गुवाहाटी, असम – उत्तर पूर्वीय भारत का प्रवेश द्वार

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गुवाहाटी - ब्रम्हपुत्र नदी पर सूर्यास्त
गुवाहाटी – ब्रम्हपुत्र नदी पर सूर्यास्त

गुवाहाटी या गोहाटी वैसे तो कोई खास पर्यटक स्थल नहीं है। मुझे नहीं लगता कि ज्यादातर लोग यहां पर घूमने आते होंगे, सिवाय उन तीर्थयात्रियों के जो कामाख्या मंदिर के दर्शन करने आते हैं। गुवाहाटी वास्तव में उत्तर पूर्वीय भारत के पर्यटन स्थलों का प्रवेश द्वार है। गुवाहाटी इस क्षेत्र का व्यापार केंद्र है, जिसके चलते लोग जानबूझकर या फिर अनजाने में यहां पर पहुँच ही जाते हैं।

गुवाहाटी में घूमने की जगहें               

ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पर बसा हुआ शहर  

महानदी ब्रह्मपुत्र के किनारे पर बसा हुआ गुवाहाटी भारत का एकमात्र ऐसा बड़ा शहर है जिससे होकर एक ओजस्वी और शक्तिपूर्ण नदी गुजरती है। मेरा मानना है कि यह नदी ही यहां पर आनेवाले पर्यटकों का प्रमुख आकर्षण है। आप या तो इस नदी के साथ साथ चलती सड़क पर टहलते हुए या फिर किनारे पर आराम से बैठकर वहां के जीवन का अवलोकन कर सकते हैं। वहां का पूरा माहौल हर समय सक्रिय होता है।

ब्रह्मपुत्र पर स्वर्णिम सूर्यास्त
ब्रह्मपुत्र पर स्वर्णिम सूर्यास्त

लोग अस्थायी फिल्टरों से नदी का पानी इकट्ठा करते हुए नज़र आते हैं। नदी के बीचोबीच मछुआरों की नावें तैरती हुई दिखाई देती हैं। यहां पर अनेक मंदिर हैं जिनमें भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। इसके अलावा यहां पर जल पर्यटन की नावें भी हैं जो हर शाम आपको एक उमंग भरी सैर पर ले जाती हैं। यहां से कुछ दूर नदी पर एक पुल बंधा हुआ है जो आपको नदी में स्थित एक छोटे से द्वीप पर ले जाता है, जहां पर एक सुंदर सा मंदिर है। इसके अलावा जब नदी का star कम होता है तो यहां-वहां आपको रेत के छोटे-छोटे द्वीप जैसे दिखाई देते हैं। इस सब के अलावा आप चाहें तो किनारे पर बैठकर बस नदी के शांत प्रवाह को महसूस कर सकते हैं।

एक ऐसे व्यक्ति के लिए, जो कभी भी नदी किनारे न रहा हो, नदी के किनारे पर बैठकर उसकी शांतता को सुनना बहुत ही सुखदायक लगता है। भले ही यह नदी ऊपर से शांत नज़र आती हो, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार उसकी गहराई में बहुत उथल-पुथल होती रहती है। क्या यह आपको किसी ऐसे व्यक्ति के समान नहीं लगता जो बाहर से तो बहुत शांत सा लगता है लेकिन जिसके भीतर भीषण तूफान चल रहा होता है।

कामाख्या मंदिर, गुवाहाटी  
कामाख्या मंदिर से जुड़े उपाख्यान  

कामाख्या मंदिर गुवाहाटी का सबसे प्रसिद्ध अध्याम्तिक स्थल है, जो हर किसी को अवश्य देखना चाहिए। यह मंदिर ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यह भारत में स्थित 52 शक्तिपीठों में से एक है। जब भगवान शिव देवी सती के पार्थिव शरीर को लेकर जा रहे तब उनके क्रोध को शांत करने हेतु भगवान विष्णु ने अपने चक्र से देवी सती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे उस समय देवी सती की योनि इसी स्थान पर गिरि थी।

कामख्या देवी मंदिर - कामरूप
कामख्या देवी मंदिर – कामरूप

इसी कारण यह जगह प्रजनन पंथ और तांत्रिकों द्वारा सबसे पवित्र मानी जाती है। कामाख्या का शाब्दिक अर्थ है काम की देवी। यह जगह कामरूप की भूमि के रूप में भी प्रचलित है, जिनके नाम से यह जिला आज भी जाना जाता है। माना जाता है कि यह मंदिर मूलतः ख़ासी जनजाति से संबंधित हुआ करता था, जो कामेखा नामक देवी को पूजते थे। यही नाम समय के साथ कामाख्या में परिवर्तित हुआ।

कामाख्या मंदिर के दर्शन  

कामाख्या मंदिर के दर्शन करने के पीछे मेरे बहुत से कारण थे, लेकिन फिर भी मैं वहां जाने के लिए उद्यत नहीं थी। वहां पर होनेवाली भीषण पशु हत्या का सामना करने के लिए मैं बिलकुल भी तैयार नहीं थी। इन पशुओं को बलि के रूप में देवी को चढ़ाया जाता है और यह कार्यक्रम लगभग हर रोज होता है। यह एकमात्र ऐसी जगह है जहां पर जाने का निर्णय लेने से पहले मैंने बहुत सोचा होगा।

शायद देवी माँ की अद्भुत शक्ति ही थी जो मुझे उनकी ओर खींच रही थी, जो उस अमानवीय बलि प्रथा के विकर्षण से भी अधिक प्रभावशाली थी। मुझे बताया गया था कि बलिदान की जगह मुख्य मंदिर से थोड़ी दूर है और इस प्रकार जब मैं मंदिर जाऊँगी तो मुझे उस ओर देखने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। लेकिन जो बात मुझे नहीं बताई गयी थी वो यह थी कि बलि चढ़ाने के लिए लाये गए सभी पशु मंदिर के परिसर में घूमते हुए अपनी बारी का इंतजार करते हुए नज़र आएंगे।

कहा जाता है कि जब यह मंदिर बनवाया गया था, तब देवी के चरणों में बहुत सारे मनुष्यों की बलि चढ़ाई गयी थी। वहां पर एक खास समुदाय ही था जो इस बलि प्रथा के लिए ही बना था। इन मनुष्यों की बलि चढ़ाने ने पहले उन्हें अच्छी तरह से खिलाया-पिलाया जाता था और जो भी उन्हें चाहिए होता था वह सबकुछ उन्हें दिया जाता था।

कामाख्या मंदिर – नीलाचल पहाड़ी, असम   
लज्जा गौरी - कामख्या देवी मंदिर - गुवाहाटी के निकट
लज्जा गौरी – कामख्या देवी मंदिर – गुवाहाटी के निकट

नीलाचल पहाड़ी पर स्थित यह नया मंदिर 16वी शताब्दी में कोच राजाओं द्वारा बनवाया गया था जो उस समय इस क्षेत्र पर शासन कर रहे थे। कामाख्या देवी का पुराना मंदिर यानी उनका मूल मंदिर काला पहाड़ द्वारा नष्ट किया गया था और उसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती। इस पहाड़ी पर और भी कई मंदिर हैं जो सभी दस महाविद्याओं अर्थात तांत्रिक परंपरा में पूजे जाने वाले देवी माँ के दस रूपों को समर्पित किए गए हैं।

इस मंदिर की शिखर अपने आप में अद्वितीय है जिसका आकार थोड़ा गोलाकार है, जिसमें खांचे बने हुए हैं जो शायद तांत्रिक परंपरा का ही एक भाग है। इस मंदिर की दीवारों पर विविध हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ हैं जो शिलाओं पर उत्कीर्णित हैं। जो शायद 16वी शताब्दी में किए गए मंदिर के नवीनीकरण से भी पहले की हैं।

इन सभी प्रतिमाओं में से मुझे लज्जा गौरी, जिन्हें प्रजनन की देवी माना जाता है, की प्रतिमा विशेष रूप से पसंद आयी जो कि मेरे लिए इस स्थान की प्रतिनिधि मूर्ति थी। अगर आप थोड़ा ध्यान से देखे तो आपको इस मंदिर की दीवारों पर माँ-शिशु के अनेक उत्कीर्णित चित्र दिखाई देंगे। इस पहाड़ी पर एक छोटा सा सुंदर तालाब है, जिसे सौभाग्य कुंड के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि यह तालाब इन्द्र देव ने कामाख्या देवी के लिए बनवाया था।

कामाख्या मंदिर का संग्रहालय  

कामाख्या मंदिर के पीछे ही एक संग्रहालय बनवाया जा रहा है, जहां पर सभी पुरानी वस्तुओं को रखा जाएगा जो देवी की पूजा के लिए इस्तेमाल की जाती थीं। यहां पर मंदिर के कुछ पुराने दरवाजे रखे गए हैं जो काफी प्रदर्शनीय है। एक प्रकार से ये प्रदर्शित दरवाजे आपको दरवाजों की उत्क्रांति से भी परिचित करवाते हैं।

यहां पर कुछ और भी वस्तुएं हैं, जैसे कि बर्तन और संगीत वाद्य जो विविध समारोहों में इस्तेमाल की जाती हैं। इसके अलावा यहां पर कुछ भेट वस्तुएं भी हैं जो भक्तों द्वारा दी गयी थीं। इस संग्रहालय के चारों ओर एक छोटा सा बगीचा है जिसमें बहुत सारी पत्थर की मूर्तियाँ हैं, जो मुझे लगता है कि कभी इस मंदिर का या फिर उसके परिसर का भाग रही होंगी। एक बार इस संग्रहालय का निर्माण कार्य पूर्ण होने पर वह मंदिर के पूजा-पाठ की पद्धतियों को पर्दर्शित करने का बहुत ही अच्छा माध्यम सिद्ध हो सकता है।

इस संग्रहालय के अभीक्षक के साथ मेरी बातचीत बहुत अच्छी रही। शुरू-शुरू में उनका कहना था कि सब कुछ देवी माँ के आशीर्वाद से ही होता है लेकिन बातचीत के दौरान उनके विचार कुछ अलग ही बताने लगे। वे कहने लगे कि देवी तो वैसी ही होती है जैसा हम उन्हें मानते हैं। अगर हम देवी माँ की इतनी अच्छी सेवा न करते तो क्या इतने सारे लोग उनकी पूजा करते? वह देवी इसलिए बनी है क्योंकि हम उस सम्मान और भक्ति भाव के साथ उनकी आराधना करते हैं। मेरे खयाल से यह एक चिरकालिक प्रश्न है कि, भगवान और भक्त के बीच किसने किसका निर्माण किया, जिसका उत्तर हमेशा एक दुविधा स्वरूप ही रहेगा।

उमानंदा मंदिर, ब्रह्मपुत्र नदी द्वीप     

उमानंदा मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीचोबीच स्थित विश्व के सबसे छोटे नदी द्वीप पर बसा हुआ एक सुंदर मंदिर है। इस द्वीप को पीकॉक आइलेंड यानी मयूर द्वीप भी कहा जाता है और यह नाम इस द्वीप को अंग्रेजों द्वारा दिया गया था। यद्यपि इस द्वीप का प्राचीन नाम भस्माचल था जो कि मिथकीय उपाख्यानों से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि यहीं वह स्थान है जहां पर भगवान शिव ने कामरूप को भस्म किया था।

नदी के बीचोबीच बसे इस द्वीप टापू पर इस मंदिर के अलावा और कुछ नहीं है। उमानंदा का मूल मंदिर अहोम राजाओं द्वारा बनवाया गया था, जो यहां पर आए हुए भूकंप के समय धरती में विलीन हो गया था। बाद में एक स्थानीय महाजन ने इस नए मंदिर का निर्माण किया था। यहां तक पहुँचने के लिए आपको मुख्य शहर में स्थित उमानंदा घाट से एक फेरी लेनी पड़ती है, जो लगभग 5 मिनटों में आपको इस द्वीप पर पहुँचा देती है। इस द्वीप पर जाने का यह एक मात्र रास्ता है। यहां पर आपको सिर्फ द्वीप पर जाने का शुल्क देना पड़ता है। लौटते समय आप बिना कोई शुल्क दिए किसी भी नाव से वापस आ सकते हैं, क्योंकि, जो भी व्यक्ति उस द्वीप पर जाता है उसे वापस लाना ही पड़ता है।

यहां का मुख्य मंदिर साधारण सा है, जिसके चारों ओर कामाख्या शैली के छोटे-छोटे मंदिर खड़े हैं। इस द्वीप पर एक पगडंडी बनी हुई है जो आपको पूरे द्वीप की सैर कराती है जिससे कि आप हर तरफ से इस द्वीप की सुंदरता का आनंद उठा सके। इस मंदिर के परिसर में सिर्फ दो ही दुकानें हैं, एक दुकान पर चाय, ठंड पेय और कुछ खाने की वस्तुएं बेची जाती हैं, तो दूसरी दुकान पर प्रसाद बेचा जाता है। अगर आप सुबह की पहली फेरी से, जो लगभग 10 बजे उमानंदा घाट से निकलती है, इस द्वीप पर जाए तो वहां पर मिलने वाली अधिकतर वस्तुएं आपके साथ इसी फेरी से द्वीप पर जाती हुई दिखेंगी।

यह बहुत ही सुंदर द्वीप है जिसके चारों ओर ब्रह्मपुत्र नदी बहती है और यह द्वीप टापू शांति से उसके बीच खड़ा है। यहां पर आपको हर प्रकार की नावें पानी में तैरती हुई नज़र आएँगी। वहां पर हमे पानी में तैरता हुआ एक नावघर दिखा जो अत्यंत रोचक था। वह बांस का बना एक छोटा सा मचान था जिसके ऊपर एक छोटी सी झोपड़ी खड़ी थी। यह नावघर का सबसे मूल स्वरूप हुआ करता था। यह नाव मछुआरों द्वारा मछली पकड़े के लिए इस्तेमाल की जाती थी।

गुवाहाटी के संग्रहालय  

हमने गुवाहाटी में दो मुख्य संग्रहालय देखे, जिन में से एक पारंपरिक राज्य संग्रहालय है, जहां पर प्रदर्शनीय वस्तुओं का प्रचुर संग्रहण देखने को मिलता है। तो दूसरा संग्रहालय इस शहर का नया संग्रहालय है, जहां पर लोगों द्वारा अपने दैनिक जीवन में तथा उत्सवों के दौरान प्रयुक्त विभिन्न कलाकृतियों के माध्यम से भारत के उत्तरपूर्वीय राज्यों की संस्कृति को दर्शाया गया है।

राज्य संग्रहालय, गुवाहाटी   
एक उत्कृष्ट शिल्प - गुवाहाटी संग्रहालय से
एक उत्कृष्ट शिल्प – गुवाहाटी संग्रहालय से

गुवाहाटी के राज्य संग्रहालय में असम के ग्रामीण जीवन पर आधारित एक सुंदर प्रदर्शन कक्ष है। इस कक्ष में प्रदर्शित वस्तुओं का अवलोकन करते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे आप वास्तव में किसी गाँव में घूम रहे हो। इस संग्रहालय में उत्कीर्णित लेखों से संबंधित एक खास प्रदर्शन कक्ष है, जो यहां का सबसे उल्लेखनीय कक्ष है। इस कक्ष में उत्कीर्णित शिला स्तंभ, जमीन से जुड़े अभिलेखों से युक्त ताम्र पत्र और सामान्य पांडुलिपियाँ रखी गयी हैं। यहां के मुद्रा संबंधी प्रदर्शन कक्ष में छोटे-छोटे बाण रूपी सिक्के रखे गए हैं जो नाग पंथियों द्वारा मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे। यहां पर प्रदर्शित धातु और पक्की मिट्टी से बनी वस्तुओं का संग्रहण काफी अच्छा और आकर्षक है।

श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र
शंकरदेव कला क्षेत्र में शिल्पकला का उदहारण - गुवाहाटी
शंकरदेव कला क्षेत्र में शिल्पकला का उदहारण – गुवाहाटी

गुवाहाटी का नया संग्रहालय यानी शंकरदेव कालक्षेत्र यहां के सम्मेलन केंद्र में स्थित है। इस बड़ी सी जगह के बगीचे में अनेक प्रदर्शनीय वस्तुएं रखी गयी हैं। तथा यहां का प्रवेश द्वार शिवसागर में स्थित रंग घर की प्रतिकृति है। इसके अलावा यहां पर एक बहु-मंज़िला संग्रहालय है जिसके प्रदर्शन कक्षों में बड़ी-बड़ी प्रदर्शनीय वस्तुएँ सुशोभित हैं। इस क्षेत्र और उसकी संस्कृति को समझने के लिए यह सबसे उचित जगह है। इसके अतिरिक्त गुवाहाटी के आस-पास और भी सांस्कृतिक केंद्र हैं, जैसे कि हाजो और सौलकुची जो मैं नहीं देख पायी।

ब्रह्मपुत्र नदी में समुद्री पर्यटन का आनंद     

गुवाहाटी की धार्मिक और सांस्कृतिक यात्रा के बाद अगर आपने ब्रह्मपुत्र नदी पर आयोजित समुद्री पर्यटन का आनंद नहीं लिया तो आपकी यह यात्रा अधूरी ही रहेगी। यहां पर खुले डेक वाली बड़ी-बड़ी नावें हैं, जिस में एक नृत्य मंच और डी.जे. भी होता है, जैसा की गोवा में पाया जाता है। यह नाव आपको ब्रह्मपुत्र नदी में घंटे भर की लंबी सैर के लिए ले जाती है। इस सैर के दौरान आप दूर नज़र आनेवाली गुवाहाटी की क्षितिज रेखा देख सकते हैं और अगर बादलों की अनुमति हो तो सूर्यास्त का खूबसूरत नज़ारा भी देख सकते हैं। इस पुरातन शहर में आराम करने का यह सबसे उत्तम तरीका है और आराम करते हुए आप अपने दिन भर के कार्यक्रमों का पुनर्विचार भी कर सकते हैं।

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