भारत की रेशमी साड़ियाँ – कला एवं धरोहर का अद्भुत संगम

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कला का दूसरा नाम है प्रेरणा। कला के विभिन्न रूप एक दूसरे से प्रेरित होते हैं तथा एक दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं। वे नवीन विचारों के प्रेरणास्त्रोत हैं। कला के विभिन्न रूपों का संगम सृजनशीलता को जन्म देता है जो आनंद व उमंग का स्त्रोत है। मंदिर, वस्त्र, वास्तुकला, संगीत तथा इनको जोड़ने वाले महान कलाकार भारतीय संस्कृति का अभिन्न भाग हैं। विद्वानों ने इन विद्याओं का पृथक पृथक अध्ययन तो भरपूर किया है किन्तु उनमें निहित कथाओं, आकृतियों एवं उनकी सराहना व संरक्षण करते कला प्रेमियों का अद्भुत संगम क्वचिद ही दृष्टिगोचर होता है।

भारत की रेशमी साड़ियाँ – भारतीय कलाशैली, वास्तुशिल्प एवं ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहर के अग्रदूत

आईये देखते हैं, भारतीय वस्त्रों में हमारी ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहर तथा अप्रतिम वास्तुकला का अद्वितीय संगम।

रेशमी साड़ियों की किनार पर मंदिरों की आकृतियाँ

जिन्हें कांचीपुरम अर्थात् कांजीवरम साड़ियाँ भाती हैं, उनसे इन साड़ियों के विषय में पूछें तो वे अत्यंत उत्साह से आप से मंदिर की आकृतियों से युक्त किनारियों के विषय में निश्चित ही चर्चा करेंगे। कांचीपुरम में बुनी ये सौंदर्य से परिपूर्ण व भव्य कांजीवरम साड़ियों की किनारियों में मंदिर की आकृतियाँ बुनी जाती हैं। कांचीपुरम साड़ियों की किनारियों में मंदिर की आकृतियाँ बुनना अब सर्वविदित है। किन्तु क्या आप जानते है कि इन साड़ियों में बुनी गयी मंदिर की किनारियों में भी अनेक प्रकार होते हैं?

गोपुरम काठ की रेशमी साडी
गोपुरम काठ की रेशमी साडी

गोपुरम काठ – दक्षिण भारत के मंदिरों के प्रवेश द्वारों के ऊपर ऊंची अट्टालिकाएं होती हैं जिन्हें गोपुरम कहते हैं। इन पर भव्य शिल्पकारी की जाती है। वे दूर से ही मंदिर के वास्तु की घोषणा करते प्रतीत होते हैं। प्रवेश द्वार के इस बहु-तलीय संरचना की प्रतिकृति को साड़ी की किनारी एवं आँचल पर ऐसे बुना जाता है कि उनके शीर्ष साड़ी के मुख्य भाग को भेदते प्रतीत होते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे नीचे से देखने पर गोपुरम के शीर्ष स्वच्छ आकाश को भेदते प्रतीत होते हैं। गोपुरम के विभिन्न तलों को तीखे ज्यामितीय आकृतियों से दर्शाया जाता है जो ऊपर जाते जाते संकरे होते जाते हैं। सामान्यतः साड़ियों की किनारियों को मुख्य रंग से विपरीत रंग में बुना जाता है। इसके कारण  मंदिर की किनारी अत्यंत भव्य प्रतीत होती है।

लघु मंदिर की किनारी –  इस प्रकार की किनारी में गर्भगृह के शिखर की प्रतिकृति बुनी जाती है। रंगीन अथवा सुनहरी किनारी पर छोटे छोटे त्रिकोणीय संरचनाओं की पंक्तियाँ होती हैं। उन्हें तमिल भाषा में “मोग्गु” कहा जाता है, जिसका अर्थ है, कली। ये आकृतियाँ कलियाँ सदृश ही प्रतीत होती हैं।

रुद्राक्ष किनारी – रुद्राक्ष का सम्बन्ध भगवान शिव से है। ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष उनके चक्षुओं से निकली आंसू की बूँद है। भगवान शिव के अलंकरण में रुद्राक्ष के आभूषण भी सम्मिलित होते हैं। अनेक शिव भक्त भी अपने शरीर पर रुद्राक्ष धारण करते हैं। इसी परंपरा का पालन करते हुए बुनकर कांचीपुरम साड़ियों की किनारियों पर गोपुरम के साथ रुद्राक्ष की आकृतियाँ भी बुनते हैं। वे यह दर्शाना चाहते हैं कि उन्होंने शिव मंदिर की आकृति को यहाँ प्रदर्शित किया है। जब आप साड़ी को खोलकर हाथों में पकड़ते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है मानो आपने रुद्राक्ष की माला पकड़ी है।

साड़ियों पर मिथिला की कथाएं

जब भागलपुर की तसर रेशम का मिथिला की ज्यामितीय आकृतियों से एक वस्त्र के रूप में विलय होता है तब वे अनगिनत कथाएं कहती हैं। मधुबनी कला का इस क्षेत्र के पारंपरिक अनुष्ठानिक चित्रों से सम्बंध है। प्राचीनकाल से विवाह, नामकरण जैसे आयोजनों में भित्तियों पर शुभ चिन्ह चित्रित किये जाते हैं। आज के समय में भित्तियों को रंगने की अपेक्षा उन चित्रों को कागज पर चित्रित कर लटकाया जाता है। उन्ही चित्रों व आकृतियों की छपाई साड़ियों पर भी की जाती है। इससे इस कला को नवीन ऊँचाई प्राप्त हो रही है। साथ ही साड़ियों की भव्यता एवं मूल्य में भी वृद्धि होती है। कलाकार, विशेषतः स्त्रियाँ, अत्यंत सावधानी से तथा परिश्रम पूर्वक अपने हाथों से इन सूक्ष्म आकृतियों को वस्त्रों पर चित्रित करती हैं। उनकी सम्पूर्ण रचनात्मकता किसी चित्रफलक के समान उन साड़ियों पर अंकित हो जाती हैं। प्रत्येक आकृति एक कथा कहती है।

मधुबनी साडी पर राम जानकी विवाह
मधुबनी साडी पर राम जानकी विवाह

इन स्त्रियों द्वारा चित्रित की गयी सर्वाधिक लोकप्रिय कथा है, राम-जानकी विवाह। यह विवाह मिथिला में संपन्न हुआ था। यह कथा इस क्षेत्र के कण कण में समाई हुई है। इसके पश्चात, लाल रेशमी वस्त्र पर दुर्गा एवं काली के चित्र भी अत्यंत लोकप्रिय हैं जो बहुधा नवरात्रि के अवसर पर उपलब्ध कराये जाते हैं। तसर रेशम के मूल रंग, मटमैले पीले रंग पर पुष्प तथा अन्य प्राकृतिक आकृतियाँ भी अत्यंत लुभावने प्रतीत होते हैं। ये आकृतियाँ साड़ियों के साथ दुपट्टों पर भी उपलब्ध हैं। इन्हें धारण करने वालों को प्रकृति की सन्निधि का अनुभव होता है।

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रेशमी साड़ियाँ तथा टेराकोटा मंदिर

पश्चिम बंगाल के बिष्णुपुर एवं बांकुरा क्षेत्र सुन्दर बालूचरी एवं स्वर्णचरी साड़ियाँ के लिए अत्यंत लोकप्रिय हैं। इनमें बालूचरी साड़ियों पर रेशमी धागे से तथा स्वर्णचरी साड़ियों पर सुनहरे धागे से कढ़ाई की जाती है।  जब आप बिष्णुपुर एवं बांकुरा क्षेत्र में भ्रमण करेंगे, तब आप यहाँ के चटक लाल रंग के टेराकोटा मंदिरों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पायेंगे। उनके फलकों पर उकेरे देवी-देवताओं, राजाओं, व्यापारियों एवं सामान्य जनता  की कथाएं आपका मन मोह लेंगी। ऐसी ही कथाएं स्थानिक कारीगरों ने इन साड़ियों पर रेशमी एवं सुनहरे धागों से बुनी है। इन साड़ियों पर रामायण एवं महाभारत के दृश्यों के अतिरिक्त अनेक अन्य दृश्य भी कढ़ाई के माध्यम से उकेरे जाते हैं।

बंगाल की बालुचेरी साडी पर गीतोपदेश
बंगाल की बालुचेरी साडी पर गीतोपदेश

मेरे पास जो बालूचरी साड़ी है, उस पर गीतोपदेश का दृश्य है। यह महाभारत का दृश्य है जहां श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे हैं। यह दृश्य सम्पूर्ण आँचल एवं किनारी पर उकेरा गया है। मेरी जानकारी के अनुसार टेराकोटा मंदिर मध्ययुगीन काल के हैं, वहीं यह रेशम की बुनाई उससे भी प्राचीन है। प्रश्न यह उठता है कि रेशम की बुनाई ने टेराकोटा मंदिर की संरचनाओं को प्रभावित किया अथवा विपरीत? यद्यपि इस प्रश्न का सरल उत्तर नहीं है, तथापि पौराणिक कथाओं की अमिट छाप किसी क्षेत्र के प्रत्येक संभव कला के माध्यम पर उकेरने की परंपरा सदियों प्राचीन है जिनका उद्देश्य हमारी संस्कृति को हमारी भावी पीढी के लिए संरक्षित करना है।

यहाँ के अधिकतर मंदिर कृष्ण भगवान को समर्पित हैं। इसलिए अधिकांशतः उनसे सम्बंधित कथाएं ही आप यहाँ निर्मित साड़ियों, शंख, डोकरा आभूषणों, टेराकोटा मंदिरों के मिट्टी के फलकों इत्यादि पर देखेंगे।

महेश्वरी साड़ियों पर बहती नर्मदा नदी

गंगा से भी प्राचीन नर्मदा नदी को प्राचीनतम नदी माना जाता है। इस नदी के तट पर बसे एवं नर्मदा नदी द्वारा पोषित स्थानिकों के लिए यह माँ के समान है। इसी नर्मदा नदी के तट पर बसी रानी अहिल्या बाई होलकर की राजधानी महेश्वर को अप्रतिम महेश्वरी साड़ियों के बुनकरों का गढ़ माना जाता है। इस नगरी में भ्रमण करते समय आप हथकरघे की लयबद्ध गति की ध्वनि सुन सकते हैं।

महेश्वरी साडी पर नर्मदा की लहरें
महेश्वरी साडी पर नर्मदा की लहरें

प्रातः सूर्योदय के समय अथवा संध्या सूर्यास्त के समय यदि आप नर्मदा के तट पर बैठें तो सूर्य की किरणों के कारण सुनहरे रंग में दमकते नदी के जल को देख आप मंत्रमुग्ध हो जायेंगे। कुछ इन्ही क्षणों को बुनकरों ने इन महेश्वरी साड़ियों पर उकेरा है। सुनहरी नर्मदा के अप्रतिम दृश्य को महेश्वरी साड़ियों की किनारी पर बुनकर उसे अमर कर दिया है। इन किनारियों पर नर्मदा नदी की लहरों को चिन्हित किया है। इनके अतिरिक्त महेश्वर के किले, महल, मंदिर आदि की नक्काशी को भी बुनकरों ने साड़ियों पर सुन्दरता से बुना है। इनमें प्रमुख आकृतियाँ हैं, ईंट, हीरा, चटाई तथा चमेली।

पुरी जगन्नाथ की गीतगोविन्द खंडुआ

१२वीं शताब्दी के कवि जयदेव की प्रसिद्ध कविता गीतगोविन्द ओडिशा की परंपरा का प्रमुख अंग है। गीतगोविन्द खंडुआ अथवा मनिआबंदी या कटकी रेशमी वस्त्र है जिस पर इस कविता के पद लिखे होते हैं। इन पदों को या तो बंधेज तकनीक से या इस क्षेत्र की लोकप्रिय इकत पद्धति से बुना जाता है। किवदंतियों के अनुसार, कवि जयदेव अपनी कविता को जगन्नाथ को समर्पित करना चाहते थे। इसके लिए सम्पूर्ण कविता को वस्त्र पर बुनने से उत्तम उपाय उन्हें नहीं सूझा क्योंकि वस्त्र ही भगवान के अलंकरण में समीपस्थ तत्व होते हैं। आरम्भ में उन्होंने इसे अपने मूल गाँव केंदुली में बनवाया था। किन्तु कालांतर में पुरी के राजाओं ने इस कला को नुआपाटणा में स्थानांतरित कर दिया था। यदि आप जगन्नाथ पुरी के मंदिर में प्रातःकाल की मंगल आरती देखें तो आप जगन्नाथ को इसी खंडुआ में सजे हुए देखेंगे। खंडुआ के बुनकर भी अनुष्ठानिक पावित्र्य का पालन करते हुए शुद्ध शाकाहारी भोजन करते हैं तथा शौच अनुष्ठान का पालन करते हैं।

गीतगोबिंद खंडुआ ओडिशा से
गीतगोबिंद खंडुआ ओडिशा से

इनके अतिरिक्त, बारालागी पाटा भी एक प्रकार का रेशमी वस्त्र है जिसे जगन्नाथ मंदिर के देव धारण करते हैं। सप्ताह के सात दिवस उन्हें सात भिन्न रंग के वस्त्र पहनाये जाते हैं। जैसे, रविवार के दिन लाल, सोमवार के दिन श्वेत-श्याम, मंगलवार के दिन बहुरंगी, बुधवार के दिन हरा, ब्रहस्पतिवार को पीला, शुक्रवार के दिन श्वेत तथा शनिवार को श्याम रंग का वस्त्र पहनाया जाता है।

मंदिर की यह परंपरा यह सुनिश्चित करती है कि इसके अनुयायी इस क्षेत्र की बुनकर परंपरा को संरक्षित एवं समृद्ध करें।

बनारसी रेशमी साड़ियाँ

बनारसी जरी वस्त्र एवं जामावार प्रत्येक रेशमी वस्त्र के प्रेमी का स्वप्न होता है। काशी के बुनकर कब से रेशम पर इस जादुई कला की बुनाई कर रहे हैं, कोई नहीं जानता। साहित्यों एवं अभिलेखों से यह स्पष्ट है कि वे भगवान बुद्ध के काल में भी थे। इसका अर्थ है कि कम से कम २६०० वर्षों से रेशम पर यह अप्रतिम बुनाई अनवरत की जा रही है। प्रसिद्ध संत-कवि कबीर ने अपनी अनेक रचनाओं में स्वयं को काशी के बुनकर द्वारा संबोधित किया है। उन्होंने बुनाई की कला के द्वारा जीनव के गहन दर्शन को समझाया है। वे जीवन को ताना-बाना ही कहते थे। विरले ही सही, किन्तु कुछ बनारसी रेशमी वस्त्रों में बुनाई द्वारा कबीर के दोहे भी उकेरे गए हैं।

पारंपरिक बनारसी साडी
पारंपरिक बनारसी साडी

बनारसी साड़ियाँ अपने भव्य किनारी एवं पल्लू के लिए प्रसिद्ध हैं। रेशमी साड़ियों पर जरी की किनारी तथा मध्य में जरी की बूटियाँ होती हैं। ये बूटियाँ प्राकृतिक तत्वों से प्रेरित होती हैं, जैसे आम, पान के पत्ते, पुष्प, बेलें इत्यादि। किसी समय इन पर शुद्ध स्वर्ण के तारों से बूटियाँ बनाई जाती थीं। उनका स्थान अब नकली चमकदार तारों ने ले लिया है। बनारसी साड़ियों में बुनी जाती कुछ परम्परागत आकृतियाँ हैं, बूटी, बूटा, कोनिया, बेल, जाल, जंगला एवं झालर। अनेक बुनकर अपनी रचनात्मकता दर्शाते हुए उन पर गंगा के घाटों के दृश्य भी बुनने लगे हैं। बनारस की जगप्रसिद्ध रेशमी साड़ियों पर वहां के जगप्रसिद्ध घाटों के दृश्य स्वयं में अद्वितीय संगम है। बनारस की प्रसिद्ध स्मारिका के रूप में इस साड़ी को अपने पास रखने का अर्थ है, विश्व के प्राचीनतम जीवंत नगर की धरोहर को संजो कर रखना। इन्हें देख ऐसा प्रतीत होता है मानो काशी की धरोहर को अक्षरशः साड़ी पर उकेर दिया हो।

बुनाई द्वारा वर्षा को आमंत्रण

राजस्थान के थार मरुभूमि में, जयपुर एवं उदयपुर के बाजारों की गलियों में लहरिया एवं बांधनी, ये दो प्रकार के वस्त्र अत्यंत लोकप्रिय हैं। लहरिया साड़ियों में दो या अधिक चटक रंगों में लहरों की आकृतियाँ होती हैं। इन्हें देख ऐसा प्रतीत होता है जैसे मरुस्थल की लहरिया सतह को हूबहू वस्त्रों पर चित्रित किया हो।

जयपुर की लहरिया साडी
जयपुर की लहरिया साडी

एक अन्य मान्यता के अनुसार ये लहरिया आकृतियाँ जल की लहरों का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक प्रकार से ये आकृतियाँ वर्षा को आमंत्रण दे रही हैं। हम सब जानते हैं कि थार मरुस्थल विश्व का सर्वाधिक जनसँख्या का मरुस्थल है। इसका श्रेय यहाँ की उत्तम जल प्रबंधन प्रणाली को जाता है। इस साड़ियों एवं वस्त्रों पर लहरिया आकृतियाँ जल की प्रचुरता की ओर संकेत करती प्रतीत होती हैं। कदाचित आकर्षण का नियम लागू करते हुए वे वर्षा को आमंत्रित करते हों।

राजस्थान से बांधनी का काम
राजस्थान से बांधनी का काम

ऐसा माना जाता है कि बांधनी शब्द संस्कृत शब्द पुलकबंद से आया है। अत्यधिक आनंद एवं उल्हास की स्थिति में हमारे रोमकूप पुलकित हो जाते हैं। बांधनी में उन्ही रोमकूपों को आधार बनाया गया है। यहाँ तक कि पोल्का शब्द का मूल भी यही है। इस तकनीक में, आकृतियों के अनुसार, वस्त्रों पर मोमयुक्त धागों से अनेक प्रकार की गांठें कसकर बांधी जाती हैं। तत्पश्चात उन्हें रंगों में डुबाया जाता है। रंगने एवं सूखने के पश्चात इन धागों को खोला जाता है। बंधे भागों पर मूल रंग रह जाता है तथा अन्य भागों पर नवीन रंग चढ़ जाता है जिससे आकृतियाँ उभर कर आती हैं। ये तकनीक राजस्थान एवं गुजरात में प्रमुखता से अपनाई जाती है। अजंता की गुफाओं में चित्रित वस्त्रों में भी यह शैली देखी गयी है।

अजंता के चित्रों में इक्कत

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में स्थित अजंता की प्राचीन गुफाओं में चित्रित जातक कथाएं २-५वीं सदी की हैं। उनमें चित्रित चरित्रों को जो वस्त्र धारण किये दर्शाया गया है, उनमें आड़ी-तिरछी रेखाओं की इक्कत बुनाई है। इसका अर्थ है कि यह कला लगभग दो सहस्त्राब्दियों से एक जीवंत कला है।

अजंता के भित्तिचित्रों में इक्कत की बुनाई
अजंता के भित्तिचित्रों में इक्कत की बुनाई

इक्कत बुनाई अब अनेक क्षेत्रों में प्रचलन में है, जैसे गुजरात के पाटन से तेलंगाना की पोचमपल्ली तथा ओडिशा के संबलपुर तक। यह शैली आप रेशम तथा सूती, दोनों प्रकार की साड़ियों में देख सकते हैं। बुनाई की इस शैली को आप पुरी के जगन्नाथ मंदिर के पुजारी की शाल पर भी देखेंगे। इस शैली के दुपट्टे भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। इक्कत दो रूपों में उपलब्ध हैं, इकहरी इक्कत एवं दुहरी इक्कत। इक्कत, विशेषतः दुहरी इक्कत एक अत्यंत जटिल बुनाई शैली है जिसके लिए उच्च-स्तरीय कौशल की आवश्यकता होती है। गुजरात के पाटन की पटोला साड़ियाँ इसी प्रकार की कोमल एवं जटिल दुहरी इक्कत बुनाई के लिए प्रसिद्ध है।

प्राचीन चित्रों में इक्कत के अतिरिक्त बनारसी जरी वस्त्र एवं जरदोजी भी दृष्टिगोचर होते हैं।

रेशमी साड़ियों पर पावन चिन्ह

रेशमी साड़ियाँ और उन पर कढ़े मंगल चिन्ह
रेशमी साड़ियाँ और उन पर कढ़े मंगल चिन्ह

भारतीय परम्पराओं में स्त्रियों द्वारा साड़ी धारण करना साक्षात लक्ष्मी का रूप धरने के समान माना जाता है जो समृद्धि एवं शुभता की देवी हैं। इसी कारण इन साड़ियों में बहुधा पावन चिन्हों की आकृतियाँ बुनी जाती हैं, जैसे कुम्भ, स्वस्तिक, गज, पक्षी, मोर, रुद्राक्ष इत्यादि। बुनकर अपनी रचनात्मकता प्रदर्शित  करते हुए इन आकृतियों को कुशलता से किनारी, पल्लू अथवा मुख्य भाग में बुनते हैं।

यह हमारे दृश्य कला रूपों के मध्य अप्रतिम जुगलबंदी नहीं है तो क्या है?

सन्दर्भ – ओडिशा पत्रिका

यह संस्करण Silk Mark Organisation of India, Central Silk Board के सहयोग से लिखा गया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

3 COMMENTS

  1. Amazing piece of compilation. Except for a few I didn’t know they are representing something, like Narmada flowing, waves in laharia!

  2. आपने बहुत सुंदर तरीके से अलग अलग राज्यों की साड़ियों की सुंदरता व कलात्मकता का उल्लेख सुंदर अलंकारों से उल्लेखित किया। साधुवाद।।
    साड़ी बीच नारी है, की नारी बीच साड़ी,
    साड़ी ही की नारी है, नारी ही की साड़ी,
    साड़ी नारी का ऐसा परिधान है कि जब तक नारी ना पहने तब तक उस साड़ी की सुंदरता का आकलन बेमानी है और नारी की सुंदरता का भी। 🙏

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