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अवनी-कोलार का रामायणकालीन रामलिंगेश्वर मंदिर समूह

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सम्पूर्ण दक्षिण भारत, विलक्षण वास्तुकला युक्त आकर्षक मंदिरों से परिपूर्ण है। अवनी का रामलिंगेश्वर मंदिर समूह भी ऐसे ही दर्शनीय एवं अद्भुत मंदिरों का एक समूह है जो कर्नाटक के कोलार नगर के पास स्थित है।

रामलिंगेश्वर मंदिर समूह अवनी कर्णाटक
रामलिंगेश्वर मंदिर समूह अवनी कर्णाटक

अवनी एक छोटी सी नगरी है जो कोलर के मुख्य नगर से ३० की.मी. की दूरी पर बसी हुई है। यह शांत व निर्मल नगरी, बंगुलुरु महानगर से अत्यंत समीप स्थित होने के बाद भी लीक से हट कर प्रतीत होती है। यह अछूती नगरी अपने आप में पर्यटन हेतु उत्कृष्ट स्थल के रूप में उभर कर आयी है। यहाँ स्थित रामलिंगेश्वर मंदिर समूह को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया गया है।

अवनी के रामलिंगेश्वर मंदिर समूह का इतिहास

अवनी के रामलिंगेश्वर मंदिर का शिखर
अवनी के रामलिंगेश्वर मंदिर का शिखर

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार अवनी के इन मंदिरों का निर्माण १०वी. ई. में नोलम्ब वंश द्वारा किया गया था। नोलम्ब वंश दक्षिण भारत का एक लघु वंश था जिसके वंशज शिवलिंग पूजन करते हुए लिंगायत परंपरा का पालन करते थे। कालान्तर में द्रविड़ वास्तुकला में निर्मित इन मंदिरों के पुनरुद्धार में चोल वंश का भी योगदान रहा था। इतिहासकार जेम्स हार्ले के अनुसार अवनी के रामलिंगेश्वर मंदिर उन मंदिर समूहों के आरंभिक उदाहरण हैं जहां मंदिरों का एक समूह एक बाहरी भित्त के भीतर निर्मित किया जाता था।

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रामलिंगेश्वर एवं लक्ष्मंलिनेश्वर मंदिर - अवनी कोलार
रामलिंगेश्वर एवं लक्ष्मंलिनेश्वर मंदिर – अवनी कोलार

स्थानीय किवदंतियों के अनुसार महर्षि वाल्मीकि अवनी में निवास करते थे। अवनी के इन मंदिरों के एक ओर स्थित पठार पर उनका निवास स्थान था। ऐसी मान्यता है कि रावण वध कर श्रीलंका से वापसी के समय भगवान् श्रीराम ने उनसे यहाँ भेंट की थी। ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान् राम व देवी सीता के पुत्रों, लव एवं कुश का जन्म भी यहीं हुआ था। अतः भक्त इस पठार को स्नेह से ‘लव-कुश बेट्टा’ भी कहते हैं। कन्नड़ भाषा में बेट्टा का अर्थ पहाड़ी होता है। भगवान् राम द्वारा आयोजित अश्वमेघ यज्ञ के समय लव एवं कुश ने श्री राम के अश्व को यहीं रोका था। इसके फलस्वरूप भगवान् राम ने अपने भ्राताओं सहित अज्ञानवश यहीं अपने पुत्रों से युद्ध किया था।

पुत्रों के विरुद्ध अस्त्र शस्त्र उठाने के कारण पश्चाताप वश भगवान् राम ने अपने भ्राताओं सह पूजा अनुष्ठान आयोजित कर अपने पापी कर्मों हेतु क्षमा याचना की थी। उसी समय चारों भ्राताओं ने एक एक शिवलिंग की स्थापना कर भगवान् शिव की आराधना की थी।

अवनी के रामलिंगेश्वर मंदिर कैसे पहुंचें?

बंगलुरु से कोलार पहुंचकर राष्ट्रीय राजमार्ग ७५ पर आगे बढ़ें। कोलार मुख्य नगर से लगभग ३०कि.मी. की दूरी पर, मुख्य राजमार्ग से एक सड़क दायीं ओर मुड़ कर अवनी गाँव की ओर जाती है। इस सड़क पर लगभग १०कि.मी. आगे जाकर आप रामलिंगेश्वर मंदिर के परिसर में पहुँच जायेंगे।

अवनी के रामलिंगेश्वर मंदिर समूह का प्रवेश
अवनी के रामलिंगेश्वर मंदिर समूह का प्रवेश

चूंकि रामलिंगेश्वर मंदिर समूह अवनी का मुख्य विरासती स्थल है, अवनी गाँव के प्रत्येक व्यक्ति को मंदिर पहुँचने के मार्ग की जानकारी है। अवनी आते प्रत्येक पर्यटक का मुख्य आकर्षण भी यही मंदिर ही हैं। अतः गाँववासियों को इन मंदिरों की जानकारी होना स्वाभाविक है। वे आपको सही मार्ग बताने हेतु सदैव तत्पर रहते हैं। अधिकतर पर्यटकों को स्थानीय भाषा की जानकारी नहीं होती। तथापि केवल मंदिर का नाम लेना ही पर्याप्त है। गाँववासी आपको सही दिशानिर्देष अवश्य प्रदान करेंगे।

मंदिर की ओर जाते मार्ग को ढूँढना आसान है क्योंकि अवनी से मंदिर की ओर केवल एक ही सड़क जाती है। लव-कुश बेट्टा को आप दूर से ही पहचान लेंगे। जो मार्ग आपको इस पठार के समीप पहुंचाए, वही सही मार्ग है।

अवनी रामलिंगेश्वर मंदिर समूह के दर्शन

जैसे ही हमने मंदिर प्रांगण के भीतर प्रवेश किया, उत्कृष्ट द्रविड़ पद्धति के वास्तुशिल्प में बने कई शोभायमान मंदिरों के समूह ने हमें सम्मोहित सा कर दिया। मंदिरों के प्रत्येक स्तंभ पर उत्कीर्णित गहन नक्काशी अत्यंत सुभग होने के कारण हमारा ध्यान आकर्षित कर रहे थे। हमने देखा कि प्रत्येक मंदिर के गर्भगृह के प्रवेशद्वार से पूर्व एक मंडप निर्मित था।

अवनी कोलर के रामलिंगेश्वर मंदिर समूह परिसर
अवनी कोलर के रामलिंगेश्वर मंदिर समूह परिसर

परिसर प्रवेशद्वार के दाहिनी ओर विवाह समारंभ हेतु एक कल्याणी मंडप बनाया गया है। उसी प्रकार बाईं ओर विश्राम हेतु एक मंच निर्मित है। मंदिर प्रांगण में प्रवेश के उपरांत, प्रवेशद्वार के समक्ष, प्रांगण के मध्य एक सुनहरा ध्वज फहराया गया था। इस मंदिर की बाईं ओर से दाहिनी ओर दक्षिणावर्त परिक्रमा करते समय आप उन सब मंदिरों के दर्शन कर सकते हैं जो रामलिंगेश्वर मंदिर समूह का भाग हैं। मंदिर भित्तियों पर देवी देवताओं सहित सिंह व गज इत्यादि जंतुओं की छवियां भी उत्कीर्णित हैं।

नंदी मंडप - कोलर के निकट अवनी
नंदी मंडप – कोलर के निकट अवनी

प्रत्येक मन्दिर के समक्ष, सम्बंधित मंदिर की समृद्ध वास्तुशिल्प की जानकारी प्रदान करती सूचना पट्टिकाएं गड़ी हुईं हैं। उदाहरणतः ऐसी ही एक पट्टिका में दर्शित जानकारी इस प्रकार थी-

रामलिंगेश्वर मंदिर समूह का ध्वज स्तम्भ
रामलिंगेश्वर मंदिर समूह का ध्वज स्तम्भ

रामलिंगेश्वर मंदिर में एक गर्भगृह, एक अंतराल तथा कई अलंकृत स्तंभों से सुसज्जित एक नवरंग है। इन अलंकृत स्तंभों की रूपरेखा मानस्तंभ के समान है। इसके अधिष्ठान की सजावटी गड़ाई कीर्तिमुख तथा सिंहों की आकृतियों द्वारा की गयी है।
मंदिर के अंतरतम पवित्र स्थल को गर्भगृह कहा जाता है, वहीं अंतराल गर्भगृह के समक्ष स्थित उपकक्ष को कहा जाता है। मंदिरों में देवी-देवताओं को नृत्य संगीत के रूप में आराधना समर्पित करने की रीत कई मंदिरों में पाली जाती है। नवरंग ऐसे ही प्रदर्शन हेतु यहाँ निर्मित एक सभागृह है जो कई स्तंभों से सुसज्जित है। अधिष्ठान वह उभरा मंच होता है जिस पर मंदिर का निर्माण किया जाता है।

परिसर के भीतर निर्मित मंदिर एवं पावनस्थल

रामलिंगेश्वर मंदिर
रामलिंगेश्वर मंदिर

रामलिंगेश्वर मंदिर के भीतर महाकाव्य रामायण के चारों भ्राताओं, राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न को समर्पित चार मंदिर हैं। इन्हें क्रमशः रामलिंगेश्वर, लक्षमणलिंगेश्वर, भरतलिंगेश्वर तथा शत्रुघ्नलिंगेश्वर कहा जाता है। इनमें से रामलिंगेश्वर, लक्षमणलिंगेश्वर तथा शत्रुघ्नलिंगेश्वर आपस में सटे हुए हैं, जबकि भरतलिंगेश्वर मंदिर, परिसर के दूसरी ओर स्थित है। कहा जाता है कि इस परिसर के भीतर सर्वप्रथम भरतलिंगेश्वर की स्थापना की गयी थी।

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परिसर के बीचों बीच रामलिंगेश्वर मंदिर स्थापित है जो यहाँ का मुख्य मंदिर भी है। इस मुख्य मंदिर के भीतर संभवतः पुजारीजी से भेंट हो सकती है। चारों शिवलिंगों में लक्षमणलिंगेश्वर का शिवलिंग विशालतम है जबकि अन्य तीन शिवलिंगों का आकार सामान है। देवी पार्वती को समर्पित भी एक मंदिर यहाँ निर्मित है। क्यों न हो! जहां शिव हों वहां उनकी शक्ति अवश्य समीप होंगीं।

जिन तथ्यों ने हमें यहाँ सर्वाधिक आकर्षित किया, वह थे मंदिर में की गयी मनमोहक नक्काशी तथा यहाँ का शांत वातावरण। यहाँ हमारे अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं था। अतः बंगुलुरु के कोलाहल से दूर, इस रमणीय अछूते शांत स्थल ने हमारे सप्ताहांत छुट्टियों को और भी सफल बना दिया था। हमने प्रत्येक मंदिर में प्रवेश किया एवं शान्ति से प्रार्थना की।

तत्पश्चात हम और आगे बढे तथा परिसर के अंतिम भाग पर पहुंचे। मंदिर के सुदूर बाईं ओर एक छोटा सा विघ्नेश्वर मंदिर निर्मित है जिसके भीतर गणेशजी की सुन्दर प्रतिमा स्थापित है। आप सब जानते हैं कि गणेशजी, भगवान् शिव एवं पार्वती के पुत्र होते हुए एक कौटुम्बिक देव हैं।

इन सर्व मंदिरों के अतिरिक्त, प्रांगण के अग्रभाग में दाहिनी ओर कुछ और शिवलिंग स्थापित थे। इनके समीप स्थित एक प्राचीन कुआं अब भी कार्यरत है तथा इसका जल पीने योग्य है।

अवनी का सीता मंदिर

लव कुश बेट्टा - अवनी
लव कुश बेट्टा – अवनी

लव-कुश बेट्टा के ऊपर भी एक लघु मंदिर निर्मित है। यह देवी सीता को समर्पित भारत के कुछ ही मंदिरों में से एक है। यूँ तो हम इस पठार पर नहीं चढ़े, यद्यपि इस पठार पर चढ़ने हेतु सोपान बनाए हुए हैं। हम केवल अनुमान लगा रहे थे कि इस पठार अथवा बेट्टा पर चढ़कर रामलिंगेश्वर मंदिर समूह का विहंगम दृश्य प्राप्त होता होगा।

रामलिंगेश्वर मंदिर एवं लव-कुश बेट्टा के मध्य एक लघु रमणीय तालाब है। तालाब में खिले कमल पुष्प इसकी सुन्दरता को उत्कृष्टता प्रदान कर रहे थे। कहा जाता है कि देवी सीता अपने अवनी निवास के समय इसी तालाब का जल मुख्य जलस्त्रोत के रूप में उपयोग करती थीं। इस जल को अत्यंत पवित्र मानते हुए पुजारीजी एवं भक्तगण अब भी इसमें पवित्र स्नान करते हैं। कुछ सीड़ियाँ उतरकर इस तालाब के जल तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।

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देवी सीता को अवनीसुता अर्थात् धरतीपुत्री भी कहा जाता है। आप सबने बाल्यावस्था में अवश्य कहानियां सुनी होंगी कि धरती में हल चलाते समय एक घड़े के भीतर शिशु रूप में सीताजी उभरी थीं। कहा जाता है कि इसी धारणा के अनुसार इस स्थान को अवनी कहा जाता है। मंदिर के समीप एक गुफा है। मान्यतानुसार यह गुफा संत वाल्मीकि का निवासस्थान था। रामायण के अनुसार, परित्याग उपरांत वनवास के समय, देवी सीता ने यहीं वाल्मीकिजी के आश्रम में आश्रय लिया था। यहीं उन्हें लव एवं कुश के रूप में पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई थी।

ऐसा माना जाता है कि संतान प्राप्ति की इच्छा लिए विवाहित जोड़ा जब इस मंदिर में देवी सीता के दर्शन करता है तब उनकी इच्छा पूर्ण होती है। इस हेतु स्त्री को सर्वप्रथम नीचे स्थित तालाब में पवित्र स्नान करना पड़ता है। तत्पश्चात मंदिर तक पदयात्रा करते हुए पठार चढ़ना पड़ता है। स्वाभाविक है कि परिश्रम से थक कर स्त्री उन्निन्दी अनुभव करती है। तब स्त्री निद्रामग्न होकर स्वप्न में एक स्नेहमयी माता के दर्शन करती है जो प्रेमपूर्वक उसे आशीर्वाद प्रदान करती है। इसके पश्चात स्त्री की गर्भवती होकर संतानप्राप्ति की इच्छा पूर्ण होती है।

अवनी के मंदिरों में उत्सव

अवनी में महाशिवरात्रि का उत्सव अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। इस उत्सव में रामलिंगेश्वर मंदिर प्रांगण से एक भव्य रथयात्रा निकाली जाती है। इस उत्सव में सहभागी होने के लिए निकटवर्ती अनेक गाँवों एवं नगरों से असंख्य भक्तगण अवनी में एकत्रित होते हैं।

अवनी गाँव

अवनी के मंदिर में स्थित कुआँ
अवनी के मंदिर में स्थित कुआँ

अवनी मुलबागल तालुका के अंतर्गत एक छोटा सा गाँव है। इस गाँव से १०कि.मी. की सीमा के भीतर कोई रेल स्थानक नहीं है। बंगलुरु तथा अन्य निकटवर्ती स्थलों से यहाँ पहुँचने हेतु वहां से चलने वाली सीधी बस सेवा सर्वोपयुक्त साधन है। किराए की गाड़ी स्वयं चलाकर सड़क मार्ग से यहाँ आना भी रोमांचक है। यहाँ पहुंचकर रामलिंगेश्वर मंदिर समूह के दर्शनोपरांत कुछ अन्य स्थलों के भी दर्शन कर सकते हैं। उदाहरणतः श्रृंगेरी शारदा पीठ के श्री नरसिंह भारती(चौथे) ने यहाँ एक नवीन मठ की स्थापना की है। अपने एक अनुयायी शिष्य को यहाँ मठाधीश भी नियुक्त किया है। आप इस मठ के भी दर्शन कर सकते हैं।

अवनी गाँव को ‘दक्षिण का बोधगया’ भी कहा जाता है। हालांकि मुझे इसके प्रष्ठभागीय कारण ज्ञात नहीं हो पाए। वाचकों से निवेदन है कि यदि आपको इस विषय में जानकारी प्राप्त हो तो कृपया मुझे अवश्य बताएं।

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कुल मिलाकर अवनी का रामलिंगेश्वर मंदिर समूह आध्यात्मिक दर्शनार्थी, वास्तुकला प्रेमी तथा शांत वातावरण के इच्छित पर्यटकों हेतु सामान रूप से संतोषजनक स्थल है। फिर वे चाहे प्राचीन मंदिरों व विरासती स्थलों में रूचि रखते हो, या जिन्हें प्राचीन किवदंतियां रोमांचित करती हो, या वे लीक से हटकर पर्यटन स्थलों के दर्शन करना चाहते हो, अथवा जो शांत वातावरण में निसर्ग का आनंद उठाना चाहते हों। अवनी तथा रामलिंगेश्वर मंदिर समूह में उपरोक्त सर्वगुण उपस्थित हैं।

इसलिए यह हर प्रकार से पर्यटकों हेतु उत्कृष्ट पर्यटन स्थल है।


यह संस्मरण नेहा द्वारा लिखा अतिथि संस्मरण है। नेहा व उनके पति अभिषेक पेशे से सॉफ्टवेर अभियंता है। साथ ही वे यात्रा उत्साही व यात्रा संस्मरण लेखक भी हैं। वे अपनी नन्ही बिटिया के संग देश-विदेश की यात्रा करते हैं तथा ‘Revolving Compass’ इस संस्मरण वेबस्थल के द्वारा वाचकों व पर्यटन प्रेमियों से अपने अनुभव बाँटते हैं।


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

4 COMMENTS

  1. अवनी-कोलार का रामायणकालीन रामलिंगेश्वर मंदिर समूह पर आपका लेख पढ़कर ही यात्रा की अनुभूति होती है, तो वहाँ जाकर कितना आनंद प्राप्त होगा? चित्रों में तो वाकई बहुत ही मनोहर स्थल प्रतीत होता है तथा रामायण के लवकुश से सम्बद्ध होना इसे अपने आप मे और भी महत्वता प्रदान करता है एक ओर ऐतिहासिक धरोहर की जानकारी देने के लिए साधुवाद????????

    • धन्यवाद संजय जी, मुझे भी अवनी के बारे में जान कर आश्चर्य हुआ था हालाँकि वाल्मीकि जी का आश्रम उत्तर में होने की संभवना अधिक है, सीतामढ़ी के आस पास.

  2. अनुराधा जी,
    १० वी ई. में निर्मित अति प्राचीन रामलिंगेश्वर मंदिर समूह के बारे में बहुत ही अनुठी जानकारी….
    दक्षिण भारत के अन्य मंदिरो की भांति इन मंदिरों की भी स्थापत्य कला बेजोड़ प्रतीत होती हैं । वैसे भी दक्षिण भारत के भव्य मंदिर अपनी विलक्षण स्थापत्य कला के लिये विश्व विख्यात हैं । बेंगलूरू महानगर के इतने समीप होते हुए भी इस राष्ट्रीय धरोहर का शांत वातावरण पर्यटकों को सुकून प्रदान करता होगा….
    अतिथी लेखीका नेहा जी को सुंदर चित्रों से परिपूर्ण ज्ञानवर्धक आलेख हेतू अनेक अनेक धन्यवाद !

    • प्रदीप जी, भाग्यवश दक्षिण भारत में अधिकतर मंदिर वैसे ही हैं जैसे वह निर्मित किये गए थे, उत्तर भारत भी किसी समय पर ऐसे ही मंदिरों से भरा रहा होगा, बस वो मंदिर अब नहीं हैं.

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