गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर – एक अनोखा शक्तिपीठ

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हिमालय पर्वत एवं तीन महासागरों के मध्य बसे, सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहरों से संपन्न भारत देश की पावन भूमि में देवी के अनेक शक्तिपीठ हैं। वस्तुतः, ये शक्तिपीठ सम्पूर्ण भारतीय महाद्वीप में फैले हुए हैं। उनमें से एक है, कामाख्या मंदिर। असम राज्य से बहती ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित नीलांचल पर्वत के शिखर पर स्थापित यह कामाख्या मंदिर उन सभी शक्तिपीठों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है।

कामाख्या शक्तिपीठ – पौराणिक कथा

शक्तिपीठ का संबंध देवी सती से है जो दक्ष प्रजापति की पुत्री एवं भगवान शिव की पत्नी है। दक्ष प्रजापति द्वारा कनखल में आयोजित एक यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किया गया जिससे दुखी होकर सती ने यज्ञ कुण्ड में अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। पत्नी के आत्मदाह से आहत तथा क्रोधित होकर भगवान शिव देवी सती के पार्थिव शरीर को उठाकर तांडव करने लगे जिससे सम्पूर्ण सृष्टि डगमगाने लगी।

कामख्या मंदिर शक्तिपीठ
कामख्या मंदिर

सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए तथा भगवान शिव को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र द्वारा सती की देह का विच्छेद कर दिया। सती की देह के ५२ भाग हो गए तथा पृथ्वी पर भिन्न भिन्न स्थानों पर गिरे। उन सभी स्थानों पर देवी के मंदिरों की स्थापना हुई तथा वे शक्तिपीठ कहलाये। इन सभी शक्तिपीठों में देवी की शक्ति समाहित है।

भिन्न भिन्न ग्रंथों के अनुसार शक्तिपीठों की संख्या एवं सूची भिन्न है। कुछ के अनुसार वे ४ हैं तो कुछ में उनकी संख्या १०८ बताई गयी है। आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित एक स्तोत्र के अनुसार उनकी संख्या १८ है। आप कोई भी सूची देख लें, कामाख्या मंदिर का नाम उन सभी में उपस्थित है।

कामाख्या मंदिर में देवी सति की योनि गिरी थी। यह एक स्त्री का जननांग होता है जिसमें एक नवीन जीव को जन्म देने का सामर्थ्य होता है। यह मंदिर उसी रचनात्मक शक्ति का द्योतक है। अतः यह मंदिर सभी शक्तिपीठों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं परम पूजनीय स्थल है। इसीलिए प्रजनन शक्ति से इसका प्रगाढ़ संबंध तो है ही, कदाचित तांत्रिक क्रियाओं से इसका संबंध भी इसी कारण ही है।

कामाख्या मंदिर से संबंधित अन्य दंतकथाएं

एक प्राचीन मंदिर होने के कारण कामाख्या मंदिर से संबंधिक अनेक कथाएं प्रचलित हैं।

कामख्या मंदिर की रूपरेखा
कामख्या मंदिर की रूपरेखा

प्राचीनकाल में असम को कामरूप नाम से जाना जाता था। यह असम क्षेत्र का प्रथम ऐतहासिक राज्य था जो काराटोआ से लेकर दिक्करभाषिणी तक फैला हुआ था। कालांतर में इसके अनेक राजनैतिक भाग किये गए। कामरूप आज असम का एक जिला मात्र रह गया है।

कामरूप प्रांत चार क्षेत्रों में विभाजित किया गया था। उनमें से एक है, कामपीठ जो स्वर्णकोष एवं रुपिका नदियों के मध्य स्थित है। कामाख्या इसी क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी है।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस क्षेत्र का एक प्राचीन नाम प्राग्ज्योतिषपुर भी है।

कामाख्या (कामाक्षी) शब्द का शाब्दिक अर्थ है, काम की देवी अथवा कामनाओं की देवी। ऐसी मान्यता है कि आरंभ में इस मंदिर का निर्माण कामदेव ने किया था। तारकासुर को वरदान प्राप्त था कि उसका वध शिव-पार्वती का पुत्र ही कर पायेगा। तारकासुर के अत्याचार से त्रसित देवों ने कामदेव से आग्रह किया कि वो भगवान शिव की तपस्या भंग करे ताकि वे पार्वती से विवाह कर सकें तथा उनका पुत्र तारकासुर का वध कर सके। तपस्या भंग होने पर क्रोधित शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। कामदेव ने इसी क्षेत्र में घोर तपस्या कर अपना पूर्व रूप पुनः प्राप्त किया तथा विश्वकर्मा के सहयोग से यहाँ कामाख्या देवी के मंदिर का निर्माण किया।

एक कथा के अनुसार नरकासुर यहाँ का एक अत्याचारी असुर राजा था जिसने १६००० स्त्रियों को बंधक बनाया था। श्री कृष्ण ने उसका वध कर उन स्त्रियों को मुक्ति दिलाई थी। ऐसा कहा जाता है कि एक समय नरकासुर माँ भगवती कामाख्या को पत्नी रूप में प्राप्त करने का दुराग्रह कर बैठा। कामाख्या ने नरकासुर की मृत्यु को निकट जानकर उसका ध्यान भंग करने की दृष्टि से उससे कहा कि यदि वह एक रात्रि में नीलांचल पर्वत के चारों ओर से शिखर तक पत्थरों के चार सोपान पथ का निर्माण करे तथा कामाख्या मंदिर के साथ एक विश्राम गृह का भी निर्माण करे तो वह स्वेच्छा से उसकी पत्नी बन जायेगी। अन्यथा उसकी मृत्यु निश्चित है।

गर्व से चूर नरकासुर ने प्रातः होने से पूर्व चार पाषाणी सीढ़ियों का निर्माण कर भी दिया था तथा वह विश्राम गृह का निर्माण कर रहा था तब देवी के एक मायावी कुक्कुट ने भोर होने की सूचना देते हुए बांग दे दी। इससे उसका निर्माण कार्य भंग हो गया। पर्वत के चार प्रवेशद्वारों के नाम हैं, वानर द्वार, बाघ द्वार, दिव्य द्वार एवं सिंह द्वार। ये चारों नरकासुर की देन हैं। ऐसी मान्यता है कि इन सोपानों द्वारा पर्वत पर चढ़ने से धन-संपत्ति, यश, मोक्ष आदि की प्राप्ति होती है।

अन्य किवदंतियां

एक अन्य किवदंती के अनुसार आरंभ में यह मंदिर खासी जनजाति का था जो देवी का-मे-खा की आराधना करते थे। कालांतर में यह नाम कामाख्या में परिवर्तित हो गया। कालिका पुराण एवं योगिनी तंत्र जैसे कुछ ग्रंथों में किरात नामक पहाड़ी जनजाति द्वारा देवी की आराधना की ओर संकेत किया गया है।

कामाख्या देवी तंत्र विद्या के उपासकों की भी देवी हैं। इसके अनुयायी सनातन धर्म में भी पाए जाते हैं तथा  बौद्ध धर्म में भी तांत्रिक वज्रयान अनुयायी कामाख्या देवी की उपासना करते हैं।

कामाख्या मंदिर का इतिहास

मूलतः यह एक प्राचीन मंदिर है जिसमें कालांतर में नवीन संरचनाएं जोड़ी गयी हैं। मंदिर का प्राचीनतम भाग ८-९वीं सदी में निर्मित है। वर्तमान मंदिर के अधिकाँश भागों का निर्माण १६वीं सदी में कोच राजवंश के राजाओं, विशेषतः नरनारायण द्वारा किया गया था जो उस कालखंड में इस क्षेत्र के शासक थे। दुर्भाग्यवश कूच बिहार के राजपरिवार को श्राप है कि उनके वंशजों के लिए इस मंदिर में प्रवेश निषिद्ध है। यहाँ तक कि इस मंदिर पर दृष्टि डालने मात्र से भी यह श्राप फलित होता है।

कामख्या मंदिर के पाषण शिल्प
कामख्या मंदिर के पाषण शिल्प

मंदिर के भीतर एवं चारों ओर बने शिल्प ८वीं से १६वीं सदी के मध्य विभिन्न कालखंडों में गड़े गए हैं। वास्तव में देखा जाए तो इस मंदिर का निर्माण प्राचीन शिलाखंडों एवं प्राचीन शैल प्रतिमाओं से संरचित है।

कालांतर में यह क्षेत्र सिबसागर के अहोम राजवंश के राजाओं के अधिपत्य में आ गया जिन्होंने इस मंदिर की देखरेख का कार्यभार अखंडित रखा। इसका अभिप्राय यह है कि विभिन्न राजाओं एवं भक्तों द्वारा इस मंदिर की देखरेख एवं पुनुरुद्धार का कार्य अनवरत चलता रहा है।

ऐसा माना जाता है कि इससे पूर्व के मंदिर को काला पहाड़ अथवा ऐसे ही किसी आक्रमणकारी ने नष्ट कर दिया था।

सेवायत अथवा मंदिर के पुरोहित

मंदिर के पारंपरिक पुरोहितों को बरदूरी कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं, बूरा बरदूरी एवं देखा बरदूरी। मंदिर में दैनिक पूजा-अर्चना का उत्तरदायित्व इन दोनों बरदूरियों पर होता है। मंदिर में होम एवं यज्ञ करने का उत्तरदायित्व जिन पर है, उन्हें होता कहते हैं। वहीं मंदिर के सम्पूर्ण अनुष्ठानिक क्रियाकलापों की निगरानी बिधिपाठक करते हैं।

इनके अतिरिक्त मंदिर में चंडीपाठक होते हैं जो चंडी पाठ अथवा दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। सुपाकार भी ब्राह्मण होते हैं जिनका कार्य है, मंदिर में चढ़ाए जाने वाले भोग को बनाना।

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इनके अतिरिक्त भी मंदिर में अनेक कार्य होते हैं, जैसे भंडारगृह की निगरानी, बहीखाता, बलि आदि। इन सब कार्यों के लिए भी व्यक्ति निहित होते हैं।

कामाख्या मंदिर की स्थापत्य शैली

इस मंदिर का शिखर किंचित बेलनाकार है जिस पर गोलाई में खाँचें बने हुए हैं। ऐसी संरचना कदाचित तांत्रिक क्रियाओं का भाग हो सकती है। सम्पूर्ण मंदिर परिसर की स्थापत्य शैली मिश्रित प्रतीत होती है। कहीं किंचित बेलनाकार शिखर है तो कहीं अर्धगोलाकार शिखर है तथा कहीं कहीं वक्रीय छतें हैं। यह मिश्रित स्थापत्य शैली नीलांचल पर्वत शिखरों से प्रेरित हैं।

कामख्या शक्तिपीठ का शिखर
कामख्या शक्तिपीठ का शिखर

यह पंचरथ शैली का मंदिर है। इस मंदिर में एक गर्भगृह तथा तीन मंडप हैं। गर्भगृह की भूमि शैलखंडों द्वारा निर्मित है जिस पर गणेश, श्री राम, देवी एवं ऋषियों के विग्रह स्थापित हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि आरंभ में यह नागर शैली का मंदिर रहा होगा। इसका शिखर ईंटों द्वारा निर्मित है। उसके ऊपर आड़े खांचे बने हुए हैं। इसके चारों ओर चल-शैली में निर्मित अनेक लघु मंदिर हैं जिन्हें अंगशिखर कहते हैं।

कामख्या मंदिर के शिखर
कामख्या मंदिर के शिखर

गर्भगृह की ओर जाता एक कालंता मंडप है जिसमें देवी-देवताओं की उत्सव मूर्तियाँ रखी हुई हैं। अन्य दो मंडप हैं, पंचरत्न तथा नाट्यमंडप जो अनुमानतः १८वीं सदी में निर्मित हैं।

गर्भगृह के भीतर एक भूतल नीचे योनी पीठ स्थापित है। यह वास्तव में योनी के रूप में एक शिलाखंड है जिसकी पूजा-अर्चना की जाती है। एक भूमिगत जल के स्त्रोत द्वारा इसमें जल भरा रहता है। यहाँ कोई मूर्ति नहीं है।

बलि

मैं अनेक कारणों से कामाख्या मंदिर में आना चाहती थी। एक तो यह एक देवी मंदिर है। मैं स्वयं को देवी से जुड़ा हुआ अनुभव करती हूँ तथा उनकी उपासना करती हूँ। दूसरा, यह एक शक्ति पीठ भी है। साथ ही इसकी अनूठी विशेषताओं ने मुझे आकर्षित किया हुआ था। वहीं, कुछ कारणों से मैं यहाँ नहीं आना चाहती थी। मैंने यहाँ की बलि प्रथा के विषय में सुना था। यहाँ लगभग प्रत्येक दिवस देवी को पशु की बलि चढ़ाई जाती है। मुझे विश्वास नहीं था कि मैं वह सब देख पाऊँगी।

बंगाल की चला शैली का मंदिर
बंगाल की चला शैली का मंदिर

अंततः देवी के दर्शन की अभिलाषा ने सभी आशंकाओं पर विजय प्राप्त की तथा मैं देवी माँ के दर्शन के लिए यहाँ आ गयी। प्राचीन काल में भक्तगण पैदल ही नीलांचल पहाड़ पर चढ़कर मंदिर पहुँचते थे किन्तु अब शिखर तक पक्की सड़क बन गयी है।

यहाँ आने से पूर्व मुझे बताया गया था कि बलि स्थान मुख्य मंदिर से दूर है तथा वहाँ देखने की आवश्यकता नहीं है। किन्तु मुझे तिलक लगे अनेक पशु यत्र-तत्र दृष्टिगोचर हो रहे थे तथा मुझे यह आभास था कि कुछ ही क्षणों में उनकी बलि चढ़ने वाली है।

इस मंदिर में वामाचार एवं दक्षिणपथ दोनों अनुष्ठानिक क्रियाओं का पालन किया जाता है। बलि चढ़ना वामाचार का भाग है तथा दक्षिणपथ में पुष्पों द्वारा देवी का अभिषेक किया जाता है।

नीलांचल पर्वत का कामाख्या मंदिर

कामाख्या मंदिर नीलांचल नामक पर्वत के शिखर पर स्थित है।

मंदिर के भीतर हर-गौरी की अष्टधातु में निर्मित भोग मूर्ति स्थापित है। उन्हें कामेश्वर-कामेश्वरी भी कहते हैं। यहाँ से लगभग दस सीढ़ियाँ उतर कर हम गर्भगृह पहुँचते हैं। यहाँ योनी पीठ के दर्शन होते हैं।

लज्जा गौरी
लज्जा गौरी

मंदिर के भीतर भित्तियों पर आप अनेक शिल्प देख सकते हैं। मुझे लज्जा-गौरी की प्रतिमा अत्यंत भा गयी। मेरी कल्पना के अनुसार वह मूर्ति इस मंदिर का सार है, उर्वरता की देवी। भित्तियों को ध्यान से देखें तो आपको शिशु सहित माता की भिन्न भिन्न प्रतिमाएं अनेक स्थानों पर दृष्टिगोचर होंगी।

गणेश, श्री राम, ऋषि गण एवं देवी
गणेश, श्री राम, ऋषि गण एवं देवी

अन्य शिल्पों में मंगलचंडी, कल्कि अवतार, श्री राम, बटुक भैरव, अन्नपूर्णा, नर-नारायण तथा कूच बिहार के कुछ राजाओं की प्रतिमाएं सम्मिलित हैं।

दश महाविद्या मंदिर

नीलांचल पर्वत पर दस महाविद्याओं के मंदिर भी हैं। तांत्रिक क्रियाओं में देवी माँ के इन दस रूपों की आराधना की जाती है। उन में से त्रिपुरसुंदरी, मातंगी एवं कमला, ये तीन महाविद्याओं के मंदिर मुख्य मंदिर के भाग हैं।  अन्य सात महाविद्यायें काली, तारा, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, बगलामुखी तथा धूमावती, इनके स्वयं के पृथक पृथक मंदिर हैं।

सौभाग्य कुण्ड
सौभाग्य कुण्ड

पांच शिव मंदिर भी हैं जो शिव के पांच मुखों के द्योतक हैं। बनवासिनी, जय दुर्गा एवं ललिता कांता की शैल प्रतिमाएं भी हैं।

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नीलांचल पर्वत पर एक छोटा जलकुंड है जिसका नाम सौभाग्य कुंड है। मान्यताओं के अनुसार इंद्र देव ने देवी के लिए इस जलकुंड का निर्माण किया था। तर्पण एवं श्राद्ध जैसे धार्मिक अनुष्ठान यहीं किये जाते हैं। इस जलकुंड की परिक्रमा को धरती की परिक्रमा के समतुल्य माना जाता है।

संग्रहालय

यहाँ स्थित संग्रहालय में देवी की पूजा-अर्चना एवं विभिन्न अनुष्ठानों में प्रयोग में लाई गयी वस्तुएं हैं, जैसे भिन्न भिन्न पात्र तथा संगीत वाद्य यंत्र। यहाँ मंदिर के पुरातन प्रवेशद्वारों का भी संग्रह हैं जो ना केवल दर्शनीय हैं अपितु द्वारों में समय के साथ आये परिवर्तन को भी दर्शाते हैं। भक्तगणों द्वारा भेंट में चढ़ाई गयी उपहार की वस्तुएं भी यहाँ रखी हैं।

कामख्या मंदिर के प्राचीन द्वार एवं घंटियाँ
कामख्या मंदिर के प्राचीन द्वार एवं घंटियाँ

संग्रहालय के चारों ओर बगीचा है जिसमें अनेक शैल शिल्प रखे हुए हैं। मेरे अनुमान से ये सभी शैल शिल्प किसी काल में मंदिर एवं उसके परिसर का भाग रहे होंगे। यह संग्रहालय एवं इसका संकलन अभी निर्माणाधीन है। संग्रहालय पूर्ण होते ही यह हमारे समक्ष मंदिर की विभिन्न अनुष्ठानिक क्रियाओं की अब तक की यात्रा का अनूठा संकलन प्रस्तुत करेगा।

संग्रहालय के अभीक्षक से मेरी विस्तार में चर्चा हुई थी। उनका मानना है कि संसार में जो भी होता है, देवी माँ के आशीष से होता है। वे यह भी कहते हैं कि देवी वैसी ही हैं जैसी हम कल्पना करते हैं।

कामाख्या मंदिर के उत्सव

अंबुबाची मेला

यह माँ कामाख्या का सर्वाधिक महत्वपूर्ण वार्षिक उत्सव है। इसे अमेटी अथवा अमोटी भी कहते हैं। जून-जुलाई में आते आषाढ़ मास की सप्तमी से यह उत्सव आरम्भ होता है। खगोल शास्त्र के अनुसार इस समय सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में मिथुन राशी में प्रवेश करता है।

उत्सवों पर सुसज्जित कामख्या मंदिर
उत्सवों पर सुसज्जित कामख्या मंदिर

इस समय ब्रह्मपुत्र नदी जल से लबालब भरी रहती है। इस समय इस क्षेत्र में वर्षा ऋतु का समय रहता है जो धरती की उर्वरता का द्योतक है। देवी को धरती माँ के रूप में पूजा जाता है।

ऐसी मान्यता है कि इस समय देवी कामाख्या रजस्वला रहती है। यह देवी का वार्षिक रजस्वला काल होता है जो तीन दिनों का होता है। ये तीन दिन मंदिर के पट बंद रहते हैं तथा देवी विश्राम करती हैं। चौथे दिवस देवी के स्नान अनुष्ठान के पश्चात् मंदिर के कपाट खोले जाते हैं।

चौथे दिवस देवी के स्नान में जिस जल का प्रयोग किया जाता है, उसे अन्गोदक कहा जाता है अर्थात देवी के अंग का जल। यह जल भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। रजस्वला काल में देवी जो वस्त्र धारण करती हैं, उसे अंगवस्त्र कहते हैं। देवी के अंगवस्त्र भी प्रसाद के रूप में भक्तों को दिया जाता है।

अम्बुबाची के इस विशाल मेले में भाग लेने के लिए गृहस्थों से लेकर सन्यासियों तक, हिमालय के साधुओं से लेकर विदेशी जिज्ञासुओं तक, दूर-सुदूर से करोड़ों भक्तगण आते हैं।

देवधनी अथवा देवध्वनी मेला

देव्धानी नृत्य
देव्धानी नृत्य

श्रावण अथवा कर्क संक्रांति के दिवस जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है, इस तीन दिवसीय नृत्य उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस उत्सव में देओधा, घोरा एवं जोकि जनजाति के लोग नट मंडप में अनुष्ठानिक नृत्य प्रस्तुत करते हैं। इसी समय मंदिर में मनसा पूजन का आयोजन किया जाता है।

दुर्गा पूजा

एक शक्तिपीठ होने के कारण कामाख्या देवी मंदिर में दुर्गा पूजा का उत्सव अत्यंत भव्यता से मनाया जाता है। नवरात्रि का उत्सव एक सम्पूर्ण पक्ष अर्थात् १५ दिवसों तक मनाया जाता है। यह उत्सव कृष्ण नवमी दिवस में आरंभ होकर शुक्ल नवमी दिवस में समाप्त होता है। इस समय देवी का महास्नान होता है। देवी को भिन्न भिन्न प्रकार के चढ़ावे चढ़ाए जाते हैं जिनमें बलि भी सम्मिलित है।

इस उत्सव में कुमारी पूजन का आयोजन किया जाता है जिसमें कुमारी कन्याओं को देवी के रूप में पूजा जाता है।

शक्ति के उपासकों के लिए यह समयावधि देवी आराधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इसके विषय में अधिक जानकारी के लिए Navaratri – When Devi Comes Home, यह पुस्तक पढ़ें।

डोल जत्रा – यह देवी का वसंतोत्सव है जो होली उत्सव के समकालीन आयोजित किया जाता है।

इनके अतिरिक्त इस मंदिर में अन्य सभी हिन्दू उत्सव मनाये जाते हैं।

कामाख्या क्षेत्र के अन्य पावन स्थल

उर्वशी कुण्ड – ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य स्थित एक पहाड़ी पर यह कुण्ड है। भक्तगण इस कुण्ड में स्नान करते हैं तथा पांडू शिला का स्पर्श करते हैं।

अश्वक्रान्ता मंदिर – ब्रह्मपुत्र के उस पार स्थित अश्वक्रान्ता मंदिर भगवान विष्णु का मंदिर है जिसमें विष्णु के कूर्म अवतार एवं शेषशायी विष्णु की आराधना की जाती है। इस मंदिर से नदी की ओर जाते मार्ग पर भगवान विष्णु के पदचिन्हों की छाप है।

उमानंद मंदिर
उमानंद मंदिर

उमानंदा द्वीप – यह ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित एक लघु द्वीप है। इस पर भगवान शिव का मंदिर है जिसमें उनकी उमानंद रूप में आराधना की जाती है। भगवान शिव ने देवी उमा के साथ आनंदमयी समय व्यतीत करने के लिए इस द्वीप को उत्पन्न किया था। यह वही स्थान है जहाँ भगवान शिव के ध्यान में विघ्न उत्पन्न करने के लिए भगवान ने कामदेव को भस्म कर दिया था। इसलिए इसे भस्माचल भी कहते हैं।

मणि कर्णेश्वर मंदिर – ब्रह्मपुत्र के उत्तरी तट पर स्थित यह एक शिव मंदिर है।

महर्षी वसिष्ठ आश्रम – गुवाहाटी के दक्षिण में असम-मेघालय सीमा पर स्थित एक पहाड़ी पर महर्षी वसिष्ठ का भव्य आश्रम एवं एक मंदिर है। यहाँ स्थित एक शिलाखंड को अरुंधती कहा जाता है जो गुरु वसिष्ठ की पत्नी थी। सूर्य ग्रहण एवं चन्द्र ग्रहण के दिवसों में यहाँ बड़ी संख्या में भक्तगण आते हैं।

कामख्या देवी के भक्त
कामख्या देवी के भक्त

नवग्रह मंदिर – चित्रांचल अथवा चित्रशिला पहाड़ी पर स्थित यह नवग्रह मंदिर किसी काल में खगोलीय अध्ययन का पीठ माना जाता था। यहाँ किये गए उत्खनन में १२ शिव मंदिर प्राप्त हुए हैं।

कामाख्या क्षेत्र में स्थित कुछ अन्य मंदिर हैं, उग्रतारा मंदिर, चक्रेश्वर मंदिर, शुक्रेश्वर मंदिर, जनार्दन मंदिर, बाणेश्वर मंदिर, पांडूनाथ मंदिर तथा हयग्रीव माधव। आप गुवाहाटी से इनके दर्शन के लिए आ सकते हैं।

यात्रा सुझाव :

  • कामाख्या मंदिर गुवाहाटी के निकट स्थित है। आप गुवाहाटी से बस अथवा टैक्सी द्वारा लगभग ३० मिनटों में मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
  • गुवाहाटी नगर देश के अन्य भागों से वायु मार्ग, रेल मार्ग तथा सड़क मार्ग द्वारा सुविधाजनक रूप से जुड़ा हुआ है। मंदिर से निकटतम रेल स्थानक कामाख्या है।
  • अंबुबाची मेले के लिए मंदिर के पट बंद रहते हैं। उनकी तिथियों की पूर्व जानकारी अवश्य प्राप्त कर लें।
  • उत्सवों के दिवसों में इस मंदिर में बड़ी संख्या में भक्तगण आते हैं। अतः कामाख्या मंदिर में देवी दर्शन के लिए यात्रा नियोजन करते समय इस तथ्य का अवश्य ध्यान रखें।

कामाख्या मंदिर के विषय में अधिक जानकारी के लिए मंदिर के अधिकारिक वेबस्थल पर देखें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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