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एलोरा गुफाएँ – कैलाश मंदिर और गुफा – यूनेस्को विश्व धरोहर का स्थल

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कैलाश मंदिर - एलोरा गुफाएं - विश्व धरोहर
कैलाश मंदिर – एलोरा गुफाएं – विश्व धरोहर

जब भी कभी भारत के अतुल्य और अद्भुत वास्तुकला-संबंधी स्थलों की बात आती है तो उन में कैलाश गुफा अर्थात एलोरा गुफाओं की गुफा क्रमांक 16 का उल्लेख अवश्य आता है। महाराष्ट्र में बसे पर्यटन स्थलों में से औरंगाबाद की अजंता और एलोरा गुफाएँ वास्तव में एक दर्शनीय धरोहर का स्थल है। इन गुफाओं से संबंधित सभी तकनीकी और ऐतिहासिक विवरणों को जानने का सबसे अच्छा माध्यम है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वेबसाइट। इस यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने का यह सबसे विश्वसनीय स्त्रोत है।

तो चलिये अब मैं आपको एलोरा गुफाओं से संबंधित अपने कुछ अनुभवों के बारे में बताती हूँ। मैंने अपनी जिंदगी में दो बार इन गुफाओं के दर्शन किए हैं। इन दोनों मुलाकातों के बीच दो दशकों के लंबे समय का फासला रहा है और दोनों ही बार मेरे अनुभव एक-दूसरे से बहुत अलग रहे हैं।

एलोरा गुफाएँ – कैलाश मंदिर, गुफा क्रमांक 16  

एलोरा गुफा में रामायण कथा
एलोरा गुफा में रामायण कथा

90 के दशक के शुरुआती दौर में मेरे पिताजी को औरंगाबाद में तैनात किया गया था। यानी वह शहर जो एलोरा गुफाओं के सबसे नजदीक बसा हुआ है। हमारा घर भी इन गुफाओं से बस कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित था। घर पर आए हुए मेहमानों को सैर पर ले जाने की यही सबसे बढ़िया जगह बन गयी थी और इसका मतलब था, इन गुफाओं के अनेकों बार दर्शन। उस समय मैं सिर्फ एक विद्यार्थी थी और वह भी संगणक जैसे नए-नए उभर रहे क्षेत्र की।

तब मुझे इतिहास जैसे विषय में जरा सी भी रुचि नहीं थी और भारत में स्थित ऐसी गुफाओं के बारे में तो मैं बहुत ही कम जानती थी। इसका मुख्य कारण यह था कि मैं उत्तर भारत में पली-बड़ी थी। लेकिन आज जब मैं इन सारी बातों को याद करती हूँ तो मुझे इस बात का एहसास होता है कि शायद मैं कभी भी कला और इतिहास से एक विषय के रूप अवगत नहीं थी, जिन पर अध्ययन किया जा सके। लेकिन कई सालों बाद मैंने संयोगवश एवं रुचिपूर्वक इन विषयों पर अध्ययन करना शुरू किया, जो हो न हो मेरी भारत यात्राओं का प्रभाव था।

एलोरा गुफाओं से जुड़ी कुछ यादें  

गजलक्ष्मी - एलोरा गुफाएं
गजलक्ष्मी – एलोरा गुफाएं

इस पृष्ठभूमि के साथ-साथ मुझे आज भी वे सारे पल साफ-साफ याद हैं जब हम पहली बार कैलाश गुफा के दर्शन करने गए थे। तब हमारे साथ एक वयोवृद्ध व्यक्ति थे, जो मेरे पिताजी के स्थानीय सहकर्मी थे। उन्होंने हमे विस्तार से समझाया कि ये गुफा किस प्रकार खोदी गयी थी। जब उन्होंने हमे बताया कि यह गुफा ऊपर से नीचे खोदी गयी थी तो हम सब चकित रह गए थे। आगे उन्होंने हमे बताया कि यहाँ पर जो मंदिर है वह पूरा का पूरा केवल एक ही बड़े पत्थर से उत्कीर्णित किया गया है। जब मैंने ऊपर देखा तो वह पूरा मंदिर जैसे मेरी चारों ओर घूम रहा था।

यह सब देखकर मैं इसी सोच में पड़ गयी कि इस गुफा के कारीगरों ने ना जाने यह सब कितनी सूक्ष्मता और स्पष्टता से किया होगा। खासकर जब आप स्तंभों से बने गलियारे से गुजरते हैं, तो ऊपर से बाहर निकलती हुई विशाल चट्टानें आपको हैरान कर देती हैं। कला के क्षेत्र से संबंधित अत्यंत सीमित जानकारी रखनेवाला, वैज्ञानिक रूप से प्रशिक्षित मेरा दिमाग इसे अभियांत्रिकी के चमत्कार के रूप में देख रहा था। ऊपर से मेरी आँखों को सफ़ेद संगमरमर से बने मंदिर देखने की आदत थी जिनके ऊपर ऊंचे-ऊंचे शिखर होते हैं और चालुक्य शैली में निर्मित यह मंदिर मेरे इस सीमित ज्ञान के चौखट से बिलकुल अनोखा और परे था।

एलोरा गुफाओं के उत्कीर्णन    

कैलाश मंदिर की दीवारों पर बचा हुआ रंग
कैलाश मंदिर की दीवारों पर बचा हुआ रंग

मेरे पिताजी के दोस्त, जो हमारे लिए गाइड की भूमिका निभा रहे थे, ने हमे पत्थरों पर बने इन उत्कीर्णनों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने हमे महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों की घटनाओं पर आधारित कुछ उत्कीर्णन दृश्य दिखाये। इन में से मुझे रावण द्वारा कैलाश पर्वत को हिलाने वाला वह उत्कीर्णित दृश्य आज भी स्पष्ट याद है। उस में उत्कीर्णित मौखिक हाव-भाव और दृश्यों के बीच की एकबद्धता इस पूरी घटना को उत्तम रूप से प्रदर्शित कर रही थी।

मैंने पत्थर से उत्कीर्णित इतने विशाल हाथी पहले कभी नहीं देखे थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने हमे यहाँ स्थित और भी कई आकृतियों के बारे में बताया, जैसे कि गंगा, यमुना आदि। पर सच कहूँ, तो उस वक्त मैं इसी सोच में पड़ी थी कि उन्हें इन सब के बारे में इतना सबकुछ कैसे पता, यह तो कुछ भी हो सकता है; क्योंकि तब तक मुझे प्रतिमा विज्ञान जैसे किसी विषय के बारे में जरा भी अंदाज़ा नहीं था। बाद में वे हमे मंदिर की छत के ऊपर ले गए और हमे थोड़ी दूर से यह मंदिर दिखाया, जहाँ से आप उसके विराट आकार की जी भर के प्रशंसा कर सकते हैं। उस वक्त मैं सहज रूप से उसकी प्रशंसा में खो चुकी थी। पता नहीं वह कौन सी बात थी जो मुझे उस वक्त उस वास्तुकला के प्रति आकर्षित कर रही थी।

2013 के शुरुआती दौर में मुझे फिर से एलोरा गुफाओं के दर्शन करने का मौका मिला। जब मैं वहाँ गयी तो मैंने देखा कि वे गुफाएँ वैसे की वैसे थीं। दो दशकों का यह समय गुफाओं के जीवन काल का बहुत ही कम समय होगा लेकिन मेरे लिए ये 20 वर्ष काफी लंबा समय था। मैं बहुत बदल चुकी थी, इन 20 सालों के दौरान मैं बहुत प्रवास कर चुकी थी। इस दौरान मुझ में इतिहास के प्रति एक प्रकार की तृष्णा सी पैदा हो गयी थी और अब मैं पहले से कई ज्यादा कला की कद्र करने लगी थी। मेरी आँखों में आज भी वही विस्मय था, लेकिन इस बार वह गुफाओं की अभियांत्रिकी से कई अधिक उसकी अद्वितीय कारीगरी के लिए था।

एलोरा गुफाओं के हाल ही में किए गए दर्शन – कैलाश गुफा   

कैलाश मंदिर - एलोरा गुफाएं
कैलाश मंदिर – एलोरा गुफाएं

इस बार बिना किसी के दिखाये मैंने मंदिर की दीवारों पर यहाँ-वहाँ उखड़े हुए रंगों के निशान देखे। मैंने अनुमान लगाने की कोशिश की, कि जब यह मंदिर अपने संपूर्ण वैभव में था तब कितना सुंदर दिखता होगा। मैं जानना चाहती थी, अगर इस मंदिर को फिर से रंगवाने का कोई तरीका है, ताकि उसे फिर से उसके मूल वैभव में लाया जा सके। इस बार मैंने इस गुफा के कुछ अपूर्ण भागों को भी ध्यान से देखा।

मैं यहाँ-वहाँ देखते हुए आगे बढ़ने लगी, और प्रतिमा विज्ञान की थोड़ी-बहुत जानकारी के आधार पर, तथा मंदिर के सांस्कृतिक और आर्थिक मूल्यों की समझ के साथ, वहाँ के उत्कीर्णनों को समझने का प्रयास करने लगी। मैं नक्काशीकाम से परिपूर्ण इन गलियारों के प्रत्येक उत्कीर्णनों की प्रशंसा करते हुए आगे बढ़ती गयी। मैं सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते हुए यहाँ की हर वस्तु का सभी संभव कोणों से अवलोकन करने की कोशिश कर रही थी। इस बार मैं गाइड द्वारा बताई जा रही बातों को परखने की कोशिश करने के बजाय, उनसे और भी जानकारी प्राप्त करने का प्रयास कर रही थी।

मैं वहाँ पर बैठकर एक चित्रकार को देखने लगी जो अपनी आस-पास की दुनिया से बेखबर, कुछ दूर बैठकर, कागज पर इस मंदिर का चित्र बना रहा था, जैसे कि वह अपने मन में इस मंदिर का पुनर्निर्माण कर रहा हो।

एलोरा गुफाएँ – जैन और बौद्धों की गुफाएँ    

मैंने एलोरा की जैन और बौद्ध गुफाओं के भी दर्शन किए, लेकिन कैलाश गुफा की खूबसूरती ने जैसे मेरे आँखों पर पट्टी बांध रखी थी। मैं उस गुफा के प्रति इतनी आकर्षित हो गयी थी कि उसके अलावा मैं दूसरी चमकदार गुफाओं की प्रशंसा भी नहीं कर पा रही थी। जो शायद मुझे किसी और दिन देखनी चाहिए थीं।

8वी शताब्दी के दौरान निर्मित ये गुफाएँ, भारतीय इतिहास की 8वी-9वी शताब्दी के आस-पास के काल में ठीक रूप से बैठती हैं। उस समय भारत में यहाँ-वहाँ उत्कीर्णित मंदिरों का उल्लेख मिलता है, जो उस दौरान अपने पूर्ण वैभव में थे, जहाँ पर भगवान को पूजा जा रहा था और उनमें से एक भी पत्थर नहीं उखड़ा था। अगर उस जमाने की आबादी को ध्यान में रखे तो शायद उस समय यह सबकुछ किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता होगा।

जैसे कि जेन की कहावत है, कि ‘यह समय भी गुजर जाएगा’, वह युग भी गुजर गया, लेकिन शुक्र है कि वह हमारे लिए अपनी कुछ झलकियाँ छोड़ गया जो आगे चलकर हमे ऐसे ही प्रेरित करती रहेंगी।

मेरा आप से अनुग्रह है कि आप अजंता और एलोरा गुफाओं के दर्शन जरूर करें। यह महाराष्ट्र की प्रसिद्ध और दर्शनीय जगहों में से एक है।

भारत के अन्य विश्व धरिहार स्थल

अजंता की गुफाएं

एलेफंटा गुफाएं

चित्तौरगढ़ दुर्ग

नालंदा विश्वविद्यालय

रानी की वाव – पाटन गुजरात

 

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