सिक्किम के १२ सर्वोत्तम स्मृति चिन्ह

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क्या आप सिक्किम भ्रमण के लिए जा रहे हैं? क्या आप यह विचार कर रहे हैं कि सिक्किम से कौन कौन सी विशेष वस्तुएँ स्मृति चिन्हों के रूप में ला सकते हैं? यह संस्करण पढ़कर आपकी जिज्ञासा अवश्य तृप्त हो जायेगी। जी हाँ, सिक्किम एक छोटा सा राज्य है लेकिन उसके आकार पर ना जाएँ।

सिक्किम के स्मृति चिन्ह
सिक्किम के स्मृति चिन्ह

सिक्किम भले ही एक विशाल राज्य ना हो लेकिन यह एक संस्कृति संपन्न राज्य है। यहाँ की संस्कृति एवं परम्पराएं यहाँ के विशेष वस्त्रों, आभूषणों तथा अनुष्ठानिक वस्तुओं में स्पष्ट परिलक्षित होते हैं। मेरे गत सिक्किम भ्रमण के समय अल्प समयावधि के चलते मैं वहाँ से कुछ ही स्मृति चिन्ह ला पायी थी किन्तु इस समय मेरे पास भरपूर समय था। मैंने निश्चिन्तता से गंगटोक के सभी पर्यटन बिन्दुओं के समक्ष स्थित बाजारों एवं दुकानों का अवलोकन किया। उसी के आधार पर सिक्किम से साथ लाने योग्य कुछ आकर्षक व रोचक स्मृति चिन्हों की एक सूची बनाई है। केवल आपके लिए!

सिक्किम के सर्वोत्तम स्मृति चिन्ह – गंगटोक में खरीददारी

सिक्किम भ्रमण की मधुर स्मृतियों को संजोकर रखने के लिए वहाँ से इन विशेष वस्तुओं का क्रय करें।

प्रार्थना ध्वज

सिक्किम में आप जहाँ भी जाएँ, वायु में लहराते रंगबिरंगे प्रार्थना ध्वज आपका स्वागत करते प्रतीत होते हैं। आप उन्हें पहाड़ियों के ऊपर, झरनों के समीप, मार्गों के ऊपर, सरोवरों की ओर जाती पगडंडियों के ऊपर,  अर्थात् अक्षरशः सभी स्थानों पर देखेंगे।

बौद्ध प्रार्थना ध्वज
बौद्ध प्रार्थना ध्वज

इन प्रार्थना ध्वजों का उद्देश्य है, सब के कल्याण के लिए की गयी प्रार्थना को वायु में आत्मसात कराना। मेरे विचार से ये प्रार्थना ध्वज सिक्किम की सर्वोत्तम स्मारिका है। आप इन ध्वजों को अपने आवास के बाहर फहरा सकते हैं। ये भिन्न भिन्न आकारों में उपलब्ध हैं। आप अपनी इच्छा के अनुसार आकार का चयन कर सकते हैं।

आप इन ध्वजों का लघु रूप भी ले सकते हैं। उन पर ‘ॐ मणि पद्मे हूँ’ लिखा होता है। यह बौद्ध धर्म का एक मंत्र है। ये ध्वज तोरण के रूप में उपलब्ध होते हैं जिन्हें आप आवास द्वार के ऊपर अथवा वाहन के पृष्ठ कांच पर लटका सकते हैं।

थान्ग्का चित्र – कला प्रेमियों के लिए सिक्किम की स्मारिका

थान्ग्का चित्र आप सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्रों में देख सकते हैं, जैसे भूटान, नेपाल, लद्दाख, सिक्किम आदि। थान्ग्का चित्र सूती वस्त्रों, रेशमी वस्त्रों तथा कागज जैसे भिन्न भिन्न माध्यमों पर चित्रित किये जाते हैं। ये एक प्रकार की सूक्ष्म चित्रकला शैली होती है जो बुद्ध के जीवन से सम्बंधित दृश्यों, बौद्ध देवी-देवताओं, विभिन्न बोधिसत्वों तथा रहस्यमयी मंडलों पर आधारित होती है। यदि आप एक बौद्ध हैं तथा इन दैव-चित्रण से सम्बद्ध हैं तो आप अपनी मान्यता अनुसार इनका चुनाव करें। अन्यथा आपको जो चित्र भाये, आप वो क्रय कर सकते हैं।

थान्ग्खा मण्डल चित्र
थान्ग्खा मण्डल चित्र

थान्ग्का चित्र मूल्यवान अवश्य होते हैं किन्तु वे सिक्किम के सर्वोत्तम स्मृतियों में से एक हैं। थान्ग्का चित्र सिक्किम के सांस्कृतिक ताने-बाने का एक महत्वपूर्ण भाग है।

थान्ग्का चित्र अत्यंत कोमल होते हैं। उनकी उत्तम देखभाल आवश्यक है। बौद्ध मठों में विशाल थान्ग्का चित्र होते हैं जिन्हें वे रेशम की अनेक परतों के मध्य सुरक्षित रखते हैं। वे उन्हें विशेष अवसरों पर ही प्रदर्शित करते हैं।

सुरीले पात्र

सिक्किम के स्मृति चिन्हों में यह मेरी सर्वाधिक प्रिय वस्तु है। आपने अनेक बौद्ध मठों में सुरीले स्वर उत्पन्न करते पात्र देखे होंगे। ये सुरीले पात्र अनेक आकारों के होते हैं जो मिश्रित धातु से बने होते हैं। इन आकर्षक पात्रों पर मनमोहक उत्कीर्णन होते हैं। कुछ पात्रों पर बौद्ध मंत्र भी उत्कीर्णित होते हैं। इन पात्रों के साथ लकड़ी का टुकड़ा दिया जाता है। जब हम इस लकड़ी को पात्र के किनारों पर घुमाते हैं तो पात्र से अत्यंत सुरीला स्वर उत्पन्न होता है। इसी प्रकार लकड़ी को अनवरत घुमाते रहे तो वह सुरीला स्वर अपने चरम उत्कर्ष तक पहुँच जाता है जो मंत्रमुग्ध कर देता है।

संगीतमय सुरीले पात्र
संगीतमय सुरीले पात्र

विक्रेता जब इस सुरीले पात्र की कार्यप्रणाली अपने हाथों द्वारा दिखाते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह अत्यंत सुगम है। किन्तु आप स्वयं जब इसे अपने हाथों में लेकर छड़ी घुमायेंगे तब हो सकता है कि सुरीले स्वर प्रस्फुटित ना हों। इसके लिए आपको इस विशेष तकनीक का प्रयोग करना होगा।

पात्र को हथेली पर इस प्रकार रखें कि दोनों के मध्य रिक्त स्थान बने। अब लकड़ी की छड़ी को इसकी किनार पर घुमाएं। मधुर स्वर अवश्य प्रस्फुटित होंगे।

सुरीले पात्र अनेक आकारों में उपलब्ध हैं। मैंने माध्यम आकार का एक पात्र अपनी भूटान-सिक्किम यात्रा से क्रय किया था।

प्रार्थना चक्र

प्रार्थना चक्र एक लघु बेलनाकार डिबिया होती है जो एक लकड़ी की मूठ से जुड़ी होती है। इस डिबिया से डोरी का एक टुकड़ा बंधा होता है जिसके दूसरे छोर पर एक बड़ा मोती होता है। यह बेलनाकार डिबिया धातु की होती है जिस पर आकर्षक उत्कीर्णन होते हैं। अधिक मूल्य के प्रार्थना चक्रों की डिबिया मणि जड़ित होती हैं। इस चक्र का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग होता है, इस डिबिया के भीतर रखी एक पत्रावली जिस पर प्रार्थना लिखी होती है। ऐसा माना जाता है कि जब इस चक्र को मूठ से पकड़ कर गोल घुमाया जाता है तब यह चक्र भीतर रखी प्रार्थना को वायु में सन्निहित करता है। वायु में सकारात्मक उर्जा का विसरण करता है।

प्रार्थना चक्र के साथ बुद्ध की प्रतिमा
प्रार्थना चक्र के साथ बुद्ध की प्रतिमा

जिस प्रकार साधु, संन्यासी अथवा साधक के हाथ में जपमाला होती है, उसी प्रकार बौद्ध लामा के हाथ में यह प्रार्थना चक्र होता है। जब आप इस प्रार्थना चक्र को घुमायेंगे, आप सम्मोहित से हो जायेंगे। यह चक्र आपको ध्यान अवस्था में ले जायेगी। यह भी सिक्किम की एक अविस्मरणीय स्मारिका होगी जिसे आप क्रय कर अपने साथ ला सकते हैं।

इसी प्रकार के अनेक विशाल प्रार्थना चक्र बौद्ध मठों में भी होते हैं। बौद्ध भिक्षुक परिक्रमा करते हुए इन चक्रों को घुमाते हैं तथा प्रार्थना करते हैं। ऐसे खड़े प्रार्थना चक्र छोटे आकर में भी उपलब्ध होते हैं जिन्हें आप क्रय कर सकते हैं। इन खड़े चक्रों को आप अपने आवास की भित्तियों पर लगा सकते हैं अथवा मेज पर रख सकते हैं।

दोरजी घंटी तथा वज्र

दोरजी घंटी एवं वज्र ऐसी दो वस्तुएं हैं जिन्हें आप केवल सिक्किम ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारत के सभी ऐसी दुकानों में देखेंगे जो धातु निर्मित कलाकृतियाँ विक्रय करते हैं। ये बहुधा पीतल अथवा कांसे धातु के बने होते हैं। ये पुरुषप्रधान एवं स्त्रीप्रधान ऊर्जा के द्योतक होते हैं तथा इन्हें बहुधा एक साथ ही रखा जाता है। दोरजी घंटी स्त्रीप्रधान उर्जा का प्रतिनिधित्व करती है तथा वज्र पुरुषप्रधान उर्जा का प्रतिनिधित्व करता है।

दोरजी घंटी और वज्र
दोरजी घंटी और वज्र

इन दुकानों में आप बुद्ध की भिन्न भिन्न मुद्राओं में तथा विभिन्न आसनों पर आरूढ़ अनेक प्रतिमाएं देखेंगे। आपको उनका जैसा रूप भाये, आप वैसी प्रतिमा क्रय कर सकते हैं। ये तीनों ऐसे स्मृति चिन्ह हैं जो देखने में अत्यंत मनमोहक होते हैं तथा जिन्हें अधिक रखरखाव की आवश्यकता नहीं होती है।

पारंपरिक परिधान

यदि आप उन पर्यटकों में से हैं जिन्हें पर्यटन गंतव्य के परिधान विशेष में रूचि होती है तथा सभी गंतव्यों से उनके विशेष परिधानों को क्रय करना तथा धारण करना भाता है तो आप सही गंतव्य की ओर जा रहे हैं।

सिक्किम का पारंपरिक परिधान
सिक्किम का पारंपरिक परिधान

सिक्किम के पारंपरिक रंगबिरंगे रेशमी परिधान अत्यंत सुन्दर होते हैं। वे नेपाली परिधानों से मेल खाते हैं। क्यों ना हों? पड़ोसी जो हैं। सिक्किम के औपचारिक परिधान बहुधा रेशमी एवं बेल-बूटे युक्त जरी वस्त्रों द्वारा बने होते हैं। किन्तु ये ऊन मिश्रित मोटे उष्म वस्त्रों में भी उपलब्ध होते हैं जो वहाँ के शीत वातावरण के लिए आवश्यक हैं।

सिक्किम में लेप्चा पुरुषों की वेशभूषा थोकोरो-दम होता है जिसमें पायजामा, लेप्चा कुरता, शंबो तथा टोपी सम्मिलित हैं। लेप्चा स्त्रियों की वेशभूषा को डमवम अथवा डुमिडम कहते हैं। वहीं, भूटिया स्त्रियों की पोशाख को बखू कहते हैं।

सिक्किम की पारंपरिक टोपी
सिक्किम की पारंपरिक टोपी

यदि आपको भिन्न भिन्न शैली के परिधानों को धारण करने में रूचि नहीं है तो सिक्किम से अन्य पारंपरिक वस्तुएं ले सकते हैं। पुरुष सिक्किमी टोपी ले सकते हैं जिसे आप अपने परिधानों के साथ विशेष अवसरों में धारण कर सकते हैं। ये टोपियाँ शीत वातावरण के लिए भी उत्तम सह-परिधान होती हैं। स्त्रियाँ सिक्किम के विशेष आभूषण ले सकती हैं।

पारंपरिक आभूषण

हिमालयीन स्त्रियों के आभूषणों का उल्लेख होते ही नेत्रों के समक्ष नीलवर्ण मणिजड़ित आभूषण उभर कर आ जाते हैं। मेरी इस सिक्किम यात्रा में मैंने यह निश्चय किया कि इन मनमोहक नीलवर्ण मणिजड़ित आभूषणों के पार भी जाकर अन्य आभूषणों की खोज करूँ। मैं वहाँ के एक स्थानीय जौहरी के पास गयी तथा उनसे सिक्किम के पारंपरिक आभूषणों के विषय में जानकारी एकत्र की। उनसे आभूषणों के पारंपरिक नमूनों एवं शैलियों के विषय में जाना। उसी के आधार पर मैं आपको दो विशेष आभूषणों के विषय में जानकारी देना चाहती हूँ।

गले के हार के लिए घौ लटकन: गले के हार के लिए ये लटकन भिन्न भिन्न आकारों की सुन्दर अलंकृत डिबिया होती हैं जिनके भीतर प्रार्थना पत्रावली रखी जाती है। कुछ लोग इसके भीतर दिवंगत गुरु के अवशेष तथा पवित्र जड़ी-बूटियाँ भी रखते हैं। चाँदी धातु में बने इस लटकन पर उपचारात्मक प्रस्तर मणि जड़ा होता है। नीलम उनमें से एक है जो हिमालयीन क्षेत्रों में पाया जाता है। अन्य लोकप्रिय मणियाँ हैं, लाजवर्द तथा मूंगा। बौद्ध धर्म के धर्मनिष्ठ अनुयायियों के लिए घौ लटकन एक प्रकार से निजी चल मंदिर सदृश होते हैं। कदाचित इस लटकन का मूल सम्बन्ध घुमक्कड़ी बौद्ध समुदायों से रहा होगा।

घौ लटकन
घौ लटकन

कुछ लटकन डिबियों में प्रार्थना पत्रावली होती हैं जिन पर ‘ॐ मणि पद्मे हूँ’ लिखा होता है। ये आभूषण आकृति एवं शैली में समकालीन प्रतीत होते हैं।

अकोर झुमके: ये अत्यंत आकर्षक झुमके होते हैं जिन्हें ल्हासा स्त्रियाँ धारण करती हैं। इन झुमकों की एक विशेषता होती है कि इनके अंतिम छोर पर कमल की कली की आकृतियाँ होती हैं। अकोर झुमकों पर नीलम मणि जड़ा होता है। कभी कभी एक छोटा मूंगा भी होता है जो इसकी एकरसता को तोड़ता है।

अकोर झुमके
अकोर झुमके

आरंभ में ये झुमके अत्यंत वजनी होते थे जिन्हें कर्णपाली पर धारण नहीं किया जाता था। इन्हें कानों के पार्श्व भागों पर धारण किया जाता था तथा भार अधिक होने के कारण उन्हें डोरी द्वारा सर के आभूषणों से बंधा जाता था। अब ये अत्यंत हलके वजन में भी उपलब्ध हैं। भार कम करने के पश्चात भी उनकी मूल शैली में परिवर्तन नहीं किया गया है। आप इन्हें उत्तम दुकानों से लें। वहाँ पारंपरिक शैली के हलके व मनमोहक अकोर झुमके उपलब्ध होते हैं।

मुखौटे

यदि आपने किसी भी बौद्ध मठ में उनके पारंपरिक उत्सव देखे होंगे तो आपने रंगबिरंगे विशाल मुखौटे भी देखे होंगे जिनका प्रयोग विभिन्न बौद्ध अनुष्ठानों में किया जाता है। बौद्ध लामा इन्हें धारण कर पारंपरिक नृत्य करते हैं। रंगबिरंगे विशाल मुखौटे धारी बौद्ध लामाओं द्वारा किये गए पारंपरिक चाम नृत्य का यह विडियो देखिये। इसमें आप मुखौटों की विभिन्नता को देख पायेंगे।

काष्ठ के मुखौटे
काष्ठ के मुखौटे

कुदृष्टि एवं दुष्ट आत्माओं से बचने के लिए सामान्य जन-मानस भी इन मुखौटों का प्रयोग करता है। सिक्किम में आप कई घरों व दुकानों के समक्ष ये मुखौटे लटकते देखेंगे। मुझे बताया गया कि प्रत्येक मुखौटा एक विशेष उद्देश्य का प्रतीक होता है। इसलिए आपको जो भाये वो आप लें। सभी मुखौटे लकड़ी के होते हैं जिन पर उत्कीर्णन व चित्रकारी की जाती है। बहुधा यह मुखौटा लकड़ी के एकल टुकड़े द्वारा निर्मित होता है।

मैंने यहाँ से गणेश का मुखौटा लिया था। जी हाँ गणेश! आपको आश्चर्य होगा कि सिक्किम की स्मारिका के रूप में गणेश एवं पंख फैलाए गरुड़ के मुखौटे अत्यंत लोकप्रिय हैं।

चाय – सुगम व कम लागत

आप दार्जिलिंग चाय व आसाम चाय के विषय में अवश्य जानते होंगे। कदाचित सिक्किम चाय के विषय में नहीं जानते होंगे। सिक्किम दार्जिलिंग से अधिक दूर नहीं है। सिक्किम में भी चाय का मनमोहक उद्यान है। सड़क मार्ग द्वारा गंगटोक से दार्जिलिंग जाते हुए हम टेमी चाय के उद्यान से होकर गए थे। वह दृश्य इस क्षेत्र का हमारा सर्वोत्तम दृश्य था।

सिक्किम की चाय
सिक्किम की चाय

टेमी चाय उद्यान सिक्किम का इकलौता चाय उद्यान है जिसकी गिनती देश-विदेश के सर्वोत्तम चाय उद्यानों में की जाती है। इस चाय उद्यान की स्थापना एवं कार्यान्वयन का श्रेय सिक्किम सरकार को जाता है। इस उद्यान के उत्पाद का कुछ भाग टेमी चाय के ब्रांड नाम पर विक्रय किया जाता है। शेष भाग अन्य ब्रांड नामों पर उपलब्ध हैं, जैसे खो-चा तथा गोल्डन टिप्स।

यदि आप एवं आपके परिजनों को चाय प्रिय है तो यह एक उत्तम स्मारिका सिद्ध हो सकती है। वह भी सीधे चाय के उद्यान से ली गयी चाय!

डमरू

हिमालय को भगवान शिव का आवास माना जाता है। यदि आप शिव भक्त हैं तो आप सिक्किम की स्मृति के रूप में यहाँ से डमरू ले जा सकते हैं। हिन्दू एवं बौद्ध, दोनों अनुयायियों के लिए डमरू का विशेष महत्त्व है। ऐसा माना जाता है कि संस्कृत व्याकरण की रचना ऋषि पाणिनि ने डमरू द्वारा उत्पन्न स्वरों के आधार पर की थी।

सिक्किम के डमरू
सिक्किम के डमरू

मैंने यहाँ डमरू क्रय तो नहीं किया किन्तु उसे बजाना अवश्य सीख लिया। देखने में यह आसान प्रतीत होता है किन्तु जब तक आप उसे सही रीति से ना पकड़ें, उसे बजाना असंभव होता है। डमरू को हाथ में लेकर घुमाने से उस पर बंधा मोती डमरू की सतह पर चोट करता है जिससे स्वर उत्पन्न होते हैं। आप जैसे हाथ घुमायेंगे, वैसे ही सुर में डमरू बजेगा।

मोमो बनाने का उपकरण

मोमो बनाने के उपकरण
मोमो बनाने के उपकरण

यदि आपको मोमो खाना भाता है तो यह भी सिक्किम की एक उत्तम स्मारिका है। सिक्किम की दुकानों में भिन्न भिन्न प्रकार के मोमो यंत्र उपलब्ध हैं। आपको जो आसान प्रतीत हो, आप ले सकते हैं।

अपनी सिक्किम यात्रा से आप इनमें से कौन कौन से स्मृति चिन्ह लाना चाहेंगे?

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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