मुक्तेश्वर धाम – कुमाऊँ पहाड़ों के न भूलने वाले दृश्य

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मुक्तेश्वर से हिमालय श्रंखला
मुक्तेश्वर से हिमालय श्रंखला

उत्तरांचल को देवभूमि कहा जाता है। सच मानिये इसमें किंचित भी आतिशयोक्ति नहीं। कुमाऊं व गढ़वाल मंडलों में बंटी, हिमालय पर्वत श्रन्खलाओं से घिरी, ये अप्रतिम घाटियों केवल देवों की भूमि, स्वर्ग ही हो सकती है| संभवतः इसीलिए सर्वत्र देवस्थानों से, मुख्यतः भगवान शिव के मंदिरों से सुशोभित है ये भूमि| प्रातः जब सूर्य की पहली किरण इन पर्वतों को सहला कर धीरे से अँधेरे की परत को सरकाती है, हिमालय का मनोहर मुख प्रकट होकर हमें मंत्रमुग्ध कर देता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात स्वर्ग के दर्शन प्राप्त हो गए। इन्ही मनोरम दृश्यों को निहारते हमने उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध झीलों के सानिध्य में कुछ दिन बिताये। तत्पश्चात हम मुक्तेश्वर के लिए रवाना हो गए।

मुक्तेश्वर में जंगल की सैर

मुक्तेश्वर से हिमालय की चोटियाँ
मुक्तेश्वर से हिमालय की चोटियाँ

अल्मोड़ा से मुक्तेश्वर जानेवाले मार्ग पर स्थित जंगल के दूसरी ओर, सुखताल गाँव में हमारे रहने की व्यवस्था की गयी थी। इस गाँव तक पहुँचने हेतु हमारे पास दो विकल्प थे। मुक्तेश्वर शहर के भीतर से अथवा जंगल होते हुवें । बिना सोच विचार किये हमने, रोमांच से भरपूर जंगल की सैर करते सुखताल पहुँचने का निश्चय किया। जंगल के सुरक्षा जांच चौकी के बही पर हमने अपना पंजीकरण करवाया। यहाँ हमें सुरक्षा संबंधी निर्देश दिए गए जिनके अनुसार १० की.मी. दूर स्थित इस वन के बहिर्गमन द्वार पर पहुँचने तक हमें वाहन से उतरने अथवा मार्ग पर टहलने की सख्त मनाही थी।

इस जंगल के अन्दर गाड़ी से सैर करना किसी स्वप्न से कम नहीं था। मार्च का महीना होने के कारण बुरुंश वृक्ष पुष्पों से आच्छादित थे व अपनी सुन्दरता की चरमसीमा पर थे। घने हरे देवदार वृक्षों के बीच से झांकते गहरे लाल रंग के बुरुंश के पुष्प एक अद्भुत छटा बिखेर रहे थे। जंगल के संकरे मार्ग पर वृक्षों की शाखाएं आच्छादित होकर हमें अपनी छाँव में समेट रही थीं। हर दिशा में जंगल रहस्यमयी प्रतीत हो रहा था, मानो हर झुण्ड एक नयी कहानी छुपाये हुए था।

मुक्तेश्वर के जंगलों से सूर्यास्त
मुक्तेश्वर के जंगलों से सूर्यास्त

घने जंगल से बाहर निकलने तक सूर्यास्त का समय हो चुका था। डूबते सूरज के धुंधले प्रकाश में जब जंगल की ओर मुड़ कर देखा तब वह और भी मायावी प्रतीत होने लगा। डूबते सूर्य के सांध्यप्रकाश में पहाड़ों की केवल छाया दिखाई पड़ रही थी जिन पर ऊंचे देवदार के वृक्षों के केवल रेखा कृति दिखाई पड़ रही थी।

जंगल से कुछ नियत स्थानों पर, झाड़ियों को साफ़ कर जंगल विभाग के कर्मचारियों व उनके परिवार जनों हेतु निवास का प्रबंध किया गया है। यहाँ लोग बिना किसी भय के बाहर घूम सकते है। बहिर्गमन द्वार के समीप पर्यटकों की सुविधा हेतु सराय व विश्राम गृह बनाए गए हैं।

जंगल से बाहर आते ही हम अल्मोड़ा मार्ग पर थे जहां “फ्रोजन वुड्स “ नामक हमारी सुन्दर कुटिया स्थित थी।

मुक्तेश्वर में प्रातःकालीन हिमालयी परिदृश्य का अवलोकन

नंदा देवी चोटी - मुक्तेश्वर
नंदा देवी चोटी – मुक्तेश्वर

भोर होते ही, गले में कैमरे लटकाए, हम हिमालय के दर्शन हेतु निकल पड़े। सड़क पर पैदल चलते चारों ओर के परिदृश्य में खो गए। उस क्षण में अपने आप को खो कर भी बहुत कुछ पा लिया था। सड़क के एक ओर ऊंचे पहाड़ियों पर घने देवदार वृक्ष आसमान छूने का प्रयत्न कर रहे थे। उन पर उछलते तरह तरह के पक्षियों मन मोह रहे थे अपने कलरव के साथ। कठफोड़वा पक्षी देवदार के एक शाखा से दूसरे शाखा पर छलांग लगा रहे थे। घने हरे देवदार वृक्षों पर बैठे नीले चटक रंग के कई नीलकंठ पक्षी सहसा ध्यान आकर्षित कर रहे थे। मार्ग के दूसरी ओर, घाटी में सीड़ीदार खेती देख पाठशाला का स्मरण हो आया। शाला में हम सब ने पढ़ा है कि पहाड़ों में खेती सीड़ीदार पद्धति द्वारा की जाती है। घाटी के उस पार के दृश्य से हमारी आँखे खुली की खुली रह गयीं। बर्फ से ढंकी नंदादेवी व हिमालय पर्वतमाला की अन्य चोटियाँ सूर्योदय के प्रकाश में चमचमा रही थीं।

देवदार के घने हरे जंगल व उसके पीछे श्वेत बर्फीली चोटियाँ अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। हम इनमें इतने खो गए कि हमारा स्वयं का अस्तित्व पिघलने लगा था। उस क्षण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हमारे हृदय का हिमालय से जुड़ा सम्बन्ध सर्वोपरि है। शेष सब महत्वहीन है।

उस क्षण तीव्र इच्छा हो रही थी कि इन चोटियों को घंटों निहारते रहें। परन्तु सूर्योदय के पश्चात कोहरे ने इन्हें अपने आँचल में समेट लिया और हमें स्वप्नों की दुनिया से यथार्थ में लौट आना पड़ा।

मुक्तेश्वर धाम

मुक्तेश्वर धाम मंदिर
मुक्तेश्वर धाम मंदिर

मुक्तेश्वर धाम एक प्राचीन शिवमंदिर है, जिसके नाम पर ही इस शहर व आसपास के इलाके को मुक्तेश्वर कहा जाता है। अन्य कई प्राचीन मंदिरों की तरह यह मंदिर भी एक पहाड़ी के शिखर पर बनाया गया है। यहाँ से हिमालय और हरियाली भरी घाटियों का दृश्य बहुत खूबसूरत दिखाई पड़ता है। यह मंदिर अपने आप में एक छोटा सा मंदिर है। इसके चारों ओर कई और छोटे मंदिर स्थित हैं।

इनमें से एक मंदिर भगवान् शिव की अर्धांगिनी, देवी पार्वती को समर्पित है। एक मंदिर को राम दरबार की उपमा दी गयी है। यहाँ भगवान् राम, देवी सीता, भ्राता लक्ष्मण और सेवक हनुमान की प्रतिमाएं साथ साथ रखी हुई हैं। भगवान् विष्णु के भावी, १० वें अवतार कलकी की भी प्रतिमा स्थापित है। सारे मंदिर बहुत छोटे छोटे है व इनकी संरचना अपेक्षाकृत प्राचीन भी नहीं है। इन मंदिरों के चारों ओर भिन्न भिन्न आकारों की घंटियाँ बंधी हुई हैं। यह एक स्थानीय प्रथा है जिसमें भक्तगण अपनी इच्छा की पूर्ति हेतु यहाँ घंटियाँ बांधते हैं। यही प्रथा हमने जागेश्वर धाम के मार्ग पर स्थित गोलू देवता मंदिर में भी देखी।

मुक्तेश्वर धाम में एक साधु की सहायता से हमने मंदिर को बारीकी से जाना। वे हमसे इतनी धीमी आवाज में चर्चा कर रहे थे मानो बड़ी तपस्या से अर्जित शक्ति का ह्रास नहीं करना चाहते थे। उन्होंने हमारे हर प्रश्न व जिज्ञासा का मुस्कुराकर उत्तर दिया। परन्तु आवाज धीमी होने के कारण मुझे समझने में थोड़ी कठिनाई हो रही थी।

मुक्तेश्वर अर्थात् मुक्ति के देवता! ये हमें जन्म व मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिला कर मोक्ष प्रदान करते हैं।

मुक्तेश्वर मंदिर परिसर में लगे फलक द्वारा यह जानकारी प्राप्त हुई कि सिख गुरु नानक देव जी ने इस स्थल की यात्रा की थी। तत्पश्चात यह स्थल सिख समुदाय के लोगों के लिए भी अतिमहत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। जिम कॉर्बेट ने भी अपने संस्मरणों में अपनी मुक्तेश्वर यात्रा का उल्लेख किया है। वे इसे मुक्तेसर कहते थे।

मुक्तेश्वर धाम पहाड़ी की सैर

मुक्तेश्वर धाम पैदल परिक्रमा पथ
मुक्तेश्वर धाम पैदल परिक्रमा पथ

मुक्तेश्वर धाम जिस पहाड़ी पर स्थित है, उसके चारों ओर एक संकरी पगडंडी बनायी हुई है। ऊंचे देवदार वृक्षों की छाँव से ढंकी इस पगडंडी पर हम भी पैदल चल पड़े। इस पहाड़ी के चारों ओर चलते हमें ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम मंदिर की परिक्रमा कर रहे हों। सही अर्थ में मंदिर केवल संकेत मात्र था। जिस भगवान् को हम पूजते हैं वे इस सम्पूर्ण पहाड़ी में समायें हुए हैं। इस पहाड़ी पर चलते, भगवान् की अनुभूति के साथ साथ उनके चमत्कारों के भी दर्शन हुए।

करीब १०० मीटर चलने के पश्चात हमें एक विशाल शिलाखण्ड हमारे ऊपर झुकती हुई दिखाई पड़ी। नाग के फन की तरह दिखती इस शिला को नागशिला कहते हैं। कुछ दूरी पर दो विशाल शिलाएं खायी की ओर बाहर झुकी हुई थीं। इनके मध्य धातु का तार बाँध कर जोखिम भरे खेल का आयोजन किया जा रहा था। भिन्न ऊंचाईयों पर स्थित इन दोनों शिलाओं के मध्य इस तार पर चरखियों द्वारा सहभागियों को लटकाया जाता है। गुरुत्वाकर्षण द्वारा ये खिलाड़ी वेगवान गति से निचली शिला तक पहुंचते हैं। दोनों शिलाओं के मध्य ये लोग खायी में लटकते रहते हैं। इस खायी में मेरी झांकने तक की हिम्मत नहीं थी। पतले तार पर लटकते इन लोगों के साहस अथवा दुस्साहस को देख मुझे बहुत अचरज हो रहा था।

चौली की जाली

चौली की जाली मुक्तेश्वर कुमाऊँ
चौली की जाली मुक्तेश्वर कुमाऊँ

कुछ दूर और चलने पर हमने कुछ ऊबड़ खाबड़ चट्टानें देखीं जो खायी की ओर लटकी हुई थीं। हमारा परिदर्शक हमें उन सारी देशी व विदेशी चलचित्रों के बारे में रस ले कर बताने में व्यस्त हो गया जिन्हें इस स्थान पर फिल्माया गया था।

शिलाओं का यह एक अद्भुत गठन था। खाई में लटकी इन शिलाओं पर खड़े होकर नीचे झांकना किसी दृढ़ ह्रदय धारक के ही बस की बात है। यहाँ से नीचे खाई में भिन्न भिन्न हरे रंगों की छटाएं बिखरी बहुत मनोहारी प्रतीत हो रही थीं। यहाँ से तीन भिन्न प्राकृतिक संरचनाएं स्पष्ट दिखाई पड़ रही थीं। ऊपर नीला आकाश, नीचे घने देवदार वृक्षों की बिछी हरियाली व मध्य में स्वच्छ श्वेत बर्फ से ढंकी हिमालय की चोटियाँ। यह वही हिमालय की चोटियाँ हैं जिन्हें हमने ‘फ्रोजन वुड्स’ से भी देखा था।

चौली की जाली से मुख्तेश्वर का विहंगम दृश्य
चौली की जाली से मुख्तेश्वर का विहंगम दृश्य

इन शिलाखंडों पर लिखे नामों को देख ज्ञात होता है कि यह स्थल पर्यटकों में बहुत प्रसिद्ध है। परन्तु इस तरह खूबसूरत स्थलों की स्वच्छता नष्ट करना अपराध भी है। हमने यहाँ एक छेद युक्त शिलाखंड भी देखा। हमारे परिदर्शक के अनुसार इसी छेद के कारण इसका नाम चौली की जाली पड़ गया। संतान की इच्छा रखती सौभाग्यवती स्त्रियाँ शिवरात्री के दिन इस छेद के पार जाती हैं। खाई में लटकते इस चिकने शिलाखंड के छेद से गुजरने की कल्पना मात्र से मैं सिहर उठी। किवदंतियों के अनुसार यहीं देवी ने दानव का वध किया था। शिला पर उपस्थित चिन्ह इसी युद्ध के प्रतीक हैं।

पहाड़ से लटकी हुई चट्टानें
पहाड़ से लटकी हुई चट्टानें

खाई से नीचे देखने पर सीड़ीदार खेत ऊपर से बहुत सुन्दर प्रतीत होते हैं। यहाँ की सुन्दरता को एक और आयाम प्रदान करते हैं। पत्थरों की चढ़ाई, लटकती रस्सी पर चढ़ना व उतरना इत्यादि रोमांचक खेलों हेतु यह अति उपयुक्त स्थान है।

पहाड़ों की सैर

देवदार के घने जंगल - मुक्तेश्वर
देवदार के घने जंगल – मुक्तेश्वर

चौली की जाली व यहाँ के विहंगम दृश्यों के अवलोकन के पश्चात हम पहाड़ी के दूसरी ओर चल पड़े। संकरी पगडंडियों से होते, वृक्षों का आलिंगन करते, हम इस जंगल में समाने लगे थे। धीरे धीरे ऊपर चढ़ते अंततः हम पहाड़ी के ऊपर स्थित मंदिर तक पहुँच गए।

सीढ़ीदार पहाड़ी खेत - मुक्तेश्वर
सीढ़ीदार पहाड़ी खेत – मुक्तेश्वर

हमने यहाँ गोली मारने के आखेट का भी अभ्यास किया। कुल मिलाकर यह भ्रमण प्रकृति, अचंभा, जोखिम, आखेट, मनोरंजन, भोजन और आध्यात्मिकता का अनोखा मिश्रण था।

मुक्तेश्वर १९ वीं. ई. में बनाई गयी भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान केंद्र के लिए भी प्रसिद्ध है।

मुक्तेश्वर की यात्रा मनोरंजक बनाने हेतु सुझाव

नीला आकाश, हरी भरी घाटियाँ और श्वेत हिमालय पर्वतमाला - मुक्तेश्वर
नीला आकाश, हरी भरी घाटियाँ और श्वेत हिमालय पर्वतमाला – मुक्तेश्वर

• मुक्तेश्वर पहुँचने हेतु निकटतम रेल स्थानक, ६५ की.मी. दूर स्थित काठगोदाम में है। यहाँ से सड़क मार्ग द्वारा ही मुक्तेश्वर पहुंचा जा सकता है।
• मुक्तेश्वर, अल्मोड़ा से ३५ की.मी. दूर स्थित है। हमारे यात्रा के समय मार्गों की अवस्था भी उत्तम थी।
• हिमालय की सुन्दरता का अनुभव प्राप्त करने का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल है। इस हेतु सूर्योदय पूर्व जागने की तैयारी आवश्यक है। आप रहने हेतु ऐसे स्थान का चयन कर सकते हैं जहां से परिदृश्य स्पष्ट दिखाई दे।
• परिदृश्य अवलोकन हेतु सर्वोत्तम स्थान पहाड़ी के ऊपर स्थित मुक्तेश्वर मंदिर है।
• मुक्तेश्वर भ्रमण के समय बाहर भोजन हेतु केवल नूडल्स के ठेले उपलब्ध हैं।
• पीने का पानी सदैव साथ रखें।
• वर्षा ऋतु को छोड़कर हर ऋतू मुक्तेश्वर व कुमाऊं भ्रमण हेतु उपयुक्त है।

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

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