पूर्व-पुर्तगाली गोवा पर श्री प्रजल साखरदांडे से एक चर्चा

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अनुराधा – डीटूर्स में आज हमारे साथ चर्चा कर रहे हैं, प्रा. प्रजल साखरदांडे। प्रा. प्रजल साखरदांडे गोवा के धेम्पे कला एवं विज्ञान विद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक हैं। वे “Goa Heritage Action Group” के उपाध्यक्ष भी हैं। “Goa Heritage Action Group” गोवा की विरासतों के संरक्षण एवं परिरक्षण कार्य की ओर अग्रसर है। प्रा. प्रजल गोवा पर सर्वाधिक प्रामाणिक रूप से लिखे गए साहित्यों में से एक के लेखक भी हैं जो एक पुस्तक के रूप में है। Goa Gold Goa Silver नामक इस पुस्तक में गोवा पर उनके दो दशकों के शोध कार्य का संकलन है। आईये पूर्व-पुर्तगाली गोवा तथा गोवा से सम्बंधित अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों पर उनके शोध के विषय में जानने का प्रयास करते हैं।

प्रा. प्रजल – नमस्कार अनुराधाजी। मेरा परिचय देने के लिए धन्यवाद। जी हाँ, “Goa Gold Goa Silver Her History Her Heritage from Earliest times to 2019” नामक मेरी पुस्तक का कुछ दिनों पूर्व ही विमोचन हुआ है। यह पुस्तक तीन भागों में विभाजित है, पुर्तगाली गोवा, पूर्व-पुर्तगाली गोवा तथा मुक्ति पश्चात गोवा।

पूर्व-पुर्तगाली गोवा के अज्ञात तथ्य

अनुराधा – पुर्तगालियों द्वारा अधिग्रहण के पश्चात के गोवा के विषय में हम बहुत कुछ जानते हैं। किन्तु प्राचीन गोवा अथवा पूर्व-पुर्तगाली गोवा के विषय में हमारी जानकारी न्यूनतम है। स्कन्द पुराण के सह्याद्री खंड एवं महाभारत में गोवा का उल्लेख प्राप्त होता है। महालसा नारायणी का उल्लेख भी अनेक शास्त्रों में किया गया है किन्तु अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। मैं जानना चाहती हूँ कि गोवा का कितने समय पूर्व का इतिहास उपलब्ध है?

प्रा. प्रजल –  जब हम पूर्व-पुर्तगाली गोवा के इतिहास की चर्चा करें तो हमें भूवैज्ञानिक समय-मापक्रम की सहायता लेनी पड़ेगी। हमें उस काल में जाना पडेगा जब गोवा का निर्माण हुआ था, जिससे परशुराम की दंतकथा भी जुड़ी हुई है। है। अर्थात् हम ट्रांजेमाईट नाईस(Trondjemeitic Gneiss) शिस्ट(Schist ) शैलसमूहों की चर्चा कर रहे हैं। परशुराम, जिन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है, वे अपने साथ ९६ सारस्वत परिवारों को लेकर सह्याद्री आये थे तथा उन्हें वहां बसाना चाहते थे। उस समय गोवा नामक कोई स्थान नहीं था। सह्याद्री की तलहटी तक समुद्र का जल था। अतः उन्होंने अरम्बोल से समुद्र की ओर तीर भेद कर समुद्र को पीछे जाने की आज्ञा दी। वह तीर जहां गिरा उसे बाण-हल्ली कहा गया जो कालांतर में बाणावली हो गया। परशुराम की आज्ञा पाकर समुद्र पीछे हटा जिससे गोमान्तक की भूमि या गोवा की उत्पत्ति हुई। यह हुई चर्चा गोवा की उत्पत्ति से सम्बंधित पौराणिक दंतकथा की।

गोवा के आदिवासी समुदाय

सारस्वत समुदाय ने सदा इस तथ्य की वैद्यता सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि उन्होंने ही गोवा की रचना की है। यहाँ हम एक सत्य भूल रहे हैं कि सारस्वत समुदाय के आने से पूर्व यहाँ अनेक आदिवासी समुदाय निवास करते थे, जैसे गौडा, कुनबी, वेलिप, खारवी इत्यादि, जिन्होंने गाँवकरी पद्धति अर्थात् ग्राम समुदाय की स्थापना की थी। इसके लिए हमें इतिहास में सहस्त्रों वर्ष पूर्व जाने की आवश्यकता है। कुशावती नदी के तट पर प्राप्त पन्सोइमल शैलचित्र इस तथ्य का प्रमाण हैं। इन शिलाओं पर उत्कीर्णन ऐसे ही किसी आदिवासी समुदाय ने किया होगा। अतः गोवा अत्यंत प्राचीन है। पर्यटन विभाग द्वारा प्रसारित सीमित तथ्यों से गोवा की काल्पनिक छवि यह निर्मित होती है कि गोवा अब भी पुर्तगाली एवं इसाई है, यहाँ कोई भी हिन्दू नहीं है इत्यादि।

आपके संस्करण के माध्यम से मैं यह कहना चाहता हूँ कि गोवा पूर्णतः भारतीय है। भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक, सभी रूपों से गोवा प्राचीन काल से भारत का भाग है। पुर्तागाली गोवा में सन १५१० से १९६१ तक थे। अधिकारिक रूप से उन्होंने सम्पूर्ण गोवा पर राज भी नहीं किया था। गोवा से बाहर के लोगों की कल्पना है कि गोवा पूर्णतः इसाई है। यह सत्य नहीं है। लोगों ने ऐसी असत्य धरणा बना ली है।

पन्सोइमल शैलचित्र – पूर्व-पुर्तगाली गोवा

अनुराधा – आपने पन्सोइमल शैलचित्र का उल्लेख किया। यहाँ पर एक विशाल लेबिरिन्थ अथवा भ्रमिका उत्कीर्णित है। मैंने कहीं पढ़ा था कि यह विश्व की प्राचीनतम ज्ञात भ्रमिका है। इस विषय में आपका तर्क क्या है?

प्रा. प्रजल – मैं नहीं जानता कि यह विश्व की प्राचीनतम भ्रमिका है अथवा नहीं, किन्तु यह भ्रमिका अत्यंत रोचक है। इसके संबध में अनेक मत व्यक्त किये गए हैं। एक मत के अनुसार शामानी धर्म अथवा जीववादी धर्म के आदिवासियों द्वारा बनाए गए सकेंद्रित वृत्त ब्रह्माण्ड को दर्शाते हैं। वे इसका सम्बन्ध खगोलीय स्थितियों से जोड़ते थे। इसका सम्बन्ध विज्ञान, कुण्डलिनी तथा पंचांग इत्यादि से भी जोड़ते थे। मेरे मतानुसार इसे समझना आसान नहीं है। मैंने कनाडा तथा वाशिंगटन के संग्रहालयों में भी इसी प्रकार की भ्रमिकाएं देखी हैं। सम्पूर्ण विश्व भर में ऐसी भ्रमिकाएं हैं। पन्सोइमल का यह शैलचित्र गोवा के प्राचीनतम शैलचित्रों में से एक हो सकता है।

गुफाएं एवं तलघर

पूर्व-पुर्तगाली गोवा
पूर्व-पुर्तगाली गोवा

अनुराधा – कदाचित आकाशीय अध्ययन के लिए यह एक प्राचीन वेधशाला हो सकती है। यदि हम कालक्रम में कुछ आगे बढ़ें तो गोवा में क्या देखेंगे?

प्रा. प्रजल – हम गोवा में अनेक गुफाएं देखेंगे, जैसे चिखली में तीन भूमिगत तलघर हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सदस्यों के साथ हमने भी उनका सर्वेक्षण किया था। १९६५ में जर्मनी की एक महिला, ग्रीट्ली मिट्टर वार्नर, ने इन गुफाओं की खोज की थी। उन्हें वहां मिट्टी के पात्रों के अंश मिले थे जो उन गुफाओं में मानव जीवन की ओर संकेत करते हैं। यह जुआरी नदी के किनारे स्थित है। जुआरी, मांडवी, कुशावती इत्यादि गोवा की नदियों के तीर आप इस प्रकार के शैलचित्र तथा गुफाएं देख सकते हैं। यहाँ समुद्री जीवाश्म भी दिख जाते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि गोवा अत्यंत प्राचीन स्थल है।

नदी घाटी सभ्यता

अनुराधा –  जी हाँ गोवा की धरोहर अत्यंत प्राचीन है। समय चक्र में कुछ और आगे बढ़ते हैं। मैं जानना चाहती हूँ कि गोवा में कौन सी ज्ञात सभ्यता सर्वप्रथम अस्तित्व में आयी।

प्रा. प्रजल – जब इस क्षेत्र में मानवी वसाहत का आरम्भ हुआ तब यहाँ म्हादेई नदी घाटी सभ्यता, कुशावती नदी घाटी सभ्यता तथा जुआरी नदी घाटी सभ्यता अस्तित्व में आयीं। लोग नदी के किनारे बसने लगे। इसके पश्चात गाँवकरी प्रणाली की स्थापना हुई। तत्पश्चात राजवंश चरण का आगमन हुआ। गोवा के इतिहास में राजवंश का सर्वप्रथम ऐतिहासिक प्रमाण राजा देवराज भोज हैं। ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार राजा देवराज भोज गोवा के प्रथम राजा थे जिन्होंने ४ई. से ७ई. के मध्य गोवा पर राज किया था। अतः ४थी से ६वीं शताब्दी तक भोज राजवंश ने राज किया। तत्पश्चात ७वीं शताब्दी में कोंकण मौर्य तथा बादामी चालुक्य राजाओं ने शासन किया था।

गोवा की प्रथम महारानी कर्णाटक की विजय भट्टारिका थीं जो पुलकेशिन द्वितीय की पुत्रवधू थीं। पुलकेशिन द्वितीय दक्षिण के सम्राट थे जिन्होंने उत्तरी भारत के राजा हर्षवर्धन को परास्त किया था। उसके पश्चात गोवा पर महाराष्ट्र के शिलाहार वंश, कर्णाटक के कदंब वंश, बाहमानियों, आदिल शाह, तत्पश्चात पुर्तगालियों ने अधिपत्य स्थापित किया।

गोवा के शासक – पूर्व-पुर्तगाली गोवा

अनुराधा –  इन शासकों में से सबसे लम्बे काल तक किसने शासन किया था?

प्रा. प्रजल – ९०६ ई. से १३५६ ई. तक का कदंब काल दीर्घतम काल था। इस काल को संस्कृति का स्वर्णिम काल कहा जाता है। ताम्बडी सुर्ला में महादेव का शैल मंदिर एक अप्रतिम मंदिर है जो कदंब काल में निर्मित अनेक शैल मंदिरों में से इकलौता जीवित मंदिर है। गोवा के पर्यटकों को इस मंदिर के दर्शन अवश्य करना चाहिए। गोवा में कदंब काल के अन्य मंदिर भी हैं। जैसे कुर्डी गाँव में कदंब वंश के संस्थापक राजा सष्टदेव प्रथम द्वारा निर्मित एक महादेव मंदिर था जिसे अब सालावाली बाँध के समीप स्थानांतरित किया गया है। राजा नारायणदेव ने भी अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया था। सप्तकोटेश्वर उनके कुलदेवता थे।

कदंब शासकों ने, विशेषरूप से महारानी कमला देवी ने, शिक्षण को बढ़ावा दिया था। उन्होंने ब्रह्मपुरी एवं अग्रहार जैसे शिक्षण संस्थानों को अपने निरिक्षण में लिया था। अनेक मंदिरों को संरक्षण दिया था। अतः, गोवा में कदंब काल की अनेक विरासतें हैं।

अनुराधा –  कदंब काल की विरासतें अब भी जीवित हैं। यहाँ तक कि गोवा राज्य परिवहन का नाम भी उसी वंश से सम्बंधित है।

प्रा. प्रजल – जी हाँ। हमारे राज्य परिवहन का नाम भी कदंब परिवहन निगम है जिसका आरम्भ १९८० में हुआ था। इसे कदंबा बस कहा जाता है तथा कदंब वंश का राजचिन्ह, सिंह ही निगम के चिन्ह के रूप में बसों पर चित्रित है।

सप्तकोटेश्वर मंदिर – पूर्व-पुर्तगाली गोवा

अनुराधा –  मैंने कुछ समय पूर्व ही दीवार द्वीप पर सप्तकोटेश्वर मंदिर के अवशेषों के दर्शन किये थे। उसके कुण्ड तथा १०८ लघु मंदिरों के अवशेषों को भी देखा था। वहां स्थित रिक्त आलों को देख ऐसा प्रतीत होता है कि किसी समय उनके भीतर मूर्तियाँ रही होंगी। उनके भीतर कौन सी मूर्तियाँ थीं? अब वह मूर्तियाँ कहाँ है?

प्रा. प्रजल – दीवार द्वीप पर स्थित सप्तकोटेश्वर मंदिर का जलकुंड अत्यंत सुन्दर है। दीवार द्वीप को दीपों का द्वीप अथवा द्वीप वाटिका या दीपावाटी कहा जाता था। इसे देववाडी भी कहा जाता था जिसका अर्थ है देवों का वाड़ा। यहाँ सप्तकोटेश्वर मंदिर का निर्माण १२वीं सदी में कदंब राजाओं ने करवाया था। कालांतर में इस मंदिर ने अनेक अत्याचार सहे। बाहमानियों ने इसे नष्ट किया, जिसके पश्चात विजयनगर सम्राटों ने इसका पुनर्निर्माण कराया। १५४१ में इसे पुनः पुर्तगालियों ने ध्वस्त किया। इसके शिवलिंग को सुरक्षित नदी के उस पार, नार्वें में ले जाया गया। तत्पश्चात १६६८ में शिवाजी महाराज ने नार्वें में ही मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। यह मंदिर अब भी गर्व से अपनी विजय-गाथा कह रहा है। इसे एक तीर्थ माना जाता है। अतः कदंब शासकों द्वारा गोवा में स्थापित सप्तकोटेश्वर मंदिर गोवावासियों को अत्यंत प्रिय है।

मूर्तियाँ

अनुराधा –  मंदिर के जलकुंड के रिक्त आलों के भीतर कौन सी मूर्तियाँ थीं? अब वे मूर्तियाँ कहाँ हैं? क्या आपके पास इस विषय में कोई जानकारी है?

प्रा. प्रजल – उन मूर्तियों के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। केवल लिंग के विषय में ज्ञात है। पुर्तगाली उस लिंग का प्रयोग कपड़े धोने के लिए करते थे। इसके पश्चात इस लिंग को एक लघु गुफा मंदिर में स्थानांतरित कर दिया गया। किन्तु आलों के भीतर की मूर्तियों के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है। कदाचित उस क्षेत्र के अधिक उत्खनन से हमें यह जानकारी प्राप्त हो सकती है।

अनुराधा –  इस प्रकार की घटनाओं के पश्चात भारत की अनेक मूर्तियाँ किसी ना किसी संग्रहालय पहुँच जाती हैं। जब मैं इस मंदिर के विषय में संस्करण लिख रही थी तब मैंने अनेक गोवावासियों से इस विषय में जानने का प्रयास भी किया था, किन्तु किसी को भी इसकी जानकारी नहीं है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

प्रा. प्रजल – जी, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। सप्तकोटेश्वर मंदिर के विषय में एक तथ्य आपको बताना चाहता हूँ. इसे दक्षिण कोंकण काशी भी कहा जाता है। स्थानीय लोग इसे एक तीर्थ मानते हैं। पुर्तगालियों से पूर्व, लोगों का मानना था कि यदि आप किसी कारणवश काशी नहीं जा सकते तो आप सप्तकोटेश्वर के ही दर्शन कीजिये। आज भी इसे पोन्ने तीर्थ कहते हैं जिसका अर्थ है, प्राचीन तीर्थ।

गोवा के मंदिर – पूर्व-पुर्तगाली गोवा

अनुराधा –  प्रजल जी, हमें गोवा के अन्य प्राचीन मंदिरों के विषय में भी बताएं।

प्रा. प्रजल –  जी। विचुन्द्रें में नारायणदेव की एक सुन्दर प्रतिमा है। यह प्रतिमा कदंब शिलाहार काल की है तथा उनका मंदिर प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। इनके अतिरिक्त कुर्डी महादेव मंदिर, ताम्बडी सुर्ला महादेव मंदिर तथा ओपा खांडेपार सप्तकोटेश्वर मंदिर भी हैं। इस प्रकार गोवा के गाँवों में अनेक पुरातन मंदिर हैं जिनमें अनेक मंदिर पूर्व में गुफा मंदिर थे। हमने शिगाओ में, दूधसागर प्रपात की तल में, एक गुफा मंदिर देखा जहाँ बाघ की आराधना की जाती थी। शिगाओं में ही, दूधसागर नदी के तल में, एक शिला पर आदि गणपति की छाप भी देखी।

इनके अतिरिक्त, चंद्रेश्वर मंदिर है जहां भोज राजा पूजा-अर्चना करते थे। उन्होंने परोड़ा पर्वत पर चंद्रेश्वर को समर्पित एक गुफा मंदिर भी बनाया जिसे चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर कहते हैं। भूतनाथ आदिवासियों के मूल तांत्रिक आराध्य थे। इस प्रकार के अनेक मंदिर आप गोवा में देख सकते हैं। इसीलिए मैं पुनः यह कहना चाहता हूँ कि गोवा के विषय में लोगों की जो समझ है कि यहाँ कोई हिन्दू नहीं है, कोई मंदिर नहीं है, यह कदापि सत्य नहीं है। इस साक्षात्कार के माध्यम से मैं भारत की जनता को यह सूचना देना चाहता हूँ कि गोवा का एक दूसरा आयाम भी है जो लोगों की समझ से पूर्णतः विपरीत है।

पुस्तक का मुखपृष्ठ

अनुराधा –  प्रजलजी, आपकी पुस्तक के बाह्य मुखपृष्ठ पर एक सुन्दर चित्र है। इसे देखकर यह कोई पहेली प्रतीत होती है। क्या आप बताएँगे कि वह क्या है?

प्रा. प्रजल – जी। २९ मई २००८ का दिन था जब मैं नार्वें गया था। मुझे वहां गाँव में कई अनूठी वस्तुएं प्राप्त हुईं। हम एक पहाड़ी पर गए जहां मुझे एक स्वस्तिक मिला। दो पट्टिकाएं थीं, एक स्वस्तिक पट्टिका तथा एक चौकोर खणों की पट्टिका जिसके मध्य में स्वस्तिक था।मैं नहीं जानता कि यह किसी भ्रमिका का भाग हैं अथवा किसी प्रकार की कुण्डलिनी इत्यादि का यन्त्र है। किन्तु मुझे चौकोर खणों की पट्टिका अत्यंत रोचक प्रतीत हुई। मैं उस पर मोहित हो गया। इसीलिए मैंने अपने पुस्तक के मुखपृष्ठ पर लगाने के लिए इसका चुनाव किया। वहां खंडहरों में एक छोटा मंदिर भी था जो स्लेटी शिला में निर्मित था। उस पर अधिक शोध की आवश्यकता है।

अनुराधा –  यह गोवा के बाहर से आया होगा क्योंकि गोवा में तो स्लेटी शिलाएं नहीं हैं।

प्रा. प्रजल – ये शिलाएं अनमोड़ घाट क्षेत्र से आयी हो सकती हैं अन्यथा यह कदंब काल की भी हो सकती हैं क्योंकि कदंब काल के मंदिरों में उन्होंने इसी प्रकार की शैलखटी शिलाओं का प्रयोग किया था जिन पर शिल्पकारी आसान होती है।

अनुराधा –  ये अपूर्ण प्रतीत होती हैं। इन्हें देख कर ऐसा आभास होता है मानो इन पर शिल्पकारी का कार्य अब भी जारी है।

प्रा. प्रजल – हो सकता है। इसके एक ओर स्वस्तिक भी है किन्तु मैंने उसे अपनी पुस्तक के मुखपृष्ठ का भाग नहीं बनाया ताकि मेरी पुस्तक को लोग हिन्दू विशेष पुस्तक ना माने। मेरी पुस्तक के मुखपृष्ठ पर अब धर्मनिरपेक्ष चित्र है।

गुफाएं एवं सुरंग

अनुराधा –  यह अत्यंत रोचक है क्योंकि इस चित्र को देखते ही मस्तिष्क में अनेक प्रश्न उभरते हैं तथा उनके उत्तर पाने की अभिलाषा प्रबल हो जाती है। प्रजल जी, आगे बढ़ते हुए मैं आपसे गोवा की गुफाओं के विषय में जानना चाहती हूँ। मैंने हर्वले गाँव में कुछ प्राचीन गुफाएं तथा दक्षिण गोवा में रिवोणा की गुफाएं देखीं थी। सप्तकोटेश्वर मंदिर के समीप भी कुछ जैन गुफाएं हैं जहाँ मैंने बाघ आराधना के चिन्ह देखे थे। ये सभी किस काल की हैं? इनका प्रयोग किसने किया था?

प्रा. प्रजल –  गोवा में हमने अनेक गुफाओं एवं सुरंगों को खोजा है। वेरणा में हमने एक भूमिगत सुरंग देखी है। यह सुरंग अत्यंत लम्बी थी जिसे हमने पूर्ण रूप से पार की है। चिखली में हमने अनेक गुफाएं एवं सुरंगे ढूँढी। इजोर्शी नामक गाँव में हमें एक भूमिगत गुफा भी मिली। एक ओर हमने गोवा के सर्वोच्च पर्वत शिखर पर प्राकृतिक गुफाएं देखी जहां हमने कुछ समय व्यतीत किया था, वहीं पर कुछ पुरापाषाण युग एवं उससे पूर्व काल की मानवी वसाहत की गुफाएं भी देखीं। कुछ गुफाएं जैन एवं बौद्ध भिक्षुओं की हैं। वहीं कुछ गुफाएं हिन्दू काल की हैं। इस प्रकार गोवा में अनेक प्रकार की गुफाएं हैं।

हर्वलें की गुफाएं

हिन्दू धर्म बौद्ध धर्म आने से पूर्व से ही अस्तित्व में था। किन्तु जहां तक हर्वलें गुफाओं का प्रश्न है, ये गुफाएं बौद्ध गुफाएं हो सकती हैं जिनके भीतर कालान्तर में शिवलिंग स्थापित किये गए हैं। किन्तु इनका कोई प्रमाण नहीं है। इन शिवलिंगों को भोज राजा कपालिवर्मन के युग का माना जाता है। एक शिलालेख में समीप स्थित उदकपाद जलप्रपात का उल्लेख किया गया है। इन शिवलिंगों को ६ठी शताब्दी में स्थापित किया गया है। इसका अर्थ है कि ये गुफाएं इससे पूर्व अस्तित्व में थीं।

गोवा की विभिन्न गुफाओं का भिन्न भिन्न प्रकार से प्रयोग किया जाता था। रिवोणा की गुफाओं में एक गुप्त कक्ष के भीतर एक मुनि आकर ध्यान में बैठते हैं। इस स्थान को ऋषिवन भी कहते हैं। थीवी में हमने एक गुफा को खोजकर उसका संरक्षण किया था। ये आवासीय गुफा थी। कालांतर में इसके भीतर शिवलिंग स्थापित किया गया था। बिचोली के लामगाँव में भी गुफाएं हैं। अतः आवास, ध्यान तथा अनेक अन्य प्रयोजनों के लिए इन गुफाओं का प्रयोग किया जाता था। ये सभी गुफाएं पुर्तगालियों से पूर्व की हैं।

गुफाओं के विषय में मुझे यह अत्यंत रोचक प्रतीत होता है कि आप किसी भी बुजुर्ग से किसी गुफा के सम्बन्ध में प्रश्न पूछें तो उनका एक आम उत्तर होता है कि ये गुफायें पांडवों ने बनाई हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार गोवा की सभी गुफाएं भी पांडव गुफाएं हैं। वे तो यह भी कहते हैं कि ताम्बडी सुर्ला का निर्माण कदंब वंश ने नहीं, अपितु पांडवों ने किया है। यह अनुभव आपने भी किया होगा।

अनुराधा –  जी। एक यात्री के रूप में मेरा यह अनुमान है कि ये प्राचीन गुफाएं यात्रियों के लिए बनाई जाती थीं ताकि वे विश्राम कर सकें, रात्रि व्यतीत कर सकें। यह शोध करना आवश्यक है कि क्या इन गुफाओं के मध्य की दूरी एक दिवस में पदयात्रा द्वारा पूर्ण की जा सकती है?

प्रा. प्रजल – जी।

मंदिरों के उत्सव

अनुराधा – भारत के मंदिरों के अत्यंत अनोखे उत्सव होते हैं। मुझे भिन्न भिन्न मंदिरों में जाना तथा उनके विषय में जानना अत्यंत भाता है। मैंने गोवा के अनेक मंदिरों के उत्सवों में भी भाग लिया है, जैसे त्रिपुरारी पूर्णिमा का मध्यरात्री नौका उत्सव, चिखल कालो का विश्व-स्तर का माटी उत्सव, अनूठा शीशा रन्नी इत्यादि। इन उत्सवों का भारत के अन्य भागों से क्या सम्बन्ध है? ये देव एवं इन उत्सवों की पृष्ठभागीय कथाएं सभी स्थलों पर समान ही है किन्तु इन उत्सवों के आयोजनों में भिन्नता आ जाती है। जैसे चिखल कालो उत्सव का सम्बन्ध कृष्ण से है। यह उत्सव देवकी-कृष्ण मंदिर के समक्ष मनाया जाता है जिसमें वे खेल खेले जाते हैं जो कृष्ण स्वयं खेलते थे।

गोवा के उत्सव अत्यंत विशेष होते हुए भी विश्व के अन्य क्षेत्रों के हिन्दू उत्सवों से किसी ना किसी प्रकार से जुड़े हुए हैं। आपका इस विषय में क्या मत है?

प्रा. प्रजल – गोवा के उत्सवों में कुछ दीपावली जैसे देशव्यापी उत्सव हैं तो कुछ गणेश उत्सव जैसे राज्य विशेष उत्सव हैं। इनके अतिरिक्त कुछ स्थानिक उत्सव हैं, कुछ लोक उत्सव हैं तथा कुछ ऐसे उत्सव हैं जिनमें जादू-टोना तथा झाड-फूंक की क्रियाएं भी सम्मिलित होती हैं।

जात्रा

दृष्टांत के लिए नार्वें में एक जात्रा होती है जिसे भूतांची जात्रा कहते हैं। यह स्त्रियों के भूतों का उत्सव है। ऐसी मान्यता है कि जब कोई गर्भवती हिन्दू स्त्री मातृत्व का आनंद प्राप्त करने से पूर्व ही प्रसव के समय मृत्यु को प्राप्त होती है, वे भूत बन जाती हैं। ऐसा कहा जाता है कि उनकी अतृप्त आत्माएँ नार्वें के इस उत्सव की रात्रि में सक्रिय हो जाती हैं। इस उत्सव में मशना देवी (मशना, स्मशान शब्द का अपभ्रंश है) की आराधना की जाती है। ये सभी अतृप्त आत्माएँ यहीं आती हैं। मैं अपने विद्यार्थियों से साथ यह उत्सव देखने गया था। वहां के स्थानिकों ने हमें सूर्यास्त के पश्चात वहां से जाने के लिए कहा अन्यथा आईवान्तिन अर्थात् अतृप्त स्त्रियों की आत्माएँ हम पर आक्रमण करेंगी। उन्होंने एक व्यक्ति का उदाहरण दिया जिसने उन आत्माओं को चुनौती दी थी। दूसरे दिन उसकी मृत देह एक वृक्ष से लटकती पायी गयी। कथाएं एवं मान्यताएं जो भी हों, यह उत्सव नार्वें में अब भी मनाया जाता है।

दसरो

पेडने में एक उत्सव मनाया जाता है जिसका नाम है दसरो। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ देह में से भूतकाढा अर्थात भूत निकालने की प्रक्रिया की जाती है। इनके अतिरिक्त, एक उत्सव है, शीशारन्नी जहां चार व्यक्ति शयनावस्था में अपने सिरों को जोड़कर चूल्हा बनाते हैं तथा उस चूल्हे में भात पकाया जाता है। वे उस भात में रक्त की बूँदें भी मिलाते हैं। तत्पश्चात वह भात प्रसाद के रूप में लोगों में बांटा जाता है। चोरोत्सव अर्थात् चोरों का उत्सव नामक भी एक उत्सव है जो सत्तरी तालुका के जर्मे तथा करंजोल में आयोजित किया जाता है। इसमें लोगों को कंठ तक धरती में गाड़ा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जिसने भी प्राचीनकाल में चोरी की हो, कोई पाप किया हो अथवा हत्या की हो, वे इस प्रकार का अनुष्ठान कर पश्चाताप करते हैं। इससे उनका पाप समाप्त हो जाता है।

अनुराधा – यह एक प्रकार से प्राचीन घटनाओं एवं स्मृतियों को पुनः सजीव करने की प्रथा प्रतीत होती है। शीशारन्नी एवं चोरोत्सव के विषय में भी मेरा अनुमान है कि प्राचीन काल में हुई किसी घटना को इन अनुष्ठानों के माध्यम से स्मरण किया जाता है। बाहर से आकर गोवा में छह वर्ष व्यतीत करने के पश्चात मैं यह कह सकती हूँ कि अपने गाँवों में गोवा एक प्राचीन भारत की सभ्यता को जी रहा है। अपनी स्मृतियों को पुनर्जीवित कर रहा है। यह प्राचीन काल की हिन्दू संस्कृति है। यह शहरी हिन्दू सभ्यता अथवा तीर्थ स्थलों की हिन्दू मान्यताओं से भिन्न हैं। यह कठिन है किन्तु फिर भी पूर्ण रूप से हिन्दू उत्सव हैं क्योंकि ये सभी उत्सव मंदिरों में देवों के समक्ष मनाये जाते हैं।

अब आप हमें बताएं कि कदंब शासकों के पश्चात गोवा पर किन महत्वपूर्ण शासकों ने शासन किया था?

शासक राजवंश – पूर्व-पुर्तगाली गोवा

प्रा. प्रजल –  कदंब शासकों के पश्चात गोवा पर विजयनगर साम्राज्य का अधिपत्य स्थापित हुआ। विजयनगर कर्णाटक का अत्यंत शक्तिशाली साम्राज्य था। उनकी सदा बाहमानियों से शत्रुता रही। सम्पूर्ण १४वीं एवं १५वीं शताब्दी में गोवा पर कभी विजयनगर तो कभी बाहमानियों का आधिपत्य रहा। घोड़ों के व्यापार पर सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त करने के प्रयोजन से वे गोवा पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए आपस में युद्ध करते रहे। उस काल में अरब के व्यापारी पुराने गोवा में घोड़ों का अत्यंत लाभप्रद व्यापार कर रहे थे। जिसे “ए-एला” कहा जाता था। इसी कारण गोवा का आधिपत्य इन दो शक्तियों के मध्य डोलता रहा।

विजयनगर साम्राज्य

अनुराधा – क्या गोवा में विजयनगर साम्राज्य को कोई चिन्ह शेष है?

प्रा. प्रजल – जी हाँ। कुडने गाँव में स्थित जैन मंदिर १५वीं शताब्दी के विजयनगर साम्राज्य की देन है। बांदोड़ा की जैन बसदी, नेमिनाथ बसदी भी विजयनगर काल की है। अतः विजयनगर साम्राज्य के प्रत्यक्ष अवशेष तो हैं ही, साथ ही सप्तकोटेश्वर जैसे मंदिर के रूप में भी उनकी छाप है जिसे सर्वप्रथम कदंब साम्राज्य ने निर्मित किया, तत्पश्चात विजयनगर साम्राज्य ने उनका नवीनीकरण किया। बांदोड़ा के नागेशी मंदिर में प्रदर्शित एक शिलालेख में विजयनगर राजा, देवराया प्रथम का नाम एवं समय वर्ष १४१३ उल्लेखित है। गोवा में विजयनगर साम्राज्य की अमिट छाप है।

अनुराधा – विजयनगर साम्राज्य के पश्चात बहमानियों का शासन था कि आदिलशाह का?

प्रा. प्रजल – १४९८ में आदिलशाह का साम्राज्य था। उसके पश्चात पुर्तगालियों ने १५१० में गोवा को अधिकृत किया।

अनुराधा – इसके पश्चात की ऐतिहासिक घटनाएं जनता भलीभांति जानती है।

पुर्तगाली काल

प्रा. प्रजल –  पुर्तगाली काल का इतिहास लोग भलीभांति इसलिए जानते हैं क्योंकि पुर्तगाली उत्तम इतिहासकार थे तथा उन्होंने सभी घटनाक्रमों का क्रमवार आलेखन किया है। पणजी अभिलेखागार में आपको सभी पुर्तगाली संलेख मिल जायेंगे। मैंने स्वयं भी उनसे ही जानकारी एकत्र की है।

अनुराधा – १५वीं व १६वीं सदी के पश्चात से हमारे पास सम्पूर्ण भारत में उत्तम ऐतिहासिक प्रलेखन उपलब्ध हैं। हमारे पास मुगल काल के भी ऐतिहासिक प्रलेखन उपलब्ध हैं क्योंकि वे घटनाएँ समयचक्र में अधिक प्राचीन नहीं हैं, साथ ही तब तक ऐतिहासिक घटनाओं के प्रलेखन की प्रथा आरम्भ हो गयी थी। किन्तु आश्चर्य होता है कि ३५० वर्षों का कदंब शासन मुगल काल से अधिक होने के पश्चात भी अधिक ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

प्रा. प्रजल – जी। मुगलों ने ३३२ वर्षों तक राज किया था। कदंब साम्राज्य उससे अधिक था।

अनुराधा – कुछ समय पूर्व मेरे कुछ जानकार गिनती कर रहे थे कि किन किन शासकों ने भारत में मुगलों से अधिक समय तक राज किया था, क्योंकि लोगों में यह भ्रान्ति है कि मुगलों का साम्राज्य सर्वाधिक समय तक था।

प्रा. प्रजल –  वस्तुतः, गोवा पर चोल, अहोम, पंड्या इत्यादि राजवंशों का भी अनेक वर्षों तक साम्राज्य था। किन्तु इनके विषय में अधिक सिखाया नहीं जाता तथा इनके विषय में जनता के ज्ञानकोष में भी अधिक कुछ उपलब्ध नहीं है।

अनुराधा – सही इतिहास पढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। विद्यालयों में इतिहास को भी वही मान व महत्ता दी जानी चाहिए जो विज्ञान अथवा गणित को प्राप्त है। जितना प्रगाड़ सम्बन्ध हमारा  विज्ञान से है, उतना ही विशेष सम्बन्ध हमारा इतिहास से है। भूतकाल के बिना भविष्य काल गढ़ना संभव नहीं है।

प्रा. प्रजल –  गोवा ही नहीं, भारत के सभी भागों का अपना इतिहास है जिसे जानना व समझना आवश्यक है। कश्मीर का भी एक महान इतिहास है। सुगंधा एवं दिद्दा जैसी रानियों ने वहाँ राज किया था। उल्लाल की रानी अब्बक्का चौता ने पुर्तगालियों से युद्ध किया था।  कित्तूर की रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजों से युद्ध किया था।

गोवा के महत्वपूर्ण दर्शनीय ऐतिहासिक स्थल

अनुराधा – आज के इस साक्षात्कार के अंत में मैं चाहती हूँ कि आप श्रोताओं को गोवा के कुछ सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दर्शनीय स्थलों के विषय में बताएं जिससे उन्हें गोवा को जानने व समझने में आसानी होगी।

प्रा. प्रजल –  इसके लिए उन्हें कुशावती नदी के तीर स्थित पन्सोइमल शैलचित्र के स्थल पर जाना चाहिये। पुराना गोवा देखना चाहिए। गोवा की प्रथम राजधानी चांदोर, तम्बडी सुर्ला मंदिर, ओपा का सप्तकोटेश्वर मंदिर, दिवे द्वीप का सप्तकोटेश्वर मंदिर या पोर्ने तीर्थ, मर्दोल का महालसा मंदिर, सालावली बाँध के निकट कुर्डी का महादेव मंदिर इत्यादि के दर्शन करना व समझना चाहिए। पर्यटक सालावली बाँध देखने तो आते हैं किन्तु महादेव मंदिर नहीं देखते जिसे कुर्डी से लाकर पुनः संरचित किया है। इसे मूलतः कदंब राजा शिष्टदेव प्रथम ने बनवाया था।

गोवा पर्यटन

अनुराधा – मैं हृदय से आशा करती हूँ कि गोवा पर्यटन इसका संज्ञान ले तथा आपका सहयोग लेकर पूर्व-पुर्तगाली गोवा पर्यटन स्थलों को प्रकाश में लेकर आये। मैं जानती हूँ कि आपसे जानने के लिए अब भी बहुत कुछ शेष है, किन्तु हमें आज का साक्षात्कार यहीं समाप्त करना पड़ेगा। आशा है कि आपसे शीघ्र ही पुनः भेंट होगी।

डीटूर्स में आने के लिए आपका धन्यवाद। यह हमारा सौभाग्य था कि हमें आपसे इतना कुछ जानने एवं समझने का अवसर प्राप्त हुआ।

प्रा. प्रजल –  गोवा की संस्कृति के अनुसार, इन शब्दों से मैं आपसे आज्ञा लेता हूँ, देव बरे करों

पूर्व-पुर्तगाली गोवा पर प्रजल साखरदांडे से हुई चर्चा की लिखित प्रतिलिपि IndiTales Internship Program के अंतर्गत हर्षिल गुप्ता ने तैयार की।  ऑनलाइन प्रकाशन के लिए संकलित।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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