कुलधरा जैसलमेर का भुतहा, शापित एवं त्यक्त गाँव

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कुलधरा – जहां जैसलमेर की भुतहा कहानियाँ अब भी जीवित हैं। चलिए जैसलमेर से दक्षिण-पश्चिम दिशा में १८ किलोमीटर दूर स्थित इस परित्यक्त गाँव जो अनेक भूतहा शापित कथाओं के लिए प्रसिद्ध है।

सुदूर फैला थार मरुस्थल
सुदूर फैला थार मरुस्थल

कुलधरा की कुख्यात कथाएं

ऐसा कहा जाता है कि कुलधरा गाँव आज से ५०० वर्ष पूर्व ६०० घरों एवं ८५ छोटे गांवों का एक समूह था जहां पालीवाल ब्राम्हण समाज निवास करता था। फिर अचानक कुलधरा गाँव भुतहा एवं शापित क्यों हो गया? लोगों ने इस गाँव को क्यों त्याग दिया? इसके विषय में अनेक कथाएं लोगों में प्रचलित हैं। उनमें से कुछ हैं:

कुलधरा की और जाता निर्जन मार्ग
कुलधरा की और जाता निर्जन मार्ग

एक संस्करण के अनुसार जैसलमेर सम्राट के दरबार में सलीम सिंह नाम का एक मंत्री था। उसने प्रजा पर नाना प्रकार के करों का बोझ डाल दिया था। इस कारण नागरिक उसे जालिम सिंह भी कहते थे। समाज की स्त्रियों पर भी उसकी कुदृष्टि रहती थी। ऐसा माना जाता है कि उसकी विशेष कुदृष्टि गाँव के मुखिया की पुत्री पर थी।

जब सलीम सिंह के सेवक मुखिया की कन्या को लिवा लेने के लिए गाँव आए तब गाँववासियों ने उन्हे प्रातः आने के लिए कहा। तत्पश्चात सभी गांव वासियों ने रातों रात गाँव से पलायन कर लिया। उन्होंने सलीम सिंह के सेवकों को इसकी भनक भी नहीं पड़ने दी। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि सलीम सिंह के भय से मुखिया की पुत्री ने आत्महत्या कर ली थी। ऐसी घटना की पुनरावृत्ति ना हो, इस आशंका से गांव वासियों ने रातों रात गाँव को त्यागने का निर्णय लिया।

कुलधरा के पास टीले पे एक छतरी
कुलधरा के पास टीले पे एक छतरी

गाँव को छोड़ने से पूर्व गांववासियों ने अपने त्यक्त घरों को श्राप दिया कि उन घरों में अब कोई नहीं बस पाएगा तथा परित्याग के पश्चात उनके गाँव एवं घर सदा के लिए शापित हो जाएँगे। आज भी ये गाँव उसी प्रकार वीरान पड़े हैं मानो अब भी अपना श्राप जी रहे हों।

जल स्तर जानने के खम्बे
जल स्तर जानने के खम्बे

गाँव के जिस मुखिया की कन्या पर राजा का कोप था, उसी मुखिया के निवास स्थान का राजस्थान पर्यटन ने अब नवीनीकरण किया है। इस निवास स्थान में एक कक्ष है जहां माना जाता है कि मुखिया ने कन्या की देह एवं श्राप छोड़कर गाँव त्याग दिया था।

राजस्थान का एक अन्य भुतहा स्थल है, भानगढ़ दुर्ग

कुलधरा के पालीवाल ब्राह्मण कौन थे?

राजस्थान के पाली क्षेत्र से ब्राह्मणों का एक छोटा समूह १३ वी. सदी में यहाँ आकर ककणी नदी के तट पर बस गया था। उन्होंने उधानसर नामक एक तालाब भी खोदा था। चूंकि वे पाली क्षेत्र से विस्थापित होकर आए थे, उन्हे पालीवाल कहा जाने लगा। १९ वीं. सदी के आरंभ में वे कुलधरा को छोड़कर चले गए थे। इसका अर्थ यह है कि लगभग ६०० वर्षों तक उन्होंने यहाँ निवास किया था। राजस्थान में आप आज भी पालीवाल उपनाम के लोग देख सकते हैं।

वीरगति पाने वालों के स्मृति पाषाण
वीरगति पाने वालों के स्मृति पाषाण

पुरातात्विक प्रमाण यह दर्शाते हैं कि कदाचित किसी भूकंप के कारण लोगों ने गांवों का परित्याग किया होगा। ककणी नदी का सूखना भी गाँव के परित्याग का एक कारण हो सकता है। एक अन्य सिद्धांत के अनुसार घटते जल स्तर के कारण कृषि उपज में कमी आने लगी, किन्तु उन पर लगाए गए करों में कोई परिवर्तन अथवा कमी नहीं की गई। अतः इस गाँव में और समय निवास करना पालीवाल समुदाय के लिए दुष्कर होने लगा था।

विभिन्न शासकों के जनगणना अभिलेख १९ वीं. में जनसंख्या में हुए तीव्र पतन दर्शाते हैं। १६ वीं. सदी में लक्ष्मी चन्द द्वारा रचित इतिहास ग्रन्थ तवारीख-ए-जैसलमेर के अभिलेखों के अनुसार यहाँ की जनसंख्या १६०० थी जो १९ वीं. सदी के ब्रिटिश युग में घट कर केवल ३० रह गई थी।

कुलधरा दर्शन

पालीवाल समाज तथा उनके शापित व त्यक्त गांवों से जुड़ी सभी किवदंतियाँ अब भी इन खंडहरों में जीवित हैं। राजस्थान पर्यटन ने इन खंडहरों को बिना किसी छेड़छाड़ के एक रोचक पर्यटन स्थल में परिवर्तित करने का कार्य अत्यंत कुशलता से किया है। रहस्य के पुलिंदे में लिपटे इन गांवों के भुतहा आभास को वैसे ही अछूता रखने में वे सफल प्रतीत होते हैं। राजस्थान पर्यटन का यह कार्य सराहनीय है।

कुलधरा गाँव के अवशेष
कुलधरा गाँव के अवशेष

मैं इसे अपना सौभाग्य मानती हूँ कि मुझे इस गाँव के दो सर्वोत्तम समय दर्शन करने के अवसर प्राप्त हुए। एक दिन के समय तथा दूसरा अर्ध रात्रि के पश्चात गाँव के भुतहा दर्शन के रूप में। कुलधरा के ये भुतहा गाँव जैसलमेर नगर की बाहरी सीमा पर में फैले हुए हैं।

कुलधरा की अर्ध-रात्री चुड़ैल सैर

यह चुड़ैल सैर हमारे आतिथेय ‘सुर्यागढ़’ द्वारा आयोजित की गई थी।

देर रात हमारे गाड़ी चालक हिम्मत सिंह हमें उस भूतहा सैर पर ले गये जिसे कौतूहलपूर्वक चुड़ैल सैर भी कहा जाता है। हास्यास्पद प्रसंग यह था कि हिम्मत सिंह नाम के हमारे गाड़ी चालक हम में से सर्वाधिक भयभीत व्यक्ति थे।

अर्ध रात्रि पार हो चुकी थी। हम सब एक भूतहा कुएं के समीप स्थित शिव मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे गए। हम सभी पर्यटक थे। अतः स्वाभाविक है, हम सब अपनी अपनी यात्राओं के विषय में चर्चा करने में व्यस्त हो गए। हिम्मत सिंह लगातार गाड़ी की रोशनी चमकाकर हमें आगाह कर रहे थे। वे हमें व्यग्र संकेत भेजते हुए शीघ्र वहाँ से उठकर वापिस नगर चलने के लिए अनुरोध कर रहे थे।

हम हिम्मत सिंह जी से विवाद कर सकते थे क्यूंकि हमें ना तो भय प्रतीत हो रहा था, ना ही किसी भूत-प्रेत की उपस्थिति का आभास हो रहा था। किन्तु हमने ऐसा ना करने का निश्चय किया। यहाँ हमारे विश्वास का प्रश्न नहीं था। यदि उन्हे ऐसा विश्वास है कि इन स्थलों पर भूत-प्रेतों का वास है एवं रात के समय उन भूत-प्रेतों को आकुल नहीं करना चाहिए तो हमें उनकी भावनाओं का परिहास नहीं करना चाहिए। हमारे अनौपचारिक हावभाव पर उनकी विकलता उचित ही है।

कुलधरा का परिदृश्य
कुलधरा का परिदृश्य

आईए आपको इस ‘चुड़ैल’ सैर के विषय में बताती हूँ। कुलधरा गाँव की यह दर्शन यात्रा हमें इन स्थानों पर ले गई:

• एक कुआं जिसमें ऐसा माना जाता है कि अनेक लोगों को मार कर डाला गया था
• एक मंदिर जो रात्रि के समय बंद था
• अनेक समाधियाँ जिन पर स्मारक शिलाएं थीं। इन्हे देओली भी कहा जाता है।
• त्यक्त एवं शापित गाँव

कुलधरा के गाँव अब पूर्णतः खंडहर में परिवर्तित हो चुके हैं।

हमने गाँव के मुखिया के दुमंजिले घर में प्रवेश किया। मेरे साथ आए कुछ पर्यटकों को मुखिया के घर के भूतहा कक्ष में सिहरन सी हो रही थी। यहाँ एक कक्ष है जहां लोगों ने कुछ असाधारण गतिविधियों का आभास किया है तथा उनके विषय में बहुत लिखा है। किन्तु सत्य कहूँ तो मुझे कुछ भी असाधारण प्रतीत नहीं हुआ। केवल एक ही भय मस्तिष्क में था कि स्याह रात्रि में खंडहर के असमतल घरती पर ठोकर खाकर गिर ना जाऊँ।

जो भी हो, रात के अंधेरे में एक भुतहा माने जाने वाले खंडहर में विचरण करने का रोमांच मुझे भुलाये नहीं भूलेगा।

मरुस्थल का अद्वितीय भूदृश्य

दूसरे दिवस भी हमने कुलधरा के शापित गाँव का दर्शन किया। इस समय हम यहाँ दिन के समय आए थे।

कुलधरा जैसलमेर
कुलधरा जैसलमेर

दिन के प्रकाश में स्थानीय पीली शिलाओं के खंडहर इस क्षेत्र की पीली रेत में घुलमिल रहे थे। कुछ कोणों से तो ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम स्वर्ण से घिरे हुए हैं। अब समझ में आया कि जैसलमेर दुर्ग को सोनार किला क्यों कहते हैं। पीली रेत से भरी विस्तृत मरु भूमि से समाधि तथा स्मारक शिलाएं ऐसे बाहर झांक रही थीं जैसे गीली धरती से अनेक अंकुर फूट पड़े हों।

थार मरुस्थल के इस अप्रतिम दृश्य को किसी ऊंचे स्थान से निहारने के लिए हमने गाड़ी को एक पहाड़ी पर चढ़ाई। इस पहाड़ी पर एक छोटा मंदिर है। इस मंदिर के चारों ओर परिक्रमा करते हुए आप थार मरुस्थल का विहंगम दृश्य पा सकते हैं।

धरती पर कई स्थानों पर सूखे पोखर थे। जब भी किंचित वर्षा हो जाए तो यहाँ जल संचित होता है। कदाचित यह एक सूखा हुआ मरु उद्यान है। इस ऊंचे स्थान से हमारी दृष्टि सर्वाधिक संभव दूरी तक पहुँच रही थी। ऐसा दृश्य आप केवल मरुस्थल में अथवा समुद्र तट पर ही पा सकते हैं।

आप को स्मरण होगा जैसलमेर भारत-पाक सीमा के अत्यंत समीप है। कुछ स्थानों पर तो हम अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा से केवल २० किलोमीटर की दूरी पर ही थे। वहाँ किसी भी आम भारतीय नागरिक के समान मैं भी कल्पना करने लगी थी कि इस सीमा रेखा के उस पार क्या होगा?

समाधि स्मारक अथवा देओली

सुंदर लोद्रवा मंदिर की ओर जाते समय हम अनेक स्थानों पर रुके जहां कई समाधियों के समूह थे। गाँव के खंडहर में ३ ऐसे स्थल थे।

छतरी के अवशेष
छतरी के अवशेष

अधिकतर समाधियों के नाम पर केवल स्मारक शिलाएं खड़ी थीं। मील के पत्थर के समान खड़ी इन शिलाओं पर कभी किसी पुरुष की शिल्पाकृति तो कभी किसी जोड़े अथवा एक पुरुष के संग दो स्त्रियों की आकृति उत्कीर्णित थी। कदाचित यह संकेत करते हैं कि एक साथ कितने लोगों की मृत्यु हुई थी, एक पुरुष अथवा पुरुष एवं उसकी पत्नी या पत्नियाँ। क्या ये सती प्रथा का भी द्योतक है? कदाचित हाँ।

कुछ समाधियों के ऊपर विशेष छत्री सदृश स्मारक भी निर्मित थे। कदाचित वे महत्वपूर्ण व्यक्तियों की समाधियाँ होंगी। इन स्मारकों पर की गई शिल्पकारी में लहँगे एवं ओढ़नी धारण किए हुए स्त्रियों के परिधान राजस्थानी शैली के प्रतीत होते हैं। वहीं पुरुषों के परिधानों में मुग़लों का प्रभाव स्पष्ट झलकता है।

सती स्मारक
सती स्मारक

इन सभी स्मारक शिलाओं पर देवनागरी भाषा में अनुलेखन हैं। उन पर अंकित तिथियाँ मेरे सीमित ज्ञान के अनुसार उन्हे १७ वीं. सदी के अंत अथवा १८ वीं. सदी के आरंभ के आसपास का बताती हैं। साहित्यों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इनमें से कुछ १३ वीं. सदी के भी हो सकते हैं। अनुलेखन यह भी बताते हैं कि वह स्मारक कुलधरा के किसी ब्राह्मण का है अथवा कलशर जाति के किसी व्यक्ति का। कलशर जाति कदाचित पालीवाल ब्राह्मणों की उपजाति रही हो।

और पढ़ें: बड़ा बाग जैसलमेर की राजसी छत्रियाँ

मुझे बताया गया कि ऊंची एकल शिला, जिस के ऊपर भगवान की प्रतिमा उत्कीर्णित हो, समीप ही किसी जल स्त्रोत की ओर संकेत करती है। मेरी तीव्र इच्छा हुई कि स्थलों के अंकन की इन प्राचीन तकनीकों को हमें संरक्षित कर रखना चाहिए जिससे सांकेतिक चिन्हों द्वारा लोगों को आम आवश्यकताओं को खोजने में सहायता हो सके ।

खाबा दुर्ग

एक अन्य पहाड़ी के ऊपर खाबा दुर्ग स्थित है। घुमावदार मार्ग से पहाड़ी पर जाते समय यह दुर्ग हमें चारों ओर से दृष्टिगोचर होता है। पहाड़ी पर स्थित इस खाबा दुर्ग के खंडहर के ऊपर से इसी प्रकार का एक अन्य गाँव दिखाई पड़ता है, अत्यंत संगठित तथा आधुनिक किन्तु त्यक्त।

खाबा दुर्ग
खाबा दुर्ग

हम जहां भी जा रहे थे, लोग हमें इन शापित गांवों तथा इन्हे त्यागने के कारणों के विषय में बता रहे थे। जहां तक मेरे दृष्टिकोण का प्रश्न है, मैं इन खंडहरों में प्राचीन शहरी बस्ती देख रही थी। सीधी रेखा में संरचित घर जिनके मध्य चौड़ी सड़कें थी। सभी घरों की संरचना लगभग समान थी तथा वे छोटे छोटे समूहों में निर्मित थे।

सभी घर अब नष्ट हो गए हैं। केवल खंडित भित्तियाँ खड़ी हैं मानो घरों की नींव ही यहाँ वहाँ से उग आई हों। किसी भी घर की छत अब शेष नहीं है। बस्ती के एक ओर भित्ति के अवशेष देख ऐसा प्रतीत होता है कि कदाचित यह नगर की सीमा रही होगी।

खाबा दुर्ग के भीतर
खाबा दुर्ग के भीतर

इन अवशेषों को देख ये कुछ सदियों पूर्व के गाँव प्रतीत नहीं होते। अपितु इन्हे देख ऐसा आभास होता है मानो ये प्राचीन काल के शहरी बस्ती रहे होंगे। इन्हे देख कोई भी विश्वास करने लगेगा कि ये कदाचित सिंधु नगरी सभ्यता का भाग रहे होंगे। विरोधाभास यह है कि यह संरचना एक दुर्ग है तथा इसके निर्माण में ईंटों के स्थान पर पत्थरों का प्रयोग किया गया है। जल निकासी व्यवस्था मुझे दिखाई नहीं दी। चूंकि हमने यहाँ अत्यंत कम समय व्यतीत किया था, कदाचित मेरे द्वारा उन्हे ढूँढने में कमी रह गई होगी।

आशा करती हूँ कि मुझे इन गांवों के दर्शन करने का एक और अवसर प्राप्त हो, वह भी किसी ऐसे इतिहासकार के निर्देशन में, जो मुझे इनके विषय में पर्यटन उद्योग द्वारा दी गई जानकारी से अपेक्षाकृत अधिक विस्तारपूर्वक जानकारी दे सके।

कुलधरा के इन खंडित गांवों में अपने जीवंत समय की कुछ ऊर्जा अब भी उपस्थित है। इन का अनुभव प्राप्त करने के लिए इनके प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है।

यात्रा सुझाव

कुलधरा का प्राचीन मंदिर
कुलधरा का प्राचीन मंदिर

आप यह भलीभाँति जानते हैं कि मरुस्थल में खो जाना अत्यंत आसान है। इन गांवों के दर्शन करने आते समय इस तथ्य का स्मरण रहे। अनेक स्थानों पर सही मार्ग दिखाते संकेत चिन्ह भी नहीं हैं। अनवरत मोबाईल नेटवर्क प्राप्त होने में भी कठिनाई होती है। अतः इस स्थान की यात्रा करने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि आप किसी स्थानीय व्यक्ति को साथ ले लें जो आपको स्थलों की यात्रा करा कर आपको वापिस ले आए।

यदि आप रात की सैर करना चाहते हैं तो आपके साथ एक स्थानीय जानकार होना अत्यंत आवश्यक है।

अपने साथ भरपूर पेयजल तथा कुछ खाद्य पदार्थ अवश्य रखें।

मरुस्थल की शुष्क एवं उष्ण वायु से बच ने के लिए स्वयं को अधिकाधिक रूप से ढक लें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

2 COMMENTS

  1. अनुराधा जी,
    कुलधरा का बहुत सुंदर,प्रभावी शब्द चित्रण । इसी वर्ष जैसलमेर यात्रा के दौरान कुलधरा जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ । स्मृतियां फिर ताज़ा हो गईं…
    विरान मरूस्थल में मुख्य सड़क से गांव का निर्जन पहुॅंच मार्ग, गांव से जुड़ी भुतहा कथाओं को कुछ हद तक बयां भी करता है ! विरान गांव के दूर दूर तक फैले छोटे छोटे खंडहर भी गांव के शापित एवम् परित्यक्त होने का एहसास कराते है ।आपने सही कहा है राजस्थान पर्यटन निगम गांव के भुतहा आभास को अछुता रखने में सफल रहा है और गांव का यहीं स्वरूप एवम् भुतहा किंवदंतियां पर्यटको आकर्षित भी करती है । यहां के पालीवाल समुदाय के बारे मे भी तथ्यपरक जानकारी से ज्ञानार्जन हुआ ।
    बेहद प्रभावी एवम् उम्दा आलेख….धन्यवाद !

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