शिरगाँव की लइराई देवी – गोवा की सात बहने और एक भाई के मंदिर

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गोवा के विषय में लोकप्रिय धारणा के ठीक विपरीत, गोवा एक मंदिरों का प्रदेश है। गोवा में प्रति व्यक्ति जितने मंदिर हैं, भारत के किसी अन्य भाग में कदाचित ही होंगे। यहाँ अनेक गौड़ सारस्वत मंदिर हैं जो मुख्यतः गोवा के गौड़ सारस्वत ब्राह्मण परिवारों के कुल देवताओं के मंदिर हैं। इनके अतिरिक्त गोवा में मंदिरों के भिन्न भिन्न समूह हैं। आईये मैं आपको लइराई मंदिर समूह के विषय में बताती हूँ जिसका सम्बन्ध गोवा की सात बहनें एवं एक भाई की कथा से है। इस देवालय समूह के अंतर्गत सात प्राचीन मंदिर हैं जो मुख्यतः मांडवी नदी के उत्तर में स्थित हैं।

गोवा की सात बहनें एवं एक भाई की कथा

एक समय की कथा है, सात बहनें एवं एक भाई हाथी पर सवार होकर गोवा की धरती पर पहुंचे। ऐसा कहा गया है कि वे किसी घाटी से होते हुए गोवा पहुंचे थे।

लइराई मंदिर - शीरगाँव गोवा
लइराई मंदिर – शीरगाँव गोवा

आठों भाई-बहन बिचोली होते हुए मयें(मायेम) गाँव पहुंचे। वे जिस हाथी पर सवार होकर यहाँ पहुंचे थे, उस हाथी का विग्रह आप मयें गाँव के निकट वडन्यार में देख सकते हैं। यह माया-केलबाई अथवा केलम्बिका मंदिर के समीप स्थित है। इसे पहाड़ी के ऊपर लेटराइट शिला में उत्कीर्णित किया है।

एक दिन बड़ी बहन केलबाई ने अपने भाई खेतोबा को चूल्हा जलाने के लिए अंगारे लाने  के लिए भेजा। उसे आने में विलम्ब होता देख केलबाई ने अपनी बहन लइराई को उसे ढूँढने भेजा। लइराई ने देखा कि खेतोबा अन्य बालकों के संग खेल में व्यस्त था। कुपित होकर उसने अपने भाई की पीठ पर पाँव से ठोकर मारने का प्रयास किया। खेतोबा ने एक ओर झुक कर स्वयं को इस आघात से बचाया। आहत खेतोबा ने बहन के संग वापिस लौटने से मना कर दिया तथा वहां से बैंगिणी गाँव चला गया। जब केलबाई को पूर्ण वृत्तान्त ज्ञात हुआ तो उन्होंने भाई के गृह त्यागकर चले जाने की घटना के लिए स्वयं को उत्तरदायी माना। इसलिए उन्होंने मुलगाँव जाकर तप किया। अपने प्रण के अनुसार वे अपने सर पर जलते अंगारे रखकर चलीं। उनके साथ उनके पांच सौ अनुयायी भी थे, जिन्हें धोंड कहते हैं।

बहन केलबाई के निर्णय को देख कर लइराई को पश्चाताप हुआ तथा उन्होंने भी एक पावन स्थल पर जाने का निर्णय लिया। अतः वे शिरगांव में जाकर कर तप करने लगीं। प्रायश्चित के रूप में वे अंगारों पर चलीं। उनके संग उनके सात सौ अनुयायी अर्थात् धोंड भी थे। उनकी स्मृति में भक्त गण आज भी वार्षिक जात्रा में अग्नि वेदी के अंगारों पर चलते हैं।

उन्हें देख मोरजई भी जल में जाने का निर्णय लेती हैं। ऐसा माना जाता है कि कालान्तर में उनकी प्रतिमा मछुआरों को मिली जिन्होंने मोर्जी गांव में उसकी स्थापना कराई।

एक बहन, अन्जीदीपा ने कारवार के समीप अन्जिदीप नामक द्वीप पर स्थायी होने का निश्चय किया।

शीतलाई ने धरती का त्याग कर पाताल में स्थायी होने का निर्णय लिया।

मोरजई देवी मंदिर - मोर्जी गाँव गोवा
मोरजई देवी मंदिर – मोर्जी गाँव गोवा

वर्तमान में सातों बहनें सात भिन्न स्थानों पर निवास करती हैं।

  • शिरगाँव में लइराई
  • मुलगाँव में केलबाई
  • मयें(मायेम) में महामाई
  • म्हापसा में मीराबाई
  • मोर्जी में मोरजई
  • कारवार के समीप अन्जिदीप द्वीप पर अन्जीदीपा – मंदिर अब शेष नहीं है।
  • शीतलाई पाताल चली गयीं।

इन स्थानों पर अब भी इन देवियों के मंदिर हैं जहां उनकी आराधना की जाती है।

शिरगाँव का लइराई मंदिर

बिचोली तालुका में स्थित शिरगाँव एक छोटा सा गाँव है जहां लगभग ३०० परिवारों के लगभग ३००० सदस्य निवास करते हैं। यह एक अनोखा गाँव है जहां किसी प्रकार की हिंसा नहीं होती है। किसी पशु की हत्या नहीं की जाती है। काजू तथा नारियल से किसी भी प्रकार की मदिरा नहीं निकली जाती है। गाँव में किसी भी प्रकार का सामिष भोजन नहीं खाया जाता है। यहाँ तक कि अंडे भी वर्ज्य हैं। जो गांववासी तामसिक भोजन करना चाहें, वे गाँव के बाहर जाकर उन्हें ग्रहण करते हैं। गाँव के भीतर घोड़ों का प्रवेश प्रतिबंधित है। जब तक गाँव में दत्तात्रय का मंदिर नहीं था, वहां कुत्ते भी नहीं थे।

लइराई मंदिर का द्वार
लइराई मंदिर का द्वार

गाँव के मध्य में पीले-नारंगी रंग में देवी का भव्य मंदिर है। यहाँ लइराई को कलश के रूप में पूजा जाता है। गर्भगृह के मध्य में एक कलश स्थापित है जिसे देवी के रूप में अलंकृत किया जाता है। यह कलश गर्भ का प्रतिनिधित्व करता है जो सर्व उत्पत्ति का द्योतक है। पुरोहितजी ने मुझे जानकारी दी कि यहाँ देवी के त्रिगुणात्मक आदिशक्ति रूप की आराधना की जाती है। वे एक अनभिव्यक्त उर्जा हैं जिनसे सबकी उत्पत्ति होती है।

देवी का चित्र

मंदिर के एक ओर देवी का २४० वर्ष प्राचीन चित्र है। इस चित्र में उन्हें हरी साड़ी धारण की हुई स्त्री के रूप में, एक कलश की सीमा के भीतर चित्रित किया है। इस चित्र को देखते ही आपको राजा रवि वर्मा के द्वारा चित्रित चित्रों का स्मरण हो आएगा। वस्तुतः, यह चित्र राजा रवि वर्मा के द्वारा चित्रित चित्रों से अधिक प्राचीन है। कदाचित राजा रवि वर्मा ने इस चित्र से ही प्रेरणा प्राप्त की हो। इस चित्र से यह भी ज्ञात होता है कि यह शैली राजा रवि वर्मा के पूर्व भी अस्तित्व में थी।

मंदिर अपेक्षाकृत सादा है। इसका मंडप विशाल है किन्तु मंडप को कालांतर में जोड़ा गया है।

लइराई देवी का वार्षिकोत्सव या जात्रा
लइराई देवी का वार्षिकोत्सव या जात्रा

वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन लइराई की वार्षिक जात्रा आयोजित की जाती है। १५ फीट चौड़ी, १५ फीट लम्बी तथा २१ फीट ऊंची अग्नि वेदी तैयार की जाती है। देवी द्वारा अंगारों पर चलने की स्मृति में भक्तगण भी इस वेदी के अंगारों पर चलते हैं। मैं सोच में पड़ गयी कि लइराई केवल एक कथा की पात्र हैं या वास्तव में वे हमारी पूर्वज हैं?

इस जात्रा के अतिरिक्त, नवरात्रि भी मंदिर का प्रमुख उत्सव है, जो देवी मंदिर होने के कारण स्वाभाविक भी है। पुरोहितजी ने कहा कि शरद नवरात्रि के प्रत्येक दिवस मंदिर में चंडीपाठ का पठन किया जाता है।

देवी को मोगरे के पुष्प अर्पित किये जाते हैं।

मंदिर के उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित लकड़ी के द्वार अत्यंत सुन्दर हैं। मंदिर के चारों ओर स्थित घरों में भी इसी प्रकार के उत्कृष्ट द्वार हैं।

इस मंदिर से लगभग एक किलोमीटर दूर देवी का मूलस्थान है। शिरगाँव में प्रवेश करने से पूर्व देवी सर्वप्रथम इस स्थान पर स्थानापन्न हुई थीं। यहाँ भी उनका उजाले पीले रंग में एक मंदिर है। यहाँ देवी के रूप में चींटियों की एक वाल्मीकि की पूजा की जाती है। समीप ही ग्राम पुरुष का मंदिर है। उसके भीतर कुछ अनोखी शैल प्रतिमाएं हैं जो शिवलिंग सदृश प्रतीत होने के पश्चात भी शिवलिंग नहीं हैं।

मुलगाँव की केलबाई

सबसे बड़ी बहन केलबाई का मुलगाँव में एक विशाल मंदिर है। यह शिरगांव से लगभग ५ किलोमीटर दूर है। केलबाई की विग्रह रूप में पूजा की जाती है। उनके विग्रह में उनके दोनों हाथों में केले के पुष्प हैं। उनके दोनों ओर दो हाथी हैं। गर्भगृह के भीतर उनकी सुन्दर शैल प्रतिमा को देख वे गजलक्ष्मी प्रतीत होती हैं। मुझे स्मरण है, मैंने गोवा राज्य संग्रहालाय में भी ऐसी प्रतिमाएं देखी हैं।

मुलगांव की केल्बाई देवी
मुलगांव की केल्बाई देवी

जिस दिन मैं केलबाई मंदिर गयी थी, वहां अनेक सुहागिनें हल्दी-कुमकुम का उत्सव मनाने पधारी हुई थीं। उन्होंने मुझे भी उत्सव में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। देवी केलबाई के मंदिर में अनेक स्त्रियों के हाथों हल्दी-कुमकुम प्राप्त करना मेरे लिए देवी का वरदान ही था।

मंदिर के बाहर एक मंडप है जिसके भीतर पेठ रखा है, जो सर पर अंगारे रखकर चलने का पात्र है। इस मंदिर का वार्षिक उत्सव चैत्र मास की शुक्ल पंचमी को आयोजित किया जाता है।

केलबाई को अबोली के पुष्प अर्पित किये जाते हैं।

मयें का महामाया अथवा माया-केलबाई मंदिर

यह एक छोटा सा मंदिर है जिसके भीतर देवी की सुन्दर शैल प्रतिमा है। मूल मंदिर कदाचित इससे भी लघु था जिसे इस मंदिर के भीतर देखा जा सकता है। मंदिर के भीतर विशाल बेलनाकार स्तंभ हैं तथा इसकी छत गुम्बददार है। गलियारे में लकड़ी के स्तंभ हैं तथा गोवा के ठेठ बाल्काओ के समान बैठक क्षेत्र हैं। मंदिर के नवीन मंडप के निर्माण का कार्य जारी है जो मंदिर से अपेक्षाकृत अत्यंत विशाल है।

मएँ गाँव की महामाया देवी
मएँ गाँव की महामाया देवी

प्रत्येक चैत्र शुक्ल अष्टमी के दिवस इस मंदिर का वार्षिक उत्सव आयोजित किया जाता है। इस समय सबसे बड़ी बहन केलबाई अपनी छोटी बहन महामाया से दो दिवसों के लिए भेंट करने आती हैं। उन्हें एक मुखौटे के रूप में बेंत के संदूक में लाया जाता है। मैंने ऐसी कथा कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर के विषय में भी सुनी थी जो त्र्यम्बोली देवी अथवा तेम्बलाई देवी से भेंट करने जाती हैं।

सात बहनों के मंदिरों में से मुझे यह मंदिर सर्वाधिक शांत एवं दैवी शक्ति से उर्जावान प्रतीत हुआ।

मोर्जी की मोरजई देवी

मैंने इस मंदिर के दर्शन दो ध्येयों को ध्यान में रखकर किये थे, एक था सात बहनों के दर्शन तथा दूसरा इस मंदिर में की गयी कावी कला का अवलोकन। इस मंदिर में देवी महिषासुरमर्दिनी के रूप में स्थित हैं। पुरोहितजी ने मुझे देवी की उत्सव मूर्ति भी दिखाई जो मुख्य मूर्ति की सटीक प्रतिकृति है।

महिषासुरमर्दिनी के रूप में मोर्जई देवी
महिषासुरमर्दिनी के रूप में मोर्जई देवी

इस मंदिर का नवीनीकरण कुछ दिन पूर्व ही किया गया है। इस पर श्वेत व लाल रंग में स्थानीय कावी कला द्वारा आकृतियाँ चित्रित की गयी हैं। मंदिर की बाहरी व भीतरी भित्तियाँ, छत, झरोखों की चौखटें, यहाँ तक कि आसपास स्थित लघु मंदिरों पर भी कावी कला द्वारा अलंकरण किया गया है।

विडियो : मोर्जी के मोरजई मंदिर पर गोवा की कावी कला

इंडीटेल के यूट्यूब चैनल YouTube channel IndiTales पर कावी कला का विडियो देखिये।

मंदिर के समीप एक लघु जलकुंड है। इस गाँव में देवी के दो अन्य मंदिर भी हैं जो इस मंदिर के समीप ही स्थित हैं।

मोरजई मंदिर की वार्षिक जात्रा श्रावण मास की कृष्ण त्रयोदशी के दिवस आयोजित की जाती है।

म्हापसा की मीराबाई अथवा मिराबिलिस

मीराबाई मंदिर को अब सेंट जेरोम गिरिजाघर में परिवर्तित कर दिया गया है। मीराबाई अब मिलाग्रेस के नाम से जानी जाती हैं। जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक ‘Lotus In The Stone’ में कहा है, मंदिर संस्कृति के कुछ डोरे अब भी जीवित हैं। मीराबाई को तेल अर्पित किया जाता था। गिरिजाघर के भीतर देवी को मिलाग्रेस के रूप में पूजा जाता है। वहीं उनकी एक प्रतिमा गिरिजाघर के बाहर भी है जिस पर भक्त तेल अर्पित करते हैं। गोवा के अन्य अनेक स्थानिकों के समान, मीराबाई के कुछ भक्तों ने भी धर्म परिवर्तन कर लिया है।

लइराई मन्दिर से मीराबाई के लिए एक हांडी में तेल भेजा जाता है। उसी प्रकार मीराबाई की ओर से लइराई के लिए मोगरे के पुष्पों की टोकरी भेजी जाती है।

अन्जिदीप/अन्जेदिवा द्वीप पर अन्जीदीपा का मंदिर

जितना मुझे ज्ञात है तथा जितनी जानकारी मैंने इन पांच मंदिरों में एकत्र की, किसी को भी अन्जीदीपा के मंदिर के अस्तित्व की जानकारी नहीं है। जहाँ तक अन्जिदीप द्वीप का प्रश्न है, यह द्वीप अब नौसेना के अधीन है। वहां जाने के लिए उनकी अनुमति आवश्यक है। इतिहासकारों के किसी भी प्रलेखन में वहां ऐसे किसी मंदिर का उल्लेख नहीं है। या तो वहां कभी कोई मंदिर था ही नहीं, यदि मंदिर था भी, तो वह समय के साथ नष्ट हो चुका है। वैसे भी कहावत है, यदि भक्त भगवान का स्मरण ना करें तो वे भी सदा के लिए खो जाते हैं।

बैंगिणी गाँव का खेतोबा मंदिर

खेतोबा की मूर्ति
खेतोबा की मूर्ति

सात बहनों के भाई, खेतोबा का मंदिर बैंगिणी में है जिस पर रंगों की सर्वाधिक छटा है। खेतोबा की पाषाणी प्रतिमा प्राचीन प्रतीत होती है। वे कमल आसन पर आरूढ़ हैं। उनकी प्रतिमा को चन्दन से अलंकृत किया जाता है। यह प्रतिमा किंचित झुकी हुई है। जैसा की कथा में उल्लेख है, उनकी बहन लइराई ने उनकी पीठ पर लात मारने का प्रयास किया था जिससे बचने के लिए वे एक ओर झुक गए थे।

यह एक छोटा मंदिर है जहां तक पहुँचने के लिए मार्ग भी संकरा है।

हम जब यहाँ पहुंचे, उनकी संध्या आरती की जा रही थी।

खेतोबा की आरती सुनें।

हाथी

सात बहन एवं एक भाई जिस गज पर आरूढ़ होकर आये थे, उस गज की प्रतिमा मयें के महामाया मंदिर से कुछ दूरी पर, एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है। उस तक पहुँचने के लिए लेटराइट या रुद्राक्ष शिला की सुन्दर सीढ़ियाँ हैं। जब हम वहां पहुंचे, अन्धकार हो चुका था। किन्तु हम एक बाल हाथी की प्रतिमा को देख पाए। उस हाथी की व्यवस्थित रूप से देखभाल एवं आराधना की जाती है।

तो यह थी कथा गोवा के सात बहनों एवं एक भाई की। क्या आपने क्षेत्र की भी ऐसी ही कोई रोचक कथा है?

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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