पाप एवं पुण्य – एक गणितीय आंकलन स्कन्द पुराण से

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स्कन्द पुराण के अनुसार सुसंगति एवं दुसंगति के प्रभावों का लेखा जोखा

इस लेख के साथ पढ़िए – स्कन्द पुराण वर्णित कार्तिक मास महात्मय

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को सुखी बनाने के लिए अन्य मनुष्यों का संग ढूंढता है। सज्जनों की संगति जीवन सुखमय करती है, वहीं दुर्जनों की संगति से जीवन दुखदाई हो जाता है। मनुष्य जैसी संगति में रहता है, उस पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है। जैसे एक ही स्वाति बूंद केले के गर्भ में पड़कर कपूर बन जाती है, सीप में पड़कर मोती बन जाती है और अगर सांप के मुंह में पड़ जाए तो विष बन जाती है। पारस के छूने से लोहा सोना बन जाता है, पुष्प की संगति में रहने से कीड़ा भी देवताओं के मस्तक पर चढ़ जाता है।

एक ओर जीजाबाई की संगति मे शिवाजी ‘छत्रपति शिवाजी’ बने, डाकू रत्नाकर, महर्षि नारद की सुसंगति के प्रभाव से महागुनि महर्षी वाल्मीकि बनें तथा अमर काव्य ‘रामायण’ लिखा । डाकू अंगुलिमाल, महात्मा बुद्ध के संगति में आकर उनका शिष्य बन गया।

वहीं दूसरी ओर कुसंगति में पड़कर भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन आदि पतन की गर्त में गिरे। ये सभी अपने आप में विद्वान और वीर थे । लेकिन कुसंगति का प्रभाव इन्हें विनाश की ओर ले गया। किसी कवि ने ठीक ही कहा है – जैसी संगति बैठिए तैसी ही फल दीन

सुसंगति – सुसंगति या सत्संगति का अर्थ है अच्छे मनुष्यों की संगति में रहना, उनके विचारों को अपने जीवन में ढालना तथा उनके सुकर्मों का अनुसरण करना। सज्जनों की सुसंगति मार्ग से भटके मनुष्य को सही राह दिखाती है। व्यक्ति की अच्छी संगति से उसके स्वयं का परिवार तो अच्छा होता ही है, साथ ही उसका समाज व राष्ट्र पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।

कुसंगति – कुसंगति का अर्थ होता है बुरी संगत। यह कभी नहीं हो सकता कि परिस्थितियों का प्रभाव हम पर न पड़े। दुष्ट और दुराचारी व्यक्ति के साथ रहने से सज्जन व्यक्ति का चित्त भी दूषित हो जाता है। एक कहावत है – अच्छाई चले एक कोस, बुराई चले दस कोस । अच्छी बातें सीखने में समय लगता है। जो जैसे व्यक्तियों के साथ बैठेगा, वह वैसा ही बन जाएगा।

कहते हैं कि व्यक्ति योगियों के साथ योगी और भोगियों के साथ भोगी बन जाता है। जहां अच्छी संगति व्यक्ति को कुछ नया करते रहने की समय-समय पर प्रेरणा देती है, वहीं बुरी संगति से व्यक्ति गहरे अंधकूप में गिर जाता है।

स्कन्द पुराण कार्तिक महात्मय - पाप पुण्य का लेखा जोखा
स्कन्द पुराण कार्तिक महात्मय – पाप पुण्य का लेखा जोखा

उन्नति करने वाले व्यक्ति को अपने आसपास के समाज के साथ बड़े सोच-विचारकर संपर्क स्थापित करना चाहिए, क्योंकि मानव मन तथा जल का स्वभाव एक जैसा होता है। यह दोनों जब गिरते हैं, तो तेजी से गिरते हैं, परंतु इन्हें ऊपर उठाने में बहुत प्रयत्न करना पड़ता है। कुसंगति काम, क्रोध, मोह और मद पैदा करने वाली होती है। अतः प्रत्येक मानव को कुसंगति से दूर रहना चाहिए क्योंकि उन्नति की एकमात्र सीढ़ी सत्संगति है।

स्कन्द पुराण के अनुसार पाप-पुण्य का गणितीय आंकलन

संक्षिप्त स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्ड-कार्तिकमास-माहात्म्य के अनुसार ब्रम्हाजी ने कहा है कि काम, क्रोध व लोभ के वशीभूत मनुष्य धर्मकृत्य नहीं कर पाते। जो इनसे मुक्त हैं वे ही धर्मकार्य करते हैं। इस पृथ्वी पर श्रद्धा एवं मेधा ये दो वस्तुएं ऐसी हैं जो काम, क्रोध आदि का नाश करती हैं।

ब्रम्हाजी आगे कहते हैं कि-

  • दूसरों को पढ़ाने से, यज्ञ कराने से तथा दूसरों के साथ एक पंक्ति में बैठकर भोजन करने से मनुष्य को दूसरों के किये पुण्य व पाप का चौथाई भाग प्राप्त होता है ।
  • एक आसन पर बैठने, एक सवारी पर यात्रा करने तथा श्वास से शरीर का स्पर्श होने से मनुष्य निश्चय ही दूसरे के पुण्य व पाप के छठे अंश के फल का भागी होता है।
  • दूसरे के स्पर्श से, भाषण से तथा उसकी प्रशंसा करने से भी मानव सदा उसके पुण्य व पाप के दसवें अंश को प्राप्त करता है।
  • दर्शन एवं श्रवण के अथवा मन के द्वारा उसका चिंतन करने से, वह दूसरे के पुण्य एवं पाप का शतांश प्राप्त करता है।
  • जो दूसरे की निंदा करता, चुगली खाता तथा उसे धिक्कार देता है, वह उसके किया हुए पातक को स्वयं लेकर बदले में उसे अपना पुण्य देता है।
  • जो मनुष्य किसी पुण्यकर्म करने वाले मनुष्य की सेवा करता है, वह यदि उसकी पत्नी, भृत्य तथा शिष्य नहीं है तथा उसे उसकी सेवा के अनुरूप कुछ धन नहीं दिया जा रहा है, तो वह भी सेवा के अनुसार उस पुण्यात्मा के पुण्यफल का भागी हो जाता है।
  • जो एक पंक्ति में बैठे हुए किसी मनुष्य को रसोई परोसते समय छोड़कर आगे बढ़ जाता है, उसके पुण्य का छटा अंश वह छूटा हुआ व्यक्ति पा लेता है।
  • स्नान एवं संध्या आदि करते समय जो दूसरे का स्पर्श अथवा दूसरे से भाषण करता है, वह अपने कर्मजनित पुण्य का छठा अंश उसे निश्चय ही दे डालता है।
  • जो धर्म के उद्देश्य से दूसरों के पास जाकर धन की याचना करता है उसके उस पुण्यकर्मजनित फल का भागी वह धन देने वाला भी होता है।
  • जो दूसरों का धन चुराकर उसके द्वारा पुण्य कर्म करता है, वहां कर्म करने वाला तो पापी होता है तथा जिसका धन चुराकर उस कर्म में लगाया गया है वही उसके पुण्यफलों को प्राप्त करता है।
  • जो दूसरों का ऋण चुकाए बिना मर जाता है, उसके पुण्य में से वह धनी अपने धन के अनुरूप हिस्सा पा लेता है।
  • जो बुद्धि(सलाह) देने वाला, अनुमोदन करने वाला, साधन सामग्री देनेवाला तथा बल लगाने वाला है, वह भी पुण्य व पाप में से छठे अंश को ग्रहण करता है।
  • प्रजा के पुण्य एवं पाप में से छठा अंश शासक लेता है।
  • इसी प्रकार शिष्य से गुरु, स्त्री से उसका पति, पुत्र से उसका पिता पुण्य-पाप का छठा अंश ग्रहण करता है।

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सुसंगति-कुसंगति पर कुछ महान संतों के विचार

दोष और गुण सभी संसर्ग से उत्पन्न होते हैं। मनुष्य में जितना दुराचार, पापाचार, दुश्चरित्रता और दुव्यसन होते हैं, वे सभी कुसंगति के फलस्वरूप होते हैं। कुसंगति के कारण बड़े-बड़े घराने नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं। बुद्धिमान्-से-बुद्धिमान् व्यक्ति पर भी कुसंगति का प्रभाव पड़ता है। श्रेष्ठ विद्यार्थियों नीच लोगों की संगति पाकर बरबाद हो जाते हैं।

कवि रहीम कहते हैं-

बसि कुसंग चाहत कुसल, यह रहीम जिय सोच।

महिमा घटी समुद्र की, रावन बस्यौ पड़ोस ॥

अर्थात् सज्जन और दुर्जन का संग हमेशा अनुचित है बल्कि यह विषमता को ही जन्म देता है। जैसे रावण के पड़ोस में रहने का कारण समुद्र की भी महिमा घट गयी। बुरा व्यक्ति तो बुराई छोड़ नहीं सकता, अच्छा व्यक्ति ज़रूर बुराई ग्रहण कर लेता है।

रहीम यह भी लिखते हैं-

कह रहीम कैसे निभै, बेर केर को संग।

वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग ॥

अर्थात् बेरी और केले की संगति कैसे निभ सकती है ? बेरी तो अपनी मस्ती में झूमती है लेकिन केले के पौधे के अंग कट जाते हैं। बेरी में काँटे होते हैं और केले के पौधे में कोमलता। अत: दुर्जन व्यक्ति का साथ सज्जन के लिए हानिकारक ही होता है।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग ।

चंदन विषा व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग ॥

अर्थात् यदि आदमी उत्तम स्वभाव का हो तो कुसंगति उस पर प्रभाव नहीं डाल सकती। यद्यपि चंदन के पेड़ के चारों ओर साँप लिपटे रहते हैं तथापि उसमें विष व्याप्त नहीं होता।

हम अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं तो हमें दुर्जनों की संगति छोड़कर सत्संगति करनी होगी। सत्संगति का अर्थ है-श्रेष्ठ पुरुषों की संगति। मनुष्य जब अपने से अधिक बुद्धिमानू, विद्वान् और गुणवान लोगों के संपर्क में आता है तो उसमें अच्छे गुणों का उदय होता है। उसके दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं। सत्संगति से मनुष्य की बुराइयाँ दूर होती हैं और मन पावन हो जाता है। कबीरदास ने भी लिखा है-

कबीरा संगति साधु की, हरे और की व्याधि।

संगति बुरी असाधु की, आठों पहर उपाधि।

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