दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा – जहां मार्ग ही लक्ष्य बन जाता है!

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सम्पूर्ण विश्व में ऐसे पर्यटकों की संख्या बहुत अधिक है जिन्हें सड़क यात्रा द्वारा पर्यटन के रोमांच का अनुभव करना अत्यधिक प्रिय है। ऐसे यात्रियों की संख्या अब भारत में भी तेजी से बढ़ रही है। फिर चाहे वह दुपहिया वाहन द्वारा हो या चौपहिया वाहन द्वारा।

दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा उन सब यात्रियों के लिए सड़क मार्ग द्वारा दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा करना किसी स्वप्न के पूर्ण होने से कम नहीं। इस क्रम में यदि लेह – मनाली मार्ग भी जुड़ जाए तो सोने पर सुहागा। इस मार्ग में दृष्ट परिदृश्य सुन्दरता की पराकाष्ठा है। इसे सुन्दरता की परिभाषा भी कहा जाय तो कदाचित अतिशयोक्ति नहीं होगी। सम्पूर्ण मार्ग में परिदृश्यों का जादुई परिवर्तन मंत्रमुग्ध कर देता है।

कहीं पंजाब के हरे-भरे खेत तो कहीं कश्मीर की नदियों से सिंचे घास के विस्तृत मैदान। और अचानक सम्पूर्ण हरियाली लद्दाख के शीत मरुस्थल में परिवर्तित हो कर विशाल सपाट पर्वतों पर विभिन्न रंगों के उतार चढ़ाव में हमें तल्लीन कर देती है।

झेलम नदी पे पुल
राहें हैं तो पुल भी होंगे

कहीं जीभ के चटोरेपन को शांत करते सड़क किनारे उपस्थित ढाबे तो कहीं मन को शान्ति प्रदान करते बौद्ध मठ अर्थात् गोम्पा। इन्ही सब का आनंद उठाने की मेरी भी अभिलाषा थी। मेरा स्वप्न पूर्ण हुआ जब लद्दाख के खरदुंगला में सर्वोच्च स्थल पर संस्मरण लेखकों के एक अधिवेशन में भाग लेने का मुझे निमंत्रण मिला।

एक ब्लॉग्गिंग पर्यटन के अंतर्गत दिल्ली से श्रीनगर एवं लेह होते हुए लद्दाख के खरदुंगला दर्रे तक सड़क मार्ग से पहुँचना था। परन्तु मार्ग में ही स्वास्थ्य बुरी तरह बिगड़ने के कारण मैं अपनी यात्रा पूर्ण नहीं कर पाई एवं लेह से ही मुझे वापिस लौटना पड़ा। अर्थात् मेरा स्वप्न केवल अर्धसत्य हुआ है। शेष स्वप्न भविष्य में पूर्ण करने की तीव्र इच्छा मन में लिए भारी मन से घर लौटना पड़ा था। तथापि दिल्ली से लेह तक की सड़क यात्रा भी मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी जिसका अनुभव मैं आपके साथ बांटना चाहती हूँ।

दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा

इस यात्रा का आरम्भ करने हेतु जैसे ही मैं दिल्ली पहुंची, सड़क के एक ओर खड़े कुछ काँवड़ियों पर मेरी दृष्टी जा टिकी। अचानक इस तथ्य से साक्षात्कार हुआ कि श्रावण मास आरम्भ हो चुका है। अर्थात् यह सड़क यात्रा वास्तव में मानसून सड़क यात्रा सिद्ध होने वाली है। ठीक उसी तरह, जिस तरह पिछले वर्ष मैंने कोंकण समुद्रतट की सड़क यात्रा की थी।

सड़क यात्रा का दिल्ली–जम्मू भाग

दिल्ली से हमारी टोली ज्यों ही निकली, हमारी मोटर दिल्ली के सडकों के यातायात संकुलन में फंस गयी। इसकी पूर्व कल्पना टोली के किसी भी सदस्य ने नहीं की थी। इसीलिए इससे बाहर निकलने हेतु सदस्यों में सामंजस्य भी स्थापित नहीं था। जितने लोग, उतनी सलाहें! इस यातायाय संकुल से बाहर निकलना इस दिन की सबसे बड़ी चुनौती सिद्ध हुई।

ढाबे के परांठे माखन के साथ
ढाबे के परांठे माखन के साथ

हमने अपने कान पकड़ लिए और निश्चय किया कि भविष्य में दिल्ली व इसकी तरह के अन्य महानगरों की सडकों पर समय एवं ऊर्जा की बचत करने हेतु मंडली के सदस्यों में पूर्व सामंजस्य स्थापित किया जाएगा। एक बार दिल्ली से बाहर निकल गए कि आप आवश्यकता अनुसार किसी ढाबे में अल्पविराम ले सकते हैं।

इस सड़क पर नियमित यात्रा करने वाले कई पर्यटकों की यह सलाह रहती है कि भोजन हेतु मुरथल के प्रसिद्द ढाबों में ही रुकें। किन्तु आप सड़क किनारे उन छोटे ढाबों में भी रुक सकते है जहां ट्रक चालक सदा रुकते हैं। यहाँ आपको ताजा एवं स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध होगा, साथ ही समय की भी बचत होगी। रही बात स्वच्छता की तो वह आप स्वयं जांच सकते हैं, क्योंकि छोटे ढाबे आपके समक्ष ही भोजन तैयार करते हैं।

रास्ते में पानीपत पहुंचते ही इतिहास में पढ़े उन सभी युद्धों का स्मरण हो आया। परन्तु यहाँ मुझे केवल बड़े बड़े विज्ञापन-पट दृष्टिगोचर हुए जो पचरंगा आचार एवं कई तरह की पाचक गोलियों का विज्ञापन कर रहे थे।

चाय पीने की इच्छा हुई तो निश्चय किया कि अम्बाला में रुक कर चाय पियेंगे। हमने जैसे ही सतलुज नदी को पार किया, मेरा मन अपने जन्मस्थल अंबाला के समीप पहुँचने के विचार से पुलकित हो उठा था। सोचा चाय भी पियेंगे एवं कुछ छायाचित्र भी खींचेंगे। परन्तु यह क्या हुआ? हमें कुछ समझ आये, इसके पूर्व ही एक हवाई मार्ग हमें अम्बाला में प्रवेश पूर्व ही उसके ऊपर से होते हुए दूर ले गया।

इसी तरह लुधियाना, जालंधर एवं फगवाड़ा में भी हमारी यही स्थिति रही। तत्पश्चात हमारी भूख हमारी सहनशक्ति के परे हो गयी और हम राजमार्ग के किनारे स्थित एक ढाबे में भोजन हेतु रुक गए। भोजन स्वादिष्ट तो था ही, साथ ही एक अरसे के पश्चात पंजाबी में वार्तालाप कर अत्यंत आनंद प्राप्त हुआ। हमारी टोली में भी कई पंजाबी भाषी प्रकट हो गए। पंजाब में पंजाबी बोलने के पश्चात लगा कि मैं सच में पंजाब वापिस पहुंची हूँ।

जम्मू की ओर कूच

पेट पूजा निपटाकर हम जम्मू की ओर कूच करने निकल पड़े। जैसा कि आप सब जानते हैं, पंजाब राज्य का नामकरण उसकी पांच नदियाँ- सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब एवं झेलम नदियों पर आधारित है। श्रीनगर पहुँचने तक मुझे इन पाँचों नदियों को पार करने की प्रतीक्षा थी। जम्मू पहुँचने से पूर्व, इनमें से दो नदियाँ, व्यास नदी एवं रावी नदी को हमने पार कर लिया था। अर्थात् अम्बाला से श्रीनगर तक हम पंजाब के कई भागों से गुजरने वाले थे।

राह में हमने कई देसी खाद्य पदार्थों का आस्वाद लिया। गर्म रेत पर भुने भुट्टे अथवा छल्ली, मुरुंडा अर्थात् मुरमुरे से बनी बर्फी एवं ताजे तोड़े जामुन खा कर पुराने दिनों का स्मरण हो आया।

जब तक जम्मू पहुंचते, अँधेरा छाने लगा था। अगले दिन, प्रातः सूर्योदय से पूर्व हमें जम्मू से विदा होना था।

इतने कम अवकाश में भी मैं यहाँ एक पुराने मित्र से भेंट कर सकी। मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि अगली बार पर्याप्त समय के साथ जम्मू भ्रमण हेतु अवश्य आऊँगी।

जम्मू से श्रीनगर यात्रा

जम्मू से हम प्रातः शीघ्र प्रस्थान कर गए ताकि समय रहते हम सोनमर्ग पहुँच जाएँ। निरंतर बरसती वर्षा एवं कुछ दिनों पूर्व ही इस मार्ग पर अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकी हमले ने हमें कुछ चिंतित कर दिया था। साथ ही जम्मू कश्मीर मार्ग पर निर्मित प्रसिद्ध सुरंगी मार्गों से जाने का उत्साह भी कुछ कम नहीं था। विशेषतः ९.२८ की.मी. लम्बाई युक्त, विश्व की सर्वाधिक लंबी एवं कुछ दिनों पूर्व ही खुली, चेनानी-नाशरी सुरंग या पटनी टॉप सुरंग को पार करने हेतु हम सब प्रतीक्षारत थे। यह सुरंगी मार्ग उधमपुर जिले के चेनानी को रामबन जिले के नाशरी से जोड़ती है।

उधमपुर पहुंचने से पूर्व हम सड़क के किनारे स्थित ढाबे में परांठे खाने रुके। तेल में तले एवं ढेर सारे शुद्ध मक्खन के साथ परोसे गए परांठों ने पहले तो हमें भयभीत किया। परन्तु जैसे ही इन्हें खाना आरम्भ किया, अभूतपूर्व स्वाद का आनंद रोके नहीं रुक रहा था। मन को समझाया कि कभी कभी इस तरह के गरिष्ठ खाने का स्वाद लेना इतना हानिकारक तो नहीं होगा।

अंततः हमारी प्रतीक्षा का अंत हुआ और हम चेनानी-नाशरी सुरंग पर पहुंचे। सम्पूर्ण सुरंग हमने हाथों में कैमरे लिए, चित्र खींचते पार की। तत्पश्चात वर्ष ऋतू में मटमैली हुई चिनाब नदी के किनारे किनारे गाडी चलाते हम रामबन पहुंचे। यहाँ हमारे उत्साह को जैसे ग्रहण लग गया। भूस्खलन के कारण आगे रास्ता बंद था। कुछ क्षण प्रतीक्षा करने के उपरांत रामबन में ही रात बिताने का निश्चय किया।

अनपेक्षित रुकावट

रामबन में चेनाब नदी
रामबन में चेनाब नदी

भूस्खलन द्वारा बंद रास्तों के कारण रामबन रेजीडेंसी होटल में रुकना तय हुआ। होटल साधारण था। तथापि होटल से चिनाब नदी का दृश्य अद्भुत था। पहाड़ों के पीछे मुड़ती चिनाब नदी मुझे आकर्षित करने लगी। मैंने नदी के किनारे कुछ समय पदभ्रमण किया। कई चित्र भी खींचे। रामबन के स्वच्छ वातावरण को आत्मसात किया।

रामबन में आये अप्रत्याशित रुकावट के कारण हमारी सम्पूर्ण योजना अस्त-व्यस्त हो सकती थी। अतः हमने प्रातः बड़ी जल्दी अपनी राह पकड़ ली। आज के गंतव्य को सोनमर्ग से परिवर्तित कर कारगिल तय किया। अर्थात् हमारा आज का दिन अत्यधिक लम्बा होने वाला था। क्यों ना हो! समय को जीतने का लक्ष्य जो था।

अनंतनाग के आस पास कश्मीर घाटी
अनंतनाग के आस पास कश्मीर घाटी

बनिहाल पार करते से ही रास्ते के दोनों ओर क्रिकेट के बल्ले बनाने के कारखाने दिखे। सम्पूर्ण परिदृश्य अत्यंत मनोहारी एवं सम्मोहक था। परन्तु समयाभाव के रहते,वहां रुक कर उसका आनंद लेना संभव नहीं था। अंततः अनंतनाग पहुँच कर ही हमने एक अल्पविराम लिया। टायटेनिक प्रेक्षण स्थल से चारों ओर फैले परिदृश्य का आनंद उठाया। यह स्थान वसंत ऋतु में दृष्ट परिदृश्यों के लिए अति प्रसिद्ध है। कदाचित उसका आनंद उठाने किसी वसंत ऋतु में मुझे पुनः अनंतनाग के दर्शन करने का अवसर प्राप्त हो।

श्रीनगर की डल झील में शिकारा
श्रीनगर की डल झील में शिकारा

श्रीनगर पहुंचते ही वातावरण में एक अनदेखे तनाव का आभास हुआ। अधिकतर संस्थान बंद थे एवं बाहर लोगों की उपस्थिति भी बहुत कम थी। डल झील के किनारे थोड़ी देर रुक कर उसकी सुन्दरता को निहारते रहे। यहाँ भी कोई अन्य पर्यटक उपस्थित नहीं था। झील में तैरते इक्के दुक्के शिकारे परिदृश्य को और भी उदास एवं रहस्यमय बना रहे थे।

श्रीनगर–कारगिल भाग – दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा

सोनमर्ग के पास सिंद नदी पे पुल
सोनमर्ग के पास सिंद नदी पे पुल

श्रीनगर से हम गांदेरबल जिले की ओर बढ़े। इस जिले का मुख्य आकर्षण है, लोकप्रिय पर्वतीय पर्यटन स्थल सोनमर्ग। श्रीनगर से सोनमर्ग तक का सड़क मार्ग इस यात्रा का सर्वाधिक सुरम्य स्थल था। झेलम नदी की मुख्य सहायक नदी, सिन्धु नदी, श्रीनगर की ओर बढ़ रही थी। हम इसके ठीक विपरीत दिशा में जा रहे थे। क्षितिज पर हिमनद प्रकट होने आरंभ हो गए थे।

हिमनदों का शनैः शनैः पिघलकर नदी में मिलन, जल की निरंतर यात्रा का बखान कर रहा था। त्रिकोणीय आकार के हिमनद किस तरह बूँद बूँद जल नदियों में भरते हैं, यह अत्यंत कुतुहलपूर्ण लुभावना दृश्य था। प्रत्येक क्षण अपने आप को खो कर किसी का अस्तित्व निर्माण करना, यही गाथा है जल की!

दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा पर हिमनद
दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा पर हिमनद

हरे भरे व्यापक घास के मैदानों के समक्ष स्थित जलपानगृह में हमने भोजन किया। मैदान में कई खच्चर अपने मालिकों समेत हम जैसे पर्यटकों की प्रतीक्षा में खड़े हुए थे। उन में से कुछ ने हमें समझाने का प्रयत्न किया की कश्मीर पर्यटन के लिए अत्यंत सुरक्षित स्थान है। यहाँ बिना किसी भय के भ्रमण किया जा सकता है। हम आपको अपने रमणीय स्थलों के दर्शन करवाएंगे। उनके शब्दों में भय एवं भरोसा दोनों का मिला जुला अर्क था। आशा करती हूँ उनके शब्द शीघ्र ही सत्य सिद्ध हों।

बालताल में अमरनाथ यात्रा शिविर

सोनमर्ग की बस्तियां पार करते ही जैसे ही हमारी दृष्टी घाटी की ओर गयी, हमारी आँखे फटी की फटी रह गयी। सिन्धु नदी के मोड़ पर अमरनाथ यात्रियों के लिए अतिविशाल शिविर लगाया गया था। वह ऐसा दृश्य था कि रुक कर उसे मनभर निहारने की आवश्यकता थी।

बालताल में अमरनाथ यात्रियों के शिविर
बालताल में अमरनाथ यात्रियों के शिविर

पहाड़ पर से वह शिविर किसी शिशु के सामने रखे खिलौने से प्रतीत हो रहे थे। चारों ओर रंगबिरंगे तम्बू लगे हुए थे। हेलिकॉप्टर निरंतर यात्रियों को लेकर आवाजाही कर रहे थे। हालांकि यह सुविधा उन्ही यात्रियों हेतु उपलब्ध थी जो चढ़ने में असमर्थ थे या चढ़ना नहीं चाहते थे। इस दृश्य को आत्मसात करने हेतु मुझे कुछ क्षण लगे।

जम्मू से लेकर राजमार्ग ४४ तक एवं इससे कई अधिक बनिहाल के पश्चात मैने कई भंडारे देखे थे। परन्तु बालताल शिविर की विशालता एवं उससे कहीं अधिक यात्रियों की संख्या ने मुझे अचंभा कर दिया था। मैंने स्वप्न में भी इसकी कल्पना नहीं की थी।

खराब मौसम और निरंतर बने आतंकी हमले के खतरे के पश्चात भी इस श्रद्धालुओं की भक्ति टस से मस नहीं हुई। यह देख इन्हें शत शत नमन करने की इच्छा हुई। आज भी जब मुझ उस दृश्य का स्मरण होता है, मुझे सब अवास्तविक सा प्रतीत होता है।

बालताल का यह शिविर उन अमरनाथ यात्रियों हेतु बनाया गया था जो सोनमर्ग की ओर से अमरनाथ तक की यात्रा करना चाहते थे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ऐसा ही अतिविशाल शिविर चन्दनबाड़ी की ओर भी लगाया गया होगा।अमरनाथ यात्रा मेरे लिए सदैव सुदूरवर्ती यात्रा प्रतीत होती थी। उस समय वहां खड़े ऐसा आभास हो रहा था जैसे मैं इस यात्रा का भाग ना होते हुए भी इसका एक भाग थी।

मेरा मन मुझे उसी क्षण इस यात्रा के लिए प्रेरित करने लगा एवं उस शिवलिंग के दर्शन हेतु आतुर होने लगा जो हिन्दू पंचांग के केवल श्रावण माह में ही प्रकट होते हैं। किन्तु मेरे मष्तिष्क ने मुझे आभास कराया कि इस क्षण मैं किसी और यात्रा का भाग हूँ। इस यात्रा की ओर मेरा कुछ उत्तरदायित्व है। भारी ह्रदय से अपने आप को संभालते हुए मन ही मन शिवजी की आराधना की एवं अन्य सदस्यों के साथ सोनमर्ग से आगे बढ़ गए। हमारा अगला लक्ष्य था जोजिला दर्रा।

जोजिला दर्रा

जोजिला दर्रा - दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा
जोजिला दर्रा

जोजिला दर्रा विश्व के सर्वोच्च दर्रों में से एक है। किन्तु आज भी मुझे इसका स्मरण हलके धूसर रंग के दलदली मार्ग के रूप में होता है, जो चारों ओर स्थित धूसर पर्वतों में विलीन होता प्रतीत हो रहा था। हम हिमनद की दीवारों के बीच से होते हुए आगे बढे थे किन्तु उस पर धुल मिट्टी जमी होने के कारण उसका रंग भी शेष परिदृश्य से मेल खा रहा था।

हिमनद की दीवारें
हिमनद की दीवारें

इस परिदृश्य को शांति से निहारने हेतु हमने एक स्थान पर गाड़ी रोकी। वहीं समीप कुछ परिचालक पर्यटकों को बर्फ की गाडी पर बिठाकर फिसलने का आनंद दिला रहे थे। चारों ओर से बर्फीली हवाओं का तेज झोंका आ कर हमें अन्दर तक कंपा रहा था। अचानक मुझे अतिशीत वातावरण की अनुभूति होने लगी। ठिठुरन से बचने हेतु हमने गर्म गर्म चाय का आस्वाद लिया। समुद्रतल से अत्यंत ऊंचाई पर आ जाने के कारण वायु अत्यंत हलकी एवं विरल हो चुकी थी। और यहीं से आरम्भ हुआ मेरी दिल्ली-श्रीनगर-लेह सड़क यात्रा का अंत।

महत्त्वपूर्ण जानकारी – विशाल जोजिला दर्रा चढ़ने से पूर्व सोनमर्ग में एक रात्री विश्राम कर तन को अत्यधिक ऊंचाई से अभ्यस्त होने का पर्याप्त समय दें।

जोजिला दर्रे से उतर कर हम कारगिल की ओर बढ़े जहां हमारा रात्रि विश्राम निश्चित था। राह में ‘टाइगर’ पर्वत से समीप द्रास युद्ध स्मारक के दर्शनार्थ एक लघु विश्राम लिया।

द्रास युद्ध स्मारक पर मेरा सविस्तार संस्मरण पढ़ें।

द्रास नदी किनारे स्थित कारगिल

द्रास नदी के किनारे बसा कारगिल शहर
द्रास नदी के किनारे बसा कारगिल शहर

द्रास नदी के किनारे स्थित कारगिल मेरी पूर्वकल्पना से कहीं अधिक विशाल नगर था। विश्रामगृह में एक फलक पर दर्शाए, कारगिल में करने लायक ४० गतिविधियों की सूची पर मेरी दृष्टी पड़ी। परन्तु इनका आनंद लेने हेतु ना तो हमारे पास समय था ना ही वह हमारी योजना का हिस्सा था। अन्यथा मैंने इन्हें इस संस्मरण का भाग अवश्य बनाया होता।

कारगिल में यात्रियों के पद चिन्ह
कारगिल में यात्रियों के पद चिन्ह

दुपहिया वाहन द्वारा सड़क यात्रा करने वाले पर्यटकों का दिल्ली-श्रीनगर-लेह मार्ग प्रिय सड़क यात्रा है। अतः विश्रामगृह में अनेक फलकों पर विभिन्न दुपहिया वाहन पर्यटकों के समूहों की चिप्पियाँ लगी हुई थीं। लेह को छोड़कर, केवल कारगिल में ही पर्यटन का सक्रियता से प्रचार हो रहा था। मैंने निश्चय किया कि मैं पर्याप्त समय लेकर कारगिल का भ्रमण करने अवश्य आऊँगी।

कारगिल से लेह

लद्दाख का ठंडा मरुस्थल
लद्दाख का ठंडा मरुस्थल

कारगिल में रात्री विश्राम के पश्चात, दूसरे दिवस हमने लेह की ओर कूच किया। अच्छी धूप खिली हुई थी। चारों ओर प्रसन्नचित्त वातावरण था। इधर उधर बलखाती सड़क पर हमारी गाड़ी दौड़ रही थी। रास्ते के प्रत्येक वक्र के पश्चात एक नवीन परिदृश्य हमारे सम्मुख प्रस्तुत हो जाता था।

कभी चारों ओर हरियाली दृष्टिगोचर होती थी तो अचानक एक मोड़ के पश्चात उजाले रंग के सपाट पत्थर के पर्वत से सामना हो जाता था। कहीं कहीं पत्थरों के पीछे से झांकती हरियाली हमारा ध्यान खींचने का प्रयत्न कर रही थी। इस परिवेश में ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम स्वर्ग के विभिन्न आयामों के दर्शन कर रहे थे।

मुलबेख गोम्पा

मुल्बेक मठ में मैत्रयी बुद्ध की प्रतिमा
मुल्बेक मठ में मैत्रयी बुद्ध की प्रतिमा

हमारी यात्रा का यह पहला ऐसा पड़ाव था जो विशेषतः छायाचित्रिकरण हेतु लिया गया था। एक सीधी चट्टान के ऊपर निर्मित यह एक सुन्दर किन्तु छोटा सा गोम्पा था। वहां की विशेषता थी आगामी बुद्ध अर्थात् मैत्रेयी बुद्ध की प्रतिमा जो चट्टान को उत्कीर्णित कर बनायी गयी थी। इसके चारों ओर बना मंदिर अपेक्षाकृत नवीन था। गोम्पा की दीवारों पर प्राचीनकाल के अभिलेख छपे थे जो इस मार्ग को प्राचीनता की सुषमा प्रदान कर रहे थे। यह प्रमाणित कर रहे थे कि प्राचीनकाल से यात्री इस मार्ग से प्रवास करते आ रहे हैं।

मुल्बेक मठ की दीवार
मुल्बेक मठ की दीवार

अन्य मठों की तरह यह गोम्पा भी रंगबिरंगी पताकाओं एवं दीवारों से सुसज्जित था। बाहरी दीवारों पर इस गोम्पा के दानकर्ताओं के नाम खुदे हुए थे। लद्दाख के नीरस परिप्रेक्ष्य को अनगिनत प्रार्थना पताकाएं, रंगों से सजा रही थीं।

नामिका ला एवं फोतू ला दर्रा

इन दो पहाड़ी दर्रों पर भी छायाचित्रिकरण हेतु अवकाश लेना तय था। परन्तु अब तक मेरा स्वास्थ्य अधिक बिगड़ चुका था। अतः मैंने गाड़ी में ही बैठे रहना उचित समझा। इन दोनों दर्रों के विषय में मेरी स्मृति में केवल तेज पवन के झोंके अंकित हैं जिसमें वहां उपस्थित प्रत्येक वस्तु फड़फड़ा रही थी।

नामिका ला दर्रा - लद्धाख
नामिका ला दर्रा – लद्धाख

इसके पश्चात हम लामायुरु होते हुए जांस्कर नदी एवं सिन्धु नदी के संगम पर पहुंचे। चूंकि मेरी शीत ऋतू में की गयी लद्दाख यात्रा के समय मैं इस भाग का भ्रमण कर चुकी थी, इस यात्रा के इस भाग को मैंने अधिकतर गाड़ी में विश्राम करते व्यतीत किया। शीत ऋतू की यात्रा के समय मेरी स्मृति पटल पर अंकित जांस्कर नदी के स्वच्छ चटक नीले रंगों को वर्षा ऋतू की इस मटमैली नदी में परिवर्तित नहीं करना चाहती थी।

और पढ़ें – लेह लद्धाख – कडकडाती सर्दियों में  

फाटू ला दर्रा - लद्धाख
फाटू ला दर्रा – लद्धाख

लेह, जिसने जनवरी के शीत मास में मुझे शान्ति एवं सुरम्य वातावरण प्रदान किया था, अब जून के महीने में मछली बाजार सदृश प्रतीत हो रहा था। रास्ते गाड़ियों से अटे पड़े थे। चारों ओर इतनी संख्या में पर्यटक थे, एक क्षण मझे प्रतीत हुआ कि मैं वापिस दिल्ली पहुँच गयी हूँ।

लामयुरु मठ - लद्धाख
लामयुरु मठ – लद्धाख

हमारी दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा में लेह हमारा मध्यभागी पड़ाव निश्चित था। इसके पश्चात हमें खरदुन्गला दर्रा, नुब्रा घाटी, लद्दाख की नदियाँ, तत्पश्चात मनाली होते हुए दिल्ली वापिस लौटना था। किन्तु बिगड़े स्वास्थ्य के कारण मुझे यात्रा बीच में त्यागकर, लेह से ही वापिस लौटना पड़ा। ह्रुदय से आशा करती हूँ कि लद्दाख के इन भागों के दर्शन हेतु मुझे यहाँ पुनः आने का अवसर मिले।

मुझे इस यात्रा के जितने भी भागों का आनंद प्राप्त हुआ, मैं पूर्णतया तृप्त हूँ। अतः मैं अपनी इस यात्रा को एक सफल यात्रा मानती हूँ। समयाभाव हो तो आप भी केवल कारगिल तक की यात्रा का आनंद ले सकते हैं। केवल यह निश्चित कर लें कि यहाँ की राजनैतिक एवं सुरक्षा की स्थिति अनुकूल है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

6 COMMENTS

  1. मनाली से लेह तक दुपहिया वाहन से यात्रा करना मेरी सूची में है। बहुत ही अच्छा और विस्तृत वर्णन किया गया है।😊

    • हाँ, दुपहिया प्रेमियों का बहुत प्रिय पथ है यह, आशा है तुम्हे शीघ्र ही ये यात्रा करने को मिले।

  2. अनुराधा जी,
    अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण दिल्ली-श्रीनगर-लेह मार्ग का उतनी ही सुंदरता से प्रस्तुत किया गया आलेख पढ़कर इस मार्ग से यात्रा करने की इच्छा बलवती हो गयी । कुछ वर्षों पूर्व श्रीनगर से सोनमर्ग,गुलमर्ग,पहलगाम जाते हुए श्रीनगर-लेह राजमार्ग से सडक यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था….संपूर्ण क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य को शब्दों मे पीरोना असंभव है ! बहुत ही सुंदर प्रस्तुति हेतू साधुवाद !

    • धन्यवाद प्रदीप जी, मेरे लिए यह यात्रा बहुत दोनों तक एक स्वपन ही थी, २ साल पहले यह पूर्ण हुई।

  3. नमस्ते मेरा नाम हर्षित गौरहा है । मेरा भी सपना है की आप की तरह ही ऐसे मनमोहक नजारों को देखू । मैं इसे ही अपना काम बनाना चाहता हु क्या यह संभव है ??
    यदि यह संभव हो तो कृपया मेरे सहाता करे ।

    • हर्षित – मन तो सबका करता है, पर सब कर नहीं पाते, तो इतना आसान तो नहीं होगा। पर घर से निकालो, अपने आस पास घूमो, देखो और लिखो, शुरू करो, आगे पथ अपने आप खुलता जायेगा।

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