प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण – पर्वत पर चढ़ना सीखें

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प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के अंतर्गत क्या क्या सिखाया जाता है? पर्वतारोहण सीखने के इच्छुक मेरे पाठक साथी मेरे अनुभव से कुछ लाभ ले सकते हैं।

“जीवन या तो साहसपूर्ण रोमांचक कृत्यों से परिपूर्ण हो अथवा कुछ ना हो।” – हेलेन केलर

पर्वतों की भव्य सुन्दरता प्रत्येक प्रकृति प्रेमी के लिए आनंद का स्त्रोत होती है। आधुनिक जनजीवन के प्रदूषणों से विरहित प्रकृति की रम्यता जो पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाती है वो हमारे जीवन में नवीन आशाओं एवं नवीन आयामों को जन्म देती हैं। गत कुछ वर्षों में हमने देखा है कि कई पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थानों एवं पर्वतारोहण अभियानों के उद्भव से अब अनेक पर्वतारोहण प्रेमी ऊँचे पर्वतों की चढ़ाई कर रहे हैं।

कई पर्वतारोहण मार्ग ऐसे होते हैं जो पूर्णतः अथवा अंशतः यथोचित पर्वतारोहण तकनीक की जानकारी एवं प्रशिक्षण की अपेक्षा रखते हैं। ऐसे मार्गों पर पर्वतारोहण के लिए यह आवश्यक है कि पर्वतारोही को सभी आवश्यक पर्वतारोहण उपकरणों एवं दुर्गम ऊँचे क्षेत्रों में उत्तरजीविता कौशल व संघर्ष क्षमता का पूर्ण ज्ञान हो। कठिन पर्वत शिखरों पर चढ़ने के लिए आरंभिक मूलभूत प्रशिक्षण प्राप्त करना न्यूनतम आवश्यकता है। इसे प्राप्त करने के लिए प्राथमिक पर्वतारोहण पाठ्यक्रम (BMC- Basic Mounteineering Course) निश्चित ही प्रथम सोपान है।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण
प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण

मुझे पर्वत सदा से ही प्रिय रहे हैं तथा उन पर चढ़ना मुझे अत्यंत रोमांचित करता रहा है। महाराष्ट्र में सह्याद्री पर्वतश्रंखलाओं पर अनेक छोटे-बड़े  पर्वतारोहण अभियानों तथा विशाल हिमालय पर्वतश्रंखला पर कुछ ऊँचाई वाले रोहण अभियानों को सफलता पूर्वक पूर्ण करने के पश्चात मेरे मन में यह विचार कौंधा कि क्यों ना पर्वतारोहण की अपनी इस रूचि को एक स्तर अधिक उंचा किया जाए!

हिमाचल प्रदेश के मनाली नगर में स्थित अटल बिहारी बाजपेयी पर्वतारोहण संस्थान एवं सम्बद्ध खेल (ABVIMAS) में २६ दिवसीय प्राथमिक पर्वतारोहण पाठ्यक्रम के लिए अक्टूबर २०२२ में मैंने अपना नामांकन पंजीकृत किया।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम

ऊँचे पर्वतों पर चढ़ने की अभिलाषा हो तो यह प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण एक दक्ष पर्वतारोहक बनने का प्रथम चरण है। यह आपको चट्टानों पर चढ़ने, चट्टानी एवं बर्फीली सतहों पर रोहण कौशल्य प्राप्त करने तथा  उत्तरजीविता कौशल व संघर्ष क्षमता प्राप्त करने में सहायता करता है। यह पाठ्यक्रम हिमनदों, ऊँची पर्वत श्रंखलाओं एवं प्रथमोपचार के विषय में मूलभूत जानकारी प्रदान करता है।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के अंतर्गत आपको वो सभी मूलभूत प्रशिक्षण दिए जायेंगे जिनकी जानकारी किसी भी पर्वतारोहण अभियान से पूर्व आपको होनी चाहिए। मौसम एवं जलवायु को समझना, मानचित्रों को पढ़ना, पर्वतारोहण से संबंधित सभी पारिभाषिक शब्द एवं चिन्ह, पर्वतारोहण उपकरणों एवं उनकी कार्यप्रणालियाँ, पर्वतों पर चढ़ना एवं पर्वतीय क्षेत्रों में चलना, पर्वतारोहण के लिए व्यक्तिगत आवश्यक सामान बांधना, ऐसे अनेक विषयों पर यहाँ प्रशिक्षण व जानकारी दी जाती है।

यदि किसी पर्वतारोहक को इस प्रकार के बाह्य क्रियाकलापों में अपना व्यवसाय करना हो अथवा ऊँचे पर्वतों पर पर्वतारोहण दल का नेतृत्व आदि करना हो तो उसे पर्वतारोहण में उच्च प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा। यदि कोई यह सोचे कि प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण केवल मनोरंजन के लिए है, केवल रोमांच के लिए है अथवा पर्वतों की चढ़ाई आसान है तो वे अपने निर्णय पर पुनः विचार करें। यह एक अत्यंत गंभीर प्रशिक्षण है जिसमें आपकी पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए।

भारत में प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण कहाँ दिया जाता है?

भारत में कुछ सरकारी मान्यता प्राप्त पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान हैं जहाँ से आप प्राथमिक प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं। वे हैं:

  • नेहरु पर्वतारोहण संस्थान (Nehru Institute of Mountaineering, NIM), उत्तरकाशी, उत्तराखंड।
  • हिमालय पर्वतारोहण संस्थान (Himalayan Mountaineering Institute, HMI), दार्जीलिंग, पश्चिम बंगाल।
  • अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण एवं सम्बद्ध खेल संस्थान (Atal Bihari Vajpeyi Institute of Mountaineering and Allied Sports, ABVIMAS), मनाली हिमाचल प्रदेश।
  • राष्ट्रीय पर्वतारोहण एवं रोमांचक खेल संस्थान (National Institute of Mountaineering and Adventure Sports, NIMAS), दिरांग, अरुणांचल प्रदेश।
  • जवाहर पर्वतारोहण एवं शीतकालीन खेल संस्थान (Jawahar Institute of Mountaineering and Winter Sports), पहलगाम, जम्मू-कश्मीर।

नेहरु पर्वतारोहण संस्थान एवं हिमालय पर्वतारोहण संस्थान, भारत के प्रतिष्ठित व ख्यातिप्राप्त पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान हैं। मुझे बताया गया कि यहाँ प्रवेश प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षणार्थियों की सूची इतनी लम्बी होती है कि प्रवेश प्राप्त करने के लिए २ वर्षों तक की प्रतीक्षा करनी पड़ जाती है। अन्य संस्थानों में प्रतीक्षा काल अपेक्षकृत कम है।

प्रशिक्षण शुल्क कितना है?

प्रत्येक पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान में प्रशिक्षण शुल्क भिन्न है। यह शुल्क १८,००० रुपयों से लेकर २३,००० रुपयों तक हो सकता है। यही शुल्क विदेशी प्रशिषणार्थियों के लिए भिन्न हैं। यदि आप को राष्ट्रीय कैडेट कोर NCC अथवा भारतीय सशस्त्र बालों से प्रायोजित किया गया है तो आपको वित्तीय छूट प्रदान की जायेगी अथवा प्रशिक्षण निशुल्क भी हो सकता है।

यह प्रशिक्षण कौन कौन प्राप्त कर सकते हैं?

जो भी व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ है तथा उसकी आयु १६ से ४५ वर्ष के मध्य है, वह इस प्रशिक्षण के लिए आवेदन कर सकता है। कुछ संस्थानों में ऊपरी आयु सीमा ४० वर्ष भी होती है।

आवेदन कैसे करें?

उपरिक्त सभी संस्थानें ऑनलाइन विधि द्वारा आवेदन स्वीकार करते हैं। आप संस्थान में भेंट देकर भी वहीं इस पाठ्यक्रम के लिए अपना आवेदन भर सकते हैं। आवेदन पत्र के साथ आपका स्वास्थ्य प्रमाणपत्र आवश्यक है जो यह सिद्ध करता है कि आप इस पाठ्यक्रम के लिए योग्य हैं।

इस प्रशिक्षण के लिए कैसे तैयारी करें?

यह प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण भले ही एक मूलभूत पाठ्यक्रम है किन्तु शारीरिक स्वास्थ्य के सन्दर्भ में इस पाठ्यक्रम की आपसे अपेक्षाएं अत्यंत कठोर हैं। यह पाठ्यक्रम प्रत्येक दिवस आपकी शारीरिक शक्ति की नित नवीन परीक्षा लेगा तथा मानसिक स्तर पर विविध प्रकार के तनाव सहने की क्षमता को परखेगा।

पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान में प्रवेश से पूर्व ३ से ६ मास की पूर्व तैयारी करनी चाहिए। आप जितनी अधिक पूर्व तैयारी करेंगे, इस पाठ्यक्रम में उतना ही उत्तम आपका प्रशिक्षण होगा। दार्जिलिंग स्थित हिमालय पर्वतारोहण संस्थान यह पाठ्यक्रम आरम्भ करने से पूर्व १२ सप्ताह के कसरत की विस्तृत समयसारिणी प्रस्तावित करती है जो उनके वेबस्थल पर उपलब्ध है।

कृत्रिम दीवार पर पर्वतारोहण का प्रशिक्षण
कृत्रिम दीवार पर पर्वतारोहण का प्रशिक्षण

सम्पूर्ण पाठ्यक्रम की अवधि में प्रशिक्षकों की सूक्ष्म दृष्टि आप पर होती है जो आपके स्वास्थ्य एवं शक्ति का लेखा-जोखा रखते हैं। इस प्रशिक्षण में शारीरिक स्वास्थ्य का सतत मूल्यांकन किया जाता है। अतः इस पाठ्यक्रम में प्रवेश से पूर्व अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की गुणवत्ता भलीभांति जांच लें।

शारीरिक सहनशक्ति का स्तर उत्तम रखने के लिए ३० मिनटों में ५ किलोमीटर तक दौड़ने की क्षमता प्राप्त करना आवश्यक है। शारीरिक सहनशक्ति के साथ मांसपेशियों की आतंरिक शक्ति भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पाठ्यक्रम काल में आपसे अपेक्षा की जायेगी कि आप अपना थैला, जो कि १५-२० किलो भारी होगा, आप स्वयं उठायें तथा सीधी ढलान पर घंटों चढ़ाई करें। शारीरिक सहनशक्ति का स्तर बढ़ाने के लिए आपको भारी सामान उठाकर चलना होगा।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण एवं पर्वतारोहण के लिए आवश्यक मानसिक सहनशक्ति

अंत में मैं आपको स्मरण करा दूं कि पर्वतारोहण प्रशिक्षण एवं पर्वतारोहण के लिए शारीरिक सहनशक्ति की माँग केवल ३०% होती है। मानसिक सहनशक्ति की आवश्यकता ७०% होती है। आप जितना भी अधिक प्रशिक्षण ले लें, इस पाठ्यक्रम में आपके धैर्य की परीक्षा अनवरत होती रहेगी। अनेक अवसरों पर आपके मस्तिष्क में इस पाठ्यक्रम को छोड़ देने के विचार उत्पन्न होंगे किन्तु सभी प्रकार की परिस्थितियों में अपना मानसिक संतुलन बनाएं रखें।

अपने अनुभव के विषय में कहूँ तो कितने ही दिवस ऐसे होते थे जब मुझे प्रातः उठने के लिए स्वयं की मनःस्थिति से संघर्ष करना पड़ता था। कई क्षण ऐसे होते थे जब मेरा सम्पूर्ण शरीर पीड़ाग्रस्त हो जाता था। अगली एक चट्टान चढ़ पाने की शक्ति शेष नहीं रहती थी अथवा अगला किलोमीटर चलने के लिए पैर धरती पर से उठते नहीं थे। अनेक अवसरों पर मैं स्वयं से प्रश्न करने लगता कि क्या मैंने इस पाठ्यक्रम में प्रवेश लेकर बड़ी चुक तो नहीं कर दी?

सौभाग्य से मेरे प्रशिक्षक को मेरी व्यथा का पूर्ण आभास था। उन्होंने मेरा उत्साहवर्धन किया। मुझे प्रेरित किया कि मैं अपनी सहनशक्ति की सीमाओं को अधिक विस्तृत करूँ। यदि मैंने यह प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण नहीं लिया होता तो मुझे यह कभी ज्ञात नहीं हो पाता कि मेरी शारीरिक एवं मानसिक सहनशक्ति की सीमा कितनी विस्तृत है। मैंने सीखा कि “हम अपनी सीमाएं स्वयं विकसित करते हैं तथा हम स्वयं के विषय में जितना आँकते हैं, हममें उससे कहीं अधिक सहनशक्ति होती है”।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के लिए क्या साथ ले जाएँ?

सभी प्रशिक्षण संस्थान पर्वतारोहण सम्बन्धी विविध उपकरण स्वयं उपलब्ध कराते करते हैं, जैसे पर्वतारोहण थैला, बर्फ को काटने वाली कुल्हाड़ी, बर्फ में उपयोगी बूट, जैकेट जैसे ऊनी वस्त्र, पात्र, रस्सी, सुरक्षा जाली, गोफन, हेलमेट, धातु कि कड़ियाँ, रिंग अथवा लूप, तेज वायु से सुरक्षा प्रदान करते वस्त्र, पीठ का थैला, शयन बस्ता, अस्तर, चटाई, टखने के लिए चमड़े का सुरक्षा कवच, काँटा आदि।

सभी पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान आपको उन वस्तुओं की सूची प्रदान करते हैं जिन्हें आपको अपने साथ ले जाना चाहिए। यह सूची आप उनके वेबस्थल पर देख सकते हैं। अपने अनुभव से मैं यहाँ कुछ वस्तुओं की ओर आपका ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ:

  • वस्त्र – पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान के परिसर में अपने वस्त्र धोने के लिए आपके पास पर्याप्त समय रहेगा किन्तु पर्वतारोहण का प्रशिक्षण करते समय पर्वतों की ऊँचाई पर आपके पास वस्त्र धोने का समय कदापि नहीं होगा। अतः मेरा सुझाव है कि पर्वतारोहण करते समय अपने परिधान का एक अतिरिक्त जोड़ा अपने साथ रखें। पहने हुए वस्त्रों को भी पुनः धारण करना पड़ सकता है। अपने साथ टेलकम पाउडर तथा इत्र आदि रखें।
  • जुते – पर्वतारोहण के लिए भारी टिकाऊ पर्वतारोहण जूते आवश्यक हैं। जुते जलरोधी हों तो अतिउत्तम। प्रातः एवं संध्या कालीन शारीरिक प्रशिक्षण के लिए दौड़ाने वाले जूते रखें क्योंकि भारी पर्वतारोहण जूतों में दौड़ना कठिन होता है। संस्थान के भीतर धारण करने के लिए सुखद चप्पलें रखें। ठोस चट्टानों पर चढ़ाई के प्रशिक्षण के लिए चढ़ाई वाले जूते रखें। कुछ संस्थान ये जूते स्वयं उपलब्ध कराते हैं।
  • भोजन – संस्थान के भीतर भोजन की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। किन्तु पर्वतों की ऊँचाई पर आप अपने साथ सूखे नाश्ते, सूखे मेवे आदि रखें।
  • औषधि – सभी संस्थानों के भीतर एक चिकित्सक तथा औषधियों की दुकान अवश्य होते हैं। किन्तु आप अपने स्वास्थ्य की आवश्यकताओं के अनुसार अपनी औषधियाँ साथ रखें।
  • इन सब के अतिरिक्त अन्य कुछ वस्तुएं भी हैं जिन्हें आपको अपने साथ रखना चाहिए – बैटरी चलित टॉर्च, मोबाइल फोन आदि चार्ज करने के लिए पॉवर बैंक (20000MAH), ओढ़नी अथवा पगड़ी का कपड़ा, साबुन, प्रसाधन सामग्री आदि।

अपना सामान बांधते समय यह ध्यान रखें कि आपको अपना सामान स्वयं उठाना है। पर्वतारोहण के समय भी अपना थैला स्वयं की पीठ पर ही लादना है। अतः सामान एकत्र करते समय किंचित कंजूसी बरतें। यद्यपि आपका सामान उठाने के लिए आपको कुली की सेवा उपलब्ध कराई जा सकती है तथापि ऐसा करने से आपके अंक काट लिए जाते हैं। पर्वतारोहण करते समय आप अतिरिक्त सामान अपने कक्ष में ही छोड़ दें।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की समयसारिणी

यद्यपि प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की वास्तविक अवधि विविध संस्थानों पर निर्भर है तथापि पाठ्यक्रम की औसतन अवधि २४-२८ दिवसों की होती है। इस अवधि को तीन भागों में बाँटा जाता है, चट्टान कौशल्य (rock craft), कोमल-हिम कौशल्य (snow craft) तथा ठोस हिमखंड कौशल्य (ice craft)।

हमारे दल में १४५ प्रशिक्षणणार्थी थे। सामान्यतः एक दल में ७०-८० सहभागी होते हैं किन्तु हमारा दल एक अपवाद था। हमारे दल में हमारे साथ राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC), सीमा सुरक्षा बल (BSF) तथा हिमाचल पोलिस के सदस्य भी सम्मिलित थे।

पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान में ठीक वैसे ही अनुशासन का पालन किया जाता है जैसा सशस्त्र बलों के संस्थानों में किया जाता है। किसी भी क्रियाकलाप के लिए निर्धारित समय पर पहुँचना अतिआवश्यक होता है। यदि एक मिनट की भी चूक हो जाए तो उसे अनुशासनहीनता माना जाता है तथा उसके लिए निर्धारित दंड दिया जाता है, जैसे दंड-बैठक लगाना पड़ता है।

पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम – चट्टान कौशल्य (८-१० दिवस)

पाठ्यक्रम के प्रथम ८-१० दिवस संकुल के भीतर ही प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें भी प्रथम १-२ दिवस हमें पाठ्यक्रम का परिचय दिया जाता है तथा प्रशिक्षकों से हमारा परिचय कराया जाता है। प्रशिक्षणार्थियों को उनके उपकरण दिए जाते हैं जिनका प्रयोग वे पाठ्यक्रम की पूर्ण अवधि में करते हैं। उद्घाटन संभाषण होता है, संग्रहालय का भ्रमण कराया जाता है तथा पर्वतारोहण पर कई ज्ञानवर्धक चलचित्र दिखाए जाते हैं।

चट्टानों की चढ़ाई
चट्टानों की चढ़ाई

दल के सभी सहभागियों को छोटे छोटे गुटों में बाँटा जाता है जिन्हें रोप (Rope) कहा जाता है। प्रत्येक रोप का एक रोप प्रमुख (Rope Leader) होता है। सहभागियों के उपकरण वितरण का संचालन करना तथा प्रशिक्षक से संयोजन करना, ये रोप प्रमुख के उत्तरदायित्व हैं। सम्पूर्ण दल का भी एक प्रमुख अथवा वरिष्ठ होता है जो दैनिक क्रियाकलापों के लिए सभी प्रशिक्षणार्थियों का संयोजन करता है तथा पाठ्यक्रम के दैनन्दिनी आवश्यकताओं का नियोजन करता है।

चट्टान कौशल्य के अंतर्गत ऊँची चट्टानों पर चढ़ना, रस्सी द्वारा सीधी सपाट चट्टान पर चढ़ना, रस्सी पर लटक कर नदी पार करना, जुमर का प्रयोग कर चट्टान पर चढ़ना (jumaring) आदि का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रत्येक संस्थान के समीप प्राकृतिक चट्टानें हैं जहाँ पर चट्टान कौशल्य के लिए प्रशिक्षणार्थियों को ले जाया जाता है।

दैनिक दिनचर्या

अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण एवं सम्बद्ध खेल संस्थान (ABVIMAS) में मेरा प्रत्येक दिवस प्रातः ६ बजे मेरे प्रथम क्रियाकलाप के साथ आरम्भ होता था। मेरा प्रथम क्रियाकलाप था, शारीरिक प्रशिक्षण व्यायाम। इसके अंतर्गत ५ किलोमीटर की दौड़ तथा शारीरिक व्यायाम होते हैं जिनके लिए डेढ़ घंटे का समय लगता था। इसके पश्चात हम प्रातःकालीन जलपान करते थे।

नदी पार करना
नदी पार करना

जलपान के पश्चात लगभग ८:३० बजे हम हमारे दैनिक बाह्य प्रशिक्षण के लिए संस्थान से बाहर चले जाते थे। चट्टान चढ़ाई का क्षेत्र हमारे संस्थान से लगभग ३० मिनट की दूरी पर था। प्रत्येक रोप के साथ उस रोप का एक समर्पित प्रशिक्षक रहता है जो उस रोप के सदस्यों को प्रशिक्षण देता है। दोपहर १-१:३० के मध्य हमारा प्रशिक्षण समाप्त होता था तथा २ बजे तक हम संस्थान वापिस पहुँच जाते थे।

दोपहर के भोजन के पश्चात कुछ क्षण विश्राम करते थे। प्रत्येक दिवस दोपहर ३:०० से ५:०० बजे तक विविध विषयों पर व्याख्यान होते थे। व्याख्यान के विषयों में मौसम एवं जलवायु की समझ, पर्वतारोहण शब्दावली, मूलभूत प्रथमोपचार, पर्वतीय क्षेत्रों के शिष्टाचार, हिम-स्खलन तथा विशालकाय हिमालय की विस्तृत समझ आदि सम्मिलित किये जाते हैं।

संध्या के समय पुनः शारीरिक व्यायाम कराये जाते हैं। बाधा दौड़ होती है जिसमें हमें अनेक बाधाओं को पार कर दौड़ना पड़ता है। इन बाधाओं में ऊँची भित्ति पर चढ़ना, कीचड़ में चलना आदि सम्मिलित हैं। सभी प्रशिक्षणार्थियों को इस प्रशिक्षण के कम से कम तीन चरणों में उत्तीर्ण होना अनिवार्य है।

बर्फ में चलने का प्रशिक्षण
बर्फ में चलने का प्रशिक्षण

बाधा दौड़ के पश्चात संध्या लगभग ७ बजे रस्सी सम्बंधित प्रशिक्षण सत्र होता था। इसमें हमें रस्सी के विभिन्न प्रयोग एवं भिन्न भिन्न प्रकार की गांठें बांधना सिखाया जाता था। रस्सी पर्वतारोहण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है। पर्वतारोहण में इसका प्रयोग सतत किया जाता है, चाहे रोहण हो अथवा अवरोहण। गाँठ बांधने की तकनीक पर हमारी दो परीक्षाएं भी ली गयीं।

रात्रि ८ से ९ बजे के मध्य हम रात्रि का भोजन करते थे। रात्रि १० बजे हमारे कक्षों की बिजली बंद कर दी जाती थी।

शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण

हमें हमारे लिए क्षण भर का भी समय नहीं मिल पाता था। हमारा सम्पूर्ण दिवस शारीरिक रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता था। प्रत्येक गतिविधि के लिए सदा चौकस रहना पड़ता था। हमारे एक एक क्रियाकलापों पर प्रशिक्षकों की अखंड दृष्टि रहती थी। कोई भी गतिविधि छूट गयी अथवा हम ध्यान केन्द्रित रखने में चूक गए तो इसका प्रभाव हमारे मूल्यांकन पर पड़ सकता था।

एडम्स दिवस – प्रत्येक संस्थान चट्टान कौशल्य सत्र के मध्य सभी प्रशिक्षणार्थियों को एक दिवस छुट्टी प्रदान करती है। इसे एडम्स दिवस कहते हैं। इस दिन कोई भी पर्वतारोहण गतिविधि नहीं की जाती है। हम संस्थान के भीतर अथवा बाहर भ्रमण सकते हैं।

चट्टान कौशल्य सत्र के अंत में हमारी प्रायोगिक परिक्षा ली गयी जिसमें हमें एक प्राकृतिक चट्टान पर चढ़ना था। इस परीक्षा में ना केवल हमारा चट्टान कौशल्य जाँचा गया, अपितु प्रशिक्षक यह भी देख रहे थे कि हम चढ़ने, उतरने अथवा गिरने में सही तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं अथवा नहीं।

कोमल-हिम कौशल्य तथा ठोस हिमखंड कौशल्य (१२-१४ दिवस)

जब हम चट्टान कौशल्य का प्रशिक्षण ले रहे थे तब हमें लगा कि यह सम्पूर्ण सत्र का कठिनतम प्रशिक्षण होगा। हमने कदाचित कठिनतम शब्द को कम आँका था। हम नहीं जानते थे कि उससे भी कठिन प्रशिक्षण हमारी प्रतीक्षा कर रहा है जिसके समक्ष चट्टान कौशल्य प्रशिक्षण वास्तव में एक आनंद था।

कोमल-हिम कौशल्य तथा ठोस हिमखंड कौशल्य का प्रशिक्षण अधिक ऊँचाई के क्षेत्रों में, समुद्र सतह से लगभग १०,०००-११,००० फीट की ऊँचाई पर किया जाता है। प्रत्येक पर्वतारोहण संस्थान प्रशिक्षणार्थियों को अंतिम आधार शिविर (Basecamp) में पहुँचाने से पूर्व १-२ आधार शिविरों में स्थानांतरित करता है।

हम मनाली स्थित अपने पर्वतारोहण संस्थान से ८,५०० फीट की ऊँचाई पर स्थित सोलंग घाटी में लगे हमारे आधार शिविर में पहुंचे। सामान एवं उपकरणों से भरा १५-२० किलो का भारी थैला अपनी पीठ पर लादे हम अनवरत ४ घंटों तक चलते रहे। सोलंग घाटी पहुँचने के पश्चात हमें तम्बू खड़ा करने का प्रशिक्षण दिया गया। ऊँचाई की जलवायु से अभ्यस्त होने के लिए हमें आसपास पदभ्रमण पर ले जाया गया।

सोलंग घाटी से हम बकर्थाच पहुँचे जहाँ हमारा अंतिम आधार शिविर था। १०,५०० फीट की ऊँचाई पर स्थित इस शिविर तक पहुँचने में हमें ५ घंटों का समय लगा। ये दो दिवस हमारे प्रशिक्षण काल के कठिनतम दो दिवस थे। भारी भरकम थैला पीठ पर लाद कर हमने घंटों तक पदयात्रा की।

आधार शिविर

अंतिम आधार शिविर बकर्थाच पहुँचते ही चारों ओर स्थित पर्वत श्रंखलाओं को देख हमारी आँखें थक्क रह गयीं। सम्पूर्ण परिदृश्य ने हमें चकाचौंध कर दिया था। हमने वहीं पर अपना तम्बू खड़ा किया। यह तम्बू अब आगामी १० दिनों के लिए हमारा घर था।

पर्वतों का वास
पर्वतों का वास

कोमल-बर्फ तथा ठोस बर्फ पर पर्वतारोहण कौशल्य अर्जित करने के लिए हमें इनका प्रशिक्षण लेना था,

  • कोमल-बर्फ तथा ठोस बर्फ पर कैसे चलें
  • हिमखंड की सीधी ढलान पर कैसे चढ़ें
  • नीचे गिरने की स्थिति में स्वयं को कैसे रोकें
  • हिमनदों की जानकारी
  • किसी दुर्घटना की स्थिति में अपने सहयोगियों का बचाव कैसे करें
  • ऊँचाई पर बर्फ की कुल्हाड़ी, बर्फ के जूते, क्रेम्पोन आदि पर्वतारोहण उपकरणों का प्रयोग कैसे करें

हमें आनंद था कि ऊँचाई पर शारीरिक व्यायाम नहीं कराये जा रहे थे। हमारा दिवस प्रातः ८ बजे जलपान द्वारा आरम्भ होता थी। हम जलपान कर प्रातः ८:३० तक आधार शिविर से निकल जाते थे तथा लगभग ११,५०० फीट की ऊँचाई पर स्थित हमारे प्रशिक्षण क्षेत्र पर पहुँचते थे। हमारा प्रशिक्षण दोपहर २ बजे समाप्त होता था जिसके पश्चात हम थके-हारे ४ बजे, कभी कभी ५ बजे अपने आधार शिविर पर पहुँचते थे। आधार शिविर पर वापिस पहुँचने के पश्चात हम दोपहर का भोजन करते थे।

प्रत्येक दिवस संध्या के समय मुक्त आकाश के नीचे हमें विविध विषयों पर व्याख्यान दिए जाते थे। पर्वतारोहण बूट एवं क्रेम्पोन कैसे पहनें, स्ट्रेचर कैसे बनाएं, भिन्न भिन्न परिस्थियों में बचाव कार्य कैसे करें, विकट परिस्थिति में स्वयं को कैसे बचाएं, इन विषयों के साथ साथ हिमनदियों की जानकारी, हिम सतहों की जानकारी आदि पर व्याख्यान होते थे।

पर्वत पर ऊँचाई तथा बिना उपकरण रात्रि का अनुभव

कोमल-बर्फ तथा ठोस बर्फ पर पर्वतारोहण प्रशिक्षण के पश्चात हमें अब तक का सर्वाधिक दुर्गम कार्य करना था, पर्वत की ऊँचाई लांघना। हिमाच्छादित पर्वतों पर उच्च ऊँचाई वाले क्षेत्रों का अनुभव प्राप्त करने के लिए हम १०,५०० फीट पर स्थित अपने आधार शिविर से चार घंटे पर्वतारोहण करते हुए १४,५०० फीट की ऊँचाई तक पहुँच गए।

हमें अंतिम पड़ाव तक पहुँचने के लिए समय सीमा प्रदान की गयी थी। समय सीमा का पालन ना करने पर हमारे अंक काट लिए जायेंगे। इसमें एक परीक्षा यह होती है कि कम से कम समय में अधिक से अधिक ऊँचाई लांघने का प्रयास करने पर स्वास्थ्य पर विपरीत परिणाम पड़ सकता है। इस प्रयास में हमारे कुछ सहयोगी अचेत हो गए थे तथा उन्हें तुरंत नीचे ले जाना पड़ा था।

यहाँ एक अन्य परीक्षा हमारी प्रतीक्षा कर रही थी। हमें बिना किसी सहायता के सम्पूर्ण रात्रि मुक्त आकाश के नीचे व्यतीत करना था। हमें भोजन नहीं दिया गया तथा तम्बू अथवा शयन थैली का भी प्रयोग वर्जित था। कोमल-बर्फ तथा ठोस बर्फ पर पर्वतारोहण पाठ्यक्रम का यह एक प्रमुख प्रशिक्षण होता है। किसी भी पर्वतारोहण अभियान में वास्तव में इस प्रकार की परिस्थिति हमारे समक्ष उपस्थित हो सकती है। अतः हमें उस स्थिति के लिए सज्ज रहना चाहिए।

मुक्ताकाश में निद्रा

हमें तम्बू के बाहर खुले आकाश के नीचे सोने के लिए कहा गया। प्लास्टिक की कुछ चादरें दी गयीं। हम आसपास स्थित चट्टान अथवा वृक्ष की सहायता से अपना आश्रय बना सकते थे। भोजन की व्यवस्था भी हमें आसपास की प्रकृति से ही करनी थी। सौभाग्य से उन्होंने हमें कुछ सूखे मेवे तथा सूखे नाश्ते दे दिए थे। अन्यथा हमें भी बेयर ग्रिल्स बनकर प्रकृति में अपना भोजन ढूँढना पड़ता। इस कार्यकलाप का मुख्य उद्देश्य है, पर्वतों पर किसी भी विपरीत परिस्थिति में न्यूनतम उपकरणों एवं मूलभूत सुविधाओं के साथ स्वयं के बचाव का प्रशिक्षण।

हमारे सम्पूर्ण पाठ्यक्रम में मुक्ताकाश में बिना किसी सहायता के रात्रि व्यतीत करने का अनुभव सर्वाधिक आनंददायी था। यह अनुभव अत्यंत सुन्दर तथा सर्वाधिक स्मरणीय था। हमने लकड़ियाँ एकत्र कर आग जलाई तथा गाते-बतियाते आनंदोत्सव मनाया। हमें प्रसन्नता थी कि हमारा कष्टकारी उच्च ऊँचाई पर्वतारोहण प्रशिक्षण अब अंतिम चरण पर पहुँच चुका है। प्रातः उठकर हमें अपने प्रशिक्षण संस्थान के लिए प्रस्थान करना है।

प्रशिक्षण के अंत में हमें एक प्रायोगिक परीक्षा देनी पड़ती है जिसमें हमारे अब तक के पर्वतारोहण ज्ञान का परिक्षण किया जाता है। हमें विभिन्न पर्वतारोहण उपकरणों एवं उनके प्रयोग के विषय में पूछा गया। हमें हिमखंड पर चढ़ाई करने के विभिन्न तकनीकों का प्रदर्शन करने के लिए भी कहा गया।

लिखित परीक्षा – दो दिवस

कोमल-हिम कौशल्य तथा ठोस हिमखंड कौशल्य के प्रशिक्षणों के पश्चात हम अपने आधार शिविर वापिस आये। हम अत्यंत प्रसन्न थे कि हमने अपना प्रशिक्षण सफलता पूर्वक संपन्न किया है। हमने अपने सभी उपकरण वापिस किये जो हमें पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान ने प्रदान किये थे। प्रत्येक प्रशिक्षण संस्थान में एक लिखित परीक्षा होती है जिसमें प्रत्येक प्रशिक्षणकर्ता के सैद्धांतिक ज्ञान की परीक्षा ली जाती है।

सभी प्रकार की परीक्षाओं के अंकों का संयोजन कर पाठ्यक्रम के अंत में अंतिम मूल्यांकन किया जाता है। हमारे अंक लिखित एवं प्रायोगिक परीक्षाओं के अतिरिक्त सम्पूर्ण पाठ्यक्रम की अवधि में हमारे व्यवहार एवं आचरण पर भी निर्भर करते हैं। साथ ही हमने किन किन गतिविधियों में भाग लिया, हम शारीरिक रूप से कितने सक्षम थे, आदि तथ्य भी हमारे अंकों को प्रभावित करते हैं।

ग्रेड ‘A’ का अर्थ है कि हमने अडवांस पर्वतारोहण प्रशिक्षण के लिए पात्रता प्राप्त कर ली है। ग्रेड ‘B’ का अर्थ है कि हमने प्राथमिक प्रशिक्षण पूर्ण कर लिया है लेकिन अडवांस पर्वतारोहण प्रशिक्षण के लिए योग्य नहीं है। ग्रेड ‘C’ का अर्थ है कि हम पर्वतारोहण प्रशिक्षण में असफल रहे हैं।

समापन समारोह

सम्पूर्ण पाठ्यक्रम के सर्वाधिक रोमांचकारी क्षण समापन समारोह तथा अंतिम दिवस का अंतिम संबोधन थे। सभी को प्रमाण पत्र एवं पर्वतारोहण बिल्ले प्रदान किये गए। दल के सर्वोत्तम प्रतिभागी के लिए विशेष पुरस्कार था। जिस प्रतिभागी ने प्रशिक्षण क्षेत्र को स्वच्छ रखने में सर्वाधिक योगदान दिया उसे स्वच्छ हिमालय का पुरस्कार प्रदान किया गया। इस समारोह के अंत में सभी प्रतिभागियों ने गीतों एवं नृत्यों द्वारा आनंद व्यक्त किया।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण चुनौतीपूर्ण क्रियाकलाप है जो प्रत्येक चरण में आपकी परीक्षा लेता है। अनेक अवसरों पर ऐसा प्रतीत होता है कि सब कुछ छोड़कर घर वापिस चले जाएँ। प्रत्येक चरण में अपनी सहनशक्ति की सीमारेखाओं को बढ़ाना पड़ता है। मानसिक रूप से भी अत्यंत शक्तिशाली होना पड़ता है।

पर्वतारोहण के प्राथमिक चरण में प्राप्त इस अद्वितीय अनुभव को आप जीवन भर संजो कर रखेंगे। आपका यह अनुभव अविस्मरणीय होगा। इस प्रशिक्षण के लिए मैं आपको अनेक शुभकामनाएं देता हूँ। सम्पूर्ण प्रशिक्षण अवधि के प्रत्येक क्षण का आनंद उठाईये। ऐसे अनुभव जीवन में पुनः प्राप्त नहीं होते हैं।

यह राहुल जाजू द्वारा प्रदत्त एक अतिथि संस्करण है। संस्करण में प्रयुक्त सभी छायाचित्र भी उन्होंने ही प्रदान किये हैं। राहुल जाजू व्यवसाय से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं तथा कोलकाता के निवासी हैं। एक बहुराष्ट्रीय निगम में ७ वर्ष कार्य करने के पश्चात उन्होंने अपने व्यवसाय से अल्प निवृत्ति ली है। कॉर्पोरेट व्यवसाय को छोड़कर अब वे यात्राएं करते हैं तथा जीवन को अनुभव करते हैं। वे एक उत्साही यात्री हैं। उन्हें समुद्रतटों से अधिक पर्वतीय क्षेत्र भाते हैं।                   

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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