पुरखौती मुक्तांगन – पूर्वजों को समर्पित भावपूर्ण श्रद्धांजलि, नया रायपुर 

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पुरखौती मुक्तांगन की दीवारों पे चित्रकारी
पुरखौती मुक्तांगन की दीवारों पे चित्रकारी

नए रायपुर की चौड़ी, व्यापक और बिजली के खंबों से पंक्तिबद्ध सड़कें आपको इस 200 एकड़ के संस्कृति और विरासत से जुड़े संग्रहालय तक ले जाती हैं, जिसे पुरखौती मुक्तांगन कहा जाता है। जब पहली बार मैंने इस जगह का नाम सुना था उसी पल से मुझे उसके नाम से एक प्यारा सा लगाव हो गया था। पुरखौती मुक्तांगन का अर्थ है एक खुला उन्मुक्त आंगन जहाँ पुरखों को श्रद्धांजलि दी जाती है और उनकी दी गयी धरोहर से हमारा परिचय कराया जाता है। इसे खुला संग्रहालय भी कहा जाता है।

सुनसान सी सड़कों और गलियों को पार करके जब आप इस संग्रहालय के पास पहुँचते हैं, तो सबसे पहले आपको इस छोटे से सांस्कृतिक ग्राम के बड़े-बड़े काले लोहे में गढ़े प्रवेश द्वार नज़र आते हैं, जिस पर आदिवासी कलाकृतियाँ बनी हुई हैं। इसकी चारदीवारी पर चित्रित लोक-कथाएँ चित्तरंजक हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस संग्रहालय का खुलापन और उसकी मुक्तता कई हद तक इसे और भी आकर्षक बनाती है।

पुरखौती मुक्तांगन – रायपुर में घूमने की जगहें   
कहानियां सुनते प्रवेश द्वार - पुरखौती मुक्तांगन - रायपुर छत्तीसगढ़
कहानियां सुनते प्रवेश द्वार

इस उन्मुक्त संग्रहालय के धातु के बने प्रवेश द्वार पर चित्रों के रूप में अनेक कहानियाँ कहते हैं – आदिवासियों की, आदवासी जनजातियों की और उनकी संस्कृति की। इस मुक्तांगन में प्रवेश करते ही वहाँ पर खड़ी सुंदर सी आदमक़द मूर्तियाँ आपका स्वागत करती करती हैं। इन मूर्तियों द्वारा छत्तीसगढ़ी लोगों के जीवन को बहुत अच्छी तरह से दर्शाया गया है।

व्यापक रूप से फैले इस आँगन के चारों ओर खड़ी दीवारें उज्ज्वल रंगों में की गयी आदिवासी चित्रकारी से सजी हुई हैं। यहाँ की सभी आदिवासी जातियों को उनकी पारंपरिक वेश-भूषा में लोक-नृत्य करते हुए चित्रावली के रूप में प्रदर्शित किया गया है। इसके अलावा यहाँ पर अनेक मौखिक भाव दर्शाते हुए मुखौटे भी दिखाई देते हैं। यहाँ लकड़ी पर उत्कीर्णित कला  दिखाने वाली एक खास दीर्घा भी है, जहाँ पर पेड़ों के बड़े-बड़े तने रखे हुए हैं, जिन्हें आप अपनी आँखों के सामने तराशते हुए देख सकते हैं।

पुरखौती मुक्तांगन के जलाशय को भी आस-पास के परिवेश में ढालने के लिए भित्ति चित्रों से सजाया गया है, जिससे की वह इस प्रांगन के वातावरण में घुल मिल जाता है और इसका एक अंग प्रतीत होता है। इस संग्रहालय के एक भाग में आदिवासी आभूषणों को प्रदर्शित किया गया है, जैसे कि दीवारों पर लटकती हुई बड़ी-बड़ी कान की बालियाँ या झुमके, या हरी घास के बीचों बीच चांदी की मोटी मोटी चूड़ियाँ आदि। संग्रहालय का यह भाग मुझे सबसे ज्यादा अभिनव लगा – जैसे कि आदिवासी आभूषण ही इस संग्रहालय की विषय वस्तु हो।

भित्तिचित्र और ठेठ छत्तीसगढ़ी ग्राम
श्रीमती सोनाबाई रजवार द्वारा बनाये गए भित्तिचित्र - पुरखौती मुक्तांगन
श्रीमती सोनाबाई रजवार द्वारा बनाये गए भित्तिचित्र – पुरखौती मुक्तांगन

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित कलाकार श्रीमति सोना बाई रजवार को इस पैतृक संग्रहालय के लिए छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन पर आधारित भित्ति चित्र बनाने हेतु खास तौर से आमंत्रित किया गया था। इन भित्ति चित्रों के द्वारा उन्होंने छत्तीसगढ़ के ठेठ ग्रामीण घरों को बड़ी बारीकी से दर्शाया है। प्रत्येक घर के मुख्य द्वार की चौखट चमकदार रंगों और चित्रों से सजायी गयी है। प्रत्येक खिड़की पर रखी गयी स्थानीय पशु-पक्षी या फिर लोक-कथा के किसी पात्र की मिट्टी की बनी मूर्ति भी दिखाई गयी है।

वहाँ पर गांववालों की आदमक़द प्रतिमाएँ भी हैं जिन्हें अपने दैनिक काम-काज करते हुए दिखाया गया है। हमारी इस यात्रा के दौरान पुरखौती मुक्तांगन में यहाँ वहां निर्माण कार्य चल रहा था। इसके बावजूद भी उस माहौल में घूमना हमारे लिए बहुत ही आनंददायी था। इस जगह के द्वारा हम भारत के ग्राम्य जीवन को देख और समझ पा रहे थे। पुरखौती मुक्तांगन का भ्रमण कर पता चलता है की कला जीवन के एक अटूट भाग हुआ करता था ना कि बस एक दिखावे की वास्तु मात्र जिसका प्रयोजन केवल हमारी दीवारों का सुसज्जित करना है।

पुरातात्विक स्थलों की प्रतिकृति और सर्वोत्कृष्ट संरचनाएं   
प्रसिद्द भोरेम देव मंदिर - छत्तीसगढ़
प्रसिद्द भोरेम देव मंदिर – छत्तीसगढ़

यहाँ पर प्रमुख छत्तीसगढ़ के पुरातात्विक स्थलों और सर्वोत्कृष्ट संरचनाओं का आदमक़द रचनाओं के रूप में पुनःनिर्माण किया गया है, जैसे कि भोरम देव का मंदिर और ताला की रुद्रशिव की मूर्ति। मुझे बताया गया कि इस संग्रहालय का मुख्य उद्देश्य यहाँ पर आनेवाले आगंतुकों को छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति की एक छोटी सी झलक प्रदान करना है, जो अन्यथा शायद इन दूरवर्ती जगहों पर ना जाए। यहाँ पर छत्तीसगढ़ के स्वतंत्र सेनानियों की भी प्रतिमाएँ हैं।

मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि इस संग्रहालय को खड़ा करने में, खास कर यहाँ पर स्थापित मूर्तियों तथा अन्य कलाकृतियों का निर्माण करने में स्थानीय कलाकारों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। सच में यह बहुत ही प्रशंसनीय बात है, कि यह जगह स्थानीय कलाकारों के लिए अपनी कला को प्रदर्शित करने का एक सुयोग्य मंच बन पाया। यह इन कलाकारों को नयी पहचान देने तथा स्थानीय कला के विविध रूपों को संरक्षित करने का बहुत ही अच्छा प्रयास है। इस संग्रहालय में स्थापित बड़ी-बड़ी प्रतिमाओं और मूर्तियों को बनानेवाले सबसे मत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक हैं कलाकार पीलू राम साहू।

चित्रकार 

इस खुले संग्रहालय के विस्तारित मैदान में यहाँ-वहाँ कुछ पेड़ लगाने की बहुत ज्यादा आवश्यकता है, जिससे कि यहाँ के वातावरण में बढ़ती उष्णता थोड़ी कम हो सके और इस जगह को भी थोड़ा प्रकृतिक स्पर्श मिले। अभी के लिए तो यह जगह कार्य प्रगति की स्थिति में है और शायद थोड़े और समय तक इसी परिस्थिति में हो सकती है। लेकिन ऐसी स्थिति में भी इस संग्रहालय के दर्शन करना हमारे लिए बहुत ही लाभदायक रहा। हम स्वयं अपनी आँखों से इन कारीगरों को बड़ी लीनता से अपना काम करते हुए देख सके। यहाँ पर अतिथि चित्रकारों के लिए एक खास जगह बनवाई गयी है, जहाँ पर रहकर वे अपना काम कर सकते हैं। पुरखौती मुक्तांगन में एक विक्रय केंद्र और एक पर्यटक सूचना केंद्र भी है, यद्यपि यहाँ पर आनेवाले पर्यटको और आगंतुकों की संख्या अभी उतनी ज्यादा नहीं है।

यहाँ पर प्रदर्शित कलाकृतियों का पर्यवेक्षण करने और उन्हें समझने के लिए आपको लगभग एक पूरे दिन की आवश्यकता है। यदि आप जल्दी में हो तो, २-३ घंटों में भी पुरखौती मुक्तांगन को देख सकते हैं। मेरा सुझाव तो यही होगा की शांति से बैठ कर यहाँ की कलाकृतियों को निहारिये

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