पूजते हैं। पूंछरी गाँव में उनका एक मंदिर है।

लौठाजी का मंदिर छोटा अवश्य है किन्तु यह एक अत्यंत जीवंत मंदिर है। दूर सुदूर से भक्त यहाँ आकर इच्छापूर्ति का वरदान माँगते हैं। लौठाजी की प्रतिमा एक पहलवान की प्रतिमा प्रतीत होती है जिनकी बड़ी बड़ी मूंछें हैं।

जतीपुरा – मुखारविंद – छोटा सा यह गाँव मुखारविंद मंदिर के कारण ही प्रसिद्ध है। यह एक खुला मंदिर है जहां भक्तगण एक विशाल शिला की दुग्ध अभिषेक द्वारा पूजन करते हैं। दिन के विभिन्न समय पर इस शिला का भिन्न भिन्न रूप से श्रृंगार किया जाता है। इस मंदिर की ओर जाती संकरी गली इन दुग्ध विक्रेताओं से भरी हुई है। इस शिला के ऊपर, एक मंच पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा करते कृष्ण का दृश्य उत्कीर्णित है।

जतीपुरा मुखारविंद मंदिर
जतीपुरा मुखारविंद मंदिर

जतीपुरा को यह नाम ५६ भोग का भक्षण कर रहे श्रीनाथजी की ज्योति से प्राप्त हुआ था।

मुखारविंद मंदिर के समीप, पहाडी के शिखर पर, गोपालजी मंदिर है जहां मूलतः श्रीनाथजी की मूर्ति स्थापित थी। गोवर्धन के निवासियों की मान्यता है कि नाथद्वारा की संध्या आरती के पश्चात श्रीनाथजी अब भी रात्रि में यहाँ आकर निद्रा में लीन होते हैं। इसका अर्थ है कि जतीपुरा, पहाडी के उस पार, आन्योर गाँव के दूसरे छोर पर स्थित है।

कुछ दूरी पर श्री गिरिराज दंडवती शिला है। गिरिराज पर्वत का भाग होते हुए यह अत्यंत विशेष है। इसके चारों ओर ७ परिक्रमा लगाना गोवर्धन की एक परिक्रमा के सामान माना जाता है। अतः, यदि आप २१ की.मी. की गोवर्धन परिक्रमा करने में स्वयं को किंचित असमर्थ मानते हैं तो आप गिरिराज दंडवत शिला की ७ परिक्रमा पूर्ण कर सकते हैं।

सखीतडा – यह चन्द्रावली गाँव है तथा श्री कृष्ण की सखी भी है।

गोवर्धन पर्वत का आकार

गोवर्धन के निवासी गोवर्धन पर्वत को गौमाता के आकार का बताते हैं। परिक्रमा के विभिन्न भागों को वे गौमाता के विभिन्न भागों से जोड़ कर देखते हैं। जैसे वे पूंछरी गाँव को गौमाता की पूंछ कहते हैं। कुछ इसे खड़ी गौमाता के समान बताते हैं तो कुछ के अनुसार यह पर्वत बैठी हुई गौमाता के सामान है। उसी अनुसार स्थान निरूपण में परिवर्तन कर देते हैं।

गोवर्धन पर्वत
गोवर्धन पर्वत

आप गोवर्धन पर्वत को चाहें जिस भी आकार का मानें, आप जानते हैं कि गोवर्धन पूजा अंततः गौमाता का पूजन है। कृष्ण तथा गौमाता को पृथक नहीं किया जा सकता।

मैंने कभी एक पुस्तक में पढ़ा था कि गोवर्धन पर्वत नृत्य करते हुए मोर के सामान है। जहां तक मोर का प्रश्न है, कृष्ण का सम्बन्ध उससे भी है।

गोवर्धन परिक्रमा के समय, मंदिरों एवं कुण्ड अर्थात जलाशयों के मध्य परिक्रमा पथ छोटे वनों से भी जाता है। मार्च के महीने में इन वनों के अधिकाँश वृक्ष सूख गए थे। मार्च महीने में तो स्वयं गोवर्धन पर्वत भी बड़ी बड़ी शिलाओं के ढेर के सामान प्रतीत होता है। यहाँ वहां छोटी छोटी शिलाएं एक दूसरे पर टिके दिखाई देते हैं। यह दृश्य आप अनेक पहाड़ी क्षेत्रों में बहुतायत में देखेंगे।

गिरिराज पर्वत की कथा

कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को कनिष्ठा में उठाने की कथा हम सब जानते हैं। इंद्र का गर्व तोड़ने के लिए एक समय कृष्ण ने ब्रजवासियों को उन की आराधना करने से मना कर दिया था। इस पर क्रुद्ध इंद्र ने ब्रजवासियों पर वर्षा का कहर बरपा दिया। ब्रजवासी घबराकर कृष्ण के पास सहायता माँगने पहुंचे। ब्रजवासियों को वर्षा से बचाने एवं आश्रय देने के लिए कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। ७ दिवसों तक बिना अन्न जल ग्रहण किये नन्हे कृष्ण ने पर्वत को उठाये रखा। इसे देख इंद्र का गर्व चूर चूर हो गया। उन्होंने कृष्ण की महिमा को स्वीकार किया। सम्पूर्ण ब्रज इस घटना का उत्सव ऐसे मनाता है जैसे यह कल की ही घटना हो।

हनुमान का ब्रज से सम्बन्ध

गोवर्धन पर्वत को त्रेता युग अर्थात् श्री राम के काल से जोड़ती भी एक कथा प्रचलित है। वानर सेवा को सागर पार कराने के लिए जब रामेश्वरम में राम सेतु का निर्माण कार्य आरम्भ था, तब वानर छोटे-बड़े पर्वतों को उठाकर सेतु का निर्माण कर रहे थे। हनुमान भी हिमालय से एक पर्वत उठा लाये थे।

जैसे ही सेतु निर्माण का कार्य सम्पूर्ण हुआ, सेतु के वास्तुविद नल व नील ने घोषणा की कि जिसके हाथों में जो पर्वत हो वह उसे वहीं धर दे। आपने सही समझा! हनुमान के हाथों में गोवर्धन पर्वत था तथा वे ब्रज भूमि पर खड़े थे। हनुमान ने गोवर्धन पर्वत को वहीं ब्रज भूमि पर रख दिया तथा श्री लंका की ओर प्रस्थान किया।

यह कथा गोवर्धन पर्वत को विष्णु के ७वें. तथा ८वें. अवतार, राम एवं कृष्ण से जोड़ती है। यह गोवर्धन पर्वत को और अधिक महान एवं पवित्र बनाती है क्योंकि यह विष्णु के एक नहीं बल्कि दो अवतारों से सम्बंधित करती है।

गोवर्धन परिक्रमा के नियम

• गोवर्धन पर्वत के ऊपर चढ़ने की चेष्टा ना करें।
• पदयात्रा के समय ध्यान रखें कि पर्वत आपके दाहिने ओर हो। गोवर्धन पर्वत एक पवित्र स्थल है। अतः इसे पीठ ना दिखाएँ, ना ही इससे अपने चरण स्पर्श करें।
• किसी भी जलकुंड में चरण ना धोएं। यद्यपि इन जलकुण्डों में पवित्र स्नान की अनुमति है।
• परिक्रमा के समय शांतता बनाए रखें। अनर्गल वार्तालाप में ना उलझें। स्पष्टतः परिक्रमा के समय अपने अंतर्मन पर लक्ष्य केन्द्रित करें।
• परिक्रमा का आरम्भ मंदिर में पूजा अर्चना से करें। परिक्रमा के समापन पर भी मंदिर में पूजा करें।

परिक्रमा के लिए कोमल जूते
परिक्रमा के लिए कोमल जूते

गोवर्धन पर्वत परिक्रमा के लिए कुछ यात्रा सुझाव:

• यदि आप पदयात्रा द्वारा सामान्य गोवर्धन परिक्रमा कर रहें हैं तो सुझाव है कि आप एक दिन में ही परिक्रमा समाप्त करें।
• जो भक्तगण किसी कारणवश एक ही दिन में २१ की.मी. की परिक्रमा पूर्ण नहीं कर सकते वे इसे २ अथवा ३ दिनों में बाँट देते हैं। यदि आपके पास समय तथा ऊर्जा ना हो तो आप इ-रिक्शा की सहायता ले सकते हैं। वे सम्पूर्ण परिक्रमा एक घंटे में पूर्ण करा देते हैं। साथ ही आपको सभी मंदिरों एवं अन्य महत्वपूर्ण स्थलों के भी दर्शन करा देते हैं।
• आदर्श रूप से ये परिक्रमा नंगे पाँव की जाती है। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते तो दुकानों में ५०/- रुपयों के सस्ते दाम पर मुलायम चप्पलें उपलब्ध हैं। आप इन्हें पहनकर परिक्रमा कर सकते हैं।
• सम्पूर्ण परिक्रमा पथ पर पेयजल, फलों का रस तथा खाद्य पदार्थ आसानी से उपलब्ध हैं। अतः भारी सामान उठाकर ना चलें। अपना सर ढंककर चलें क्योंकि दिन के समय सूर्य की किरणें आपकी ऊर्जा नष्ट कर सकती हैं।
• परिक्रमा का आरम्भ प्रातः करें। इस प्रकार आप अधिकतर समय तपती धूप से बच सकते हैं।
• गोवर्धन पर्वत को अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है। अतः उस पर ना चढ़ें।
• वर्तमान में गोवर्धन के आसपास कई आधुनिक अतिथिगृहों का निर्माण हो रहा है। इसलिए यदि आप गोवर्धन परिक्रमा की योजना बना रहे हैं तो गोवर्धन में ही ठहरना सुविधाजनक होगा। मथुरा यहाँ से लगभग २५कि.मी. की दूरी पर है। वृन्दावन भी यहाँ से इतनी ही दूरी पर है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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