हिडिंबा देवी मंदिर – मनाली के डूंगरी वन विहार स्तिथ अधिष्टात्री देवी

2
264

मनाली, भारत के हिमाचल प्रदेश राज्य की पहाड़ियों का एक महत्वपूर्ण पर्वतीय स्थल, अनेक देवी-देवताओं एवं ऋषियों की भूमि रही है। हिडिंबा देवी मनाली की अधिष्ठात्री देवी हैं। मनाली के डूंगरी वन विहार में स्थित उनका मंदिर अपनी विस्तृत छत संरचना एवं धातु के छत्र के कारण अपने परिदृश्य से एकसार होते हुए भी उभर कर दिखायी पड़ता है। हिडिंबा देवी के मंदिर तक जाता संकरा मार्ग ऊंचे ऊंचे देवदार के वृक्षों से घिरा अत्यंत ही मनमोहक प्रतीत होता है।

हिडिंबा देवी से संबंधित रोचक दंतकथाएं

हिडिंबी अपने भ्राता हिडिंब के साथ हिमालय की तलहटी में स्थित वनों में निवास करती थी। इस क्षेत्र को अब हम मनाली के नाम से जानते हैं। हिडिंबी एवं हिडिंब, दोनों भाई-बहिन राक्षस कुल से संबंध रखते थे। हिडिंबी ने प्रण लिया था कि वह उसी से विवाह करेगी जो उसके भ्राता हिडिंब को पराजित कर सकेगा। इसका अर्थ हम यह लगा सकते हैं कि हिडिंबा अत्यंत शक्तिशाली वर से ही विवाह करना चाहती थी।

डूंगरी वन विहार - मनाली
डूंगरी वन विहार – मनाली

पांडव अपने वनवास के समय जब भारत के इस भाग में आए थे, तब भीम ने हिडिंब को एक द्वंद युद्ध में परास्त किया था। तत्पश्चात भीम ने हिडिंबी से विवाह किया जिससे हिडिंबी कुंती की प्रथम कुलवधू बनी। किन्तु समुदाय के नियमों एवं उसकी स्वयं की इच्छा के कारण उसने अपने वन में ही रह जाने का निश्चय किया। वे पांडवों के साथ नहीं गई। हिडिंबी ने भीम के पुत्र घटोत्कच को जन्म दिया जो कालांतर में उस वनीय क्षेत्र का राजा बना। घटोत्कच ने महाभारत युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी तथा अर्जुन के प्राणों की रक्षा की थी।

घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक महाभारत युद्ध का इकलौता साक्षी है। कृष्ण से प्राप्त वरदान के चलते ‘खाटू के बाबा श्याम’ के नाम से उसकी आराधना की जाती है।

अवश्य पढ़ें: नरेन्द्र कोहली द्वारा रचित हिडिम्बा । यह पांडवों एवं हिडिंबा के बीच हुए संवादों पर केंद्रित है जिसे एक सभ्य विश्व एवं आदिवासी संस्कृति के मध्य अंतःक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

मनाली में हिडिंबा को दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। भक्तगण दूर-सुदूर से माता के दर्शन करने आते हैं तथा अपनी व्यथा उनसे कहते हैं। उनके भक्तों का उन पर अपार विश्वास है कि वे उनके सभी कष्टों एवं दुखों को दूर करेंगी।

हिडिंबा मंदिर का इतिहास

किसी काल में यह हिडिंबा मंदिर भी एक गुफा मंदिर रहा होगा, जैसा कि पहाड़ी पर स्थित अधिकतर देवी मंदिर हैं। वर्तमान में उपस्थित यह हिडिंबा मंदिर एक गुफा के चारों ओर निर्मित है। प्रमुख देवी की छवि वास्तव में धरती से उभरती हुई एक शिला है।

हिडिम्बा देवी मंदिर - मनाली
हिडिम्बा देवी मंदिर – मनाली

मंदिर के प्रवेशद्वार के समीप लगी लकड़ी की पट्टिका पर लिखे अभिलेख के अनुसार वर्तमान मंदिर का निर्माण सन् १५५३ में राजा बहादुर सिंह ने करवाया था। इसकी संरचना मंदिर वास्तुकला की ठेठ काठकोणी शैली में की गई है जो पहाड़ी क्षेत्रों की प्रचलित शैली है। मंदिर का निर्माण करने के लिए क्रमशः शिला एवं लकड़ी की परतों को अदल-बदल कर लगाया गया है। मंदिर की छत तीन परतों की है तथा इसके शीर्ष पर पीतल धातु में निर्मित शुंडाकार शिखर है।

हिडिंबा देवी का मंदिर डूंगरी गाँव में स्थित है। इसी कारण हिडिंबा देवी को डूंगरी देवी भी कहा जाता है।

और पढ़ें: सराहन की देवी भीमाकाली

हिडिंबा देवी मंदिर के दर्शन

मैं हिमाचल प्रदेश में १५ दिवसों से सड़क भ्रमण कर रही थी जिसके अंतर्गत मैं सड़क मार्ग द्वारा हिमाचल की पर्वत शृंखलाओं में भ्रमण कर रही थी। इस धरती के कुछ सर्वाधिक जोखिम भरे मार्गों में १५ दिवस भ्रमण करने का पश्चात मैं मनाली पहुंची। कई दिवस हिमालय की बंजर शृंखलाओं की वीरानता देखने के पश्चात अंततः मुझे मनाली में भरपूर हरियाली दृष्टिगोचर हुई। ऐसा प्रतीत हुआ मानो मैं पुनः अपनी जानी-पहचानी सभ्यता में वापिस आ गई हूँ। जीवन की इस अद्वितीय जोखिमभरी यात्रा की समाप्ति के पश्चात अंततः मुझे राहत मिली। इसलिए जब मैं हिडिंबा देवी के दर्शन करने उनके मंदिर पहुंची, ऐसा लगा मानो मैं उन्हे धन्यवाद देने ही आई हूँ।

मनाली हिडिम्बा देवी मंदिर की काष्ठ कला
मनाली हिडिम्बा देवी मंदिर की काष्ठ कला

जब मैं ऊंचे ऊंचे वृक्षों के मध्य से जा रही थी, मेरे मस्तिष्क में एक विचार कौंधा। प्रकृति के समक्ष हम मानवों का सामर्थ्य कितना सूक्ष्म है। उसके समक्ष हम कितने असहाय व शक्तिहीन हैं। यहाँ तक कि हमारा अस्तित्व भी प्रकृति पर ही निर्भर है।

मैंने इससे पूर्व शिला एवं लकड़ी द्वारा निर्मित अनेक छोटे-बड़े मंदिरों के दर्शन किये हैं। यह मंदिर उस प्रकार के बड़े मंदिरों में से एक माना जाएगा। बड़े बड़े वृक्षों के मध्य यह मंदिर गर्व से खड़ा प्रतीत होता है।

काष्ठ के उत्कीर्णित द्वार

काष्ठ के मंदिर पे टंगे सींघ
काष्ठ के मंदिर पे टंगे सींघ

मंदिर के समीप पहुँचने के पश्चात सर्वप्रथम मेरे नैनों को जिसने आकर्षित किया वह था सूक्ष्मता से उत्कीर्णित लकड़ी का द्वार। इस द्वार पर देवी के विभिन्न स्वरूपों को उत्कीर्णित किया गया है। उस पर अनेक पावन चिन्ह भी बने हुए थे। उनमें मुख्यतः पूर्ण-कुम्भ, पर्णसमूह, पशु-मूर्तियाँ इत्यादि की छवियाँ हैं। महिषासुरमर्दिनी, गरुड़ पर सवार विष्णु एवं लक्ष्मी तथा नंदी पर बैठे शिव एवं पार्वती सहित अनेक देवी-देवताओं की भी छवियाँ उत्कीर्णित हैं। मेरा ध्यान हाथ जोड़े खड़े एक भक्त की छवि पर भी पड़ा। द्वार के चौखट के ऊपर गणेश एवं नवगृह उत्कीर्णित हैं।

मंदिर के इर्द गिर्द सींघ
मंदिर के इर्द गिर्द सींघ

मंदिर के भीतर आप एक विशाल शिलाखंड देखेंगे जो प्रमुख देवी का प्रतीक है। इस शिलाखंड के समीप धातु की एक छोटी मूर्ति है। एक अन्य शिलाखंड के ऊपर देवी के पदचिन्ह हैं। इसका अर्थ है कि देवी यहाँ तीन रूपों में उपस्थित है।

शिला, मूर्ति एवं चरण पादुका।

गर्भगृह के भीतर एक रस्सी लटकी हुई है जिसकी एक रोचक कथा है। प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में अपराधियों को इस रस्सी पर लटकाया जाता था तथा उनका सिर इस शिला पर पटका जाता था। अपने क्षेत्र के अपराधियों को सजा दिला कर न्याय सुनिश्चित करने में इस मंदिर की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

मंदिर से बाहर आकर हम स्वाभाविक रूप से मंदिर की परिक्रमा करने लगे। तभी मेरी दृष्टि मंदिर की भित्तियों पर लटके हुए अनेक सींगों पर पड़ी। प्रथम दृष्टि में यह मन में भय उत्पन्न कर देते हैं। कुछ समय पश्चात मुझे ज्ञात हुआ कि ये मंदिर के ही भाग हैं। ये अतीत में दी गयी पशु बलि के अवशेष हैं।

सींगों की संख्या इतनी अधिक थी कि उन पर से दृष्टी हटाने में मुझे कुछ क्षण लगे। उसके पश्चात ही मेरी दृष्टि मंदिर की समृद्ध रूप से उत्कीर्णित खिड़कियों पर पड़ी।

घटोत्कच मंदिर

हिडिंबा मंदिर के समीप उनके पुत्र घटोत्कच को समर्पित एक छोटा मंदिर है।

घटोत्कच मंदिर
घटोत्कच मंदिर

वहाँ लगा एक सूचना फलक यह जानकारी भी दे रहा था कि समीप ही कहीं बर्बरीक को भी समर्पित एक मंदिर है। किन्तु नियति ने उनसे मेरी भेंट यहाँ एवं अभी नहीं लिखी थी। अपितु कुछ वर्षों पश्चात मैं बर्बरीक से खाटू श्याम मंदिर में भेंट करने वाली थी।

हिडिंबा देवी मंदिर के उत्सव

नवरात्रि

देवी मंदिर होने के कारण स्वाभाविक ही है कि इस मंदिर का सर्वाधिक प्रमुख उत्सव नवरात्रि है। मुझे बताया गया कि देवी के उन नौ दिनों में बड़ी संख्या में भक्तगण मंदिर के चारों ओर पंक्तियों में खड़े रहते हैं। नवरात्रि के नौ दिवस यहाँ मेले जैसा वातावरण हो जाता है।

डूंगरी उत्सव

डूंगरी उत्सव वसंत पंचमी के दिन मनाया जाता है जिसे हिडिंबा की जन्मतिथि माना जाता है। यह दिवस फरवरी मास में पड़ता है जब चारों ओर विभिन्न प्रकार के पुष्पों की छटा छायी रहती है। यही उत्सव ज्येष्ठ मास के पहले दिन भी मनाया जाता है जो अंग्रेजी पंचांग के मई मास में आता है।

तीन-दिवसीय मेले में उत्सव मनाने के लिए आसपास के गांवों के निवासी अपने अपने देवी-देवताओं को सजी हुई पालकियों में बैठाकर यहाँ लाते हैं। गीत-संगीत की तान पर देवी-देवताओं की शोभायात्रा निकालते हुए उन्हे डूंगरी लाया जाता है। इन देवी-देवताओं में मुख्यतः सिमसा के कार्तिकस्वामी, पारशा के चांडाल ऋषि, अलेऊ के सृष्टि नारायण, जगतसुख के श्रीगण, सजला के विष्णु, सियाल की मालादेवी, नासोगी के शंख नारायण इत्यादि सम्मिलित हैं। उत्सव के चौथे दिवस यह मेला मनाली गाँव में स्थित मनु के मंदिर में स्थानांतरित हो जाता है। मेले में पतंग उड़ाये जाते हैं, भिन्न भिन्न खेल खेले जाते हैं तथा देवी से प्रार्थना की जाती है।

इस उत्सव को हिडिंबा देवी मेला भी कहते हैं। इंटरनेट द्वारा मुझे जानकारी प्राप्त हुई कि इस मेले का सम्पूर्ण आयोजन एवं संयोजन स्थानीय स्त्रियों द्वारा किया जाता है।

सरूहनी जात्रा

सरूहनी जात्रा अथवा बहादुर सिंह की जात्रा श्रावण मास के पहले दिन मनाया जाता है जो वर्षा ऋतु में आता है। यह उत्सव वास्तव में धान की सफल बुआई के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

शरद नवरात्रि के अंत में मनाए जाने वाले कुल्लू दशहरा में भी देवी भाग लेती है। यही नहीं, दशहरा उत्सव का आरंभ एवं अंत देवी की उपस्थिति में ही किया जाता है। देवी उत्सव के अश्व को आशीष देती हैं। कुल्लू का राजपरिवार हिडिंबा देवी को अपनी दादी मानता है। भावी राजा के राजतिलक से पूर्व राजपरिवार देवी के दर्शन करने एवं उनसे आशीर्वाद लेने यहाँ अवश्य आता है।

मंदिर में पर्यटकों के कार्यकलाप

यह मंदिर पर्यटकों में अत्यंत लोकप्रिय है। जो भी मनाली घूमने आता है वह हिडिंबा देवी के दर्शन करने अवश्य यहाँ आता है। मंदिर के आसपास के क्षेत्र को डूंगरी वन विहार कहते हैं। यहाँ अनेक याक हैं जो आपको अपनी पीठ पर बिठाकर सैर करवा सकते हैं।

मनाली का आनंद लेते पर्यटक
मनाली का आनंद लेते पर्यटक

यहाँ अनेक छायाचित्रकार घूमते रहते हैं जो आपको हिमाचल प्रदेश के स्थानीय वेशभूषा में सज्ज कर आपके छायाचित्र लेते हैं। यह मनाली की अप्रतिम स्मृति हो सकती है। यहाँ कई नवीन जोड़े घूमने आते हैं तथा हिमाचली वेशभूषा में अपने चित्र बनवाते हैं ताकि अपनी भावी पीढ़ी को दिखा सकें। कुल मिलाकर यहाँ अत्यंत आनंद भरा वातावरण रहता है।
इस मंदिर को ‘राष्ट्रीय महत्व का स्मारक’ घोषित किया गया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here