लद्दाख की महिला बौद्ध दैवज्ञ से एक अविस्मरणीय भेंट

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लद्दाख ही नहीं, समूचा हिमालयीन क्षेत्र रहस्यों से परिपूर्ण प्रतीत होता है। पग पग पर हमारा सामना मायावी कथाओं एवं लोगों की विभिन्न आस्थाओं से होता है जिन्होंने इस रहस्यपूर्ण इंद्रजाल को जीवंत रखा है। चंद्रताल में मैंने एक गड़ेरिये की कथा सुनी थी जो सरोवर में स्थित एक जलपरी के प्रेम में बावला हो गया था। वहीं गुलमर्ग में मैंने बाबा रेशी की कथा सुनी थी। उन्ही रहस्यमयी अनुभवों को जीवंत रखते हुए लद्दाख में मेरी भेंट एक बौद्ध दैवज्ञ अस्तित्व से हुई।

महिला बौद्ध दैवज्ञ से एक साक्षात्कार
महिला बौद्ध दैवज्ञ से एक साक्षात्कार

लद्दाख के थिकसे एवं चेमरे मठों तक सड़क यात्रा करने के पश्चात हम लेह से पूर्व, चोग्लाम्सर गाँव में रुके। हमारे परिदर्शक हमें वहां एक साधारण से लद्धाखी घर में ले गये। शीत ऋतु का प्रातःकाल था। घर के सभी सदस्य घर के बाहर बैठकर धूप सेक रहे थे। वे हमें घर के एक कक्ष के भीतर ले गए तथा वहां बैठने के लिए आसन दिया। हमने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। कक्ष के भीतर सम्पूर्ण स्त्री वर्ग सामने की ओर बैठा था तथा पुरुष वर्ग कक्ष के पृष्ठभाग में विराजमान था।

लद्दाख की बौद्ध दैवज्ञ पद्मा लामो

कुछ क्षण पश्चात बौद्ध दैवज्ञ पद्मा लामो ने अपने नन्हे पोते के साथ कक्ष में प्रवेश किया तथा स्मित हास्य द्वारा हमारा अभिवादन स्वीकार किया। उन्होंने एक सामान्य सा सलवार व कुर्ता धारण किया हुआ था। किसी भी अन्य दादी की भाँति वे अपने पोते का हाथ पकड़कर कक्ष में आयी थी। हमारा अभिवादन स्वीकार करने के पश्चात वे कक्ष से चली गयीं। कुछ क्षणों पश्चात वे पारंपरिक बौद्ध परिधान धारण कर आध्यात्मिक बैठक हेतु पुनः उपस्थित हो गयीं। उन्होंने पूर्व के परिधान के ऊपर एक लम्बा पारंपरिक बौद्ध चोगा धारण कर लिया था। वैसे भी जनवरी मास में लद्दाख जैसे स्थान पर वस्त्रों की कितनी भी परतें हों, आवश्यक ही प्रतीत होती हैं।

बौद्ध दैवज्ञ पद्मा लामो जी
बौद्ध दैवज्ञ पद्मा लामो जी

आज मेरी प्रसन्नता चरम सीमा पर थी क्योंकि मैं अपने समक्ष एक स्त्री दैवज्ञ के दर्शन कर रही थी। हम में से अधिकांश आगंतुकों ने अपने मानसपटल पर मानव स्वभाववश एक पुरुष बौद्ध दैवी अस्तित्व की छवि उभार ली थी। हमें पूर्व सूचना प्रदान की गयी थी कि हमें उनके व सम्पूर्ण आध्यात्मिक बैठक के छायाचित्र अथवा चलचित्र नहीं लेने हैं। उन्हें विचारने योग्य प्रश्नों की पूर्व सूची भी तैयार रखने के लिए कहा गया था। हमारे जीवन से सम्बंधित किसी भी विषय पर प्रश्न पूछने की हमें अनुमति थी।

बौद्ध अनुष्ठान

अनुष्ठान के लिए धान्य एवं दीप
अनुष्ठान के लिए धान्य एवं दीप

पद्मा लामो जी ने बौद्ध अनुष्ठानों का आरम्भ करते हुए समक्ष एक पंक्ति में रखे पीतल के अनेक पात्रों में जल भरना आरम्भ किया। कुछ पत्रों में सत्तू तथा गेहूं जैसे धान्य भी भरे। तत्पश्चात उन्होंने एक दीप प्रज्ज्वलित किया। हमें यह जानने की उत्सुकता थी कि दीपक में तेल भरा है अथवा याक का मक्खन। उन्होंने हास्य करते हुए कहा कि ‘यह अमूल मक्खन है’। मुझे अमूल कंपनी की पहुँच पर अचम्भा हुआ। पद्मा लामो जी के सधे हुए हाथों में अनेक वर्षों का अभ्यास स्पष्ट झलक रहा था।

चीख

अनुष्ठान की सभी आवश्यकताएँ पूर्ण करने के पश्चात पद्मा लामो जी ने एक बंधी हुई पोटली अपने समीप अपने आसन पर रख दी तथा वेदी पर विराजमान देवों के समक्ष नतमस्तक हो गयीं। अचानक हमारे आसपास स्थित मौन भरे वातावरण में कर्णभेदी स्वर गूँज उठा। नतमस्तक हुई पद्मा जी अचानक एक तीव्र चीख के साथ उठकर बैठ गयीं। उनकी चीख इस तथ्य का द्योतक थी कि वे एक दैवी अवस्थिति में प्रवेश कर चुकी हैं। वे प्रबलता से अपना शीष हिला रही थीं। उनके केशों से छिटकता जल कक्ष में चारों ओर पसर गया था। उनके मुंह से ऊँचे स्वर में निकलते अस्पष्ट शब्द मुझे व्याकुल व भयभीत कर रहे थे। मुंह से तीव्र अस्पष्ट स्वर निकालते हुए ही उन्होंने अपनी पोटली खोली तथा उसमें से एक मुकुट निकाल कर अपने शीष पर धारण कर लिया। उस मुकुट पर विभिन्न बोधिसत्वों के चित्र चित्रित थे। बैठक के पश्चात मुझे बताया गया था कि इस मुकुट को अपने शीष पर वही धारण कर सकता है जो दैवी स्थिति में प्रवेश कर चुका है।

पद्मा लामो जी अपना अनुष्ठान का सामान समेटते हुए
पद्मा लामो जी अपना अनुष्ठान का सामान समेटते हुए

तत्पश्चात पद्मा जी ने एक ब्रोकेड का वस्त्र ओढ़ लिया, जो वैसा ही था जैसा हमने इससे पूर्व स्पितुक मठ के गस्टर उत्सव में चाम नर्तकों को धारण करते देखा था। दीर्घ काल तक झूमने, हिलने एवं चीखने के पश्चात वे हमारे प्रश्नों के उत्तर प्रदान करने के लिए तत्पर हुईं। ऐसा माना जाता है कि उनकी इस स्थिति में कुछ दिव्य आत्माएँ उनके शरीर पर आधिपत्य जमा लेती हैं। वे उन आत्माओं एवं हमारे मध्य एक माध्यम की भूमिका निभाती हैं जिनके द्वारा हम उन आत्माओं से चर्चा कर सकते हैं। प्रश्न पूछने से पूर्व हमने उन्हें एक श्वेत दुपट्टा अर्पित किया जिसे उन्होंने उत्तर देने से पूर्व हमें वापिस दे दिया। हमारे परिदर्शक अर्थात् गाइड ताशी ने एक दुभाषिये की भूमिका निभाते हुए हमारे प्रश्नों को एक भिन्न भाषा में अनुवादित कर उन्हें सुनाया। हमने अनुमान लगाया कि वह लद्दाखी भाषा होगी। उनका उत्तर सुनने के पश्चात ताशी ने उन्हें पुनः हिन्दी/अंग्रेजी में अनुवाद कर हमें बताया।

बौद्ध दैवज्ञ के साथ प्रश्नोत्तरी

प्रत्येक प्रश्न सुनने के पश्चात पद्मा जी गेहूं के कुछ दानों को डमरू पर छिड़कती थीं। दाने कहाँ गिर रहे हैं, उसके आधार पर वे हमें उत्तर प्रदान कर रही थीं। हममें से कुछ के कोई प्रश्न नहीं थे। हमने केवल उनसे आशीष माँगा। हो सकता है कि हमारे इस व्यवहार को उन्होंने अपनी दैवी शक्ति व क्षमता पर हमारे विश्वास की कमतरता माना हो। किन्तु हम असमंजस में थे। इस प्रकार के व्यक्तिगत व अन्तरंग प्रश्नोत्तरी के लिए एकांत एवं घनिष्ठता की आवश्यकता होती है जो लोगों से भरे उस कक्ष में उपलब्ध नहीं था। हममें से कुछ लोगों ने सामान्य प्रश्न अवश्य पूछे थे, जैसे क्या भविष्य में उनके स्वास्थ्य में सुधार होगा? इन प्रश्नों के वे सामान्य व व्यापक उत्तर दे रही थीं, जैसे आपके शरीर का भार आवश्यकता से अधिक है, अतः आपको भविष्य में कष्ट हो सकता है अथवा आप वैद्य से आवश्यक सलाह लें, आदि।

हमारे वाहन चालक ने अपने स्वर व भावभंगिमाओं द्वारा पूर्ण विश्वास प्रदर्शित करते हुए उनसे लद्दाखी भाषा में प्रश्न किया। तब उन्होंने उसके कष्ट का पूर्ण रूप से संज्ञान लेते हुए अत्यंत आत्मीयता से उसे लद्दाखी भाषा में उत्तर दिया। हमारा वाहन चालक उनके उत्तर से अत्यंत संतुष्ट था। हमारे सन्दर्भ में कदाचित हमारी भाषा से लद्दाखी भाषा तथा विपरीत अनुवाद करने में हमारे प्रश्नों एवं उनके उत्तरों के सटीक भाव कहीं लुप्त हो रहे थे। इसीलिए हम उनकी इस शक्ति का अनुभव नहीं ले सके।

सभी के प्रश्न समाप्त होते ही पद्मा जी अपनी तन्मयावस्था से बाहर आयीं तथा पूर्व रूप से आचरण करने लगीं। किन्तु उनके मुख पर थकान स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी। कुछ क्षण पूर्व वे जिस उग्र रूप में स्थित थीं, उससे बड़ी मात्रा में उनकी उर्जा व्यय होती होगी। सम्पूर्ण कालावधि में यदि कुछ उन्हें विचलित कर रहा था, तो वह था उनका नन्हा पोता।

पुनः सामान्य स्थिति में प्रवेश

सामान्य स्थिति में पुनः प्रवेश करते ही पद्मा जी हमसे हिन्दी भाषा में वार्तालाप करने लगीं। हम यह विचार करने के लिए विवश हो गए कि उनकी तन्मयावस्था में हमें एक अनुवादक की आवश्यकता क्यों पड़ी? हिन्दी भाषा में वार्तालाप करते हुए हम उनसे अधिक आत्मीयता से जुड़ सकते थे। किन्तु हमें बताया गया कि अपनी तन्मयावस्था में वे केवल तिब्बती भाषा में ही संवाद कर सकती हैं। उस क्षण मुझे यह आभास हुआ कि वे तिब्बती भाषा में संवाद कर रही थीं, ना कि लद्दाखी भाषा में।

पद्मा जी से वार्तालाप करते हुए हमें ज्ञात हुआ कि वे अपनी वंशावली एवं अपने पारिवारिक परम्पराओं के आधार पर बौद्ध दैवज्ञ बनी हैं। पद्मा जी से पूर्व उनके दादाजी भी बौद्ध दैवज्ञ थे तथा उन्होंने अपनी धरोहर पद्मा जी को विरासत के रूप में प्रदान की थी। दैवज्ञ पदवी प्राप्त करने के लिए पद्मा जी ने अनेक बौद्ध लामाओं से प्रशिक्षण प्राप्त किया था। वे अपने दैवज्ञ प्राप्ति की प्रक्रिया के विषय में अधिक चर्चा करने में उत्सुक नहीं थीं। ना ही वे इस प्रक्रिया के विषय में सामान्य ज्ञान प्रदान करने के लिए तत्पर थीं। अतः तिब्बती बौद्ध धर्म के अंतर्गत एक दैवज्ञ आत्मा की पहचान कैसे की जाती है, इस विषय पर मैंने एक विडियो एवं संस्करण ढूंढा है। आप इसे देखकर आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

श्रद्धा व सम्मान

हम इस तथ्य से अत्यंत ही आनंदित थे कि हमें एक स्त्री बौद्ध दैवज्ञ से भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हमने प्रत्यक्ष अनुभव किया कि उनके गाँव के स्थानिक अपने बौद्ध दैवज्ञ पद्मा जी से अत्यंत श्रद्धा व सम्मान से व्यवहार करते हैं। पद्मा जी इसे अपना सौभाग्य मानती हैं कि भगवान ने उन्हें लोगों के कष्टों एवं समस्याओं के निवारण के लिए एक माध्यम  के रूप में चयनित किया है। अनेक दुखियारे उनके पास विविध समस्याएं लेकर आते हैं। वहां से वापिस जाते समय वे अपने साथ समस्याओं का निवारण ले जाते हैं। यदि संतोषजनक निवारण प्राप्त ना भी हो तो अपने साथ कम से कम एक आशा तथा आनंद अवश्य लेकर जाते हैं।

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श्रद्धा एवं विश्वास

श्रद्धा उसे ही होती है जिसके भीतर विश्वास होता है। मैंने उस कक्ष में बैठे सभी लद्दाखियों में पद्मा लोमा जी के प्रति असीम श्रद्धा एवं विश्वास देखा। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि उनके बौद्ध दैवज्ञ के पास उन की सभी समस्याओं एवं कष्टों का निवारण है। मुझे आभास हुआ कि इस प्रकार की श्रद्धा एवं विश्वास कुछ क्षणों में निर्मित नहीं होती हैं। ऐसी श्रद्धा व विश्वास का निर्माण होने में एक कालावधि व्यतीत हो जाती है। अपने अनेक अनुभवों द्वारा पुष्टिकरण के पश्चात् ही हम किसी नवीन संकल्पना पर विश्वास करने के लिए तत्पर होते हैं।

मेरे लिए दैवी आत्मा पद्मा लामोजी से प्रत्यक्ष भेंट करना स्वयं में एक अनोखा अनुभव था। साथ ही उनकी पूर्ण तन्मयावस्था में लिप्त होने की प्रक्रिया को भी प्रत्यक्ष देखने का अवसर प्राप्त हुआ। वे जिस प्रकार से लोगों के प्रश्नों एवं समस्याओं को सुनकर उन्हें उत्तर दे रही थीं, वह भी अत्यंत दर्शनीय था। अंत में वे जिस प्रकार एक सामान्य स्थिति में पुनः आयीं तथा जिस सहजता से एक अनुरक्त दादी की भूमिका में समाहित हो गयीं, यह सब अनुभव करना हमारे लिए अद्वितीय था। स्वयं को एक भूमिका से दूसरी भूमिका में अत्यंत सहजता एवं सत्यता से आत्मसात करना, अनेक वर्षों के अनुभव से ही संभव हो सकता है।

वे हमें एक असाधारण एवं दिव्य सिद्धि से परिपूर्ण स्त्री प्रतीत हुईं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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