चिदंबरम का नटराज मंदिर – शिव के आनंद तांडव का स्थल

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1933

चिदंबरम, अधिकांश उत्तर भारतीयों के लिए यह केवल एक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ का नाम है। अधिक से अधिक यह उस गाँव का नाम होगा जहां के वे निवासी हैं। चिदंबरम का महत्व आप तभी जान पाएंगे जब आप दक्षिण भारत एवं वहाँ के मंदिरों को जानने का प्रयास करेंगे। तभी आप जानेंगे कि सुप्रसिद्ध नटराज मंदिर चिदंबरम में ही है। उसे चिदंबरम मंदिर भी कहते हैं। चेन्नई से दक्षिण की ओर लगभग २४० किलोमीटर तथा पुद्दुचेरी से लगभग ६० किलोमीटर दूर स्थित इस नगर में अनेक बड़े-छोटे अप्रतिम मंदिर हैं।

चिदंबरम का नटराज मंदिर
चिदंबरम का नटराज मंदिर

नटराज मंदिर से संबंधित इतिहास एवं किवदंतियाँ

यहाँ मंदिर की स्थापना से कई वर्ष पूर्व यह भूभाग एक विशाल वनीय प्रदेश था। तिल्लई मैंग्रोव के नाम पर इस वन का नाम तिल्लई वन पड़ा। इस वन में ऋषियों का वास था जो सदा विभिन्न अनुष्ठानों का आयोजन करते रहते थे। समयोपरांत उन्हे ऐसा भ्रम होने लगा था कि शक्तिशाली मंत्रों द्वारा वे भगवान शिव को भी नियंत्रित कर सकते हैं। फलतः भगवान शिव ने उन्हे यथार्थ से अवगत कराने का निश्चय किया। एक दिवस उन्होंने एक भिक्षु का रूप धारण किया तथा मोहिनी रूप में भगवान विष्णु को साथ लेकर उन ऋषियों से भेंट करने यहाँ आए। भगवान शिव का वो स्वरूप देख ऋषि पत्नियाँ उन पर मुग्ध हो गईं। इससे कुपित होकर, ऋषियों ने शिव पर सर्पों का वर्षाव किया । भगवान शिव ने उन सर्पों को आदर पूर्वक स्वीकारा तथा उन्हे आभूषण के रूप में अपनी देह पर धारण किया। उन्होंने शिव पर बाघ को छोड़ा। भगवान शिव ने बाघ को मुक्ति प्रदान की तथा बाघचर्म को अपने कटि पर धारण कर लिया। यह देख ऋषियों ने अपनी समस्त आध्यात्मिक शक्तियां एकत्रित की तथा मुयलकन असुर अर्थात् अपस्मर का आव्हान किया जो अज्ञानता एवं निरर्थक भाषण का प्रतीक है। भगवान शिव ने अपस्मर पर खड़े होकर उसे गतिहीन कर दिया। तत्पश्चात वे आनंद तांडव नृत्य करने लगे तथा अपना वास्तविक रूप ऋषियों के समक्ष प्रकट किया। ऋषियों को अपनी अज्ञानता का पूर्ण आभास हुआ तथा वे भगवान शिव के समक्ष नतमस्तक हो गए।

तभी से भगवान शिव यहाँ नटराज के रूप में पूजे जाने लगे।

चिदंबरम् नटराज मंदिर का एक प्राचीन चित्र
चिदंबरम् नटराज मंदिर का एक प्राचीन चित्र

एक अन्य किवदंती के अनुसार भगवान शिव के आनंद तांडव का दर्शन करने के लिए भगवान विष्णु आदिशेष के रूप में यहाँ आए थे। वे अब भी इस मंदिर में गोविन्दराज के रूप में विराजमान हैं।

तिल्लई नटराज मंदिर से संबंधित सभी ऐतिहासिक संदर्भ यह दर्शाते हैं कि कम से कम ६वीं सदी से यह मंदिर व्यवहार में है। संगम साहित्य से प्राप्त जानकारी के अनुसार मंदिर के पुनरुद्धार में प्रमुख वास्तुविद के रूप में विडुवेलविडुगु पेरुंटक्कन का योगदान है जो पारंपरिक विश्वकर्मा समुदाय के वंशज हैं। अप्पर एवं सम्बन्द की कविताओं में भी चिदंबरम के नृत्य मुद्रा में विराजमान भगवान का उल्लेख है। १०वीं सदी के आसपास चिदंबरम चोलवंश की राजधानी थी तथा नटराज उनके कुलदेवता थे। कालांतर में उन्होंने अपनी राजधानी तंजावुर में स्थानांतरित कर दी थी।

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किन्तु इस मंदिर के अस्तित्व के विषय में तात्विक साक्ष्य १२वीं सदी से आगे के ही है। दक्षिण भारत के पल्लव, पंड्या, चोल, चेर एवं विजयनगर जैसे अनेक राजवंशों ने अपनी कालावधि में इस मंदिर के रखरखाव एवं विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। आप प्रत्येक राजवंश की शैली के चिन्ह मंदिर के विभिन्न भागों में देख सकते हैं।

१४वीं सदी के आरंभ में मलिक काफ़ुर ने इस मंदिर पर आक्रमण किया तथा अपार मात्रा में मंदिर की संपत्ति लूट कर ले गया था। अनेक प्रतिमाएं भूमिगत गड़ी हुई थीं जिन्हे गतकाल में उत्खनित किया गया है। पुर्तगलियों, अंग्रेजों एवं फ़्रांसीसियों ने भी इस मंदिर पर कोई दया नहीं दिखायी थी।

नटराज मंदिर के विभिन्न शिव स्वरूप

मंदिर में पूजे जाने वाला भगवान शिव का प्राथमिक स्वरूप नृत्य देव एवं लौकिक नर्तक नटराज का है। मंदिर के पूर्वी गोपुरम पर आप उनकी नृत्य की विभिन्न मुद्राएं देख सकते हैं। वास्तव में ये केवल नृत्य मुद्राएं नहीं हैं, अपितु १०८ कारण अथवा गतियाँ हैं जिनका शास्त्रीय नृत्य में प्रयोग किया जाता है।

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भगवान शिव यहाँ उनके निर्गुण स्वरूप अर्थात् शिवलिंग के रूप में भी उपस्थित हैं।

चिदंबरम मंदिर के गलियारे
चिदंबरम मंदिर के गलियारे

चिदंबरम रहस्य – चिदंबरम मंदिर दक्षिण भारत के ५ पंचभूत मंदिरों में से एक है। यह पंच महाभूतों में से एक, आकाश का प्रतिनिधित्व करता है। गर्भगृह में एक रिक्त स्थान है। यहां ५१ स्वर्ण बिल्व पत्रों से बना एक हार है जिसकी पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ शिव एवं पार्वती का वास है किन्तु वे मानवी नेत्रों के समक्ष अदृश्य रहते हैं। इस स्थान को सदैव लाल व काले वस्त्र के आवरण से ढँक कर रखा जाता है। यह आवरण माया का प्रतिनिधित्व करता है। यह आवरण केवल विशेष पूजा अर्चना के समय ही खोला जाता है। तब आप इन स्वर्ण बिल्व पत्रों को देख सकते हैं। यह इस मंदिर को अद्वितीय बनाता है।

दक्षिण भारत के ५ पंचभूत मंदिर हैं-
• चिदंबरम का चिदंबरम मंदिर – आकाश का प्रतिनिधित्व करता है।
कांचीपुरम का एकंबरेश्वर मंदिर – पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करता है।
• तिरुचिरापल्ली का जंबुकेश्वर मंदिर – जल का प्रतिनिधित्व करता है।
• थिरुवन्नमलाई का अरुणाचलेश्वर मंदिर – अग्नि का प्रतिनिधित्व करता है।
• कालाहस्ती का कालाहस्तीश्वर मंदिर – वायु का प्रतिनिधित्व करता है।

चिदंबरम मंदिर के उत्सव एवं दैनिक पूजा अनुष्ठान

एक पालकी में भगवान की पादुकाओं को लाने की प्रक्रिया द्वारा चिदंबरम मंदिर की दैनिक पूजा अनुष्ठान का आरंभ किया जाता है। सम्पूर्ण दिवस में उनके ६ विभिन्न अनुष्ठान किए जाते हैं। इन सभी अनुष्ठानों में शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। तत्पश्चात, उसी पालकी में भगवान की पादुकाओं को वापिस ले जाकर दिवस की समाप्ति की जाती है।

चिदंबरम मंदिर के पाषण शिल्प
चिदंबरम मंदिर के पाषण शिल्प

चिदंबरम मंदिर के दो प्रमुख उत्सव हैं मार्गलि तिरुवादिरई एवं आणि तिरुमन्जनं। इन उत्सवों में भगवान को रथ पर बिठाकर उनकी शोभायात्रा निकाली जाती है।

नटराज मंदिर का कार्यभार दीक्षिदर ब्राह्मणों का समुदाय संभालता है। एक दीक्षिदर ब्राह्मण को विवाहोपरांत अपने परिवार से अर्चक की उपाधि विरासत में प्राप्त होती है। यद्यपि ऐसी मान्यता है कि इन ब्राह्मणों को स्वयं पतंजलि कैलाश पर्वत से यहाँ लेकर आए थे, तथापि ये केरल के नंबूदिरी से अधिक साम्य रखते प्रतीत होते हैं।

नटराज मंदिर की वास्तुकला

नटराज मंदिर का परिसर ४० एकड़ के क्षेत्र में पसरा हुआ है। मंदिर परिसर प्राकारों अथवा प्रांगणों की ५ परतों से घिरा है जिसमें सबसे भीतरी प्राकार में गर्भगृह है। कुल मंदिर एक ठेठ द्रविड़ वास्तुकला का पालन करता है। किन्तु इसका गर्भगृह ठेठ स्पष्टतः केरल अथवा मलाबारी शैली का है।

गोपुरम

मंदिर को घेरे हुए कुल नौ गोपुरम हैं। उनमें से चार विशालतम गोपुरम बाहरी प्राकार में चार दिशाओं में स्थित हैं। ये गोपुरम मंदिर से अपेक्षाकृत कहीं अधिक ऊंचे हैं। फिर भी, अपने शुद्ध स्वर्ण के शीर्ष के कारण साधारण ऊंचाई का यह मुख्य मंदिर उठकर दिखाई पड़ता है। मुख्य प्रवेश द्वार पूर्वी गोपुरम के नीचे है जहां तक पहुँचने के लिए एक संकरे मार्ग से जाना पड़ता है। सँकरे मार्ग के दोनों ओर पूजा सामग्री बिक्री करते अनेक विक्रेता तथा जूते-चप्पल के रखवाले इसे और अधिक संकरा बना देते हैं। गोपुरम का निचला प्रवेश द्वार का भाग रंगा हुआ नहीं है। किन्तु इसकी ऊपरी विशाल अधिरचना को नीली पृष्ठभूमि में अनेक रंगों में रंगा हुआ है। उस पर अनेक देवी-देवताओं के शिल्प हैं जो पुराणों के विभिन्न कथाओं को प्रदर्शित करते हैं।

नटराज मंदिर का गोपुर
नटराज मंदिर का गोपुर

गोपुरम के अन्तः भाग में पत्थर के छोटे छोटे चौकोर खंडों पर भरतनाट्यम की विभिन्न मुद्राओं को उत्कीर्णित किया गया है। गोपुरम के अग्र एवं पृष्ठ भाग पर लघु प्रतिमाएं हैं। उनमें से कुछ को ताले में बंद कर रखा है। मैं समझ नहीं पायी कि ऐसा क्यों किया गया है।

महिषासुरमर्दिनी - नटराज मंदिर चिदंबरम
महिषासुरमर्दिनी

कुछ मूर्तियों को वस्त्रों एवं पुष्पों से अलंकृत किया हुआ है। उन्हे देख ऐसा आभास होता है कि उनकी नियमित पूजा अर्चना की जाती है जबकि अन्य मूर्तियों का कदाचित केवल अवलोकन किया जाता है। मेरे अनुमान से जहां जहां महिषासुर का वध करती देवी की महिषासुरमर्दिनी रूप में प्रतिमाएँ हैं, केवल उन्ही की पूजा अर्चना की जाती है। स्मित हास्य लिए तथा हाथ जोड़े एक दाढ़ीधारी पुरुष की प्रतिमा मुझे अत्यंत रोचक प्रतीत हुई। मेरे सर्वोत्तम अनुमान के अनुसार यह प्रतिमा उस राजा की होगी जिसने किसी काल में इस मंदिर का संरक्षण किया होगा। इसके एक ओर एक छोटे आले के भीतर स्थित प्रतिमा उनकी पत्नी की होगी। एक अनभिज्ञ दर्शक के लिए अन्य गोपुरम भी इसी प्रकार के हैं, केवल उनमें नृत्य मुद्राएं नहीं हैं। प्रांगण में कुछ अन्य छोटे-बड़े मंदिर हैं जो विभिन्न देवी-देवताओं को समर्पित हैं।

शिव मंदिर

मंदिर के भीतर विशाल गलियारे हैं जिन्हे अनेक विशाल चौकोर स्तम्भ आधार देते हैं। इन स्तंभों के फैले हुए शीर्ष इन गलियारों के ऊपर मंडप सा बनाते प्रतीत होते हैं। ये स्तम्भ अधिकांशतः सादे हैं किन्तु इनके ऊपरी भाग उत्कीर्णित हैं। इन गलियारों से होकर जाते हुए अत्यंत राजसी भाव का आभास होता है। मंदिर का भीतरी भाग बाहरी परिवेश से अत्यंत पृथक है। यह आपको एक भिन्न विश्व एवं कदाचित एक भिन्न कालावधि में ले जाता है।

मेरी उपस्थिति के समय मंदिर में अधिक दर्शनार्थी नहीं थे। जो भी यहाँ उपस्थित थे उन्होंने पारंपरिक परिधान धारण किए हुए थे। उनकी भक्ति की अवस्था वातावरण को अत्यंत पवित्र कर रही थी। मंदिर में उपस्थित पंडितों ने अधिकतम शीश का मुंडन कर केवल छोटी चुटिया बांधी हुई थी। उनकी देह पर चंदन से अनेक बिन्दु एवं रेखाएं बनी हुई थीं। मंदिर के क्रियाकलापों के साथ वे प्रत्येक दर्शनार्थी पर भी दृष्टि रख रहे थे तथा उन्हे विभिन्न पूजा-अनुष्ठान करने के लिए प्रेरित कर रहे थे। भक्तों द्वारा नकारने पर वे तुरंत उनसे विरक्त भी हो रहे थे। मेरी माने तो उनके इस आचरण को मन से न लगाएं।

नटराज मंदिर का गर्भगृह

नटराज मंदिर की स्वर्णिम छत
नटराज मंदिर की स्वर्णिम छत

चिति सभा अर्थात् चेतना कक्ष, नटराज मंदिर का गर्भगृह इसी नाम से जाना जाता है। यह ग्रेनाइट के आधार पर स्थापित चौकोर काष्ठी संरचना है जिसके छत पर सोने का पानी चढ़ा हुआ है। इसकी असामान्य रूप से तिरछी छत इसकी वास्तुशिल्प को अत्यंत विशेष बनाती है। गर्भगृह में नटराज की मूर्ति स्थापित है। गर्भगृह के भीतर अग्रभाग से नहीं जा सकते अपितु एक ओर से प्रवेश किया जाता है। नटराज की प्रतिमा पर वस्त्रों एवं पुष्पों की इतनी परतें रहती हैं कि आप विग्रह का अधिकांश भाग देख नहीं पाते। वैसे भी मंदिर के भीतर कुछ क्षण ही व्यतीत करने दिए जाते हैं।

चिदंबरम, यह शब्द चित एवं अंबर इन दो शब्दों के संयोजन से बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है, चेतना का आकाश। मंदिर के गर्भगृह के भीतर ये दोनों तत्व प्रदर्शित होते हैं।

कनक सभा या स्वर्ण कक्ष चिति सभा के ठीक सामने स्थित है। इस की छत स्वर्णिम है। ऐसा कहा जाता है कि इसकी छत को २२,६०० सुनहरी पट्टिकाओं को ७२,००० सुनहरी कीलों द्वारा जोड़कर बनाया गया है। आप जानते ही हैं कि २२,६०० मानवी श्वास की वह संख्या है जो वह एक दिन में ग्रहण करता है। वहीं, एक मानव की देह में ७२,००० की संख्या में शिराएं रहती हैं। शीर्ष पर स्थित ९ कलश मानवी देह के ९ द्वारों की ओर संकेत करते हैं। कनक सभा का प्रयोग अनेक अनुष्ठानों के आयोजनों में तथा मुख्य मूर्ति के दर्शन के लिए किया जाता है। चिति सभा एवं कनक सभा मंदिर के केंद्र हैं। अन्य सभी अवयव इनके चारों ओर स्थित हैं।

नृत्य सभा में ५६ स्तंभ हैं। घोड़ों एवं चक्रों का प्रयोग कर इसे एक रथ का रूप प्रदान किया है। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर शिव एवं पार्वती के मध्य नृत्य की स्पर्धा हुई थी जिसमें अपने प्रसिद्ध ऊर्ध्व तांडव मुद्रा का प्रदर्शन कर भगवान शिव ने विजय प्राप्त की थी।

नटराज मंदिर पर उत्कीर्णित हाथी
नटराज मंदिर पर उत्कीर्णित हाथी

राज सभा अथवा १००० स्तंभों का कक्ष शिव गंगा सरोवर के समीप स्थित है। मैं कल्पना सकती हूँ कि सरोवर से आती शीतल बयार का आनंद उठाते भक्तगण इस कक्ष में बैठकर तनिक सुस्ताते होंगे। इसकी भित्ति पर एक विशालकाय गज उत्कीर्णित है। राज सभा का रखरखाव देखकर यह लगभग परित्यक्त प्रतीत होता है।

देव सभा इस परिसर के प्राचीनतम संरचनाओं में से एक है। इसका प्रयोग कदाचित दर्शन के लिए पधारे साधु-संत ध्यान एवं भजन-गायन के लिए करते थे।

मंदिर परिसर के अन्य मंदिर

शिवकामसुंदरी मंदिर – यह प्रमुख शक्ति मंदिर देवी पार्वती को समर्पित है। ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन काल में इस मंदिर की भित्तियों पर सम्पूर्ण देवी माहात्म्य चित्रित था किन्तु कालांतर में वह पूर्णतः नष्ट हो चुका है। यह मंदिर नटराज मंदिर के पृष्ठ भाग में स्थित है। इसका भूतल अत्यंत रंगबिरंगा है।

चिदंबरम मंदिर की चित्रकारी
चिदंबरम मंदिर की चित्रकारी

गोविन्दराज मंदिर – यह मंदिर भगवान विष्णु के अनंतशयन रूप को समर्पित है। यह भगवान विष्णु के १०८ दिव्य देसम में से एक है। भगवान शिव के मंदिर में अनंतशयन विष्णु एवं देवी लक्ष्मी को देख मुझे सुखद आश्चर्य हुआ क्योंकि इस क्षेत्र में शैवों एवं वैष्णवों के मध्य विवाद सर्व विदित है। धर्म में समावेशिता का इससे उत्तम उदाहरण अन्य नहीं हो सकता है।

चंडीकेश्वर मंदिर – यह आपको प्रत्येक दक्षिण भारतीय शिव मंदिर में अवश्य दृष्टिगोचर होगा।

महालक्ष्मी मंदिर

मूलस्थान – यहाँ भगवान शिव अपने मूल रूप अर्थात् शिवलिंग रूप में पूजे जाते हैं।
सुब्रमण्यम मंदिर
गणेश मंदिर
सुंदरेश्वर एवं मीनाक्षी मंदिर
नवग्रह मंदिर
सूर्य मंदिर – यह मंदिर के प्राचीनतम भागों में से एक है।
नवलिंग मंदिर
शिवगंगा तीर्थ – यह मंदिर का प्रमुख जलकुंड है। इसके अतिरिक्त मंदिर परिसर में अन्य कई जलस्त्रोत हैं। माध्यम आकार की यह पुष्करणी उत्तरी गोपुरम की सीध में मंदिर के एक ओर स्थित है। इसके जल पर जब गोपुरम का प्रतिबिंब पड़ता है तो वह दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है। इस पुष्करणी के चारों ओर स्तंभों से युक्त एक गलियारा है। जब मैं यहाँ आई थी तब यह गलियारा अत्यंत ही गलिच्छ था। मेरा विश्वास है कि इसमें पैर रखना आपके लिए भी कठिन होगा।

कल्याण मंडप एवं यज्ञ शाला

इस मंदिर का भीतरी भाग अत्यंत विस्तृत है। इसके भीतर विचरण करते आप पर्याप्त समय व्यतीत कर सकते हैं। सभी छोटे मंदिर एक ओर हैं। अनेक स्थानों पर इसकी छत पर आप चटक नीले एवं सुनहरे रंगों में सुंदर आकृतियाँ देख सकते हैं। मुख्य मंदिर की सुनहरी छत वक्रीय है तथा इसके द्वार चांदी के हैं।

परिसर का रखरखाव

नटराज  मंदिर परिसर
नटराज मंदिर परिसर

भित्तियों पर जंग के धब्बों की उपस्थिति पत्थरों में उपस्थित लोहे की प्रचुर मात्रा के कारण हो सकती है। कदाचित इसी जंग से रक्षण करने के लिए गोपुरम को चटक रंगों में रंगा गया है क्योंकि इस क्षेत्र की वायु में अत्यधिक आर्द्रता रहती है। मंदिर में लगी बिजली की व्यवस्था में सौंदर्यविषयक सुधार अत्यावश्यक है। इस समय उन्हे देखें तो ऐसा प्रतीत होता है मानो इस अप्रतिम मंदिर को कुदृष्टि से बचाने के लिए उन्हे जानबूझ कर अव्यवस्थित रूप से बिठाया गया है। भित्तियों पर कहीं कहीं भित्तिचित्रों के अवशेष दृष्टिगोचर होते हैं। क्या कभी किसी ने इनके संरक्षक के लिए प्रयास किया होगा? मेरी यह भी इच्छा है कि इस प्रकार के धरोहरों एवं धार्मिक स्थलों की स्वच्छता को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि वहाँ की अस्वच्छता ना तो दर्शनार्थियों को व्याकुल कर रही थी ना ही वहाँ के अधिकारियों को विचलित कर रही थी।

चिदंबरम नटराज मंदिर की यात्रा से संबंधित कुछ सुझाव

नटराज मंदिर के दर्शन करने में ही आप आधा दिवस व्यतीत कर सकते हैं। इनकी अद्भुत शिल्पकारी व इसकी वास्तुकला निहारने में तथा मंदिर की जीवंत परंपरा के दर्शन करने में आप मग्न हो जाएंगे।

मंदिर के परिसर में चारों ओर घूमने के लिए १ से २ घंटों का अतिरिक्त समय रखें।

मंदिर प्रातःकाल से रात्रि तक खुला रहता है। मध्यकाल में दोपहर से संध्या ५ बजे तक मंदिर के पट बंद रहते हैं। अधिक जानकारी के लिए मंदिर के इस वेबस्थल से संपर्क करें।

मंदिर के बाह्य भाग में छायाचित्रीकारण की मनाही नहीं है। किन्तु मंदिर के भीतर इसकी अनुमति नहीं है, गर्भगृह के आसपास व भीतर तो कदापि नहीं।

चिदंबरम में इस प्रतिष्ठित नटराज मंदिर के अतिरिक्त भी अनेक दर्शनीय स्थल हैं। चिदंबरम नगर के दर्शनीय स्थल भी अवश्य देखें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

4 COMMENTS

  1. इस अलौकिक शक्ति के मंदिर की जानकारी पढने के उपरान्त मन में प्रभू की प्रतिमा का अद्भुत अनुभव जाग उठा। अत्यंत सुन्दर तथा संग्रहणीय वर्णन किया है आपने मिता मामी जी। मनःस्थिति सच में भावविभोर हो गई है। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे बैठे बैठे ही मन ही मन में प्रभू के इस विलक्षण मनोहारी मंदिर की परिक्रमा कर ली।
    👍🙏

  2. अनुराधा जी, भगवान शिव को समर्पित चिदंबरम का “नटराज” मंदिर, शिव के अलौकिक रूप “नटराज” के समान ही अद्भुत एवम् अलौकिक हैं । आलेख में मंदिर की विस्तृत जानकारी बडी ही बारीकी से प्रस्तुत की गई है ।छाया चित्रों से पता चलता हैं कि सदीयों पूर्व निर्मित इस मंदिर और इसके विशाल गोपुरम की शिल्पकारी वास्तव में नायाब है । गोपुरम पर उत्कीर्णित भगवान शिव की विभिन्न नृत्य मुद्रायें तथा अन्त: भाग में उत्कीर्णित भरतनाट्यम की मुद्रायें भी अद्भुत प्रतीत होती है ।
    बड़ी विडम्बना की बात हैं कि अद्भुत शिल्पकारी से युक्त सदीयों पुराने इस मंदिर में गंदगी का साम्राज्य हैं और कुछ अपवादों को छोड़ दे तो हमारे अधिकांश मंदिरों के भी यहीं हाल हैं । इसे व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी मंदिर प्रशासन के साथ साथ हमारी भी हैं ।
    सुंदर अनुवादित,ज्ञानवर्धक आलेख हेतू साधुवाद !

    • प्रदीप जी – यह मंदिर बहुत ही विशाल एवं सुन्दर है, इसके सबसे सुन्दर भाग देखने के लिए आपको चिदंबरम जाना होगा, क्योंकि अन्दर चित्र लेना मन है।

  3. अनुराधाजी और मीताजी
    चिदंबरम के मंदिर की दंतकथाओं तथा इतिहास विषयी विस्तृत जानकारी से भरपुर लेख बहुत ही सुंदर है. फोटो और लेख से मंदिर की भव्यता,सुंदरता और मोहकता की प्रचिती होती है.
    गर्भगृह. के स्वर्ण -बिल्व मायारुपी वस्त्रों से ढके है बहुत रोचक लगा.गोपुरम की ऊंचाई और शिल्पकाम अचंभित करनेवाला है.
    गर्भगृह में नटराज की मुर्ति
    वस्त्रों और पुष्पों से ढकी रहती है जानकर मन थोडा दु:खी हुआ.
    ‌‌ मुख्य-मंदिर और परिसर में स्थित अन्य मंदिरों का विवरण इतने व्यवस्थित ढंग से किया गया है कि लगता है हम वहीँ भ्रमण कर रहें है.
    सुंदर आलेख हेतु धन्यवाद.

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