एक सींग वाले भारतीय गैंडे का घर – काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, असम

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काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान - एक सींघ वाला गैंडा
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान – एक सींघ वाला गैंडा

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान भारत के विश्व धरोहर के स्थलों में से एक है। यह उद्यान एक सींग वाले गैंडों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। इसका क्षेत्रफल 400 वर्ग कि.मी. से भी अधिक व्यापक है। माजुली द्वीप की तरह इस उद्यान का भी बहुत सारा भूभाग ब्रह्मपुत्र नदी के कारण हो रहे भूकटाव के चलते नष्ट होता जा रहा है। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान गुवाहाटी और जोरहाट इन दो प्रमुख शहरों को जोड़नेवाले मुख्य मार्ग पर बसा हुआ है और वहाँ तक पहुँचने के लिए आप या तो गुवाहाटी से जा सकते हैं, या फिर जोरहाट से। यह मार्ग इस उद्यान से होकर ही गुजरता है। यहाँ पर रास्ते में आपको कई ऐसे स्थान मिलेंगे जहाँ पर थोड़ी देर रुककर आप जंगल में टहल रहे जानवरों को देख सकते हैं, खास कर हिरण और जंगली भैंस।

यहाँ पर सड़क के किनारे कुछ धान के खेत हैं जो हमे बताया गया था कि कुछ समय पूर्व इसी उद्यान का भाग हुआ करते थे, लेकिन अब धीरे-धीरे यह सबकुछ इस जंगल में बढ़ते लोगों के अनधिकारिक प्रवेश का शिकार होता जा रहा है। इस जंगल के दूसरी तरफ ब्रह्मपुत्र नदी बहती है और वर्षा ऋतु के दौरान इस तरफ की अधिकतर घासभूमि बाढ़ में जलमग्न हो जाती है। इस दौरान इस भाग के सभी जानवर जंगल के आंतरिक क्षेत्रों में प्रवेश करने लगते हैं। और तो और इस मौसम में यहाँ के सड़कों की हालत भी बहुत ही बुरी हो जाती है, जिसके कारण गाडियाँ भी जंगल के भीतर नहीं जा सकती।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का मानचित्र
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का मानचित्र

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान अक्टूबर/नवम्बर से लेकर मार्च तक आगंतुकों के लिए खुला होता है। इसे खोलने की ठीक-ठीक तारीख उद्यान की भीतरी परिस्थितियों के आधार पर निश्चित की जाती है। वैसे तो यहाँ पर जाने का सबसे अच्छा समय है मध्य नवम्बर से लेकर फ़रवरी के अंत तक।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान – जैव विविधता का प्रसिद्ध स्थल   

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में हिरण
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में हिरण

लॉर्ड कर्ज़न की पत्नी श्रीमति कर्ज़न पहली ऐसी व्यक्ति थी जिन्होंने इस क्षेत्र के जंगली जानवरों की सुरक्षा की माँग की थी। उन्हीं के निवेदन से इस वन क्षेत्र को आरक्षित वन में परिवर्तित किया गया था। इसके बाद 1974 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया और फिर 1985 में इसे जैव विविधता का प्रसिद्ध स्थल होने के नाते यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल की उपाधि भी प्राप्त हुई। आज इस राष्ट्रीय उद्यान को 3 प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है। इनमें से पश्चिमी भाग को बागोरी, मध्य भाग को कोहोरा और पूर्वी भाग को बोकाखाट के नाम से जाना जाता है। हमने यहाँ के बागोरी क्षेत्र के दर्शन किए और इस दौरान हमारा निवास स्थान कोहोरा क्षेत्र था।

एक सींग वाला गैंडा या भारतीय गैंडा   

इस उद्यान में आप एक सींग वाले भारतीय गैंडे के अलावा जंगली हाथी, जंगली भैंस और हिरण भी देख सकते हैं और अगर आप भाग्यवान हैं तो आपको यहाँ पर बाघ भी दिखाई दे सकता है। इस उद्यान के भीतर लंबी-ऊंची जंगली घास है जिसे हाथी घास कहा जाता है। यहाँ के जानवर अक्सर इस घास के पीछे छिपकर बैठे हुए होते हैं। इन घने और दलदली घास के मैदानों में ये जानवर पल में आपके सामने आकर, पल में गायब भी हो सकते हैं। इस वजह से इस जंगल में अकेले घूमना थोड़ा खतरनाक हो सकता है, क्योंकि आप नहीं बता सकते कि कब और कहाँ से ये जानवर आप के सामने आकर खड़े हो जाए।

लगता है जैसे ये जानवर गले में कैमरा लटकाए हुए मनुष्यों को लेकर उद्यान में घूमनेवाली इन जैतुनी रंग की जीपों के आदी हो गए हैं। लेकिन अगर आपको कहीं पर गैंडा या हाथी जैसे क्रूर और भयानक जानवर दिखे तो अच्छा होगा कि आप अपने स्थान पर ही रहें और उन्हें अपना समय लेते हुए अपने रास्ते जाने दे।

हाथी और गैंडे अपने बच्चों के साथ  
हाथी - काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान
हाथी – काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान

हाथी आम तौर पर समूह में घूमते हुए नज़र आते हैं और अक्सर जल स्रोतों के आस-पास ही पाये जाते हैं। तो दूसरी तरफ गैंडे अकले ही घूमना पसंद करते हैं और कभी-कभी आप उन्हें उनके बच्चों के साथ भी देख सकते हैं।

हमारी सफारी के दौरान हमे यहाँ पर गैंडे का एक बच्चा दिखा जो हमारी जीप के ठीक सामने था। उसे देखते ही हमारे गाइड ने तुरंत जीप रोक दी और कहा कि अगर गैंडे का बच्चा यहाँ पर है तो उसकी माँ भी कहीं आस-पास ही होगी। इतना कहते ही हमारी नज़र माँ गैंडे पर पड़ी जो अपने बच्चे का पीछा करते हुए आ रही थी। गैंडे का बच्चा खुशी-खुशी वहाँ खेल रहा था और उसकी माँ आस-पास रहकर उसपर कड़ी नज़र रखे हुई थी। एक बार तो उसने पलटकर हमारी ओर देखा, लेकिन शायद हमारी तरफ से उसे किसी प्रकार की शंका का कारण नहीं लगा और वह अपनी गतिविधियों में मग्न हो गयी। कुछ देर बाद गैंडे का बच्चा उस लंबी सी घास में कहीं गायब हो गया और उसकी माँ भी उसके पीछे चली गयी। कुछ ही पलों में वहाँ पर उनकी कोई हलचल नहीं थी।

जंगली भैंसा - काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान
जंगली भैंसा – काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान

आगे जाकर हमे एक और गैंडा दिखा जो सो रहा था। उसके थोड़ा नजदीक पहुँचकर हमारे गाइड ने हल्की सी आवाज से उसे जगा दिया। वह गैंडा आलस भरते हुए जाग गया और अपने आस-पास देखकर वापस सो गया। इन गैंडों की खाल देखकर मुझे लगा जैसे उन्होंने कोई कसा हुआ चमड़े का जैकेट पहन रखा हो। उनके संधि स्थलों पर नज़र आनेवाली सिलवटों भरी खाल के कारण ही देखनेवाले को ऐसा प्रतीत होता है।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में शायद उस दिन माँ और बच्चों का दिन था। माँ गैंडा और उसके बच्चे के बाद हमारी मुलाक़ात सिर्फ 28 दिनों के हाथी के बच्चे से हुई जो अपनी माँ के साथ खेल रहा था।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में पहरे की मीनारें     

इस उद्यान में जल स्रोतों के आस-पास कुछ पहरे की मीनारें बनवाई गयी हैं, जहाँ से आप आस-पास के सुंदर नज़रों का आनंद उठा सकते है। इसी के साथ इस ऊंचाई से आप यहाँ की हाथी घास में छिपे बैठे जानवरों को भी देख सकते हैं, तथा उनकी अन्य गतिविधियों का भी अवलोकन कर सकते हैं। जैसे कि, आप उन्हें तालाब के उस पार स्नान करते हुए, यहाँ-वहाँ टहलते हुए, अपने साथियों के साथ खेलते हुए, या फिर ऐसे ही बेफिक्र घूमते हुए देख सकते हैं।

जिस मीनार पर हम खड़े थे उसके नीचे स्थित तालाब में हमने बड़ी-बड़ी मछलियाँ देखी, जो पल में ऊपर आकर फिर से पानी में लुप्त हो जाती थीं। उनकी इस चंचल गति के कारण हम ठीक से उनकी तस्वीरें भी नहीं ले पाये। इसके अतिरिक्त हमने वहाँ पर बहुत सारे रंगबिरंगी और सुंदर पक्षी देखे जो हमारे चारों ओर उड़ रहे थे। यहाँ पर बिताए हुए इन पलों ने जैसे हमारी इस उद्यान सफारी के अनुभव को पूर्ण कर दिया था।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की पशुसंख्या   
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की पशु संख्या
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की पशु संख्या

इस उद्यान में वन विभाग द्वारा एक सूचना फ़लक लगवाया गया है, जिस पर यहाँ की पशुसंख्या संबंधी जानकारी दी गयी है। इस फ़लक पर साफ-साफ लिखा गया था कि इस उद्यान में एक सींग वाले गैंडों और अन्य जानवरों की आबादी काफी वृद्धि कर रही है। यद्यपि बाघों की संख्या के बारे में उनके आंकड़े कुछ अस्पष्ट से थे। हमारे गाइड ने हमे बताया कि, संचार माध्यमों में जैसे कि बाघों की संख्या 1411 बतायी जाती है, असल में वह उससे कई ज्यादा है।

अवैध शिकार आज भी यहाँ के वन विभाग का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। हमे बताया गया था कि हर समय इस उद्यान में कोई ना कोई, कहीं ना कहीं छिपा हुआ मिल ही जाता है, जो गैंडों के शिकार के इंतजार में होते हैं। असल में ये लोग इन गैंडों को उनके सींग के लिए मारना चाहते हैं। इन सींगों की सीमित उपलब्धि के कारण उन्हें बहुत ही विशेष माना जाता है और ऐसे किसी के पास यह विशेष वस्तु होना अपने-आप में बहुत बड़ी बात है। शायद यह सींग किसी प्रकार की तांत्रिक विद्या में भी इस्तेमाल किया जाता है। ये विशेषताएँ इस सींग को इतना कीमती बनाती हैं कि उसके लिए शिकारी अपनी जान पर भी खेलने के लिए तैयार होते हैं। इसी प्रकार हाथी के दांतों की भी यही कहानी है।

इत्तेफाक से हमे वहाँ पर दंतोंवाला एक भी हाथी नहीं दिखा। क्या हो सकता है कि इन सभी हाथियों के दांत काट दिये गए हों?

संजातीय गाँव   
लोहे सीमेंट से बना संजातीय गाँव
लोहे सीमेंट से बना संजातीय गाँव

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के कोहोरा क्षेत्र में एक कृत्रिम संजातीय गाँव का निर्माण किया गया है, जहाँ पर पर्यटन विभाग द्वारा उत्तर पूर्वीय भारत की विविध जनजातियों के घरों के प्रतिरूप बनवाने की कोशिश की गयी है। दुर्भाग्यवश, स्थानीय लोगों ने जहाँ अपने घर बांस जैसे प्रकृतिक वस्तुओं से बनवाए हैं, वहीं यहाँ पर सबकुछ सीमेंट का बनवाया गया है। यहाँ तक कि बांस की प्रतिकृतियाँ भी सीमेंट की बनवाई गयी हैं। इसके अतिरिक्त, वहाँ पर आदिवासी जनजातियों के दैनिक जीवन को दर्शानेवाले बड़े-बड़े चित्र भी बनवाए गए हैं। इस प्रकार ग्रामीण जीवन को कृत्रिम रूप में प्रदर्शित करना आज एक प्रवृत्ति सी बन गयी है, जो देश में हर जगह देखा जा सकता है। प्रत्यक्ष गांवों को छोड़कर कृत्रिम गांवों का यह निर्माण मुझे कुछ खास पसंद नहीं हैं।

आदिवासी गाँव - असम
आदिवासी गाँव – असम

पता नहीं इसकी प्रभावशीलता पर कोई ध्यान देता भी हैं या ये सारे लोग बस इस तेजी से फैलती मानसिकता का भाग बनते जा रहे हैं। इस कृत्रिम गाँव में हमे कोई भी नहीं दिखा, हम बस ऐसे ही चीजों को देखते हुए वहाँ पर घूमते रहे और फिर वापस अपने होटल लौट गए। यहाँ पर घूमते हुए आप आस-पास बहुत सारे चाय बागान देख सकते हैं, जो आपके लिए सुंदर दृश्य प्रदान करते हैं।

जीप सफारी  

अगर आप कभी इस उद्यान के दर्शन करने गए तो वहाँ के जंगलों में घूमने के लिए जीप सफारी का चुनाव ही सबसे बढ़िया रहेगा। इस प्रकार आप वहाँ के जानवरों को नजदीक से देख सकते हैं। आप चाहे तो यहाँ पर हाथी की सवारी भी कर सकते हैं। इस राष्ट्रीय उद्यान के आस-पास फैले गार्हस्थ्य प्रबंध, जो सड़क के उस पार बसा हुआ है, को आप चाहने पर ही अनदेखा नहीं कर सकते। वहाँ पर बड़े-बड़े और महंगे आश्रय घर और बैकपैकर के मांद हैं।

इस उद्यान में उपलब्ध जीप सेवा सिर्फ पर्यटन के मौसम में ही कार्यरत होती हैं, जो पर्यटकों को इस उद्यान की पूरी सैर करवाते हैं। इसके अलावा यहाँ पर स्मारिका दुकानें भी हैं जो बांस की बनी विविध प्रकार की स्थानीय वस्तुएं बेचते हैं। यद्यपि एन मौके पर आयोजित यात्राओं की बढ़ती प्रवृत्ति ने अभी तक यहाँ दस्तक नहीं दी है, लेकिन यहाँ पर कुछ गाइड ऐसे हैं जिन्हें इस जंगल के रास्तों और वहाँ के जानवरों की थोड़ी बहुत जानकारी है जो आनेवाले आगंतुकों का भली-भांति मार्गदर्शन कर सकते हैं। और देखा जाए तो यहाँ का वन विभाग भी अपनी सेवाएँ प्रदान करने में काफी तत्पर है।

इस उद्यान की सैर करते हुए तथा वहाँ के जानवरों को देखते हुए आपको बहुत गर्व सा महसूस होता है कि ये जानवर इस उद्यान के आस-पास रहने वाले बहुत से लोगों की रोजी-रोटी का स्रोत हैं। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान एक बहुत ही खूबसूरत और शांत सी जगह है। जब मैं यह ब्लॉग लिख रही थी तो मेरे मन में बार-बार वहाँ की लंबी-लंबी हाथी घास के चित्र घूम रहे थे।

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