ओडिशा की प्राची घाटी के समृद्ध पुरातात्विक स्थलों की खोज में

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प्राची घाटियों के मध्य से बहती प्राची नदी को भारत के पूर्व दिशा की सरस्वती कहा जाता है। रहस्यमयी सरस्वती सदियों पूर्व लुप्त हो चुकी है। किन्तु प्राची नदी, सीमित परिस्थितियों में ही सही, अब भी अनवरत बह रही है। प्राची घाटी प्राची नदी के तटों पर निर्मित भव्य स्मारकों के लिए प्रसिद्ध है। ७ वीं. से १६वी. सदी के मध्य यह क्षेत्र एक अत्यंत समृद्ध क्षेत्र था। उसी समयावधि में अधिकतर स्मारकों का निर्माण किया गया था। इन स्मारकों में ईंट के मंदिर, पत्थर के मंदिर, मठ, बावड़ियाँ, तीर्थ, घाट, दुर्ग, बंदरगाह, रेत के टीले इत्यादि सम्मिलित हैं।

प्राची घाटी यात्रा का मानचित्र
प्राची घाटी यात्रा का मानचित्र

प्राची घाटी विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं के सह-अस्तित्व का साक्षी रहा है। उनमें जैन, बौद्ध, शैव, शक्ति तथा वैष्णव विचारधाराएं प्रमुख हैं। यहाँ स्थित अधिकतर स्मारक समय के साथ नष्ट हो चुके हैं। जो कुछ अब शेष है वह अवश्य उस गौरवशाली सभ्यता का जीवंत साक्ष्य है जो किसी समय इस क्षेत्र में फल-फूल रही थी। यहाँ स्थित १५० स्मारकों में से केवल २ स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत आते हैं। १५ स्मारक राज्य पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।

खारवेल का चेदि वंश, शैलोद्भवा, भौमकर, सोमवंशी, पूर्वी गंग वंश, गजपति, मुगल तथा मराठा राजवंश इस क्षेत्र से संबंधित राजवंशों में से हैं।

महाकवि जयदेव ने पवित्र प्राची नदी के तट पर बैठकर ही महान कलाकृति गीत गोविंद की रचना की थी।

प्राची घाटी – ओडिशा में सड़क-यात्रा

प्राची घाटी ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से १५ किलोमीटर के अंतराल पर है। इस घाटी का विस्तार लगभग ५४ किलोमीटर है तथा यह खोर्धा, कटक तथा पुरी जिले से जुड़ा हुआ है। प्राची नदी कटक के नराज बांध के समीप स्थित दाकम्बा नामक एक छोटे गाँव से निकल कर, पुरी के देबी मुहाने से ३ किलोमीटर  विरुद्ध दिशा में कादुआ नदी से मिलती है। तत्पश्चात केउटजंग में समाप्त होती है।

भुवनेश्वर-फूल नखरा-अडसपुर अथवा भुवनेश्वर-उत्तरा-बालीपाटना, इन दोनों दिशाओं से आप प्राची घाटी आ सकते हैं। मेरा प्रिय एवं चिरस्मरणीय मार्ग भुवनेश्वर-फूल नखरा-अडसपुर है जिसमें हमें नीआली, चौरासी अमरेश्वर, गोप तथा बालीपाटना के भी दर्शन होते हैं।

प्राची नदी
प्राची नदी

एक रविवार की शीतल प्रातः काल में मैं प्राची घाटी के दर्शन के लिए निकला। भुवनेश्वर-कटक राष्ट्रीय राजमार्ग १६ पर लगभग १५ किलोमीटर जाने के पश्चात पाहाल नामक स्थान पर जलपान के लिए रुका। पाहाल विशेषतः ताजे तले रसगुल्लों के लिए प्रसिद्ध है। राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों ओर अनेक दुकानें हैं जहां ये रसगुल्ले मिलते हैं। किन्तु मेरा सुझाव है कि आप इस स्थानीय व्यंजन का आस्वाद लेने के लिए राजमार्ग के दाहिने ओर, पुल के नीचे स्थित प्राची बाजार वणिक संघ की दुकानों पर ही जाएँ। इस संघ का नाम भी प्राची घाटी पर ही रखा गया है जिसके अंतर्गत यह पाहाल क्षेत्र आता है। आप यहाँ एक अन्य स्थानीय व्यंजन, छेना पोड़ भी अवश्य चखें जो दूध फाड़कर तैयार किए छेने से बनता है।

पहाल के प्रसिद्द रसगुल्ले
पहाल के प्रसिद्द रसगुल्ले

जलपान के पश्चात मैं राजमार्ग पर मोटरसायकल दौड़ाते हुए फूल नखरा की ओर आगे बढ़ा। दाहिनी ओर मुड़कर अडसपुर-नीआली राज्य राजमार्ग ६० पर आया। इस परिपथ पर मेरा प्रथम पड़ाव था, कटक जिले में स्थित नीआली का शोभनेश्वर  मंदिर।

शोभनेश्वर मंदिर

शोभनेश्वर मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप मेरी भेंट हुई नंदी के एक विशाल प्रतिमा से। ४८ फुट ऊंचा शोभनेश्वर मंदिर प्राची नदी के बायीं तट पर स्थित है। कलिंग शैली के मंदिर में पीढ जगमोहन (गर्भगृह) तथा रेखा विमान अर्थात् रेखा शिखर (शिखर छिद्र) है। सामने स्थित स्तंभों के अवशेष यह संकेत देते हैं कि किसी समय यहाँ नाट्य मंडप रहा होगा।

शोभानेश्वर मंदिर - प्राची घाटी
शोभानेश्वर मंदिर – प्राची घाटी

ऐसा अनुमान है कि इस जीवंत मंदिर का निर्माण पूर्वी गंग वंश के सम्राट अनंगभीम देव तृतीय ने १२ वीं. शताब्दी के अंत में करवाया था। मंदिर की भित्तियों पर उड्र-मगधी भाषा में लिखे अभिलेख जागीरदार नागवंशी राजा वैद्यनाथ के विषय में जानकारी देते हैं जिन्होंने गंग वंश के पश्चात इस मंदिर के कारभार का उत्तरदायित्व निभाया होगा।

इस पूर्व-मुखी मंदिर के निर्माण में बलुआ पत्थरों का प्रयोग किया गया है। इसके भीतर एक शिवलिंग है जो एक गोलाकार योनिपीठ के भीतर स्थापित है।

महाशिवरात्रि यहाँ का प्रमुख उत्सव है। एक लघु संग्रहालय है जिसमें नीआली क्षेत्र से प्राप्त माधव एवं अन्य देवों की दुर्लभ प्रतिमाओं का प्रदर्शन किया गया है। यह मंदिर फूल नखरा से लगभग २३ किलोमीटर की दूरी पर है।

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प्राची घाट का माधवानंद मंदिर

मेरा अगला पड़ाव माधव गाँव में स्थित अत्यंत शोभायमान माधवानंद मंदिर था जो कटक जिले के नीआली खंड के अंतर्गत आता है। ४९ फुट ऊंचा माधवानंद मंदिर पीढ जगमोहन युक्त एक रेखा विमान है। कलिंग शैली के नाट्य मंडप की छत सपाट है। इस पूर्वाभिमुख मंदिर का निर्माण १३ वीं. शताब्दी के मध्य में पूर्वी गंग वंश ने किया था। इस जीवंत मंदिर के निर्माण में भी बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया है। इस मंदिर के अधिष्ठात्र देव चार भुजा धारी माधव हैं जो विष्णु के अवतार हैं। उनकी प्रतिमा काले क्लोराइट पर गढ़ी गई है। ग्रेनाइट में उकेरी गरुड की मूर्ति अत्यंत नयनाभिराम है।

मधावानान्द मंदिर का पृष्ठ भाग
मधावानान्द मंदिर का पृष्ठ भाग

जन्माष्टमी, डोल पूर्णिमा तथा राम नवमी यहाँ के प्रमुख उत्सव हैं। पूर्व सूचना देकर आप मंदिर में दोपहर का महाप्रसाद ग्रहण कर सकते हैं। इस मंदिर को पुरी के भगवान जगन्नाथ के मामा का घर माना जाता है। यह मंदिर फूल नखरा से लगभग ३० किलोमीटर तथा शोभनेश्वर से लगभग ७ किलोमीटर की दूरी पर है।

अंगेश्वर महादेव मंदिर

गाँव के सँकरे मार्गों से होते हुए मैं कटक जिले के नुआ पीतपाड़ा में स्थित अंगेश्वर महादेव मंदिर पहुंचा। १४.२५ फुट ऊंचा अंगेश्वर महादेव मंदिर कलिंग शैली का रेखा विमान है। इस पूर्वमुखी मंदिर का निर्माण सोमवंशियों ने १० वीं. शताब्दी में करवाया था। इस जीवंत मंदिर की निर्मिती में पके हुए ईंटों का प्रयोग किया गया है जो भारत के इस भाग में सहज दृष्टिगोचर नहीं होता। सर्वाधिक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि ईंटों द्वारा निर्मित यह मंदिर १९९९ में आए भयावह चक्रवात में भी सुरक्षित बच गया जबकि उस चक्रवात ने इस क्षेत्र में सब कुछ तहस-नहस कर दिया था। इस मंदिर के अधिष्ठात्र देव पातालफुटा शिवलिंग है जो गोलाकार योनिपीठ पर आसीन है।

अन्गेश्वर महादेव मंदिर
अन्गेश्वर महादेव मंदिर

इस मंदिर का प्रमुख उत्सव महाशिवरात्रि है। समीप ही विश्वनाथ मंदिर है जो एक अप्रतिम धरोहर है। यदि समय अनुमति दे तो इस मंदिर का अवलोकन भी अवश्य करें। यह मंदिर फूल नखरा  से लगभग ५२ किलोमीटर तथा माधवानंद मंदिर से लगभग १८ किलोमीटर की दूरी पर है।

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चौरासी का वाराही मंदिर

कटक जिला पार करने के पश्चात पुरी में मेरा जो प्रथम पड़ाव था वह इस परिपथ में स्थित सभी मंदिरों में से सर्वाधिक शोभायमान मंदिर है। वह है चौरासी गाँव का वाराही मंदिर। विचित्र नाम वाले चौरासी गाँव में स्थित वाराही मंदिर प्राची नदी के दाहिने तट पर स्थित है। १५.८४ मीटर ऊंचे मंदिर में खाखरा विमान एवं एक चौकोर जगमोहन है। बलुआ पत्थर द्वारा निर्मित इस पूर्वाभिमुखी मंदिर का निर्माण सोमवंशियों ने १० वीं. शताब्दी में करवाया था।

वाराही मंदिर - चौरासी गाँव
वाराही मंदिर – चौरासी गाँव

इस मंदिर की अधिष्ठात्री देवी दो भुजाओं वाली माँ वाराही हैं। उनके दाहिने हाथ में एक मछली है जिसके कारण उन्हे मत्स्य वाराही भी कहा जाता है।

हरे-भरे बगीचे में स्थित इस मंदिर की लगभग सम्पूर्ण संरचना अखंडित है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग अब इसकी देखरेख करता है। यह मंदिर अपने अप्रतिम घुमावदार उत्कीर्णन तथा रूपांकनों के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। मंदिर के पृष्ठभाग में उत्कीर्णित सूर्य अत्यंत विशेष है। दशहरा एवं रज्जा यहाँ के प्रमुख उत्सव हैं।

यह मंदिर फूल नखरा से लगभग ५७ किलोमीटर तथा अंगेश्वर से लगभग ७ किलोमीटर दूर है। इस मंदिर में आप नीमपाड़ा-काकटपुर की दिशा में स्थित अंगेश्वर चौक द्वारा भी आ सकते हैं जो यहाँ से केवल २ किलोमीटर दूर है।

प्राची घाटी का प्रसिद्ध गंगेश्वरी मंदिर

पुरी जिले में मेरा अगला पड़ाव गंगेश्वरी मंदिर था जो गोप खंड के बयालीसबाटी में स्थित है। १५.८५ मीटर ऊंचे मंदिर में खाखरा विमान एवं कलिंग शैली का एक पीढ जगमोहन (मंडप) है। दक्षिण-पश्चिम दिशा में इसका मुख होने के कारण यह जीवंत मंदिर अत्यंत अनूठा है। इसका निर्माण भी बलुआ पत्थर द्वारा किया गया है। इस मंदिर का विशेष तत्व इसका तोरण है। पार्श्वदेवी के रूप में उपस्थित तेजस्वी वाराही का दर्शन आप अवश्य करें।

गंगेश्वरी मंदिर की तोरण
गंगेश्वरी मंदिर की तोरण

इस मंदिर की अधिष्ठात्री देवी चार-भुजा धारी महिषासुरमर्दिनी है। इस मंदिर को कोणार्क मंदिर की प्रतिकृति माना जाता है।

दशहरा, चैत्र मंगलवार, शोला पूजा इत्यादि इस मंदिर के प्रमुख उत्सव हैं। यह मंदिर वाराही मंदिर से लगभग १८ किलोमीटर दूर है। इस मंदिर तक आप नीमपाड़ा-काकटपुर की दिशा में स्थित अमरेश्वर चौक द्वारा भी पहुँच सकते हैं जो यहाँ से केवल २ किलोमीटर की दूरी पर है।

नीमपाड़ा का छैना झीली
नीमपाड़ा का छैना झीली

इस मंदिर से वापिस आते समय आप कोमल छेना झीली खाना ना भूलें। ये छेने के तले हुए मीठे गोले होते हैं जिसका अविष्कार नीमपाड़ा के स्व. आर्तबन्धु साहू के परिवार ने किया था। उनकी ‘आर्तबंधु मिठाई की दुकान’ के प्रबंधन का कार्य अब उनके पुत्र के कंधों पर है। जिन्हे खाना प्रिय है तथा विभिन्न खाद्य पदार्थों के विषय में लिखना प्रिय है वे यहाँ अवश्य आयें।

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बुद्धनाथ मंदिर

पुरी जिले में एक छोटी सी सवारी करने के पश्चात, बुद्धनाथ मंदिर के दर्शन करने के लिए मैं खोर्धा जिले की ओर वापिस मुड़ा। गंगेश्वरी मंदिर से लगभग २७ किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर बालीपाटना खंड के अंतर्गत गारेडी पांचण गाँव में स्थित है। यह मंदिर गारेडी पांचण के सुरम्य पृष्ठभूमि एवं ठेठ देहाती परिप्रेक्ष्य में स्थित है। २१.८५ मीटर ऊंचे मंदिर में रेखा विमान एवं कलिंग शैली का एक पीढ जगमोहन है। इस पूर्वाभिमुखी मंदिर का निर्माण पूर्वी गंग वंश ने १३ वीं. शताब्दी में करवाया था। इस जीवंत मंदिर का निर्माण भी बलुआ पत्थर द्वारा किया गया है। मंदिर परिसर में स्थित दो मंचों के निर्माण में लैटराइट का प्रयोग किया गया है। मंदिर के वास्तु रूपांकन, विशेषतः पार्वती एवं कार्तिक अत्यंत दर्शनीय हैं।

बुद्धनाथ मंदिर प्राची घाटी
बुद्धनाथ मंदिर प्राची घाटी

महाशिवरात्रि तथा बड़ा ओशा उत्सव  

महाशिवरात्रि तथा बड़ा ओशा यहाँ के प्रमुख उत्सव हैं। माँ अमृतलोचनी इस गाँव की ग्रामदेवी हैं जिनकी आराधना बुद्धनाथ मंदिर परिसर के एक प्राचीन मंदिर में की जाती है। भुवनेश्वर से उत्तर चौक होते हुए यहाँ तक पहुँचने के लिए २४ किलोमीटर की दूरी पार करनी पड़ती है।

भुवनेश्वर वापिस आते समय उत्तर चौक से थोड़ा पहले, बालकाटी में रुककर घंटी के धातु द्वारा कलाकृतियाँ तैयार करने की प्रक्रिया देख सकते हैं। यहाँ इस धातु से बनी कलाकृतियाँ अत्यंत प्रसिद्ध है। इस धातु का प्रयोग कर कारीगर अनेक सदियों से पीतल के सुंदर पात्र एवं मंदिर की कर्णप्रिय घंटियाँ बना रहे हैं। यहाँ से ओडिशा एवं ओडिशा के बाहर अनेक स्थानों पर इन वस्तुओं की आपूर्ति की जाती है।

प्राची घाटी का एक-दिवसीय भ्रमण

मैंने प्राची घाटी के धरोहरों के परिपथ में स्थित इन अप्रतिम स्थलों का भ्रमण एक दिवस में ही पूर्ण किया था। इन के अतिरिक्त कुछ अन्य स्थलों के भी आप दर्शन कर सकते हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • कुरुम बौद्ध स्थल
  • देओलीधरपुर के मधुकेश्वर एवं बोधिकेश्वर मंदिर
  • काकटपुर मंगल मंदिर
  • केंदुली गाँव का जयदेव पीठ
  • हीरापुर चौसठी योगिनी मंदिर

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यात्रा सुझाव

  • अधिकतर धरोहर क्षेत्रों के दर्शन के लिए सार्वजनिक परिवहन की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। मेरा सुझाव है कि आप अपने लिए किराये की गाड़ी का प्रबंध करें।
  • सड़क मार्ग वाहनों के लिए सुविधाजनक हैं। मार्ग में दृष्टिगोचर अप्रतिम दृश्य ग्रामीण जीवन से हमारा परिचय कराते हैं।
  • शौचालय, जलपानगृह एवं भोजनालयों जैसी सार्वजनिक सुविधाएं सभी मार्गों में कदाचित उपलब्ध ना हो पाएं। जहां तक हो सके, ईंधन स्थानक के शौचालयों एवं सुलभ शौचालयों का प्रयोग करें।
  • उपरोक्त उल्लेखित स्थलों में से अधिकांश स्थल ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं जो मुख्य मार्ग से दूर हैं। अतः आपने साथ पर्याप्त जल एवं खाद्य पदार्थ लेकर चलें।
  • मार्ग में सभी आवश्यक स्थानों पर पर्याप्त संकेत उपलब्ध हैं जो आपको इन मंदिरों तक आसानी से पहुंचा देंगे।
  • पाहाल, फूल नखरा, नीआली नीमपाड़ा तथा उत्तर चौक जैसे स्थानों पर आपको खाना व नाश्ता अवश्य मिल जाएगा।

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यह श्री तरणीसेन पट्टनाइक द्वारा लिखित एक अतिथि संस्करण है।


श्री तरणीसेन पट्टनायक व्यवसाय प्रबंधन में स्नातकोत्तर (एमबीए) हैं। वे व्यवसाय से अकाउन्टेंट हैं तथा ऐतिहासिक एवं भौगोलिक धरोहरों में उनकी अत्यंत रुचि है। वे भुवनेश्वर की मंदिर नगरी में पले-बढ़े हैं जो सांस्कृतिक रूप से जीवंत ओडिशा की राजधानी भी है। वे एक यात्रा-उत्साही हैं जो अपना खाली समय मोटरसायकल पर एकल भ्रमण करने में व्यतीत करते हैं। वे ऐसे राष्ट्रीय धरोहरों की खोज में भ्रमण करते हैं जिनके विषय में लोग कम जानते हैं। वे अपने गृह राज्य के सांस्कृतिक आयामों को जानने के लिए भी विशेष रूप से उत्सुक रहते हैं। वे www.bbs rpulse.com/blog पर अपनी यात्रा तथा सांस्कृतिक धरोहरों के विषय में विस्तृत संस्करण लिखते रहते हैं। उनके संस्करण विशेषतः ओडिशा से संबंधित होते हैं। उनकी तीव्र अभिलाषा है कि प्राची क्षेत्र ओडिशा के पर्यटक परिपथ में शीघ्र सम्मिलित किया जाए।


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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