जल शक्ति – जल संसाधनों के प्रति श्रद्धा को पुनर्जीवित करने का एक प्रयास

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हमारे पूर्वजों ने सदैव हमसे यही कहा है कि प्यासे को जल पिलाने से तत्काल पुण्य की प्राप्ति होती है। सम्पूर्ण भारत में हम कहीं भी जाएँ, हमें इस परंपरा का जीवंत उदहारण दृष्टिगोचर होगा। भारत के अनेक प्रदेशों में मार्गों के किनारे मिट्टी के घड़े में जल रखा जाता है जिसे कोई भी ग्रहण कर सकता है। मध्य एवं उत्तर भारत में ग्रीष्म ऋतु में यह दृश्य अत्यंत सामान्य है। काल के साथ घड़ों का स्थान विद्युत् चालित शीत जल यंत्रों ने ले लिया है जो शीतल जल उपलब्ध कराते हैं। राजस्थान एवं मध्य प्रदेश में भरी दुपहरी की तपती धूप में भी आप सड़क के किनारे महिलाओं को बैठे देखेंगे जो प्रत्येक प्यासे जो जल शक्ति प्रदान करती हैं, अर्थात् जल पिलाती हैं। गर्मी बढ़ते ही मानव ही क्यों, हम पशु एवं पक्षियों के लिए भी बाहर जल रखते हैं।

चाँद बावड़ी - आभानेरी - राजस्थान
चाँद बावड़ी – आभानेरी – राजस्थान

शास्त्रों के अनुसार जल उन पंच तत्वों में से एक है जिनसे सृष्टि की रचना हुई है। अन्य चार हैं, पृथ्वी, आकाश, वायु एवं अग्नि। जल शक्ति अथवा जल प्रमुख पोषणकर्ता है जिसके अभाव में मानव समेत सभी जीवों का जीवन असंभव है। इसी कारण मानवों ने जब भी बस्ती बसाई, उन्होंने बसने के लिए पर्वतों से बहकर आती नदियों के तटीय  क्षेत्रों का ही चयन किया। नदी किनारे की उपजाऊ भूमि ने सदा उनका भरण-पोषण किया। इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सभी की विविध आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए नदियों में भरपूर जल विद्यमान होता था। कालांतर में बढ़ती जनसँख्या एवं औद्योगीकरण के चलते मानवों ने नित-नवीन संसाधनों की खोज में नदियों से दूर बस्ती बसाना आरम्भ किया। जल की आपूर्ति हेतु अनेक विशाल सरोवरों की संरचना की ताकि जल संसाधन प्राप्त हो सके तथा भूमिगत जल की भी भरपाई भी हो सके। भोपाल, हैदराबाद तथा बंगलुरु ऐसे ही अनेक उत्तम उदाहरणों में से हैं जो अनेक मानवनिर्मित विशाल सरोवरों से संपन्न हैं।

जल शक्ति – जल संसाधनों के प्रति मानवी श्रद्धा को पुनर्जीवित करना

भारतीय परम्पराओं व संस्कारों में उन सभी तत्वों को देवता माना जाता है जो हमारा पोषण करते हैं। उनके प्रति श्रद्धा व सम्मान की भावना रखी जाती है। उन्ही पोषक तत्वों में एक है, जल। इन्ही परम्पराओं के अंतर्गत जल के प्रत्येक स्त्रोत की आराधना की जाती है तथा उसे जल शक्ति कहा जाता है। जल के ये प्राकृतिक स्त्रोत हैं, समुद्र, नदियाँ, जलाशय, कुँए, मानव निर्मित बावड़ियां तथा मंदिरों के जलकुंड इत्यादि। जल की आराधना वैदिक काल से चली आ रही है। ऋग्वेद में उपस्थित नदी स्तुति स्तोत्र में उन सभी नदियों का उल्लेख है जो भरत की भूमि का पोषण करती हैं। जैसे गंगा, यमुना, शताद्री (सतलज), सरसुती (सरस्वती), असिक्नी (चेनाब), परुष्णी (रावी), वितस्ता (झेलम) तथा अनेक अन्य नदियाँ जो अब लुप्त हो चुकी हैं। सभी प्रमुख नदियों की स्वयं की स्तुतियाँ हैं जो उनकी आराधना करते समय गाई जाती हैं।

दूधसागर जलप्रपात गोवा
दूधसागर जलप्रपात गोवा

किन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है कि जल-संपन्न परंपरा द्वारा हमने जिन जल शक्तियों की आराधना की, आज उनका जल तीव्र गति से घट रहा है। नदी किनारे स्थित औद्योगिक इकाईयों द्वारा अनियंत्रित रूप से निस्सारण किये गए विषाक्त अवशेषों के कारण नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं। नगरों के अनियंत्रित निस्सारण भी उन्हें दूषित कर रहे हैं। ग्रीष्म ऋतु में यह समस्या अपनी चरम सीमा पर होती है. यह सत्य है कि पर्वतीय राज्य मेघालय के चेरापूंजी एवं मौसिनराम को धरती का सर्वाधिक नम स्थान माना जाता है क्योंकि यहाँ सर्वाधिक मात्रा में वर्षा होती है। किन्तु ग्रीष्म ऋतु में ऐसे स्थानों को भी जल का अभाव सहन करना पड़ता है।

अनियंत्रित उपयोग एवं दोषपूर्ण नीतियों के कारण सम्पूर्ण भारत में भूमिगत जल का स्तर शीघ्रता से घट रहा है। वहीं, घनी आबादी वाले नगरीय क्षेत्रों में उनका स्तर भयावह रूप से कम हो गया है। भूमिगत जल के संरक्षण एवं पुनःपूर्ति की ओर भी अब तक आवश्यक प्रयास नहीं किये गए थे। बंगलुरु जैसे महानगरों के विषय में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वह दिन दूर नहीं है, जब वे शीघ्र ही जल विहीन हो जायेंगे। PARI (People’s Archive of Rural India) के संस्थापक सम्पादक पी साईनाथ कहते हैं कि सन् १९५१ में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता ५१७७ घनमीटर थी जो अनवरत घटते हुए सन् २०११ में लगभग ३३०० घनमीटर हो गयी है। वे नदी के जल को छोटे जमींदार किसानों से उद्योगों एवं नगरी क्षेत्रों की ओर निर्देशित करना ही इसका प्रमुख कारण मानते हैं।

जल को वस्तु मानना – एक भारी चूक

जल संकट के अनेक मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। उनमें कुछ हैं, जल को वस्तु मानना तथा उससे हमारे संबंधों का विच्छेद होना। नगरी क्षेत्रों में जल की आपूर्ति नलों द्वारा की जाती है। यहाँ तक कि अधिकाँश ग्रामीण क्षेत्रों में भी अब नलकूप के साथ साथ नलों द्वारा जल की आपूर्ति की जाती है। इसका विपरीत प्रभाव हम पर यह पड़ा है कि ये जल कहाँ से आ रहा है, ना तो हम जानते हैं, ना ही जानने की चेष्टा करते हैं। मानवों एवं जल स्त्रोतों के मध्य किसी प्रकार का आध्यात्मिक सम्बन्ध अब शेष नहीं रह गया है। भारत वह राष्ट्र है जहां के पूर्वज अपने दिन का आरम्भ अपने आसपास के जल स्त्रोतों एवं दूर-सुदूर की नदियों की स्तुति से करते थे। विभिन्न जल स्त्रोतों के प्रति प्रत्येक भारतीय के हृदय में श्रद्धा व सम्मान का भाव विद्यमान रहता था। ‘गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥’ जैसे मंत्रों द्वारा पवित्र नदियों का आह्वान करते हुए वे स्नान करते थे। वही राष्ट्र अब ऐसे दिवस का साक्षी है जहां जल को एक वस्तु माना जा रहा है। जल को क्रय कर पिया जा रहा है। जिस धरती के ऐसे संस्कार थे जहां प्यासे को जल पिलाना सर्वोत्तम पुण्य माना जाता था, अब उसी धरती पर विक्रेता पेयजल की विक्री करते हैं। उनकी स्वयं की धरती के गर्भ से जल खींच कर, बोतलों में भरकर ग्राहकों तक पहुँचाया जाता है। वह भी ऐसी प्लास्टिक की बोतलों में, जो कभी विघटित नहीं होती हैं तथा उसी धरती माँ को वर्षों प्रदूषित करती रहती हैं।

अब समय आ गया है कि हम जल के साथ हमारे सम्बन्ध को जाने व समझें। हम इस संबध की पुनः रचना करें, पुनर्स्थापना करें, उसे महत्त्व दें तथा पोषित करें। अपने पूर्वजों के मार्ग पर चलते हुए जल स्त्रोतों को सहेजें, उनकी आराधना करें तथा उनके प्रति कृतज्ञ होयें।

अभय मिश्रा, लेखक एवं शोधकर्ता (Riverine Culture Scholar) इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली, इस विचार का समर्थन करते हैं कि नलों द्वारा जल आपूर्ति ने हमें हमारे जल स्त्रोतों से पृथक कर दिया है। वही जल स्त्रोत, जिनका प्रबंधन एक काल में सामूहिक रूप से हमारा समाज ही करता था। वे हमारे परिवारिक एवं सामाजिक अनुष्ठानों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका का स्मरण कराते हैं। वे कहते हैं कि हमारा पोषण करने के लिए हमने इन जल स्त्रोतों का आभार मानना भी विस्मृत कर दिया है। वे सौरभ सिंह के प्रयासों की प्रशंसा करते हैं जो गाजीपुर में पेयजल की आपूर्ति के लिए कुओं को पुनर्जीवित करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। वहां के भूमिगत जल में विषैले आर्सेनिक तत्वों की उपस्थिति जैसे गंभीर समस्याओं का निवारण करने में भी उनके प्रयास अत्यंत कारगर सिद्ध हो रहे हैं। यह समस्या खेतों में आवश्यकता से कहीं अधिक जलकूप खोदने के कारण उपस्थित हुई है। खेतों में छिड़के गए विषैले कीटनाशक इत्यादि जल स्त्रोतों को प्रदूषित कर देते हैं। वे हलमा का उदहारण देते हैं, जो आम समस्याओं के निवारण हेतु एक सामाजिक प्रयास है। इसका प्रबंधन मध्य भारत के झाबुआ में स्थित आदिवासी क्षेत्र की शिवगंगा समिति करती है।

जल शक्ति का संचयन

मध्य प्रदेश में झाबुआ जिले का भूमिगत जल स्तर अत्यंत निम्न स्तर पर पहुँच गया था। अतः जल सहेजने हेतु गांव वासियों ने हाथीपावा की पहाड़ी पर एक विशाल जन अभियान चलाया। सप्ताह में एक दिवस सैकड़ों की संख्या में गांव वासी हाथीपावा की पहाड़ी पर एकत्र होते हैं तथा सामूहिक श्रमदान करते हैं। इस प्रकार उन्होंने पहाड़ी पर ३०,००० खंदक खोदे हैं जिसमें वर्षा का जल एकत्र होता है, जो अन्यथा बह जाता था। प्रत्येक खंदक लगभग दो मीटर लम्बा, एक मीटर चौड़ा तथा आधा मीटर गहरा है। ये खंदक वर्षा के जल का संचय करते हैं तथा उन्हें सही दिशा देते हैं जिससे इस क्षेत्र की जल उपलब्धता में बढ़ोतरी हो सके तथा जैव विविधता एवं पर्यावरण में सुधार हो सके। यह विशाल कार्य न्यूनतम लागत में सामूहिक प्रयास द्वारा संभव हो पाया है। इसी प्रकार के क्रियाकलाप देश के अन्य भागों में भी लघु स्तर पर किये जा रहे हैं। आशा है, शीघ्र ही इस प्रकार की जल स्त्रोत पुनरुद्धार गतिविधियाँ देश के सभी क्षेत्रों में विशाल स्तर पर किये जायेंगे। इसके द्वारा जल प्रबंधन एवं जल उपभोग के मध्य अतिआवश्यक संतुलन पुनः प्राप्त किया जा सके। इन प्रयासों को सफल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने पुरातनकाल में झाँक कर भारत के जल धरोहर को जानें व समझें।

जल प्रधान भारत

भारत एक जल प्रधान देश है। भारत को ना केवल तीन महासागरों एवं ७५१७ किलोमीटर लम्बे समुद्रतट का वरदान है, अपितु इसके सम्पूर्ण परिदृश्य पर नदियों का जाल बिछा हुआ है जो भिन्न भिन्न पर्वतों से निकल कर मैदानी क्षेत्रों का पोषण करते हुए अंततः समुद्र में समा जाती हैं। ये नदियाँ देश की शिराएँ हैं जो जल रूपी पोषक तत्व को देश के विभिन्न भागों में पहुँचाती हैं। सैकड़ों जलप्रपातों की जलधाराएं विभिन्न शैलप्रदेशों से होते हुए इन नदियों में आ कर समा जाती हैं। भारत की जल धरोहरों का उल्लेख पुराणों में भी किया गया है। पौराणिक काल से भारत को सात नदियों का प्रदेश कहा जाता है। प्रत्येक प्रमुख हिन्दू धार्मिक अनुष्ठानों से पूर्व इन सातों नदियों का आह्वान किया जाता है। विस्तृत स्तर पर देखा जाए तो भारत के प्रत्येक क्षेत्र में इतनी संख्या में नदियाँ तथा नदी-घाटी सभ्यताएँ हैं कि भारत को ‘सैकड़ों नदियों की भूमि’ कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

भारतीय नदियाँ – हमारी जल शक्ति

वाराणसी में गंगा
वाराणसी में गंगा

नदियाँ हमारी जीवनदायिनी हैं। प्रकृति का अभिन्न अंग हैं। वे हमारी जल शक्ति हैं। सम्पूर्ण विश्व में नदियों को सभ्यता का पालना कहा जाता है। इन नदियों से ही मानव का विकास जुड़ा हुआ है। हमारी अधिकतम आवश्यकताएं भी इन्हीं नदियों से पूर्ण होती हैं। अतः विश्व व भारत के अधिकतर नगर इन नदियों के किनारे ही बसे हैं। भारत के प्रत्येक नदी के तट पर प्रसिद्ध नगर तथा तीर्थस्थल बसे हुए हैं। इनमें से कुछ प्रसिद्ध स्थल हैं, यमुना नदी के तट पर मथुरा, क्षिप्रा नदी के तट पर उज्जैन, गोमती नदी के तट पर द्वारका, गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रयागराज, तुंगभद्र नदी के तट पर हम्पी, गोदावरी नदी के तट पर नासिक, सरयू नदी के तट पर अयोध्या, मन्दाकिनी नदी के निकट केदारनाथ, अलखनंदा नदी के निकट बद्रीनाथ इत्यादि। हिमालय से उतर कर मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती गंगा के किनारे हरिद्वार एवं काशी बसे हुए हैं। कावेरी नदी दक्षिण भारत के कुर्ग अथवा कोडगु के पर्वतों से प्रस्फुटित होती है। तत्पश्चात कर्णाटक एवं तमिलनाडु का पोषण करती हुई पूर्व की ओर बहती है तथा बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।

ब्रह्मपुत्र उस स्थान से निकलती है जहाँ कभी ब्रह्मा के पुत्र थे, जो इसे एक नद बनता है। पुराणों के अनुसार नदियाँ देवी का स्वरुप हैं जो की धरती पर द्रव्य रूप में रहती हैं। इन्द्रलोक की सुप्रसिद्ध सुंदरियाँ भी जल से अवतरित होती है इसि लिए उन्हें अप्सरा कहा जाता है, अप यानि जल।

वर्षा – जल शक्ति का स्त्रोत

पुरातन काल से जल के प्रति भारतीयों की श्रद्धा केवल नदियों, जलाशयों तथा सागरों के प्रति ही नहीं है, अपितु धरती को अपने प्रेम से सराबोर करती वर्षा की एक एक बूँद तक जाती है। ग्रीष्म ऋतु की चरम सीमा तक पहुँचते पहुँचते धरतीवासी आकाश की ओर आस से ताकना आरम्भ कर देते हैं कि कब आकाश में मेघ छाएंगे तथा वर्षा का सन्देश लायेंगे। कृषि प्रधान विकासशील राष्ट्र होने के कारण भारत की अर्थव्यवस्था का चक्र वर्षा पर निर्भर करता है। अतः चातुर्मास के चार मास में यदि भरपूर वर्षा हो जाए तो भारतीयों के लिए, विशेष रूप से किसानों के लिए इससे प्रसन्नता का विषय अन्य नहीं हो सकता है।

लदाख में आधी जमी हुई जांसकर नदी
लदाख में आधी जमी हुई जांसकर नदी

मानसून के लिए संस्कृत भाषा में शव्द है, वर्षा। मानसून मूलतः हिन्द महासागर एवं अरब सागर की ओर से भारत के दक्षिण-पश्चिम तट पर आने वाली वायु को कहते हैं जो भारत में अधिकाँश वर्षा के लिए उत्तरदायी होती हैं। ये मौसमी वायु है जो दक्षिण एशिया क्षेत्र में जून से सितम्बर तक प्रायः चार मास तक सक्रिय रहती है। मानसून का व्यापक अर्थ है, ऐसी वायु जो किसी क्षेत्र में किसी ऋतु विशेष में ही अधिकाँश वर्षा कराती है।  भारत के छः ऋतुकाल में से एक काल वर्षाकाल है। मानसून की वायु जून मास में भारत के दक्षिण-पश्चिम तट से प्रवेश कर ऊपरी दिशा की ओर अग्रसर होती है।

राजस्थान एवं लद्धाख जैसे उष्ण एवं शीत मरुभूमि को क्वचित ही वर्षा के दर्शन होते हैं। वहीं तटीय क्षेत्रों में सामान्यतः ३००० मिलीमीटर प्रतिवर्ष तक वर्षा हो जाती है। भारत के आर्द्रतम स्थल मौसिंराम में औसतन १४००० मिलीमीटर प्रतिवर्ष तक वर्षा हो जाती है। मानसून में गाये जाने वाले ‘कजरी’ जैसे लोकगीत वर्षा के प्रति आस्था एवं कृतज्ञता की भावनाओं से ओतप्रोत होते हैं। कालीदास ने अपने काव्य संग्रह ऋतुसंहारम् में मानसून को ललक एवं तृष्णा का मौसम वर्णित किया है।

वर्षा-जल का संग्रहण व संरक्षण

अनुपम मिश्रा वर्षा-जल संग्रहण एवं संरक्षण के अग्रणी अन्वेषकों में से एक हैं। अनेक पारंपरिक जल संरक्षक तकनीकों के पुनरुद्धार का श्रेय उन्हें दिया जाता है। उनकी प्रतिलिप्याधिकार-मुक्त पुस्तक ‘Ponds are still relevant’ में वे भारत के विभिन्न क्षेत्रों के जल स्त्रोतों के पारिस्थितिकी तंत्र के विषय में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं। वे बताते हैं कि किस प्रकार प्राचीनकाल से भारतवासियों ने उपयुक्त समय व स्थान पर सरोवरों का निर्माण किया तथा समाज के सभी वर्गों के सहयोग से किस प्रकार उन्होंने वर्षानुवर्ष उनका रखरखाव किया। जैसलमेर जैसे अल्प वर्षा वाले मरु नगरों में प्रत्येक घर की छत को जल संचयन प्रणाली से जोड़ा गया तथा प्रत्येक कुँए में जल संचय किया गया, जबकि वहां ५२ अप्रतिम जलाशय हैं। प्राचीनकाल से वर्षा-जल के संचयन हेतु किये गए अनेक प्रयासों के कुछ उदहारण हैं,

बावड़ियां

सम्पूर्ण भारत में अनेक अप्रतिम प्राचीन बावड़ियां हैं जो वर्षा-जल का संचयन करने में अग्रणी है। उनमें से अधिकतर बावड़ियां राजस्थान एवं गुजरात जैसे उत्तर-पश्चिमी सूखे राज्यों में स्थित हैं। वे एक प्रकार से मानव-निर्मित मरूद्यान हैं। उनका उद्देश्य ना केवल जल संचयन है अपितु वे ऐसे सामाजिक स्थलों का कार्य करते हैं जहां जल के समीप बैठकर लोग आनंद लेते हुए वार्तालाप करते हैं। ये बावड़ियां एक प्रकार से भगवान विष्णु को समर्पित मंदिर का प्रतीक होती हैं जिन्हें क्षीरसागर के जल में विश्राम करना प्रिय है।

रानी की वाव
रानी की वाव

११वीं सदी में निर्मित रानी की वाव की संरचना सोलंकी वंश की रानी उदयमती ने करवाया था। यह भूमि से नीचे की ओर जाती हुई सात तलों की संरचना है। इसके चारों ओर अलंकृत भित्तियाँ एवं चबूतरे हैं। जब आप ऊपर से इसे देखेंगे तो यह भूमि में खोदे गए एक विशाल कुँए जैसा प्रतीत होती है। यह देख आपको अत्यंत आश्चर्य होगा कि इतने वर्षों के पश्चात भी इसकी भित्तियाँ अखंडित खड़ी हैं। इसके मंडप को केवल २९२ स्तम्भ ही आधार प्रदान कर रहे हैं। इस विशालकाय बावड़ी के भीतर प्रवेश करने पर इसका भव्यतम रूप शनैः शनैः प्रकट होने लगता है। नीचे १० मीटर व्यास का एक कुआं है जो लगभग ३०० मीटर गहरा है तथा समीप स्थित सरस्वती नदी से भूमिगत रूप से जुड़ा हुआ है। आप सोच रहे होंगे कि रानी द्वारा अपने दिवंगत पति की स्मृति में इस बावडी की संरचना हेतु क्या प्रेरणा रही होगी? इसका उत्तर है, पुण्य। अपनी प्रजा के लिए प्रचुर मात्रा में जल उपलब्धि सुनिश्चित करने से अधिक पुण्य क्या हो सकता है?

जयपुर के आभानेरी में चाँद-बावडी है जो अपनी समरूपता के लिए प्रसिद्ध है। इसे सर्वाधिक छायाचित्र अनुकूल बावड़ियों में से एक माना जाता है। इसमें ३५०० से भी अधिक तालबद्ध ज्यामितीय तिरछी सीढ़ियाँ हैं जो यह सुनिश्चित करती हैं कि आप किसी भी समय अथवा ऋतु में बावड़ी के जल तक पहुँच सकते हैं।

बाढ़ जल प्रबंधन

प्रयागराज के निकट श्रिंगवेरपुर में जलकुण्डों को जोड़ती एक प्राचीन विस्तृत संरचना है जो वर्षा ऋतु में बाढ़ की स्थिति में गंगा के जल को एकत्र करती थी तथा अतिरिक्त जल को पुनः गंगा में प्रवाहित करती थी। ये जलकुंड ना केवल जल एकत्र करते थे, अपितु अवसादन प्रक्रिया द्वारा जल का शुद्धिकरण भी करते थे। अंतिम जलकुंड में सर्वाधिक शुद्ध जल एकत्र होता था।

ढोलावीरा जैसे पुरातात्विक स्थलों में विस्तृत जल प्रबंधन प्रणालियाँ दृष्टिगोचर होते हैं। उनका सम्बन्ध ८वीं शताब्दी की सिन्धु सरस्वती नदी घाटी सभ्यता से लगाया जाता है। मुंबई नगर के बीचोबीच कान्हेरी जैसे २००० वर्ष प्राचीन बौद्ध गुफाएं भी प्राचीनकालीन उत्तम जल प्रबंधन का साक्ष्य देती  हैं। आप उन उत्खनित गुफाओं में चारों ओर जल नलिकाएं देख सकते हैं। नियमित अंतराल पर परस्पर जुड़े हुए जलकुंड हैं। चट्टानों के प्राकृतिक ढलान का उपयोग करते हुए गुफाओं की छतों पर गिरते जल को एकत्र किया जाता था। चार मास में एकत्रित मानसून जल बौद्ध भिक्षुओं के वर्ष भर की जल आवश्यकताओं की पूर्ती करने में सक्षम होता था।

गाँव के जलाशय

भारत के पूर्वी राज्य ओडिशा में जब आप किसी ग्रामीण भाग की ओर वाहन चलाते हैं, तब विशाल जलाशयों की पंक्ति को देखते ही आप समझ सकते हैं कि आप गाँव के समीप पहुँच रहे हैं। बहुधा इन जलाशयों के मध्य अथवा तट पर छोटे सुन्दर मंदिर हैं। उसी प्रकार भारत के अनेक राज्यों में जलाशयों की उपस्थिति दृष्टिगोचर होती है। अधिकतर जलाशय कमल पुष्पों से भरे होते हैं जिनके चौड़े पत्ते जल सतह को ढँक लेते हैं ताकि जल वाष्पीकरण निम्नतम हो।

मंदिर के जलकुंड

मुंबई का प्राचीन बाणगंगा कुंड
मुंबई का प्राचीन बाणगंगा कुंड

प्राचीन भारत के सभी मंदिर परिसरों में कम से कम एक जलकुंड अवश्य होता था। स्कन्द पुराण का अयोध्या महात्मय अयोध्या नगरी का मानचित्र प्रदर्शित करता है जिसमें चिरकालीन सरयू नदी के तट पर बसे होने के पश्चात भी उसमें परस्पर जुड़े हुए अनेक जलकुंड थे। दक्षिण भारत की प्राचीन मंदिर नगरी कांचीपुरम जलकुण्डों से भरा हुआ है जिनमें कुछ मंदिर परिसर के भीतर तथा कुछ बाह्यस्थल पर स्थित हैं। नगरी के मधोमध सर्व तीर्थं कुलम् है जो एक विशाल जलकुंड है। इसके तीन ओर मंदिर हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि प्राचीनकाल में ऐसे संपन्न स्थल पर स्थानिक एवं तीर्थयात्री परस्पर भेंट करते हुए अपने विचारों व अनुभवों का आदान-प्रदान करते रहे होंगे।

तमिलनाडु के मंदिरों के जलकुण्डों का नवीनीकरण आशा की किरण दिखाता है। वहां के भूमिगत जल संचय के स्तर में उन्नति इसका त्वरित प्रभाव दर्शाता है। यदि इन जलकुण्डों में जल प्रवेश एवं निकास द्वारों को सुनियंत्रित किया जाए तो वर्षा-जल का पर्याप्त मात्रा में भूमि में रिसना सुनिश्चित हो सकता है।

जल संरक्षण – जल शक्ति के प्रति श्रद्धा

मांडू का जल महल
मांडू का जल महल

जल संरक्षण का सर्वोत्तम उदहारण मध्य प्रदेश के मांडू में दृष्टिगोचर होता है। मध्यप्रदेश के एक ऊंचे सपाट पठार पर स्थित मांडू एक प्राचीन नगरी है जो प्राचीन काल में जल के लिए केवल वर्षा पर निर्भर था। इसके शीर्ष से धुंधली सी दृष्टिगोचर नर्मदा नदी, निकटतम नदी है किन्तु वह यहाँ से लगभग ४० मील दूर स्थित है। प्राचीनकाल में यह नगरी विश्व की सर्वाधिक सघन आबादी वाले क्षेत्रों में से एक थी। इसके पश्चात भी ऐसा माना जाता है कि मांडू में कभी भी जल का अभाव नहीं था। जब आप मांडू में विचरण करेंगे तो आप पायेंगे कि सम्पूर्ण मांडू क्षेत्र में अनेक सरोवर हैं जो वर्षा के जल का संचयन करते हैं। सभी राजसी भवनों की संरचनाएं गहरे कुओं के चारों ओर की गयी हैं जो वर्षा की प्रत्येक बूँद को संचित करते हैं। आपको इन महलों की छतों पर भव्य तरणताल दृष्टिगोचर होंगे। यहाँ के एक महल का नाम ही जलमहल है। इसके दोनों ओर विशाल सरोवर हैं जिनके मध्य यह महल ऐसा प्रतीत होता है मानो जल सतह पर कोई विशाल नौका अथवा जहाज तैर रहा हो। सम्पूर्ण मांडू नगरी जल संचयन व जल संरक्षण के ध्येय पर निर्मित की गयी है।

जल शक्ति की आराधना

ओम्कारेश्वर में नर्मदा तट
ओम्कारेश्वर में नर्मदा तट

भारत में सभी तीर्थयात्राओं का समापन वहां स्थित पवित्र जल में स्नान के पश्चात ही होता है। क्या काशी की तीर्थयात्रा गंगा के जल में डुबकी लगाने से पूर्व सम्पूर्ण हो सकता है? काशी की प्रसिद्ध पंचक्रोशी यात्रा का शुभारम्भ एवं समापन दोनों ही मणिकर्णिका घाट से व मणिकर्णिका घाट तक गंगा में नौकायन द्वारा ही होता है। भारत की प्राचीनतम नदी, नर्मदा की आराधना का सर्वोत्तम साधन नर्मदा परिक्रमा है। तीर्थयात्री पैदल चलते हुए नर्मदा की परिक्रमा करते हैं। प्रत्येक प्रातः नर्मदा के जल में स्नान करते हैं। इस परिक्रमा की २६०० किलोमीटर से भी अधिक दूरी पार करने के लिए महीनों, कभी कभी वर्षों व्यतीत हो जाते हैं। वे मंदिरों एवं आश्रमों में रात्रि व्यतीत करते हैं। जो उन्हें भाग्य से प्राप्त हो जाए वही भोजन करते हैं।

कुम्भ मेला

अब हम पहुंचते हैं, जल शक्ति के सर्वाधिक विशाल पर्व, कुम्भ मेले में। कुम्भ मेला भारत के चार स्थानों पर प्रत्येक १२ वर्षों में एक बार आयोजित किया जाता है। इस पर्व में उन स्थानों के पावन जल में कुम्भ स्नान किया जाता है। जैसे, प्रयाग में गंगा, यमुना व सरस्वती नदियों का संगम, हरिद्वार में गंगा नदी, उज्जैन में क्षिप्रा नदी तथा नासिक में गोदावरी नदी। हिन्दुओं का जल से सम्बंधित यह विशालतम पर्व होता है। भारत भर से, यहाँ तक कि विदेशों से भी, लाखों की संख्या में तीर्थयात्री ग्रहों की विशेष युति में इन स्थानों पर जाते हैं तथा जल में पावन स्नान करते हैं। यद्यपि कुम्भ में आप सत्संग, संतों से संवाद, ज्ञानवर्धक चर्चाओं जैसी अनेक गतिविधियाँ कर सकते हैं, तथापि कुम्भ मेले की सर्वोपरि आवश्यकता है कि आप नदी के दर्शन करें, उसके प्रति कृतज्ञता दर्शाये, उसकी आराधना करें, जितना हो सके उसके पावित्र्य व अस्तित्व को चिरायु रखने का प्रण करें। उसके पावन जल में स्नान करें।

गंगा यमुना के संगम में डुबकी लगाते श्रद्धालु
गंगा यमुना के संगम में डुबकी लगाते श्रद्धालु

यद्यपि प्रत्येक स्थान पर कुम्भ मेला १२ वर्षों में एक बार आयोजित होता है तथापि पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में कुछ विशेष तिथियाँ होती हैं जिन्हें पावन नदियों में स्नान के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। जैसे जनवरी में आने वाला माघ मास तथा कार्तिक मास की पूर्णिमा जो दीपावली पर्व के १५ दिवसों पश्चात पड़ती है। सूर्य ग्रहण जैसे कुछ विशेष अवसरों पर भी विशेष स्नान किये जाते हैं जिनमें श्रद्धालु उपरोक्त नदियों के अतिरिक्त कुरुक्षेत्र की भी यात्रा करते हैं तथा वहां के जल में पावन स्नान करते हैं। आवश्यक यह है कि आप अपने निकटतम किसी भी पवित्र जल में स्नान करें।

चार धाम यात्रा

भारतवर्ष के चार प्रमुख दिशाओं में चार पावन धाम हैं जिनके स्वयं के विशेष उद्देश्य हैं। देवता उत्तर दिशा में हिमालय की गोद में स्थित बद्रीनाथ में ध्यान करते हैं, पूर्व में स्थित पुरी के अन्न क्षेत्र में भोजन करते हैं, पश्चिम में स्थित द्वारका में निद्रामग्न होते हैं तथा दक्षिण में स्थित रामेश्वरम में स्नान करते हैं। आप रामेश्वरम मंदिर परिसर के भीतर २२ कुँए देख सकते हैं। श्रद्धालु काशी से गंगाजल लाकर इस मंदिर में शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, तत्पश्चात कुँए के जल से स्नान करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि इन चिरस्थायी कुओं के जल से स्नान करने से उनके सभी पापों का नाश हो जाता है। प्रत्येक कुँए का एक नाम है तथा उनसे सम्बंधित पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। उन कथाओं में उन ऋषि-मुनियों व राजाओं का उल्लेख है जिन्होंने इन कुओं के जल से स्नान किया था तथा उन पापों का भी उल्लेख है जिनसे उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई थी। जैसे, कोडी तीर्थम में स्नान के पश्चात श्री कृष्ण को कंस वध के पाप से मुक्ति प्राप्त हुई थी। चक्र तीर्थ में स्नान के उपरांत सूर्य को स्वर्णिम आभा प्राप्त हुई थी।

दान का महत्त्व

राजस्थान में पीने के पानी का दान
राजस्थान में पीने के पानी का दान

भारत में प्यासे को जल का दान करना सर्वोच्च दानों में से एक माना जाता है। इसके कारण भारत सदा से जल का निर्यातक बना रहा है। जी नहीं, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि भारत जल की विक्री करता है। अपितु इसके प्रमुख निर्यातित वे वस्तुएं हैं जिसके उत्पादन में प्रचुर मात्रा में जल का निवेश होता है। कुछ प्रमुख निर्यातित फसलें हैं, चावल, कपास तथा गन्ना। इन सभी फसलों में प्रचुर मात्रा में जल का प्रयोग होता है। इसके अतिरिक्त भारत बड़ी मात्रा में मांस का भी निर्यातक है। इसका यह अर्थ है कि भारत अपने निर्यातक देशों की जल आवश्यकताओं के भार को एक प्रकार से अपने कंधे पर उठा रहा है। स्वयं भारत में जल के अभाव को दृष्टी में रखते हुए क्या उसे यह भार उठाना चाहिये अथवा नहीं, यह एक भिन्न चर्चा का विषय है।

भारत सरकार ने सन् २०१९ में जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया था। यह मंत्रालय जल को एक प्रमुख संसाधन के रूप में देखता है। नदियों को पुनर्जीवित करना इसका प्रमुख कार्य है। इसके कार्यक्षेत्र में गंगा जैसी अनेक प्रदूषित नदियों का शुद्धिकरण एवं भारत के सभी नागरिकों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करना सम्मिलित हैं। आशा है सरकार का यह प्रयास भारत को एक दिवस पुनः जल संपन्न राष्ट्र बनाने में सहायक सिद्ध होगा। इसके साथ ही वह परंपरा भी पुनः जीवित हो सकेगी जिसके अंतर्गत जल को धार्मिक अनुष्ठानों के साथ दैनन्दिनी जीवन में भी अत्यंत पावन स्थान प्राप्त हो सकेगा।

अनुराधा गोयल द्वारा लिखित यह संस्करण सर्वप्रथम Hinduism Today में प्रकाशित किया गया है।

इस लिखित संस्करण को प्रकाशन से पूर्व सम्पादित किया गया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

3 COMMENTS

  1. अनुराधाजी और मिताजी
    जल देवता की उत्तम प्रस्तुती आपने इस सुंदर लेख मे की है.जलकी महत्ता को आदिकाल से वर्णीत किया गया है.उनके व्दारा इसके संग्रह की विभिन्न प्रणालीओं का वर्णन बहुत ही सुयोग्य तरीके से किया गया है.बर्षातो ईश्वर का वरदान है परंतु लोग इसकी महत्ता को न तो समज पा रहे है और न ही उसके प्रती जागरूक हो रहे है.
    इस लेख से जनमानस मे थोडी सीभी जागरूकता आयेगी तो आपको भी दैवत्व की ओर अग्रेसर होने का लाभ प्राप्त होगा.
    वर्तमान मे सबसे पहले अटलबिहारी वाजपेयी जीने भारतमे नदियोंको जोडीने की योजना बनाइथी परंतु वह कार्यान्वित नहीं हो पाई.देखते है इस बार जल शक्ती मंत्रालय क्या करता है.
    माहिती योंसे भरपूर आलेख हेतू बहुत बहुत धन्यवाद.

  2. भारतजल शक्ति – जल संसाधनों के प्रति श्रद्धा को पुनर्जीवित करने का एक प्रयास:- शुद्ध जल की उपलब्धता में दिनोंदिन कमी होना, आजकल का समसामयिक चिंतनीय विषय है, अब तो धरती माँ के गर्भ में भी शुद्ध जल का अकाल होता जा रहा है व भूजल का स्तर भी अपने निम्नतम स्तर तक गिरता जा रहा है। आपके लेख में बताई गई प्राचीन जल प्रबंधन के द्वारा ही इस विनाश से मुक्ति सम्भव है, जिसे लघु स्तर पर नही बल्कि वृहद स्तर पर करने पर समाधान हो पायेगा। लेख से काफी अच्छी जानकारीयां प्राप्त हुई, साधुवाद।🙏🙏

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