मंडावा एवं फतेहपुर – शेखावाटी पर्यटन केंद्र के आकर्षण

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राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र का सर्वाधिक लोकप्रिय नगर है, मंडावा। विश्व भर से आये पर्यटकों की चहल-पहल से भरा यह एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। यह उन विशेष स्थलों में से एक हैं जहां की अर्थ व्यवस्था पर्यटन व्यवसाय पर ही आधारित है तथा इसी कारण जहां स्थानीय निवासियों की अपेक्षा पर्यटक ही अधिक दिखाई देते हैं। यह स्थान चित्रपट निर्माताओं के मध्य भी अत्यधिक प्रसिद्ध है। इस नगर की रंगबिरंगी गलियों में अनेक चित्रपटों के चित्रीकरण किये गए हैं। इसका कारण विविध रंगों से परिपूर्ण यहाँ की हवेलियों के साथ साथ, आसानी से उपलब्ध होने वाले विश्राम गृह भी हैं।

१८वीं शताब्दी में स्थापित मंडावा, नवलगढ़ जैसे अन्य शेखावाटी नगरों का ही समकालीन नगर है। झुंझुनू जिले के अंतर्गत आते इन सभी शेखावाटी नगरों की विशेषताएं लगभग सामान ही हैं, किन्तु मंडावा उन सब से अपेक्षाकृत अधिक आकर्षक एवं विविधतापूर्ण है। मैंने मंडावा की यात्रा उस समय की थी जब शेखावाटी की रंगबिरंगी हवेलियों के दर्शन करने के लिए मैंने झुंझुनू के निकट स्थित बागड़ में कुछ दिनों के लिए डेरा डाला हुआ था।

ऐसी ही रंगबिरंगी शेखावाटी हवेलियों से भरे मनमोहक मंडावा नगर में भ्रमण करने में मुझे अत्यंत आनंद की अनुभूति हुई जो मैं आपके साथ बांटना चाहती हूँ। आईये मेरी दृष्टी से मैं आप सब को मंडावा का भ्रमण कराती हूँ।

मंडावा दुर्ग

मंडावा दुर्ग अब एक आलीशान विरासती होटल है। अतः यहाँ ठहरकर इसका अवलोकन करना सर्वोत्तम मार्ग है। अन्यथा, इस दुर्ग में प्रवेश करने के लिए भारी प्रवेश शुल्क देना पड़ता है।

मंडावा दुर्ग - राजस्थान
मंडावा दुर्ग – राजस्थान

राजस्थान के किसी भी राजमहल के समान यहाँ भी अनेक छायाचित्र हैं, अनेक प्राचीन रूपचित्र हैं तथा साज-सज्जा की अनेक पुरातन चल-सामग्रियां हैं। इस ऐतिहासिक धरोहर के मध्य में एक तरणताल भी है।

मंडावा दुर्ग का चौक
मंडावा दुर्ग का चौक

इस दुर्ग से सम्बंधित मेरी सर्वाधिक प्रगाढ़ स्मृति है, इसके विशाल प्रांगण की, जिसके मध्य में एक चौक है। यह एक मुक्तांगन है जिसकी भूमि पक्की नहीं है। इसके विपरीत, इसकी भूमि को शुभाकृतियों से चित्रित किया गया है। इस प्रकार के मुक्तान्गणों का प्रयोग बहुधा विवाह समारम्भों जैसे अनुष्ठानों के लिए किया जाता है। मुझे स्मरण है कि मेरे पैतृक निवास में भी इसी प्रकार का एक प्रांगण है।

मंडावा दुर्ग की रंग भरी चित्रकारी
मंडावा दुर्ग की रंग भरी चित्रकारी

इस दुर्ग की एक अन्य प्रगाढ़ स्मृति एक लघु व संकरे कक्ष की है जिसके भीतर नील वर्ण की प्राधान्यता लिए कुछ अत्यंत उत्कृष्ट चित्र हैं। यहाँ भगवान विष्णु के दस अवतारों से चित्रित फलकों की एक श्रंखला है।

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यहाँ आपको समग्र कला की कुछ उत्कृष्ट कलाकृतियाँ देखने का अवसर प्राप्त होगा। एक प्राणी, बहुधा एक गज अथवा अश्व, की देह को अनेक अन्य प्राणियों के चित्रों द्वारा चित्रित किया गया है। यह कला अन्य शेखावटी हवेलियों में आम नहीं है।

मंडावा हवेली

मंडावा हवेली भी अब एक अतिथिगृह है जो अन्य अतिथिगृहों की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय है। इसका निर्माण सन् १८९० किया गया था। कुछ समय पूर्व इसका नवीनीकरण भी किया गया। उस समय इसे एक अतिथिगृह में परिवर्तित किया गया। इसकी छत पर एक जलपानगृह भी है। यहाँ के प्रबंधक पर्यटकों को सहर्ष हवेली के दर्शन कराते हैं। यदि आप केवल हवेली के दो तलों में प्रदर्शित चित्रकारियों का ही अवलोकन करना चाहते हैं, तब भी वे उसी आत्मीयता से आपका स्वागत करते हैं।

मंडावा हवेली
मंडावा हवेली

हवेली की भित्तियों पर प्रदर्शित चित्रों में कृष्ण एवं उनकी लीलाओं की प्राधान्यता है। इनके अतिरिक्त, प्रदर्शित चित्रों में आप विमान, रेल, मानवी जीवन की झलक तथा राजसी शोभायात्राओं को भी देख सकते हैं। यह शेखावटी हवेली अब भी उपयोग में लाई जाती है, जिसके चिन्ह आप चारों ओर देख सकते हैं। चारों ओर हर प्रकार के साज-सज्जा की चल-सामग्रियां रखी हुई हैं। जिन कक्षों के झरोखों से सुन्दर बाह्य दृश्य प्राप्त होता है वहां अतिथियों को ठहराया जाता है। अन्य कक्षों का भी विभिन्न कार्यों हेतु प्रयोग किया जाता है। प्रवेश द्वार के ऊपर रखे गणेश जी के विग्रह पर ताजे पुष्पों का हार चढ़ाया जाता है। इन सब के कारण यह हवेली पर्यटकों को अत्यंत जीवंत प्रतीत होती है। इसके विपरीत शेखावटी क्षेत्र की कई हवेलियाँ या तो रिक्त पड़ी हैं अथवा उन्हें संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है। इस प्राचीन हवेली के पुरातन कक्षों को किस प्रकार पुनर्जीवित एवं अलंकृत कर अतिथि कक्षों  में परिवर्तित किया है, यह अत्यंत रोचक एवं सराहनीय है। हवेली के लघु क्षेत्रों तथा मुक्तान्गणों को बैठकों में परिवर्तित किया है।

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हवेली के गच्ची से आप सम्पूर्ण मंडावा नगर देख सकते हैं। वहां से विभिन्न भवनों की छतों का अद्भुत सम्मिश्रण दिखाई पड़ता है, जिनके मध्य से कलात्मक अभिव्यक्तियाँ झांकती सी प्रतीत होती हैं। ऊंची ऊंची भित्तियों वाला दुर्ग तथा सुन्दर शिखरों से आच्छादित मंदिरों को आप अनदेखा नहीं कर सकते।

रघुनाथ मंदिर

रघुनाथ मंदिर - मंडावा
रघुनाथ मंदिर – मंडावा

मंडावा हवेली के निकट रघुनाथ मंदिर है जहां आप कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर पहुँच सकते हैं। यह मंदिर हवेली के ही सामान प्रतीत होता है। किन्तु सूचना फलक एवं ऊपर फहराता ध्वज हमें यह सन्देश दे देता है कि यह हवेली नहीं, अपितु मंदिर है। नवलगढ़ के गोपीनाथ जी के मंदिर के ही सामान, इस मंदिर में भी मुखमंडप की भीतरी छत पर विविध रंगों में जीवंत चित्रकारी की गयी है। मुझे एक तथ्य ने अत्यंत सुखद आश्चार्य प्रदान किया, प्रत्येक चित्रित दृश्य पर सूक्ष्म सूचना पत्रक हैं जिन पर चित्रों की व्याख्या की गई है। किन्तु दृश्यों में चित्रित पात्रों के विषय में जानकारी की अनुपस्थिति में उन कथाओं को समझना कठिन है। उस समय मुझे एक जानकार परिदर्शक अथवा गाइड की अनुपस्थिति अत्यंत खली, जो हमें चित्रित कथाओं की जानकारी दे सकता था।

झुनझुनवाला हवेली का सुनहरा कक्ष

यूँ तो झुनझुनवाला हवेली आसपास की किसी भी अन्य हवेली के ही सामान है जिनकी भित्तियों के रंग अब फीके पड़ने लगे हैं, किन्तु इस हवेली का एक अपवाद है कि यह अपने एक सुनहरे कक्ष के सन्दर्भ में अंग्रेजी एवं फ्रेंच भाषा में बढ़चढ़ कर विज्ञापन करता है।

झुनझुनवाला हवेली के सुनहरी कक्ष में कृष्ण लीला
झुनझुनवाला हवेली के सुनहरी कक्ष में कृष्ण लीला

झुनझुनवाला हवेली में प्रवेश करते ही मैं एक मुक्तांगण में पहुँची जिसके बायीं ओर वसाहत थी तथा दाहिनी ओर रंगकारी किया हुआ एक द्वारमण्डप था। एक सहायक ने नाममात्र प्रवेश शुल्क लेकर मेरे लिए इस द्वारमण्डप का द्वार खोल दिया। उस द्वार से मैंने एक कक्ष में प्रवेश किया जिसे सुनहरा कक्ष कहते हैं क्योंकि यहाँ के चित्रों में सुनहरे रंग की प्राधान्यता है।

लगभग पूर्ण रूप से उपेक्षित इस हवेली के इस इकलौते सुनहरे कक्ष की एक संग्रहालय के रूप में विशेष रूप से देखरेख की जाती है। इस कक्ष में साज-सज्जा की पुरातन चल-वस्तुएं रखी हुई हैं, साथ ही शतरंज जैसे विशेष पट्टिकाओं पर खेले जाने वाले खेल रखे हुए हैं। सर्वोत्तम रूप से संरक्षित वे चित्र हैं जो कक्ष की भीतरी छत पर अथवा भित्तियों के ऊपरी भागों पर चित्रित हैं। अधिकतर चित्र कृष्ण लीला पर आधारित हैं। किन्तु मैंने कुछ स्थानों पर शिव-पार्वती, देवी तथा राम दरबार भी चित्रित देखे। झरोखों के किवाड़ों पर रंगबिरंगे काँच लगे हुए हैं जो कक्ष की आभा में अपने रंगों का अद्भुत मेल करते प्रतीत होते हैं।

मंडावा का हरलालकर बावड़ी

मंडावा का हरलालकर बावड़ी
मंडावा का हरलालकर बावड़ी

झुनझुनवाला हवेली से आते मार्ग के दूसरे छोर पर यह बावडी है। कुछ सीढ़ियाँ उतरकर हम बावड़ी तक पहुंचते हैं। प्रवेश पर स्थित दो स्तंभ इस बावडी की रक्षा करते प्रतीत होते हैं। बावडी के चारों ओर अनेक छत्रियाँ भी हैं। कहते हैं कि यह बावड़ी अत्यंत गहरी है। संभव है, क्योंकि रेगिस्तानी मरुभूमि होने के कारण भूमिगत जल अत्यंत गहराई में प्राप्त होता है। हो सकता है कि प्राचीन काल में आसपास की हवेलियों की स्त्रियाँ जल लेने इसी बावड़ी पर आती रही होंगी।

बावड़ी की ओर जाते मार्गों पर चलते हुए मैं भवनों की बाह्य भित्तियों पर चित्रित सुन्दर चित्रों को देख स्तब्ध हो गई थी। वहां खेलते बालकों ने मुझे बताया कि बॉलीवुड के अनेक चित्रपटों का चित्रीकरण इन गलियों में किया गया है।

चोखानी दुहरी हवेली

चोखानी दुहरी हवेली
चोखानी दुहरी हवेली

मंडावा में अनेक दुहरी हवेलियाँ हैं। मैंने चोखानी दुहरी हवेली के अवलोकन का निश्चय किया क्योंकि एक सूचना पट्टिका में “डबल” अथवा दुहरी शब्द देख मेरे मस्तिष्क में सहज ही कौतूहल उत्पन्न हुआ। चोखानी दुहरी हवेली में प्रवेश करते ही मेरी भेंट हवेली के अभीक्षक से हुई जिसने नाममात्र का प्रवेश शुल्क लेकर मुझे हवेली के दर्शन कराये। एक छोटे से निर्देशित भ्रमण के द्वारा उन्होंने मुझे दुहरी हवेली का अर्थ समझाया। दुहरी हवेली का अर्थ है, दो संयुक्त समरूप हवेलियाँ। उन्होंने मुझे इस प्रकार की हवेलियों का प्रयोजन यह बताया कि ऐसी हवेलियाँ बहुधा कोई संपन्न व्यक्ति अपने दो पुत्रों के भावी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए बनाता है। यदि दोनों पुत्रों में सामंजस्य है तो दोनों हवेलियों को एक संयुक्त हवेली के रूप में प्रयोग किया जा सकता है, अन्यथा सामंजस्य के अभाव में दोनों हवेलियों के मध्य स्थित भित्ति पर लगे प्रवेश द्वार को बंद कर दोनों पुत्र स्वतन्त्र जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

इन हवेलियों की विशालता एवं इसके विशाल प्रांगणों ने मुझे इतना अचंभित कर दिया था कि उन्होंने मेरे मानसपटल पर अमिट छाप छोड़ दी है।

मुरमुरिया हवेली

मुरमुरिया हवेली को देख ऐसा प्रतीत होता है मानो यह इटली की कोई हवेली है। इसका कारण इसकी भित्तियों पर लगे हलके रंग हैं, जैसे हल्का पिस्ता रंग इत्यादि। इसके विपरीत, आसपास की हवेलियों की भित्तियों पर चटक रंग रंगे गए हैं। इस हवेली के विशेष तत्व हैं, एक अश्व की सवारी करते व हाथ में तिरंगा लिए नेहरु का चित्र तथा जॉर्ज पंचम का रूपचित्र। हवेली के बाहर लगा फलक गर्व से इसकी सूचना देता है।

मुरमुरिया हवेली में भारत माता का चित्र
मुरमुरिया हवेली में भारत माता का चित्र

मुरमुरिया हवेली के भीतर मुझे शेखावटी हवेली एवं यूरोपीय भवन का अनोखा सम्मिश्रण दिखाई दिया। इसकी भीतरी भित्तियों पर बड़े बड़े चौकोर चौखटों के भीतर समकालीन चित्रों का मिश्रित संग्रह प्रदर्शित किया गया है। वहीं रामायण एवं महाभारत के दृश्यों के साथ भारत माता का एक विशाल चित्र भी चित्रित है। एक चौखट के भीतर भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सहभागी अनेक नेताओं के रूप चित्र हैं, जैसे महात्मा गाँधी तथा बाल गंगाधर तिलक।

अनेक ठेठ शेखावटी हवेलियों से घिरी यह हवेली अपनी विशेष मिश्रित शैली के कारण दर्शकों की दृष्टी अकस्मात् अपनी ओर खींचती है।

मंडावा की गोयनका हवेली

मंडावा की गोयनका हवेली भी उत्तम रीति से संरक्षित सुन्दर हवेली है। यहाँ मैंने भित्ति पर यमराज का एक दुर्लभ चित्र भी देखा। इस हवेली का सम्बन्ध प्रसिद्ध गोयनका घराने से है। हवेली की चित्रकारी एवं उत्कीर्णन अत्यंत दर्शनीय है।

गोयनका हवेली पर यमराज का चित्र
गोयनका हवेली पर यमराज का चित्र

इस क्षेत्र के निवासियों के अनुसार बिड़ला, मित्तल, गोयनका, बजाज, डालमिया, पोद्दार, चोखानी जैसे भारत के संपन्न मारवाड़ी व्यापारी घरानों ने इस नगर को बसाया था। आपसी प्रतिस्पर्धा के चलते इन सेठों ने अत्यंत आकर्षक हवेलियों का निर्माण कराया। कहा जाता है कि मंडावा प्राचीन सिल्क रूट पर पड़ने वाला प्रमुख व्यापारिक केंद्र था जिसके कारण यहाँ के व्यापारी अत्यंत संपन्न हुए। अतः उन्होंने हवेलियों के सौन्दर्यीकरण में कोई कमी नहीं होने दी। कालान्तर में उत्तम सुख-सुविधाओं की चाह में ये संपन्न घराने बड़े शहरों में स्थानांतरित हो गए। अब वे कुलदेवता की पूजा-अर्चना जैसे विशेष आयोजनों के लिए ही अपनी हवेलियों में आते हैं। अतः ये हवेलियाँ या तो वीरान पड़ी रहती हैं अथवा किसी अभीक्षक को सौंप कर उसे संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है।

फतेहपुर की हवेलियाँ

फतेहपुर भी एक शेखावटी नगर है जो मंडावा से अधिक दूर नहीं है। यह क्षेत्र फ्रांसीसी हवेलियों के लिए लोकप्रिय है।

नादिन ली प्रिंस सांस्कृतिक केंद्र

फतेहपुर की फ्रांसिसी हवेली पर गज चित्रण
फतेहपुर की फ्रांसिसी हवेली पर गज चित्रण

यह संरचना अन्य शेखावटी हवेलियों का ही सामान है किन्तु इसका निर्माण २०० वर्षों पूर्व नंदलाल देवरा ने करवाया था। सन् १९९८ में फ्रांसीसी कलाकार नादिन ने इसे खरीद लिया था। उन्होंने इस हवेली के संरक्षण का कार्यभार उठाया। इसी कारण अब इसका एक फ्रांसीसी नाम है तथा इसके भीतर प्रवेश करने के लिए भारी प्रवेश शुल्क भी वसूला जाता है। यहाँ मुझे नीले रंग की पृष्ठभूमि में चित्रित एक विशाल गज अत्यंत भाया।  मुझे यहाँ का वातावरण किंचित असुविधाजनक प्रतीत हुआ। यहाँ का अभीक्षक हमसे अशिष्टता से व्यवहार कर रहा था। कदाचित उसे केवल श्वेत पर्यटकों की ही प्रतीक्षा रहती है। मुझे जानकारी प्राप्त हुई कि यूरोपीय कला विद्यालयों के अनेक विद्यार्थी इन चित्रों के अध्ययन के लिए यहाँ आते रहते हैं। दुर्भाग्य से अधिकतर भारतीय अप्रतिम रूप से चित्रित इन हवेलियों से अवगत ही नहीं हैं।

फतेहपुर नगरी में पद-भ्रमण करते हुए आप यहाँ की गलियों में अनेक रंगबिरंगी हवेलियाँ देखेंगे। प्रत्येक हवेली स्वयं में एक अनूठी हवेली है।

फतेहपुर के भीतर एवं आसपास स्थित मंदिर

गोयनका शक्ति मंदिर – यह शेखावटी का वह प्रथम दादी सती मंदिर है जिसके मैंने सर्वप्रथम दर्शन किये थे। इस सुन्दर मंदिर में गोयनका वंश की पूर्वज बीरन एवं बरजी की वंदना की जाती है। इस मंदिर में इनकी त्रिशूल रूप में पूजा-अर्चना की जाती है। यहाँ एक अन्य मंदिर भी है जो शक्ति के १६ रूपों को समर्पित है। इस मंदिर ने मेरे समक्ष इस क्षेत्र के अध्ययन के लिए एक नवीन विषयवस्तु प्रस्तुत किया है।

गोयनका शक्ति स्थल फतेहपुर
गोयनका शक्ति स्थल फतेहपुर

गोयनका मंदिर के बाहर मुझे एक सूचना पट्टिका दिखी जो बिंदल घराने की कुलदेवी के मंदिर की ओर संकेत कर रही थी। मूलतः, अग्रवाल घराने के लगभग सभी गोत्रों की कुलदेवियों के मंदिर आपको इस क्षेत्र में दिख जायेंगे।

पंचमुखी बालाजी मंदिर – हनुमानजी को समर्पित यह एक सुन्दर मंदिर है। बालाजी नाम से आप भ्रमित ना होएं। इस क्षेत्र में हनुमानजी के लिए बालाजी नाम का प्रयोग किया जाता है। इस क्षेत्र में अनेक बालाजी मंदिर हैं।

श्री दो जाँटी बालाजी मंदिर – यह भी एक लोकप्रिय मंदिर है जहां अर्पण किये गए श्रीफलों को सभी स्थानों पर लटकाया गया है। यहाँ तक कि अनेक स्थानों पर इन श्रीफलों से भित्तियाँ तक बन गयी हैं।

मंडावा के कुँए
मंडावा के कुँए

मंडावा में अनेक स्थानों पर बावड़ियां दृष्टिगोचर हो जाती हैं। इन सभी बावडियों के विषय में आवश्यक जानकारी भी दी गयी हैं तथा इन बावडियों के संरक्षण पर भी कार्य किया गया है। यह इस सत्य का सूचक है कि ये बावड़ियां यहाँ के निवासियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रत्येक बावडी, प्रत्येक जल संचयन प्रणाली के नाम भी अत्यंत अनूठे हैं। इनमें अधिकतर नाम उनके निर्माताओं के नाम से सम्बंधित हैं।

यह क्षेत्र लाख की चूड़ियों इत्यादि राजस्थानी वस्तुओं के लिए भी प्रसिद्ध है। आप यहाँ से इच्छित वस्तुएं क्रय कर सकते हैं।

यहाँ की गलियों में भ्रमण करना एक प्रकार से भूतकाल की उस समयावधि में प्रवेश करने जैसा है जब स्थापत्य शास्त्र पर सौंदर्य शास्त्र का राज था।

मंडावा एवं फतेहपुर नगरों में पर्यटकों के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं हैं। आपको यहाँ विश्रामगृह/होटल अथवा जलपान गृह जैसी सुविधाओं को प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं होगी।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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