काज़ा, लान्ग्जा एवं रंग्रिक – स्पीति घाटी के मनमोहक बौद्ध गाँव

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गत वर्ष, हमारे हिमाचल के स्पीति घाटी भ्रमण के समय हम नाको, ताबो एवं धनकर गाँवों की यात्रा के पश्चात काज़ा पहुँचे थे। घुमावदार एवं ऊबड़-खाबड़ मार्गों पर धीमी गति से गाड़ी चलाते हुए हम वहां पहुंचे। प्रायः हमारे एक ओर सुन्दर नदी कलकल बहती रही। मुझे स्मरण है, एक छोटे से लोह सेतु को पार करते ही ऐसा प्रतीत हुआ मानो हम एक विश्व से किसी दूसरे ही विश्व में प्रवेश कर रहे हों। काज़ा पहुंचते पहुंचते हम इस शीत मरुस्थल के बीहड़ बंजर परिदृश्यों से अभ्यस्त हो गए थे।

हिमाचल की मनोरम स्पीति घाटी
हिमाचल की मनोरम स्पीति घाटी

पर्वत एवं उसकी घाटियाँ हरी-भरी भी होती हैं, यह तथ्य पूर्णतः विस्मृत हो चुका था। अपने चारों ओर की निस्तब्धता से पूर्णतः अभ्यस्त हो चुके थे, उससे एकाकार हो चुके थे। छोटे छोटे गाँव, वह भी दूरी पर स्थित होते है। मध्य में, शब्दशः, एक जीवात्मा के भी दर्शन नहीं होते थे। गांवों में भी घरों की संख्या कम थी, परन्तु एक विद्यालय एवं एक हेलिपैड प्रत्येक गाँव में अवश्य दृष्टिगोचर हुआ, मानो उनकी उपस्थिति किसी नियम के अंतर्गत आती हो।

काज़ा गाँव

हमें बताया गया कि काज़ा में हम कुछ हरियाली देख सकते हैं। जी हाँ। काज़ा इस क्षेत्र का अलपेक्षाकृत एक बड़ा नगर है। इसकी जनसँख्या लगभग २००० है। यही एक स्थान है जहां आसपास के लोग क्रय-विक्रय, व्यापार तथा मनाली जैसे अन्य बड़े नगरों तक पहुँचने के साधनों की खोज में आते हैं। काज़ा नगरी में हमारा प्रथम साक्षात्कार वहां स्थित एक पेट्रोल पम्प से हुआ क्योंकि हमारी गाड़ी में पेट्रोल की स्थिति चिंताजनक हो चुकी थी। यदि उस समय उस पेट्रोल पम्प में इंधन नहीं होता तो हमें तब तक वहीं विश्राम करता पड़ जाता, जब तक पम्प में इंधन की आपूर्ति नहीं हो जाती। भगवान की दया से उस पेट्रोल पम्प में पर्याप्त इंधन था तथा हम अपनी आगे की यात्रा नियोजित एवं निर्विघ्न रूप से पूर्ण कर पाए।

विश्व का सबसे ऊचा पेट्रोल पंप
विश्व का सबसे ऊचा पेट्रोल पंप

काज़ा का इंडियन आयल पेट्रोल पंप विश्व का सर्वाधिक ऊंचा खुदरा पेट्रोल पंप है जो समुद्र तल से ३७४०मीटर ऊंचाई पर स्थित है।

जुलाई मास था। स्पीति नदी शान्ति से बह रही थी। जहां जहां जा रही थी, मार्ग में चित्ताकर्षक आकृतियाँ बनाती जा रही थी। उन आकृतियों ने मुझे अभिभूत कर दिया था, मुझे स्वयं से एकाकार कर लिया था। जल स्तर बढ़ते ही आकृतियाँ लुप्त हो जाती थीं, तो जल स्तर गिरने पर पुनः नवीन रूप में प्रकट हो जाती थीं। नदी के प्रत्येक मोड़ पर एक नवीन स्वरूप दृष्टिगोचर हो रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो मैं जीवन के विलंबित रूप का दर्शन कर रही हूँ।

पर्वतों के बीच मंडराती स्पीति नदी
पर्वतों के बीच मंडराती स्पीति नदी

गाड़ी में इंधन भरने के पश्चात, हम काज़ा को पार करते हुए रंग्रिक गांव में स्थित हमारे विश्रामगृह की ओर चल पड़े। ९०० की जनसँख्या लिए रंग्रिक अपेक्षाकृत एक बड़ा गाँव है। रंग्रिक में हम ग्रैंड देवाचेन होटल में ठहरे थे। सौभाग्य से हमें ऐसा कक्ष प्राप्त हुआ था जहां से की गोम्पा या क्ये मठ का अबाधित दृश्य प्राप्त होता है।

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की गोम्पा अथवा क्ये मठ

की गोम्फा
की गोम्फा

की गोम्पा, क्ये मठ, के मठ, कि मठ अथवा की मठ। ये सभी नाम हैं की गोम्पा के, जो इस क्षेत्र के प्रमुख बौद्ध मठों में से एक है। ऊँचे पर्वत की ढलान पर स्थित यह मठ अत्यंत आकर्षक दिखाई देता है। श्वेत व श्याम रंगों में रंगा यह मठ अपने मटमैले पीले रंग की पार्श्वभूमी में उठकर दिखाई पड़ता है। ध्यान से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो यह मठ पर्वत की सतह के भीतर से एक कुकुरमुत्ते के सामान अंकुरित हुआ हो। उस ओर खुलती मेरी खिड़की के बाहर भी पीले रंग के पुष्प उगे हुए थे। बलखाती स्पीति नदी के पृष्ठ भाग में विशाल पर्वत गर्व से खड़ा था जिस पर मुकुट के मणि के समान की गोम्पा चमक रहा था। यह मनमोहक दृश्य देखकर मैं सुध-बुध खो चुकी थी।

की मठ को की गोम्पा, क्ये मठ, के मठ अथवा कि मठ भी कहा जाता है।

की गोम्फा थोड़े पास से
की गोम्फा थोड़े पास से

प्रातःकाल ही हमने निश्चय किया कि हम प्रातः होने वाली आराधना के लिए मठ में जायेंगे। प्रातःकालीन प्रकाश में सर्व परिदृश्य अद्भुत दिखाई पड़ रहा था। चारों ओर निस्तब्ध शान्ति छाई हुई थी। यह निःशब्दता हमारे रोम रोम में प्रवेश करने लगी थी। हमारा अंतःकरण शांत एवं केन्द्रित हो गया था। मठ में कुछ छोटे-बड़े द्वारों को पार कर हम प्रमुख ध्यान कक्ष के भीतर पहुंचे। इस कक्ष में छोटे से बड़े आयवर्ग के अनेक बौद्ध भिक्षुक एक ताल में जप कर रहे थे। उन सभी के हाथों में रोटियाँ थी जिसके टुकड़े वे कुछ क्षणों के अंतराल में अपने मुँह में डाल रहे थे। उन्हें गर्म चाय अनवरत परोसी जा रही थी जो इतनी ऊंचाई पर व इतने शीत वातावरण में यहाँ बैठकर जप करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। किन्तु स्वच्छता की भीषण कमतरता ने मेरे मुंह में कड़वाहट भर दी। जिस भूमि पर वे चल रहे थे, उसी भूमि पर वे रोटियाँ भी रख रहे थे। भूमि पूर्णतः अस्वच्छ थी। मेरे मन में तीव्र अभिलाषा उत्पन्न हुई कि स्वच्छता को भी इस मठ की संस्कृति का एक अभिन्न अंग माना जाता तो उत्तम होता।

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स्पीति घाटी का परिदृश्य

की गोम्फा पर बनी आकृतियाँ
की गोम्फा पर बनी आकृतियाँ

हम मठ की छत पर गए जो चारों ओर के परिदृश्यों को निहारने का सर्वोत्तम स्थल सिद्ध हुआ। वहां हमें कुछ अत्यंत विस्मयकारी दृश्य दृष्टिगोचर हुआ। छत पर, ऊंचे मंचों पर कुछ असुरी आकृतियाँ स्थित थीं। उनकी उपस्थिति की पृष्ठभूमि में पौराणिक कथाओं से सम्बंधित कारण अवश्य होंगे। कदाचित पैशाचिक कुदृष्टि से मठ का रक्षण करना उनका हेतु हो। मैंने इन प्रतिमाओं के विषय में उनसे जानकारी प्राप्त करने का प्रयास भी किया। किन्तु अधिकतर भिक्षुओं का यही उत्तर होता था कि वे जब से मठ को जानते हैं, तब से ये आकृतियाँ मठ का अभिन्न अंग हैं।

की गोम्पा का इतिहास

की गोम्पा अथवा की मठ ११वीं सदी में निर्मित है। इस पर समय समय पर अनेक सेनाओं तथा विपक्षी धार्मिक गुटों ने आक्रमण किया। १९४० में यह मठ भीषण अग्नि से क्षति ग्रस्थ हुआ था। १९७५ में इसे भूकंप के झटके भी सहन करने पड़े थे। लोगों का कहना है कि निरंतर होते रखरखाव के कारण इसका स्वरूप अत्यंत अव्यवस्थित हो चुका है। यूँ तो हिमालय की चोटियों व ढलानों पर स्थित मठों की संरचना बहुधा अत्यंत अव्यवस्थित होती है। तीव्र ढलानों पर संरचनाओं का संतुलन बनाए रखना तथा कालांतर में विभिन्न चरणों में संरचनाओं में वृद्धि किया जाना इसका प्रमुख कारण हो सकते हैं।

मुझे जानकारी दी गयी कि की मठ में अनेक प्राचीन भित्ति चित्र भी हैं, किन्तु सामान्य पर्यटकों के लिए उनके दर्शन करना सुलभ नहीं है। इस मठ में ३५० से भी अधिक भिक्षुक हैं। वर्ष २००० में इस मठ ने अपने १००० वर्ष पूर्ण किये हैं।

काज़ा

सायंकाल में हमने काज़ा नगर में पैदल सैर की। स्पीति घाटी में कुछ दिवस व्यतीत करने के पश्चात स्वाभाविक रूप से यह नगर अपेक्षाकृत भीड़ भरा प्रतीत हुआ। बाजार में चहल-पहल थी। हमने जिससे भी अपने आगामी स्पीति यात्रा का उल्लेख किया, उन्होंने हमें स्पीति पारिमंडल(इकोस्फीयर) कार्यालय एवं कैफे एवं दुकान में जाने की सलाह दी। अतः हमने वहाँ जाने का निश्चय किया। वहाँ हमने प्यारी इशिता खन्ना से भेंट की तथा उनके साथ चाय पी। उन्होंने हमें अपने पर्यावरणीय पर्यटन के विविध गतिविधियों के विषय में बताया। अपने द्वारा संचालित व निर्देशित पद-यात्राओं एवं होमस्टे की सुविधाओं द्वारा वे कैसे गांववासियों के लिए जीविका के साधन उत्पन्न कर रहे हैं, यह जानकार अत्यंत प्रसन्नता हुई।

स्पीति पारिमंडल(इकोस्फीयर) में एक छोटी सी दुकान है जहां कुछ रोचक स्थानीय वस्तुएं उपलब्ध हैं। यहाँ सी-बक्थोर्न अथवा समुद्री झरबेरी का रस, शरबत तथा सार सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। मैंने यहाँ की विशेषताओं से चित्रित कुछ चुम्बक भी खरीदे।

लान्ग्जा

स्पीति घाटी का लान्ग्ज़ा गाँव
स्पीति घाटी का लान्ग्ज़ा गाँव

काज़ा के उत्तर में लान्ग्जा, हिक्किम तथा कोमिक तीन गाँव हैं। ये तीनों गाँव विश्व के उच्चतम मोटर योग्य सडकों वाले गाँवों में से हैं। हम जिस दिन यहाँ पहुंचे, वर्षा हो रही थी जो इस क्षेत्र में विरल है। वर्षा के कारण मार्ग कीचड़ भरे हो गए थे। अतः हम हिक्किम एवं कोमिक नहीं जा पाए। वर्षा में कीचड़ व फिसलन भरे पहाड़ी संकरे मार्गों में गाड़ी चलाना अत्यंत जोखिम भरा कार्य होता है। हम इस संकट से दूर ही रहे। किन्तु हम लान्ग्जा पहुँचने में सफल रहे।

हिक्किम को विश्व का सर्वाधिक ऊँचाई पर स्थित डाक घर की अवस्थिति का गौरव प्राप्त है।

सालिग्राम

लान्गज़ा के सालिग्राम
लान्गज़ा के सालिग्राम

लान्ग्जा पहुँचने से कुछ क्षण पूर्व कुछ बालक हमारी गाड़ी के समीप आये तथा गाड़ी की खिड़की खटखटाने लगे। प्रत्येक बालक ने हाथ में एक बस्ता उठाया हुआ था जिसमें चक्र की छवि से उत्कीर्णित छोटे छोटे शिलाखंड थे। ये जीवाश्म युक्त शिलाखंड थे। हम सब जानते हैं कि करोड़ों वर्षों पूर्व हिमालय समुद्र की गहराइयों से उभर कर बाहर आया है। कुछ अंतर्जलीय जीव अब भी हिमालय के कुछ क्षेत्रों में पाए जाते हैं। चूंकि पत्थर पर स्थित चिन्ह चक्र के समान है, लोग इसका सम्बन्ध भगवान विष्णु से जोड़ देते हैं। ऐसे पत्थरों को सालिग्राम कहा जाता है। अनेक मंदिरों एवं घरों में इन्हें पूजा जाता है। ऋषिकेश एवं नेपाल जैसे स्थानों पर आप इन्हें विक्रेताओं के पास देख सकते हैं। ये सही था या नहीं, यह मैं नहीं जानती, किन्तु लान्ग्जा में प्रवेश करने से पूर्व मैंने भी एक सालिग्राम पत्थर क्रय किया था। लान्ग्जा में प्रवेश के पश्चात भी सालिग्राम बिक्री करती कुछ बालिकाओं के एक समूह से हमारी भेंट हुई।

उन बालिकाओं से वार्तालाप के पश्चात, उनसे सम्बंधित एक स्पष्ट स्मृति मेरे मस्तिष्क में अब भी है, वह है अल्प वय में उनके मोलभाव करने का कौशल।

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लान्ग्जा में पैदल सैर करते हुए हमने कुछ बालक-बालिकाओं से तथा कुछ महिलाओं से वार्तालाप करने का प्रयत्न किया। उनसे यह जानकारी प्राप्त हुई कि इस गाँव की जनसँख्या १०० से भी कम है। उन्हें कदाचित एक विशाल परिवार कह सकते हैं। संकरी गली में चलते हुए हम एक मठ पर पहुंचे। यहाँ प्रत्येक गाँव एक मठ के चारों ओर बसा हुआ है। गाँव के सभी घर एक समान हैं। श्वेत रंग में रंगी भित्तियाँ तथा उन पर स्थित द्वारों व झरोखों के चौखट काले रंग के हैं। प्रत्येक घर के अग्रभागीय द्वार पर नीले रंग की छाप उसे अन्य द्वारों से भिन्न बनाती हैं। यहाँ से हमें बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा की ओर निर्देशित किया गया।

बुद्ध प्रतिमा

लान्ग्ज़ा की बुद्ध प्रतिमा
लान्ग्ज़ा की बुद्ध प्रतिमा

लान्ग्जा में बुद्ध की प्रतिमा इस परिदृश्य में एक नवीन अनुवृद्धि है। वस्तुतः, हिमालय के एक छोर से दूसरे छोर तक बुद्ध की अनेक विशाल प्रतिमाएं स्थापित की जा रही हैं। प्रतिमा के समीप पहुंचकर हमने समझा कि यह प्रतिमा सर्वोत्तम स्थान पर स्थापित की गयी है। यहाँ से चहुँ ओर का अप्रतिम व अबाधित दृश्य दृष्टिगोचर होता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो बुद्ध को यहाँ सोच-समझ कर बिठाया गया है ताकि वे इस ऊँचाई से इस सुंदर एवं अछूती घाटी पर दृष्टी रख सकें।

रंग्रिक

यूँ तो रंग्रिक एक छोटा सा गाँव है किन्तु स्पीति के परिप्रेक्ष्य में यह अपेक्षाकृत विशाल है। हमने यहाँ भी बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा देखी। पर्वतों की ढलान पर लिखित प्रार्थनाएं भी देखीं।

चुम्बकीय शैल गुफा

चुम्बकीय शैल गुफ़ा
चुम्बकीय शैल गुफ़ा

नदी के समक्ष, खड़ी चट्टान के ऊपर स्थित गुफा तक पहुँचने के लिए हमें किंचित पदचाप करने पड़े। गुफा अत्यंत लघु है जिसके भीतर एक समय केवल एक ही व्यक्ति जा सकता है। किन्तु गुफा के भीतर किसी भी सामान्य व्यक्ति के उपयोग की सभी सुविधाएं हैं। एक बिछौना, एक सिगड़ी, रसोईघर की सभी सामान्य वस्तुएं, पढ़ने की मेज इत्यादि। अर्थात सभी आवश्यक वस्तुएं, किन्तु ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसके बिना जीवन संभव है।

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इस गुफा के एक छोर पर एक शिला थी। उस पर कुछ सिक्के चिपके हुए थे, ठीक वैसे ही जैसे हम फ्रिज के ऊपर चुम्बकीय प्रदर्शन वस्तुएं चिपकाते हैं। इस खड़ी शिला की चुम्बकीय विशेषताएं हैं। शिला का परिक्षण करने के लिए हमने भी कुछ सिक्के निकाले तथा उस पर चिपकाने का प्रयत्न किया। सिक्के शिला पर इस प्रकार चिपक गए मानो वे शिला का ही भाग हों।

चुम्बकीय शिला को गुफा के भीतर रखने का कारण मेरी समझ के परे था। कदाचित इसका चुम्बकीय प्रभाव मानवों के लिए सकारात्मक ना हो, अथवा यह लोगों में उत्सुकता उत्पन्न करने के लिए किया गया हो।

विरली जनसंख्या की स्पीति घाटी में जो इकलौता ब्रांड का नाम हमने देखा, वह था भारतीय स्टेट बैंक। ना केवल इसकी शाखाएं सभी प्रमुख स्थानों पर हैं, अपितु प्रत्येक शाखा में अगली शाखा की दूरी एवं अवस्थिति की सूचना स्पष्ट रूप से दी गयी है।

स्पीति घाटी यात्रा सुझाव

स्पीति घाटी का परिदृश्य
स्पीति घाटी का परिदृश्य

एक शाकाहारी होने के कारण स्पीति घाटी में हमारा जीवन शाकाहारी थुपका पर निर्भर था। दाल-भात भी आसानी से उपलब्ध हो जाता है।

शिमला से मनाली की हमारी यात्रा के मध्य में हमने काज़ा में अल्प-विराम लिया तथा काज़ा व उसके आस-पास के पर्यटन स्थलों के अवलोकन का आनंद उठाया। यदि आप सीधे काज़ा जाना चाहते हैं तो आप मनाली की ओर से ग्राम्फु एवं कुंजुम दर्रा होते हुए वहां पहुँच सकते हैं। ग्रीष्म ऋतु में मनाली एवं काज़ा के मध्य राज्य परिवहन की एक बस भी चलती है। मार्ग दुर्गम एवं अप्रत्याशित हैं।

यह एक मनमोहक व सुन्दर घाटी है। नीला आकाश, सपाट व रिक्त पर्वत, कलकल बहती नदी तथा कहीं कहीं हरियाली।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

2 COMMENTS

  1. हमेशा की तरह एक खूबसूरत मनमोहन जगह का उसी तरह शब्दों के उचित चयन से सुंदर चित्रण। 🙏🙏

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