ऐतिहासिक पावागढ़ पहाड़ी – गुजरात की यूनेस्को विश्व धरोहर

4
3452
पावागढ़ पहाड़ी चढ़ने का पैदल मार्ग
पावागढ़ पहाड़ी चढ़ने का पैदल मार्ग

चंपानेर एवं पावागढ़ पहाड़ी, ये दो शब्द मैंने सदैव एक साथ सुने थे। भारत में यूनेस्को द्वारा घोषित बहुत कम विश्व धरोहर स्थल बचे थे जिनके दर्शन मैंने अब तक नहीं किये थे। पावागढ़ उनमें से एक था। मुख्यतः इसी कारणवश मैंने गुजरात यात्रा की योजना बनायी और पावागढ़ एवं हाल ही में विश्व विरासती स्थलों की सूची में समाविष्ट रानी की वाव के दर्शन करने का निश्चय किया। वड़ोदरा से ४५कि.मी. दूर स्थित पावागढ़ पहाड़ी पर पहुँचने के पश्चात मैंने जाना कि इस पहाड़ी की तलहटी में स्थित गाँव ही चंपानेर है। इस पहाड़ी के चारों ओर जगह जगह स्मारक बने हुए हैं। उसी तरह इसकी चोटी एवं तलहटी पर भी अनेक स्मारक बने हुए हैं। इस स्थान से सम्बंधित कई भ्रांतियां, किवदंतियां एवं कहानियां पढ़ने एवं सुनने में आती हैं। जितने स्त्रोत उतनी कहानियां!

पावागढ़ पहाड़ी

पावागढ़ पहाड़ी पे बिखरे समारक
पावागढ़ पहाड़ी पे बिखरे समारक

पावागढ़ पहाड़ी के निकट पहुँचने के पश्चात लगभग सभी लोगों ने हमें सलाह दी कि हम तलहटी स्थित गाँव के दर्शन से पूर्व, पावागढ़ पहाड़ी चढ़ें। हमने उनकी सलाह मानना उचित समझा। परन्तु पहाड़ी की तलहटी पर पहुँचने के पश्चात एक छोटा सा विघ्न उत्पन्न हो गया। नवरात्री उत्सव के चलते, मोटर गाड़ियों को आगे जाने की मनाही थी। इस कारण कई यात्री पैदल ही पहाड़ी चढ़ कर ऊपर स्थित मंदिर पहुँच रहे थे।

हालांकि वहां गुजरात राज्य परिवहन की कई बसें उपलब्ध थीं जो पहाड़ी पर माछी नामक स्थान तक यात्रियों को ले जा रही थी। माछी से पहाड़ी के ऊपर पहुँचने हेतु ‘रोप वे’ अर्थात् रस्सी पर उड़न खटोले की सुविधा भी उपलब्ध थी। रोप वे से उतरने के पश्चात, लगभग २५० सीढ़ियाँ और चढ़नी पड़ती हैं। तब जाकर मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुँचते हैं।

पावागढ़ का उड़न खटोला

पावागढ़ पहाड़ी के ताल
पावागढ़ पहाड़ी के ताल

माछी पहुंचने के पश्चात, पहाड़ी की चोटी तक पहुँचने हेतु दो विकल्प हमारे समक्ष प्रस्तुत थे। एक विकल्प था रोप वे, अर्थात् उड़न खटोला जो ६ मिनट में ऊंची चढ़ाई पार कर लगभग चोटी तक पहुंचाती थी। दूसरा विकल्प था पहाड़ी चढ़ने का पुराना मार्ग जो पहाड़ी के चक्कर काटते हुए, कई मानव निर्मित स्मारकों के बीच से होते हुए, चोटी तक पहुंचाता था। मानव सभ्यता के विभिन्न युगों को दर्शाते इन स्मारकों के बीच से जाते हुए चोटी तक पहुँचने में १ से २ घंटों का समय लग सकता है। यह आपके चलने की क्षमता पर निर्भर है। जैसे जैसे आप पहाड़ी पर चढ़ेंगे, कई तालाबों एवं झीलों से भरी यह हरी भरी पहाड़ी आपके समक्ष अपनी सुन्दरता शनैः शनैः उजागर करती है।

हमने उड़न खटोले से ऊपर जाने का निर्णय किया।

पावागढ़ पहाड़ी की चढ़ाई

उड़न खटोले से उतर कर, २५० सीढ़ियाँ चढ़ कर पावागढ़ पहाड़ी की चोटी पर स्थित कालिका माता के मंदिर पहुंचा जाता है। जैसे जैसे सीढ़ियाँ चढ़ते हम मंदिर के समीप पहुँच रहे थे, पहाड़ी धीरे धीरे और संकरी होती जा रही थी। प्राचीन उत्कीर्णित शिलाखंडों से सीढ़ियों को अलंकृत किया गया था। कुछ शिलाखंडों पर लगे सिंदूर के चिन्ह इस तथ्य का द्योतक थे कि किसी काल में इन्हें पूजा जाता था। परन्तु सीढ़ियाँ अनियमितता से जड़ी होने के कारण चढ़ाई बहुत भयावह थी। पाँव जरा फिसला कि नीचे भगदड़ मचने की पूर्ण संभावना थी। परन्तु थोड़ी थोड़ी देर में जब हम रुक कर पीछे देखते तो वहां का दृश्य सारा भय भुला देता था। ऊपर से नीचे का दृश्य बहुत मनभावन दिखाई पढ़ रहा था। सीढ़ियों के प्रत्येक मोड़ पर नीचे का परिदृश्य बदल रहा था।

पावागढ़ पहाड़ी पर कालिका माता मंदिर

पावागढ़ पहाड़ी पे कालिका माता का मंदिर
पावागढ़ पहाड़ी पे कालिका माता का मंदिर

पावागढ़ पहाड़ी की चोटी पर स्थित कालिका माता मंदिर १००० वर्षों से भी अधिक प्राचीन है। इसे देश में स्थित ५१ शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पुराणों के अनुसार पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित हुई देवी सती ने जब अपने प्राण त्याग दिए थे, तब भगवान् शिव ने उनके मृत देह को उठाकर तांडव नृत्य किया था। तब भगवान् विष्णु ने अपने चक्र से देवी के शारीर के टुकड़े किये थे। जहां जहां देवी सती के अंग गिरे, वहां वहां शक्तिपीठ बन गए। ऐसा माना जाता है कि पावागढ़ में देवी माँ का अंगूठा गिरा था।

पावागढ़ के छोटे से मंदिर में ३ देवियों की प्रतिमाएं थीं जिनके दर्शन हेतु भिन्न भिन्न पंथ के भक्तों का तांता लगा हुआ था। कुछ स्त्रियाँ हाथों में तलवार उठाये, शरीर में देवी के अवतरण का प्रदर्शन करती आ रही थीं। लोग अनायास ही उन्हें रास्ता दे रहे थे। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ मानो लम्बी कतार से बचने हेतु कुछ स्त्रियाँ देवी के अवतरण का स्वांग रच रही थीं। मैंने उनमें से एक स्त्री का हाथ पकड़ कर उनकी इस अवस्था के विषय में पूछा। इस पर वह अपनी बगलें झांकती आगे बढ़ गयी।

हालांकि मंदिर छोटा सा था, लोगों की श्रद्धा से इसकी महानता का अनुमान लगाया जा सकता था। मंदिर में बलिवेदी भी थी परन्तु वर्तमान में बलि प्रथा के विद्यमान होने के कोई संकेत मुझे दृष्टिगोचर नहीं हुए।

पावागढ़ के प्राचीन जैन मंदिर

पावागढ़ के प्राचीन मंदिर और ताल
पावागढ़ के प्राचीन मंदिर और ताल

कालिका माता मंदिर के चरणों में कई जैन मंदिर भी स्थापित हैं। ऊपरी स्तर पर देखने से ये ४०० से ५०० वर्ष प्राचीन प्रतीत होते हैं। इन्ही में से एक मंदिर के पंडित से हमने चर्चा की। उन्होंने हमें इस स्थान से सम्बंधित कुछ कथाएं सुनाई। परन्तु हम उन पर सहसा विश्वास नहीं कर पाए। अतः हमने स्वयं ही कुछ खोजबीन करने का निश्चय किया।

जैन भक्तों का मानना है कि पावागढ़ पहाड़ी किसी काल में जैन मंदिरों से परिपूर्ण था। परन्तु कालान्तर में मुसलमान शासकों ने इस स्थान पर कब्ज़ा कर चंपानेर में अपनी राजधानी बनायी। उन्होंने यहाँ कई मस्जिद भी बनवाये। कुछ अन्य आलेखों के अनुसार भील एवं राठवा जैसी जनजातियाँ यहाँ निवास करती थीं। ये जनजातियाँ शक्ति की उपासक थीं। माता का मंदिर भी इन्ही का था। ये सब प्राचीन कालीन तथ्य हैं एवं इनकी प्रामाणिकता का कोई सबूत हमें नहीं मिला। तथापि यह महत्वपूर्ण नहीं है। तत्व यह है कि यह एक प्राचीन प्रार्थना स्थल है एवं करोड़ों भक्त इसे एक जाग्रत प्रार्थना स्थल मानते हैं।

पावागढ़ पहाड़ी के तालाब

पावागढ़ पहाड़ी पे भक्तगण
पावागढ़ पहाड़ी पे भक्तगण

पावागढ़ पहाड़ी के दोनों तरफ स्थित तालाब, पहाड़ी की चोटी से अत्यंत मनमोहक प्रतीत होते हैं। परन्तु उनके समीप पहुँचने पर एक तथ्य मन को कचोटता है। वह यह कि हम अपने मंदिरों के कुंडों एवं तालाबों को स्वच्छ रखने हेतु अधिक कुछ नहीं कर रहे हैं। इन दो तालाबों की स्वच्छता में भी वृद्धि आवश्यक थी। यह हमारा एवं प्रशासन, दोनों का ही दायित्व है।

मंदिर की ओर जाते पथ के दोनों ओर कई दुकानें थीं जहां विक्रेता देवी को अर्पण हेतु पूजा सामग्री विक्री कर रहे थे। यहाँ कई दुकानों में यात्रियों एवं पर्यटकों द्वारा साथ ले जाने हेतु स्मारिकायें भी बिक रही थीं। चित्र खींचने हेतु सुविधाएं भी थीं जहां पहाड़ी के चित्र की पृष्ठभूमि में आप चित्र खिंचवा सकते हैं।

इस पावागढ़ पहाड़ी की सुन्दरता एवं आध्यात्मिकता का अनुभव लेने का सर्वोत्तम तरीका है इस पहाड़ी पर, तल से शीर्ष तक, पैदल चढ़ाई करना। तथापि इस हेतु प्रचुर धैर्य एवं सहनशीलता की आवश्यकता है। तथापि हम बस द्वारा पहाड़ी की तलहटी तक एवं उड़नखटोले द्वारा मंदिर के समीप पहुंचे थे। तत्पश्चात शेष यात्रा पैदल पूर्ण की थी। इन सुविधाओं के उपयोग के पश्चात भी हमारी यात्रा में अर्धांश दिवस व्यतीत हो गया।

गुजरात के अन्य पर्यटन स्थलों की यात्रा हेतु मेरे संस्मरण पढ़ें:-

1. मोढेरा सूर्य मंदिर – अद्वितीय वास्तुशिल्प

2. रानी की वाव – एक रानी की विरासत

3. अहमदाबाद के ६ देखने लायक संग्रहालय

4. दाभोई के उत्कीर्णित द्वार

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

4 COMMENTS

  1. I went twice to this place in different seasons. Winter is best.. for normal turist but for advanture rainy season is fatastic. .. Disciption of place in your blog tempt me to go again and visit few more places like lake and Jain mandir. Very nicely discibed blog. Thx

    • धन्यवाद तेजस. फिर से जाईये और देखिये उन सब झीलों मंदिरों को अपनी कहानियां सुनाने को उत्सुक बैठे हैं.

  2. भारत में यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहरों में पावागढ भी सम्मिलित है तथा पहाडी की चोटी पर स्थित कालिका माता का मंदिर लगभग १००० वर्षो से अधिक प्राचीन है यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ. आलेख पढकर सुरम्य प्राकृतिक सौन्दर्य से आच्छादित इस विश्व धरोहर को प्रत्यक्ष निहारने की इच्छा बलवत्तर हुई. सुंदर चित्रों एवम् प्रभावी रूप में अनुवादित प्रस्तुति हेतू धन्यवाद !

    • प्रदीप जी – बहुत लोग इस प्राचीन मंदिर और पहाड़ी को नहीं जानते – जबकि यह एक विश्व धरोहर है. आशा करते हैं की आपको शीघ्र ही कालिका माँ के दर्शन का संयोग प्राप्त हो.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here