द्रौपदी का जन्मस्थान – प्राचीन पांचाल देश की राजधानी कांपिल्य

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नीरा मिश्र ‘द्रौपदी ड्रीम ट्रस्ट’ की संस्थापक, अभिभावक एवं अध्यक्षा हैं। वे गत दो दशकों से सामाजिक व्यवसायी हैं तथा प्राचीन भारतीय धरोहरों को पुनर्जीवित करने के शुभकार्य में व्यस्त हैं। दिल्ली अर्थात्   इंद्रप्रस्थ एवं पांचाल की राजधानी कांपिल्य में उनकी विशेष रुचि है।

नीरा मिश्र से डीटूर्स संवाद

अनुराधा गोयल – नीरा जी, डीटूर्स में आपका स्वागत है।

नीरा मिश्र – नमस्कार अनुराधाजी। मुझे आमंत्रित करने के लिए आपका धन्यवाद।

कांपिल्य – द्रौपदी का जन्मस्थान

अनुराधा गोयल – आज हम द्रौपदी के जन्मस्थान कांपिल्य के विषय में चर्चा करने जा रहे हैं। हम सब जानते हैं कि द्रौपदी महाभारत की एक अत्यंत महत्वपूर्ण पात्र थी। एक प्रकार से वह महाभारत की ‘इच्छाशक्ति’ थी। पांचाल एवं कांपिल्य के विषय में भी हम सबने सुना है। किन्तु वह भारत के मानचित्र पर कहाँ स्थित है, यह हम नहीं जानते। इसीलिए हम इसी विषय से हमारी चर्चा का आरंभ करते हैं कि कांपिल्य वास्तव में कहाँ है?

नीरा मिश्र – पुरातत्वविदों, प्राचीन भारत के शोधकर्ताओं तथा संस्कृत के विद्वानों के अतिरिक्त अधिक लोग नहीं जानते कि गंगा तट पर स्थित कांपिल्य वास्तव में उत्तर प्रदेश के  फर्रुखाबाद जिले में स्थित है। प्राचीन काल में कांपिल्य स्वयं एक जनपद था। इसकी अवस्थिति की चर्चा की जाए तो यह स्थान दिल्ली से लगभग ३०० किलोमीटर दूर है जहां हम आगरा महामार्ग द्वारा आगरा, टूंडला तथा एटा राज्यमार्ग होते हुए पहुँच सकते हैं। उसी प्रकार, कांपिल्य कानपुर से लगभग १५० किलोमीटर दूर है। कानपुर से फर्रुखाबाद होते हुए हम कांपिल्य पहुँच सकते हैं। कांपिल्य फर्रुखाबाद नगर से लगभग ४० किलोमीटर दूर स्थित है। लखनऊ से यह स्थान लगभग २०० किलोमीटर दूर है।

अनुराधा गोयल – द्रौपदी का जन्मस्थान कांपिल्य था। उन्हे पांचाली भी कहा जाता था। यह बताइए कि क्या कांपिल्य एवं पांचाली एक ही क्षेत्र के दो नाम थे या दो भिन्न क्षेत्र थे अथवा एक दूसरे के अंतर्गत आते थे? उनमें क्या संबंध था?

नीरा मिश्र – मैं सर्वप्रथम आपको पांचाल के विषय में बताती हूँ।

भारत के मानचित्र पर काम्पिल्य एवं पांचाल
भारत के मानचित्र पर काम्पिल्य एवं पांचाल

पांचाल प्राचीन भारत का प्रथम राजनीतिक जनपद था। एक समय कुरु एवं पांचाल एक सम्पूर्ण राज्य थे। पांचाल के नागरिक प्रगीतिशील एवं प्रबुद्ध थे तथा विद्या, वैदिक अध्ययन एवं शोधकार्य में उनकी विशेष रुचि थी। इस कारण कुरु के नागरिकों के संग निभाना उनके लिए कठिन हो रहा था। अतः पांचाल के पाँच कबीले पृथक हो गए तथा उन्होंने पाँच कबीलों का एक महाजनपद बनाया जिसे पाँच अंचल अथवा पांचाल कहा। इस महा संघ का एक भाग, कांपिल्य, उस क्षेत्र का सर्वाधिक प्राचीन व समृद्ध स्थान होने के कारण पांचाल महाजनपद की राजधानी बना।

आज का काम्पिल्य
आज का काम्पिल्य

अनुराधा गोयल – हम सब जानते हैं कि द्रौपदी पांचाल पुत्री तथा कांपिल्य पुत्री कहलाती थी। किन्तु यह क्षेत्र उससे पूर्व भी अस्तित्व में था। क्या महाभारत-पूर्व के इस क्षेत्र के अस्तित्व के विषय में कोई जानकारी है?

महाभारत से पूर्व का काल

नीरा मिश्र – अवश्य है। हमारे प्राचीन साहित्यों में कांपिल्य को हमारे भारत देश अथवा आर्यावर्त क्षेत्र के दस प्राचीनतम नगरों में से एक कहा गया है। इसे ‘प्रजापति की नाभि’ का एक भाग माना गया है। महाभारत-पूर्व से संबंधित क्षेत्रों के अनेक भौतिक अवशेष उपलब्ध हैं। मैं सतयुग से आरंभ करती हूँ जिसे मैं वैदिक काल कहना अधिक उत्तम मानती हूँ। किसी भी पूजा-हवन तथा गृहपूजन के समय एक श्लोक का उच्चारण किया जाता है जिसमें कांपिल्य का उल्लेख स्पष्ट है। वह श्लोक इस प्रकार है –

ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके नमा नयति कश्चन।
ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पिल्यवासिनीम्‌॥    

(भगवती अम्बिका को प्रणाम)

द्रौपदी-पार्वती

कांपिल्य के प्राचीनतम मंदिरों में से एक का यजुर्वेद में उल्लेख किया गया है। महाभारत से पूर्व का यह मंदिर है, कांपिलवासिनी मंदिर। भगवान शिव के श्राप के उपरांत देवी पार्वती इसी स्थान पर तपस्या में लीन हुई थी। द्रौपदी को पार्वती का ही अवतार माना जाता है। महाभारत से पूर्व के कांपिल्य के अस्तित्व का एक अन्य प्रमाण है, कपिल मुनि की कुटिया जहां कपिल मुनि तपस्या करते थे। इसके समीप त्रेता युग का एक अन्य महत्वपूर्ण मंदिर है, रामेश्वर शिव मंदिर। इसका निर्माण अयोध्या नरेश राम के अनुज शत्रुघ्न ने करवाया था।

कांपिल्य वेदिक अध्ययन एवं धार्मिक अनुष्ठानों का क्षेत्र था। वहाँ साधु एवं ऋषिगण अनेक यज्ञों, हवनों एवं अन्य कर्मकांडों का आयोजन करते थे। वहाँ स्थित अनेक दानव एवं असुर उनकी साधना में सदा बाधा उत्पन्न करते तथा उन्हे नाना प्रकार से त्रास देते रहते थे। जब साधुओं एवं ऋषिगणों ने भगवान राम के समक्ष अपनी व्यथा कही तब श्रीराम ने शत्रुघ्न को उन दानवों का वध करने के लिए भेजा। वहाँ से अयोध्या वापिस आते समय वे कांपिल्य की पावन धरती पर पहुंचे थे। वे कांपिल्य से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने श्रीलंका के अशोक वाटिका से लाये हुए शिवलिंग की यहाँ स्थापना की। यह शिवलिंग प्राचीनतम शिवलिंगों में से एक है। इसका उल्लेख कांपिल्य माहात्म्य में भी है जो मूलतः वैशम्पायन एवं परीक्षित के मध्य हुए संवाद के रूप में है।

अतः महाभारत से पूर्व के तीन प्रमाण हैं, कपिल मुनि, कांपिलवासिनी मंदिर तथा त्रेतायुग का रामेश्वर मंदिर। इनके अतिरिक्त गंगा है जो कितनी प्राचीन है आप सभी जानते ही हैं।

अनुराधा गोयल –  आपने जिस असुर का उल्लेख किया, क्या वह लवणासुर है?

नीरा मिश्र – जी वह लवणासुर है।

महाभारत काल से पूर्व के अवशेष  

अनुराधा गोयल –  नीराजी, आपने महाभारत से पूर्व काल के कांपिल्य के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी दी। अतः कांपिल्य द्रौपदी से पूर्व भी था एवं पश्चात भी। एक उत्सुकता मन में उत्पन्न हो रही है कि यदि आज हम वहाँ जाएँ तो महाभारत काल, उससे पूर्व एवं पश्चात के कौन कौन से अवशेष देख पाएंगे?

नीरा मिश्र – यहाँ अनेक स्थान हैं जिनका त्रेतायुग, सतयुग एवं यहाँ के इतिहास से सीधा संबंध है। जैसा कि मैंने कहा है, यह वेदिक शिक्षा का केंद्र था। उपनिषद का आधार था। यहाँ आप उस ज्ञान के वातावरण को अनुभव कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, इसी स्थान पर आयुर्वेद के ज्ञान को पुस्तक के रूप में संकलित करने का निर्णय लिया गया था जो कालांतर में चरक संहिता के रूप में अस्तित्व में आई। इसीलिए यहाँ अनेक वैद्य अब भी आयुर्वेद का प्रयोग कर रोगों का इलाज करते हैं। ये हुए महाभारत से पूर्व के कुछ प्रमाण।

महाभारत काल के अवशेष

कालेश्वर मंदिर

द्रौपदी स्वयंवर
द्रौपदी स्वयंवर

महाभारत काल के कुछ रोचक तथ्य इस स्थान से जुड़े हुए हैं। इसका आरंभ करते हैं द्रौपदी के जन्म से। कांपिल्य द्रौपदी के जन्मस्थान के रूप में अधिक प्रसिद्ध है। यहाँ एक द्रौपदी कुंड है जहाँ हवन इत्यादि का आयोजन किया जाता था। इसके निकट द्रौपदी द्वारा स्थापित एक मंदिर है।

यहाँ एक कालेश्वर मंदिर है जिसका संबंध द्रौपदी के स्वयंवर से है। स्वयंवर में अर्जुन के विजयी होने के पश्चात भी एक भ्रामक स्थिति के कारण उसे पांचों पांडवों को पति स्वीकार करने के लिए कहा गया था जिसके लिए वह कदापि तत्पर नहीं थी। तब भगवान कृष्ण ने उन्हे स्मरण कराया कि वह स्वयं पार्वती का अवतार है तथा एक वरदान के कारण पांचों पांडव भी शिव स्वरूप हैं। तब पार्वती ने कहा था, ‘काल के समक्ष झुकती हूँ तथा शिव के पंच रूप को ग्रहण करती हूँ’। इसीलिए इस मंदिर को कालेश्वर मंदिर कहा जाता है।

शिवलिंग एवं अन्य मंदिर

कुछ लघु मंदिर हैं जो चौमुखी शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुख्य शिवलिंग युधिष्ठिर का है। उसके चार मुख अन्य पांडवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ब्रह्म को समर्पित एक छोटा मंदिर भी है। कांपिल्य में मीनपुर नामक एक स्थान है जहाँ मत्स्यभेदन के पश्चात द्रौपदी का स्वयंवर हुआ था। उत्तर प्रदेश का राज्य चिन्ह भी इसी से संबंधित है, घूमती मीन, धनुष एवं बाण जो मत्स्यभेदन पर आधारित है तथा समर्पण, दिशा एवं संकल्प को दर्शाता है।

यद्यपि वर्तमान में कांपिल्य का भूगोल सिकुड़कर एक कस्बे में परिवर्तित हो गया है तथापि प्राचीन काल में यह एक विस्तृत जनपद था। आज के कांपिल्य से कुछ आगे, किन्तु प्राचीन कांपिल्य के भीतर ही मंडावर मंदिर है। फर्रुखाबाद में स्थित, पांडव बाग के भीतर यह पांडवों का मंदिर है।

शिव मंदिर

द्रौपदी कुंड
द्रौपदी कुंड

यहाँ एक शिव मंदिर भी है। गंगा का घाट है जिस पर ऋषि दुर्वासा का आश्रम है। यहाँ पांडवों के पुरोहित धौम्य ऋषि का भी एक आश्रम था। रुदायन नामक एक गाँव है जहाँ पांडवों ने कुछ काल व्यतीत किया था तथा वहाँ से बहती गंगा में उन्होंने अपने पितरों का तर्पण भी किया था। द्रौपदी के जन्म से संबंधित एक रोचक कथा यहाँ प्रचलित है। द्रौपदी के पिता को एक योद्धा व वीर पुत्र की इच्छा थी। अतः उन्होंने अनेक प्रार्थनाएं की तथा योज एवं उपयोज नामक दो परम ज्ञानी पुरोहितों से यज्ञ करने का भी अनुरोध किया। यहाँ इन दोनों पुरोहितों के दो गाँव अब भी हैं। एक प्राचीन मंदिर के भीतर २४ अवतारी विष्णु की साढ़े चार फुट ऊंची प्रतिमा भी है।

एकचक्रपुर नामक स्थान में भीम ने एक रात्रि व्यतीत की थी। ये सभी स्थान कांपिल्य एवं उसके आसपास ही स्थित हैं तथा विशेषतः महाभारत से जुड़े हुए हैं।

महाभारत के पश्चात का काल  

उत्तर प्रदेश का चिन्ह
उत्तर प्रदेश का चिन्ह

अब हम महाभारत के उपरांत के कांपिल्य के विषय में चर्चा करेंगे। हम सब जानते हैं कि जब भी कोई स्थल शिक्षा एवं राजनैतिक कारणों से प्रसिद्धि पाता था तब आने वाली पीढ़ियों के सभी गणमान्य व्यक्ति उस स्थान का भ्रमण अवश्य करते थे। बुद्ध ने भी कांपिल्य का भ्रमण किया था।

बुद्ध कांपिल्य से अत्यंत प्रभावित थे। कांपिल्य के समीप संकिसा नामक स्थान है जो कांपिल्य के संकुचन से पूर्व उसके भीतर ही था। इसका प्राचीन नाम संकाश्य है। वहाँ एक अशोक स्तंभ है। कहते हैं बुद्ध भगवान स्वर्ग से उतर कर यहीं पर आये थे। ऐसी भी मान्यता है कि बुद्ध ने यहाँ स्वर्ग प्राप्त किया अर्थात् ऐसा ज्ञान प्राप्त किया जिसके द्वारा उन्हे जीवन के उस पार के सत्य का आभास हुआ। अब यह भारतीय पुरातत्व संरक्षण विभाग द्वारा संरक्षित क्षेत्र है।

कांपिल्य पर विदेशियों का प्रभाव

संकिसा बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है। यहाँ बौद्ध धर्म को मानने वाले अनेक देशों के अतिथिगृह हैं, जैसे बर्मा, जापान इत्यादि। आप सब को स्मरण होगा कि स्टीव जॉब्स नीम करौली बाबा से अत्यंत प्रभावित थे। क्या आप जानते हैं कि नीम करौली बाबा ने फर्रुखाबाद के समीप स्थित नीम करौली गाँव में भी कुछ समय व्यतीत किया था। तदनंतर बाबा को इसी नाम से जाना जाने लगा। जब मुगलों का आगमन हुआ तब द्रौपदी कुंड के समक्ष स्थित घाट को मुगल सम्राटों की मलिकाओं के लिए मुगल घाट में परिवर्तित किया गया।

बंटवारे से पूर्व गांधीजी ने दो बार कांपिल्य का भ्रमण किया था। छावनी क्षेत्र में एक अप्रतिम संग्रहालय भी है जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित है। इस प्रकार इस क्षेत्र में आये प्रत्येक आगंतुक ने यहाँ अपनी छाप छोड़ी है।

अनुराधा गोयल –  तब तो गुरुनानकजी ने भी इस स्थान का भ्रमण अवश्य किया होगा क्योंकि उन्होंने भी भारत के लगभग सभी महत्वपूर्ण स्थानों का भ्रमण किया है?

नीरा मिश्र – यहाँ एक गुरुद्वारा अवश्य है किन्तु मुझे यह ज्ञात नहीं कि गुरुनानकजी ने इस स्थान का भ्रमण किया है। इस विषय में मैं जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करूंगी।

कांपिल्य के उत्सव एवं मेले

अनुराधा गोयल –  मैं जानना चाहती थी कि कांपिल्य में कौन कौन से उत्सव आयोजित किये जाते हैं। क्या कोई ऐसा उत्सव है जो केवल कांपिल्य में ही मनाया जाता है?

नीरा मिश्र – कांपिल्य प्रत्येक धरातल पर इतना महत्वपूर्ण है कि स्वयं अलेक्जेंडर कनिंघम भी यहाँ आए थे।  अलेक्जेंडर कनिंघम को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पिता के रूप में जाना जाता है। इसके पश्चात कांपिल्य की धरोहर एवं उसकी महत्ता से संबंधित अनेक आलेख तैयार किये गए। सन् १९७८ में जिला मैजिस्ट्रैट श्री त्रिपाठी ने प्रथम कांपिल्य महोत्सव का आरंभ किया था। यह महोत्सव कांपिल्य की पुरातनता एवं संस्कृति का उत्सव मनाता है। ना जाने कैसे एवं कब यह महोत्सव फर्रुखाबाद उत्सव में परिवर्तित हो गया। इसके अतिरिक्त, गंगा के तट पर तथा द्रौपदी कुंड पर वर्ष में दो बार मेला भरता है।

जनवरी मास में यहाँ राम गंगा मेला अथवा माघ मेला लगता है जब अनेक ऋषिगण यहाँ आते हैं तथा गंगा के तट पर अपना डेरा डालते हैं। यह मेला महीने भर चलता है। इसके अतिरिक्त, गंगा सागर उत्सव मनाया जाता है जिसे गंगा दशहरा मेला भी कहते हैं। एक अन्य मेला है, कार्तिक मेला। ‘पूर्णिमा का स्नान’ एक अन्य अत्यंत पावन उत्सव है। इस दिन भक्तगण ना केवल गंगा में स्नान करते हैं, अपितु द्रौपदी कुंड में भी डुबकी लगाते हैं। द्रौपदी कुंड एक यज्ञ कुंड था। विडंबना यह है कि २५-३० वर्ष पूर्व किसी अति उत्सुक नेता ने इसके चारों ओर पक्की मेंड़ बनवा दी जिसके कारण उसमें जल एकत्र होने लगा। भक्तगण इसे अत्यंत पावन मानते हैं इसीलिए अब वे इसमें भी डुबकी लगाते हैं।

जैन एवं बौद्ध उत्सव

कांपिल्य को १३ वें. जैन तीर्थंकर विमलनाथ अथवा विमल कुमार का भी स्थल माना जाता है। विमल कुमार वास्तव में कांपिल्य के राजकुमार थे जिन्हे दीक्षा एवं कठोर तपस्या के उपरांत कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। तत्पश्चात वे तीर्थंकर विमलनाथ बने। यहाँ एक श्वेताम्बर मंदिर तथा एक दिगम्बर मंदिर है। कांपिल्य में जैन धर्म के अनुयायी अनेक उत्सव मनाते हैं जिसके लिए भक्तगण दूर दूर से आते हैं। वे भी वैदिक पद्धति से ही पूजा अनुष्ठान करते हैं किन्तु उनके अनुष्ठान की पद्धति किंचित भिन्न होती है। अंततः उनकी संस्कृति की उत्पत्ति भी वैदिक संस्कृति से ही हुई है।

सनातन धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म इत्यादि अनेक समुदायों के भक्तगण यहाँ कई उत्सवों का आयोजन करते हैं। जो उत्सव प्रयागराज के लिए महत्वपूर्ण एवं पावन हैं, वे सभी कांपिल्य के लिए भी अत्यंत पावन हैं।

कांपिल्य दर्शनार्थियों के लिए सुविधाएं

अनुराधा गोयल – कांपिल्य के विषय में आपसे जानने के पश्चात कांपिल्य के दर्शन करने की मेरी अभिलाषा तीव्र हो गई है। क्या आप मुझे वहाँ यात्रियों के लिए उपलब्ध सुविधाओं के विषय में कुछ जानकारी दे सकती हैं? जैसे अतिथिगृह, किराये की गाड़ी, गाइड इत्यादि।

नीरा मिश्र – ठहरने के लिए २-३ विकल्प हैं। प्रथम विकल्प है कि आप फर्रुखाबाद में ठहरें तथा गाड़ी द्वारा विभिन्न दर्शनीय स्थलों तक जाएँ। फर्रुखाबाद में उचित दरों पर अनेक स्तरों के यात्री निवास उपलब्ध हैं। औसतन १००० से १५०० रुपयों में सभी मूलभूत सुविधाओं से युक्त अच्छे यात्री निवास आपको मिल जाएंगे। कई स्थानों पर आपको भोजन की पूर्वसूचना देनी पड़ सकती है।

कांपिल्य में ठहरने के लिए जैन धर्मशालाओं की सुविधाएं उपलब्ध हैं। यदि आप वहाँ उत्सवों के समय ना जाएँ तो पूर्वसूचना देकर इन धर्मशालाओं में उत्तम सुविधाओं से युक्त कक्ष भी आप प्राप्त कर सकते हैं। अन्यथा, हो सकता है कि आपको यहाँ कक्ष ही नहीं मिलें। तहसील कायमगंज में भी एक अतिथिगृह है। जहाँ से आप आसानी से कांपिल्य भ्रमण के लिए जा सकते हैं। कांपिल्य में भी मूलभूत सुविधाओं से युक्त औसत स्तर के कुछ अतिथिगृह हैं।

यह एक दोआब क्षेत्र है जहाँ भरपूर मात्र में जल उपलब्ध है। यहाँ की भूमि भी अत्यंत उपजाऊ है। भिन्न भिन्न प्रकार की भाजियाँ एवं फल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। यदि आप यहाँ नवंबर अथवा दिसंबर में आयें तो चारों ओर भरपूर हरियाली देखेंगे। इन्हे देख आप इतने मंत्रमुग्ध हो जाएंगे कि ठहरने की सुविधाओं में कुछ कमी  रह भी जाए तो आप निराश नहीं होंगे।

परिवहन सुविधाएं

नीरा मिश्र – आपको विश्वास नहीं होगा कि सन् २००३ में जब हमने यहाँ कार्य आरंभ किया था तब यहाँ पर ब्रॉड गेज रेलवे लाइन भी नहीं थी। प्राचीन मीटर गेज रेलवे लाइन ही थी। यहाँ तक पहुँचने के लिए सड़क मार्ग भी नहीं थे। कांपिल्य तक पहुँचने में हमें अत्यधिक समय लग जाता था। असुविधा भी होती थी। इसीलिए हमने सर्वप्रथम भारत पर्यटन विकास निगम से संपर्क किया। उसके निरीक्षण में कांपिल्य में सांस्कृतिक पर्यटन के विकास पर विस्तृत रूप से शोध किया। इस शोध का केंद्र बिन्दु बुनियादी ढांचे का विकास करना था। आज कांपिल्य पहुँचने के लिए उत्तम सड़क मार्ग हैं। ब्रॉड गेज रेलवे लाइनें बिछाई गई हैं जिन के ऊपर दौड़ती द्रुत गति की रेलें कम समय में हमें कांपिल्य पहुँच देती हैं।

बस सुविधाएं भी अत्यंत उत्तम हैं। अतः अब आप कांपिल्य अपनी गाड़ी, टैक्सी, बस अथवा रेल द्वारा आसानी से पहुँच सकते हैं।

इंद्रप्रस्थ की महारानी द्रौपदी

द्रौपदी महात्म्य अनुराधा गोयल – मैं द्रौपदी के विषय पर आपका ध्यान पुनः खींचना चाहती हूँ। हम जानते हैं कि द्रौपदी कांपिल्य की पुत्री थी, दिल्ली की प्रथम रानी थी एवं इंद्रप्रस्थ की महारानी थी। किन्तु उन्हे समर्पित किसी मंदिर के विषय में मैंने कभी नहीं सुना। केवल आपसे द्रौपदी कुंड के विषय में जानकारी प्राप्त हुई। क्या आप द्रौपदी को समर्पित किसी मंदिर के विषय में जानती हैं?

नीरा मिश्र – द्रौपदी को पांचाली भी कहा जाता है किन्तु पाँच पतियों की पत्नी होने के कारण नहीं, अपितु पांचाल राज्य की पुत्री होने का कारण। उन्हे पंच कन्याओं में से एक होने का मान प्राप्त है। पंच कन्यायाएं हैं, सीता, अहिल्या, तारा, मंदोदरी तथा द्रौपदी।

दुर्भाग्य से गत सहस्त्र वर्षों में भारत ने अनेक आक्रमण एवं राजनैतिक उथल-पुथल सहन किये हैं। धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों का विनाश सहा है। सौभाग्य से दक्षिण भारत कुछ सीमा तक इस विनाश से अछूता रहा है। दक्षिण भारत में द्रौपदी अम्मा के कई मंदिर हैं। चेन्नई में ही ५ मंदिर हैं जिनमें से एक मंदिर मुझे १५०० वर्ष प्राचीन बताया गया, किन्तु मुझे वह अधिक प्राचीन प्रतीत हुआ था।

धर्मराज मंदिर

कर्नाटक में धर्मराज नामक एक मंदिर है। इस मंदिर में प्रत्येक वर्ष अप्रैल मास में १५ दिवसों का द्रौपदी उत्सव आयोजित किया जाता है। इस उत्सव को करगा उत्सव कहते हैं। भक्तगण द्रौपदी का वेश धरकर उनकी स्मृति में सम्पूर्ण रात्रि नृत्य करते हैं एवं पूजा अनुष्ठान करते हैं। द्रौपदी को धर्म का प्रतीक एवं कृष्ण की बौद्धिक संगिनी माना जाता है जिसने धर्मराज स्थापित करने में पांडवों की सहायता की थी।

दक्षिण-पूर्वी एशिया एवं बाली में भी द्रौपदी अत्यंत श्रद्धेय हैं। दक्षिण भारत में, विशेषतः तमिल भाषी समाज उन्हे मरिअम्मा के रूप में पूजता है। भारत के सर्वाधिक दक्षिणतम छोर पर एक स्थान है जहाँ अनेक निवासियों ने ईसाई धर्म अपना लिया है किन्तु फिर भी वे वहाँ स्थित द्रौपदी मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं।

इंद्रप्रस्थ

इंद्रप्रस्थ की चर्चा की जाए तो यह कहते हुए मुझे अत्यंत खेद होता है कि पांडवों के गढ़ ‘पुराना किला’ में भी, जहाँ वे इंद्रप्रस्थ की प्रथम महारानी थी, उनका एक भी मंदिर नहीं है। पुराना किला के भीतर कुंती माता का एक मंदिर अवश्य है। महरौली जो इंद्रप्रस्थ का एक भाग है, वहां योगमाया का एक मंदिर है। महरौली शक्ति से भी संबंधित है। जैसे शक्ति को कृष्ण की भगिनी माना जाता है, वैसे ही द्रौपदी को भी कृष्ण की भगिनी कहा जाता है। अतः मेरे अनुमान से महरौली का शक्तिपीठ द्रौपदी को ही समर्पित होगा। राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के रहते इस स्थान का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विकास नहीं हो पाया है।

द्रौपदी – एक धर्मनिष्ठ स्त्री

द्रौपदी ने धर्म की स्थापना के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था। स्त्रियों को उचित सम्मान दिलाना उनका विशेष ध्येय था। आपको स्मरण होगा कि धृतराष्ट्र के दरबार में उन्होंने पांडवों सहित वहाँ उपस्थित सभी गणमान्य व्यक्तियों के व्यवहार पर प्रश्न चिन्ह खड़े किये थे तथा उन्हे अपना अपमान करने के लिए दोषी ठहराया था। द्रौपदी ऐसी धरती की पुत्री थी जहाँ वैदिक अध्ययन अपनी चरम सीमा पर था। वह स्वयं एक सुशिक्षित, चरित्रवान एवं अत्यंत धर्मनिष्ठ स्त्री थी। नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण थी। इसी कारण वह कृष्ण की बौद्धिक संगिनी बनी।

अब समय आ गया है कि इंद्रप्रस्थ उन्हे उनका यथोचित सम्मान प्रदान करे। हम पूर्ण प्रयास करेंगे कि इंद्रप्रस्थ के द्रौपदी मंदिरों को पुनर्जीवित करें।

कांपिल्य से मेरा संबंध

अनुराधा गोयल – यह विचार मुझे चौंका रहा है कि द्रौपदी के विषय में कितना कुछ जानना अभी शेष है। उनके लिए कितना कुछ करना भी शेष है। इस विषय में आपका प्रयास अत्यंत सराहनीय है। संवादों के इस सत्र का अंत करते हुए मैं कुछ व्यक्तिगत प्रश्न पूछना चाहती हूँ। द्रौपदी से आप किस प्रकार जुड़ी हुई हैं? उनके विषय में आपकी क्या भावनाएं हैं? आपने अपने ट्रस्ट का नाम ‘द्रौपदी ड्रीम ट्रस्ट’ क्यों रखा? इस विषय में कुछ बताएं। मैं जानने के लिए उत्सुक हूँ।

नीरा मिश्र – द्रौपदी का जन्मस्थान कई शताब्दियों से मेरा पैतृक स्थान रहा है। कितनी शताब्दियाँ, कह नहीं सकती। जीविका की खोज में सर्वप्रथम मेरे पिता ने सन् १९४७ में कांपिल्य छोड़ा तथा कोलकाता में बस गए। मैं भले ही कोलकाता में पली-बढ़ी किन्तु मेरी सांस्कृतिक डोर मेरे पैतृक स्थान से ही जुड़ी रही। सन् १९९४ में मैं दिल्ली आ गई। किन्तु जब भी परिवार में कोई शुभकार्य या विवाहोत्सव अथवा किसी शिशु का आगमन होता होता है तो अब भी हम पूजा के लिए अपनी कुलदेवी के मंदिर जाते हैं जो कोई अन्य नहीं अपितु कांपिलवासिनी अर्थात् द्रौपदी ही हैं। इसीलिए हम अब भी कांपिल्य की धरती से जुड़े हुए हैं।

द्रौपदी से मेरा असाधारण संबंध

यूँ तो शाहजहाँ ने हमें कांपिल्य में भूमि प्रदान की थी, शाहजहाँ के दरबार में मेरे पूर्वजों के ज्ञान का भरपूर सम्मान किया जाता था। मेरे एक पूर्वज शाहजहाँ के दरबार में राज कवि भी थे। किन्तु कांपिल्य से मेरा व्यक्तिगत संबंध एक असाधारण घटना से आरंभ हुआ। जयपुर महामार्ग पर विराटनगर के निकट मेरे साथ बहुत बड़ा अपघात हुआ था। उस अपघात में मुझे भारी क्षति पहुंची थी। दो स्थानीय व्यक्तियों ने मेरे प्राण बचाए थे। ३ मास तक मैं शैय्या से उठ नहीं पायी थे। आपको स्मरण होगा कि विराटनगर वही स्थान है जहाँ अज्ञातवास में द्रौपदी वहाँ की रानी की सेविका बनी थी।

स्वस्थ होने के पश्चात मेरे माता-पिता ने सर्वप्रथम मुझे पूर्वजों की भूमि में जाकर पूजा अर्चना करने का परामर्श दिया। उनका विश्वास था कि द्रौपदी ही मुझे मृत्यु के मुंह से खींच लायी थी। कांपिल्य में द्रौपदी कुंड पहुंचते ही ना जाने मुझे क्या हुआ। मैं वहाँ से आगे जाने के लिए उठ नहीं पा रही थी। मानो जड़ सी हो गई थी। उसी समय से तथा उसी स्थान से मैंने द्रौपदी के विषय में लिखना आरंभ कर दिया।

मुझे यह आभास होने लगा था कि कोई अज्ञात ऊर्जा मुझे पुनः पुनः कांपिल्य जाने के लिए बाध्य कर रही है। आप तो जानती ही हैं अनुराधा जी कि मैं शहरी परिवेश में पली–बढ़ी हूँ। गाँव जाकर रहना मेरे कल्पना से भी परे था। अपने माता-पिता की इकलौती पुत्री होने के कारण मुझे सुख-सुविधा से परिपूर्ण जीवन प्राप्त हुआ है। इसके विपरीत, अब मैं प्रत्येक महीने कांपिल्य जाने लगी हूँ। सुख-सुविधाओं से कोसों दूर, वहाँ के ग्रामीण वातावरण में रहते हुए उसे जानने का प्रयास करने लगी हूँ। नहीं जानती अकस्मात ही यह क्या हो गया। मेरे जोश को देख मेरी दादी तो मुझे थानेश्वरी बुलाने लगी है। आप जानती होंगी कि कुरुक्षेत्र को थानेश्वर कहते हैं।

अतः द्रौपदी से मेरे संबंधों का आरंभ एक विचित्र परिस्थिति में हुआ था। उनसे मैं कुछ इस प्रकार जुड़ गई कि मैंने अपना व्यवसाय बंद कर दिया तथा पूर्ण रूप से द्रौपदी की सेवा में जुट गई। अब मेरा ध्येय है, देश में द्रौपदी के सम्मान को पुनः स्थापित करना, कांपिल्य के इतिहास से सबको अवगत कराना एवं उसकी संस्कृति को पुनर्जीवित करना।

वेदों में लिखा है कि अपनी पुत्रियों को सुखी व आनंदित देखना चाहते हो तो विवाह से पूर्ण उन्हे शिक्षित करो। शिक्षा ना केवल जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए उनके व्यक्तित्व का विकास करती है, अपितु वह जिस परिवार में ब्याही जाएगी उस परिवार के जीवन मूल्यों में भी वृद्धि करती है। अतः प्राचीन काल में भी शिक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण थी। कन्याओं को शिक्षित कर उन्हे सक्षम बनाया जाता था। उन्हे स्वयंवर का अधिकार प्राप्त था। द्रौपदी इसी शिक्षित, सक्षम तथा आत्मनिर्भर स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है।

देश में द्रौपदी के सम्मान को पुनः स्थापित करना, कांपिल्य के इतिहास से सबको अवगत कराना एवं उसकी संस्कृति को पुनर्जीवित करना आज की आवश्यकता है क्योंकि हमारी संस्कृतिक धरोहरों, ऐतिहासिक तथ्यों एवं धर्म के विषय में अत्यंत भ्रामक, मिथ्यापूर्ण एवं दोषयुक्त जानकारियाँ फैलायी जा रही हैं। इस विषय में ठोस कदम उठाना आवश्यक है। द्रौपदी मेरी आदर्श हैं। उनसे मैं एक प्रगाढ़ संबंध का अनुभव करती हूँ। मुझे आभास होता है कि द्रौपदी के विषय में जो दृश्य है, उसके परे भी कुछ है जो मैं नहीं जानती। उनके विषय में अधिक जानने के लिए मुझे मेरा हृदय अत्यंत प्रेरित करता है।

अनुराधा गोयल – आपके भीतर द्रौपदी की ऊर्जा के अंश मैं स्पष्ट अनुभव कर सकती हूँ। आपके भीतर अनुवांशिक जुड़ाव तथा स्थल ऊर्जा स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। मेरा विश्वास है कि इस ऊर्जा ने आपको किसी उद्देश्य के लिए चुना है। आज के इस फलदायक संवादों के लिए मैं आपका धन्यवाद करती हूँ। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे अनेक विषय हैं जिनके संबंध में आपसे चर्चा आवश्यक है। मैं आशा करती हूँ कि उन विषयों पर भी मुझसे चर्चा कर आप मुझे एवं हमारे पाठकों को अवश्य अनुगृहीत करेंगी। द्रौपदी के विषय में आप जो नेक कार्य कर रही हैं उसके लिए आपको अनेक शुभकामनाएं। द्रौपदी की धरती पर उन्हे पुनर्जीवित करने के आपके ध्येय में हम सब आपके साथ हैं।

नीरा मिश्र – अनुराधाजी, प्राचीन भारत की महानता को बढ़ावा देने के आपके महान कार्य में योगदान देने का अवसर प्रदान करने के लिए आपका धन्यवाद। आपके ध्येय में मैं सहायता कर सकूं तो यह मेरा सौभाग्य एवं कृष्ण का आशीष होगा।

श्रव्य से मूलग्रंथ में प्रतिलेखन हर्शिल गुप्ता द्वारा किया गया है जो के IndiTales अंतर्गत  Internship Program में प्रशिक्षु हैं।

प्रतिलेखन का आवश्यकतानुसार संपादन किया गया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

2 COMMENTS

  1. अनुराधाजी एवं मीताजी
    नीराजी के व्दारा कांपिल्य के विषय में दी गई जानकारी बहुत ही रोचक और महत्त्वपूर्ण है। यह स्थान वैदिक अध्ययन और धार्मिक अनुष्ठानों का केंद्र था तथा यहीं पर आयुर्वेद के ज्ञान को पुस्तक रुप में संकलित किया गया जानकर आश्र्चर्य हुआ.
    कांपिल्य ही द्रौपदी के जन्म का,मत्सभेद का और उनके स्वयंवर का स्थान था, जानकर खुशी हुई.अभी तक यही मालूम था कि उनका स्वयंवर गुजरात के सुरेंद्र नगर के तरणेतर में हुआ था. इसी कारण यहां जो मेला लगता है उसमें स्वयंवर का आयोजन किया जाता है.
    कांपिल्य बौद्ध और जैन लोगों का तीर्थस्थान तथा पुराणों से अभी तक के महत्त्वपूर्ण स्थानों में से एक है. कांपिल्य और द्रौपदी के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करने हेतू बहुत बहुत धन्यवाद.

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