राजस्थान की जल संस्कृति – नीरज दोशी से वार्ता

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अनुराधा – नमस्ते। इंडीटेल्स डीटुअर्स के इस संस्करण में आप सबका स्वागत है। आज हमारे साथ हैं नीरज दोशीजी जो जयपुर के जल धरोहर पदभ्रमण, Heritage water walks नाम की संस्था के संस्थापक हैं। यह इस दिशा में एक अत्यंत ही रोचक पहल है। मैंने सदा ही इस मांग पर पुरजोर बल दिया है कि यदि भारत को अपनी स्वर्णिम संस्कृति पुनः प्राप्त करनी है तो उसे अपनी प्राचीन राजस्थान की जल संस्कृति को वापिस लाना होगा। जल का सम्मान करना होगा। जल की विक्री नहीं, उसकी आराधना करनी होगी क्योंकि जल हमारे जीवन का मूलभूत आधार है।

जल के बिना किसी जीव का जीवित रहना संभव नहीं है। भारत में जल स्त्रोतों की अवस्था एवं उसके संरक्षण की आवश्यकता किसी से छुपी नहीं है। वह भी राजस्थान में, जिसका अधिकतर भाग मरुभूमि के अंतर्गत आता है। जयपुर के निवासी होने के कारण जल से हमारे संबंधों, उस के संरक्षण एवं संस्कृति के विषय में चर्चा करने के लिए नीरज से उत्तम जानकार कौन हो सकता है? वे एक ऐसे राज्य के निवासी हैं जो सबसे सूखे राज्यों एवं जल संरक्षण व संग्रहण के क्षेत्र में सर्वाधिक विकसित राज्यों में से एक है। तो आईये आज की इस महत्वपूर्ण चर्चा में हम सब नीरजजी का स्वागत करते हैं।

नीरज – डीटुअर्स में मुझे आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद अनुराधाजी। विश्व भर के पाठकों से राजस्थान के जल की गाथाओं को साझा करते हुए मुझे प्रसन्नता हो रही है। मैं आप सबको यह भी बताना चाहता हूँ कि जल धरोहर पदभ्रमण, Heritage water walks का आरम्भ करने की प्रेरणा मुझे कहाँ से मिली। साथ ही यहाँ के जल स्त्रोतों की विलक्षणता की भी चर्चा करना चाहता हूँ।

अनुराधा – आईये राजस्थान की जल संस्कृति के विषय में चर्चा आरम्भ करते हैं। राजस्थान में जल संरक्षण व संचयन के अनेक उदहारण देखने को मिलते हैं। वहां लोगों का जल से कैसा सम्बन्ध है?

नीरज – जी। जल के बिना जीवन असंभव है। राजस्थान में इसी जल का अभाव है। इसीलिए वहां के निवासियों का जल के साथ प्रगाढ़ सम्बन्ध है। राजस्थान जैसी मरुभूमि भी वसाहत से परिपूर्ण है, यह विश्व का प्रथम अचम्भा है। राजस्थान में जल का विशेष महत्त्व है।

सम्पूर्ण विश्व में २५ मरुस्थल हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर भाग में महान भारतीय मरुस्थल थार है, जिसे ग्रेट इंडियन डेजर्ट भी कहा जाता है। उस मरुस्थल का ७५ प्रतिशत भाग राजस्थान में है। शेष भाग पाकिस्तान में है। इस मरुस्थल का कुल क्षेत्रफल लगभग २००,००० वर्ग किलोमीटर है। वहीं अफ्रीका के विशालतम मरुस्थल, सहारा मरुस्थल का क्षेत्रफल लगभग ९,२००,००० वर्ग किलोमीटर है। विश्व के अन्य मरुभूमियों की तुलना में थार मरुस्थल की विशेषता उसकी प्राकृतिक रूप से निवास कर रही बड़ी जनसँख्या है। सहारा की जनसँख्या का घनत्व एक व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इसके ठीक विपरीत थार मरुस्थल की जनसँख्या का घनत्व १४३ व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है जो एरिज़ोना अथवा अमेरिका के मरुभूमि के जनसँख्या घनत्व से १४० गुना अधिक है। राजस्थान में जिस प्रकार जीवन विकसित हुआ, उसका सम्बन्ध जल से अवश्य ही होगा क्योंकि सब कुछ अंततः जल से ही जुड़ा हुआ है। यदि आप राजस्थान की संस्कृति के भीतर झाँक कर देखें तथा उसकी परतों को खोलते हुए उसके मूल में जाएँ तो आपको वहां जल ही जल दिखाई देगा।

राजस्थान की जल संस्कृति – जल प्रबंधन

अनुराधा – राजस्थान की मरुभूमि में इतनी बड़ी संख्या में लोग निवास करते हैं, इसका एक ही अर्थ है कि वे अपने जल का उपयुक्त प्रबंधन करने में सफल हुए हैं।

नीरज – जल प्रबंधन एक आयाम है। जल प्रबंधन का उनके जीवन का अभिन्न अंग बनना एक दूसरा किन्तु महत्वपूर्ण आयाम है जहां उन्हें यह प्रतीत ही नहीं होता है कि वे इस दिशा में परिश्रम कर रहे हैं। जैसे जब भी किसी गाँव में कुआँ आदि खोदा जाता है तब सभी गांववासी पूर्ण उत्साह से उसमें भाग लेते हैं। उन्हें यह आभास ही नहीं होता है कि वे अपने दैनिक कार्य से हटकर कुछ कर रहे हैं। जल संचयन एवं प्रबंधन के प्रत्येक कार्य को अपनी परंपरा मानते हुए उन्होंने अपना जीवन जल के चारों ओर ही विकसित किया है। अपने दैनिक कार्यों के भाग के रूप में वे जल संचयन, संरक्षण एवं प्रबंधन करते हैं।

उदहारण के लिए, विवाह, जन्म तथा मृत्यु जैसे सुखद व दुखद अवसरों पर वे प्रतिज्ञा लेते हैं कि नवजात शिशु अथवा स्वर्गवासी व्यक्ति के नाम पर वे जल के एक स्त्रोत का निर्माण अवश्य कराएँगे। ऐसे अवसरों के लिए किया गया कार्य उन्हें श्रम प्रतीत नहीं होता है, अपितु वह आनंद का अवसर होता है। मेरे बालपन में मेरी दादी स्नान के लिए मुझे केवल आधी बाल्टी जल देती थी तथा कहती थी कि यदि अधिक जल चाहिए तो स्वयं लेकर आओ। वह मेरे लिये बड़ी सीख सिद्ध हुई। उसके पश्चात मुझे कभी भी जल के अभाव का तनिक भी आभास नहीं हुआ।

अनुराधा – मैं देवी भागवत पुराण पढ़ रही हूँ। उसके अनुसार किसी भी जल स्त्रोत का निर्माण कराना एक पुण्य कार्य है। किन्तु उससे भी बड़ा पुण्य कार्य उस जल स्त्रोत का प्रबंधन होता है, संरक्षण होता है। जल स्त्रोत का केवल निर्माण ही नहीं, अपितु उसका संरक्षण भी आवश्यक है। इसी तथ्य में भारत का सम्पूर्ण जल दर्शन समाया हुआ है।

नीरज – महाभारत का युद्ध १८ दिवसों तक चला था। महाभारत महाकाव्य १८ अध्यायों में विभक्त है जिसकी १८ पुस्तकें हैं। इसके १३वें अध्याय को अनुशासन पर्व कहा जाता है। इस अध्याय में मृत्यु शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह एवं युधिष्ठिर के मध्य हुए संवाद हैं। मृत्यु से पूर्व भीष्म पितामह अपना सम्पूर्ण ज्ञान युधिष्ठिर को देना चाहते थे। युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा था कि सबसे उत्तम कर्म कौन सा होता है? उन्होंने उत्तर दिया कि सर्वोत्तम कर्मों में एक है, प्यासे को जल पिलाना, चाहे वह मनुष्य हो अथवा पशु, पक्षी, वृक्ष आदि। ऐसा करने से ६०,००० पुनर्जन्मों से मुक्ति मिल जाती है।

अनुराधा –  इससे मुझे प्याऊ संस्कृति का स्मरण हो आया जो विशेषतः ग्रीष्म ऋतु में देखे जाते हैं। भारत के राजस्थान, मध्य प्रदेश या उत्तर प्रदेश जैसे अनेक उष्ण प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु की चिलचिलाती धूप में मैंने कई लोगों को देखा है जो घड़ों में जल भरकर उसका शीतल जल प्यासे को पिलाते हैं। किसी भी प्रकार का प्रश्न पूछे बिना वे लोगों की सेवा करते हैं। वहीं दूसरी ओर जब हम विमानतल पर जाते हैं तो वहां पाव या आधा लीटर जल की बोतल के लिए ५० रुपये से भी अधिक शुल्क माँगा जाता है। दोनों में कितनी भिन्नता है। एक ओर सेवा की प्राचीन परंपरा है तो दूसरी ओर स्वार्थी व्यापार। मेरा यही मानना है कि जिस दिन से हम जल एवं जल स्त्रोतों का आदर करना सीखेंगे, उसी दिन से भारत की भूतपूर्व गरिमा पुनः वापिस आ जायेगी।

जल स्त्रोतों के विभिन्न प्रकार

अनुराधा – क्या आप हमें राजस्थान के जल स्त्रोत संरक्षण तकनीकियों एवं प्राचीन प्रक्रियाओं के विषय में कुछ बताएँगे? वहां कौन कौन से जल स्त्रोत उपलब्ध हैं?

नीरज –  राजस्थान में जल स्त्रोतों की अनेक वास्तु शैलियाँ हैं। कई जल स्त्रोत ऐसे हैं जो देखने में तो एक प्रकार के ही हैं किन्तु भिन्न भिन्न क्षेत्रों में होने के कारण उनके नाम भिन्न हैं। राजस्थान को ५ प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है। शेखावटी, मारवाड़, मेवाड़, ढूंढाड़ तथा हाडोती। जल के विषय में हाडोती अन्य चारों से अधिक भाग्यशाली है क्योंकि यह चम्बल नदी के समीप है। चम्बल नदी राजस्थान से बहती इकलौती चिरस्थाई नदी है।

शेखावाटी के चुरू नगर में सेठानी का जोहारा - राजस्थान की जल संस्कृति
शेखावाटी के चुरू नगर में सेठानी का जोहारा

राजस्थान के जल स्त्रोतों में प्रमुखतः कुआं, जलाशय एवं बावड़ियां हैं। राजस्थान में लगभग ३००० जल स्त्रोत हैं तथा सभी मानव निर्मित हैं। यदि किसी गाँव, नगर या शहर का नाम ‘सर’ से अंत होता है तो वह स्थान निश्चित रूप से अपने जल स्त्रोत के नाम से ही जाना जाता है क्योंकि ‘सर’ का अर्थ है, सरोवर। जैसे अलसीसर, पदमसर, लूणकरणसर, इन सभी के नाम वहां के जल स्त्रोतों के नाम पर आधारित हैं। यही दर्शाता है कि प्राचीनकाल में लोग जल को इतना महत्त्व देते थे तथा उसका आदर करते थे।

राजस्थान में जल स्त्रोत का एक ऐसा प्रकार भी है जो आप भारत में अन्यत्र कहीं नहीं देखेंगे। वह है, कुईं, जो कुआं का स्त्रीलिंग संस्करण है। ये कुईं किसी भी क्षेत्र के भूविज्ञान एवं स्थलाकृति पर आधारित हैं। शेखावटी क्षेत्र में अनेक कुईं हैं जो ‘रेजानी पानी’ के अंतर्गत आते हैं। राजस्थान में जल के तीन प्रकार हैं। प्रथम है, पालर पानी, जो वर्षा का जल है। दूसरा है, पातालपानी, जो भूमिगत जल है। तीसरा है, रेजानी पानी, जिसे वायु की आर्द्रता से एकत्र किया जाता है।

शेखावाटी के कुछ भागों में भूमि सतह से कुछ फीट नीचे जिप्सम की परतें हैं तथा उनके ऊपर बालू है। इसके कारण वर्षा का जल भूमि के भीतर नहीं जा पाता तथा बालू की परत में ही एकत्र रहता है। यहाँ के लोगों ने व्यक्तिगत उपयोग के लिए उस जल के निकास का भी उपाय खोज लिया है। उन्होंने संकरी(४-५ फीट व्यास), खड़ी व बेलनाकार कुओं का निर्माण किया।

मंडावा में हरलालका कुआँ
मंडावा में हरलालका कुआँ

इसकी गहराई लगभग ४०-५० फीट तक हो सकती है। इस प्रक्रिया में कुँए के भीतर कम दबाव का क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। इससे बालू में एकत्र जल का वाष्पीकरण होने के पश्चात भी वायु की आर्द्रता पुनः जल में परिवर्तित हो जाती है। कुईं कुँए का ही संकरा प्रकार है।

कुईं व्यक्तिगत अथवा सार्वजनिक दोनों हो सकते हैं। वे किसी विशेष परिवार, क्षेत्र अथवा जाति की व्यक्तिगत संपत्ति हो सकती हैं। परिवार की कुईं उनके निवास के भीतर ही होती हैं। एक क्षेत्र में होने के पश्चात भी ये कुईं आपस में जुड़े हुए नहीं होते हैं। इस जल की शुद्धता अधिक होती है क्योंकि कुईं में एकत्र होने से पूर्व यह बालू की अनेक परतों से होकर जाता है।

अनुराधा – इससे मुझे बुरहानपुर के कुओं का स्मरण हो गया। वे भूमिगत रूप से  आपस में जुड़े हुए हैं तथा सम्पूर्ण नगरी में झरने एवं वर्षा के जल की आपूर्ती करते हैं। ये भी कुईं के समान लगते हैं किन्तु वहां का भूविज्ञान एवं स्थलाकृति भिन्न होने के कारण उनका जल संचयन तकनीक भिन्न है।

नीरज – नाहरगढ़ दुर्ग जल संसाधन पदभ्रमण के समय आप दो कृत्रिम जल प्रणालियाँ देख सकते हैं। इस प्रणाली का आविष्कार प्रथम ईसवी में रोम वासियों ने किया था। यह तकनीक मध्य-पूर्वी देशों से होते हुए भारत में आई थी।

जल स्त्रोतों की स्थापत्य शैली

अनुराधा – भारत के पश्चिमी भागों में, गुजरात एवं राजस्थान में अत्यंत सुन्दर बावड़ियां हैं। वे सब उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित होते हुए भी एक दूसरे से भिन्न हैं क्योंकि वे सब अपने स्थानीय परिवेश एवं संस्कृति को उजागर करती हैं। मुझे राजस्थान की चाँद बावडी एवं गुजरात की रानी की वाव के विषय में जानना है। उनका निर्माण कैसे किया गया? उनमें तिरछी पौढ़ियाँ क्यों हैं? उन्हें भूमि को गहराई तक खोदकर बनाया गया है। आज ८००-९०० वर्षों पश्चात भी वे अखंड कैसे खड़ी हैं?

नीरज – ये बावड़ियां अत्यंत गहरी हैं। इस कारण उनके भीतर सीधे सीधे नहीं उतरा जा सकता क्योंकि ऐसा करने के लिए एकाग्रता एवं समन्वय की तीव्र आवश्यकता पड़ेगी। अन्यथा हम अपना संतुलन खो कर सीधे जल की गहराई में गिर जायेंगे। वहीं तिरछी सीढ़ियों से गहराई का आभास नहीं होता है।

आभानेरी की चाँद बावड़ी - राजस्थान की जल संस्कृति
आभानेरी की चाँद बावड़ी

संतुलन भी बना रहता है तथा गिरने पर भी २-३ पौढ़ियाँ  से ही गिरेंगे। इस संरचना में पौढ़ियों की संख्या भी बढ़ जाती है तथा प्रत्येक पौढ़ी की ऊँचाई भी अधिक नहीं होती। अन्यथा इतनी गहरी बावड़ी में यदि सीधी पौढ़ियाँ बनाई जाएँ तो या तो प्रत्येक पौढ़ी की ऊँचाई अत्यधिक हो जायेगी जिससे नीचे उतरने का संकट कई गुना बढ़ जाएगा, या पौढ़ियों की ऊँचाई कम कर उनकी संख्या बढ़ाई जाए, उससे बावड़ी का घेरा प्रभावित होगा। तिरछी सीढ़ियाँ देखने में भी अत्यंत आकर्षक लगती हैं तथा एक समय में अधिक से अधिक लोग बिना संकट के नीचे उतर सकते हैं।

राजस्थान की जल संस्कृति

अनुराधा –  राजस्थान की संस्कृति में जल की क्या भूमिका है?

नीरज – किसी भी क्षेत्र की संस्कृति उसकी जीवनशैली, वस्त्रशैली, परम्पराएं एवं खान-पान से परिभाषित होती है। हमारे लिए जल एक उत्सव है। पुष्कर का ही उदहारण लें। वहां सब कुछ जल के चारों ओर ही केन्द्रित है, चाहे वह होटल व धर्मशालायें हों, विद्यालय व महाविद्यालय हों, या मेले एवं उत्सवों का आयोजन हो।

लहरिया साडीपर जल तरंगों का आभास
लहरिया साडीपर जल तरंगों का आभास

जल ही जीवन है। जल हमारी आवश्यकता तब भी थी, अब भी है। किन्तु जल संस्कृति में बड़ा परिवर्तन आ गया है। पारंपरिक जल संस्कृति का स्थान आधुनिक संस्कृति ने ले लिया है। अब हमारे घरों में सीधे नल से जल की आपूर्ति की जाती है। इसके अपने लाभ व हानियाँ हैं। एक ओर जल प्राप्त करने में परिश्रम नहीं करना पड़ता है तो दूसरी ओर हम जल स्त्रोतों के महत्त्व एवं उनके संरक्षण के विषय से दूर हो जाते हैं। आप ही सोचिये, क्या घर में नल के जल का प्रयोग करते समय आपके मस्तिष्क में उस स्त्रोत की छवि भी आती है जहां से इस जल की आपूर्ति की जा रही है? क्या एक क्षण के लिए भी उसकी परिस्थिति आपको चिंता में डालती है? कदाचित नहीं!

राजस्थान की एक पारंपरिक वस्त्र शैली है, बांधनी। उसमें लहरिया एक लोकप्रिय आकृति है जो जल की तरंगों को दर्शाती हैं। किन्तु राजस्थान में तो कहीं भी बहता हुआ जल नहीं है। इसीलिए लोग भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे शीघ्रातिशीघ्र वर्षा दें ताकि उन्हें भी बहता हुआ जल प्राप्त हो। उसी  के प्रतीक स्वरूप यह लहरिया साड़ी मानसून के आरम्भ में तथा तीज में पहनी जाती है।

अनुराधा – बहते जल की कितनी सुन्दर अभिव्यक्ति है यह लहरिया साड़ी। इसमें भगवान से प्रार्थना भी है कि वे उन्हें वर्षा से अनुग्रहीत करें।

नीरज – कल्पना कीजिये कि सहस्त्रों महिलायें एक साथ लहरिया साड़ियाँ पहन कर एक साथ खड़ी हैं। उन्हें देख आपको बहते हुए जल का आभास होगा। पुरुष भी तीज त्योहारों में लहरिया शैली के वस्त्रों से बने साफे धारण करते हैं।

जैसलमेर का गडीसर सरोवर - राजस्थान की जल संस्कृति
जैसलमेर का गडीसर सरोवर

जल से सम्बंधित दो प्रकार की नृत्य शैलियाँ हैं। पहला है, गुजरात का भवाई जिसमें स्त्रियाँ अपने सर पर कई मटके रखकर नृत्य करती हैं। दूसरा है राजस्थान का चारी नृत्य जिसमें स्त्रियाँ अपने सर पर एक घड़ा रख कर नृत्य करती हैं। भवाई का मटका टेराकोटा अथवा मिट्टी का होता है तो चारी का मटका ताम्बे या पीतल का होता है। स्थानीय भाषा में ताम्बे के घड़े को चारी कहते हैं। वे अपने नृत्य में घर से जल लेने के लिए जाने का दृश्य प्रस्तुत करती हैं। किन्तु एक सर पर अनेक घड़े क्यों? प्राचीन काल में समय की कमी तथा जल स्त्रोतों की दूरी के कारण स्त्रियाँ एक समय में ही कई घड़ों को अपने सर पर उठाती थीं। बिना जल छलकाए, कई मटके सर पर उठाकर घर तक पहुँचना कोई आसान कार्य नहीं है। जल से भरे मटकों को सर पर रखकर वे नीचे कंकड़ पत्थर नहीं देख सकती थीं। वह भी नंगे पैर। बिना नीचे देखे ही अपने पैरों से कंकड़-पत्थर का आभास लेते हुए, बिना जल छलकाए वे कैसे घर पहुँचती थीं, यह नृत्य उसी का चित्रण है। यह नृत्य अत्यंत मनमोहक व सुन्दर होता है।

अनुराधा –  मैंने कई सांस्कृतिक आयोजनों में यह नृत्य देखा है। किन्तु मैं नहीं जानती थी कि अपने नृत्य में वे जल ले जाने का दृश्य प्रस्तुत करती हैं।

नीरज – यह उनकी दिनचर्या से प्रेरित नृत्य है। इस क्षेत्र में पनिहारी संगीत भी लोकप्रिय है। पनिहारी का अर्थ है, वह स्त्री जो नदी आदि से जल भरने जा रही है। समुदाय की सभी स्त्रियाँ एकत्र होकर एक साथ जल भरने जाती हैं। मार्ग में वे आपस में चर्चा करते हुए अपने सुख-दुख बांटती हैं, हंसी-ठिठोली करती हैं। उनके पायल एवं कंगनों से निकलती मधुर ध्वनी वातावरण में संगीत का रस घोल देती हैं।

अनुराधा –  मैंने भी वह मधुर संगीत सुना है।

नीरज – अनेक संगीतज्ञों ने अनेक शैलियों में यह संगीत बजाया व गाया है। उनमें यह कथा बहुधा प्रस्तुत की जाती है। एक स्त्री सम्पूर्ण श्रृंगार कर घूंघट ओढ़कर जल लेने के लिए जा रही है। मार्ग में उसे एक घुड़सवार मिलता है जो प्यासा है। वह उसे जल पिलाती है। उस समय उसे यह ज्ञान नहीं होता है कि वह उसका मंगेतर है क्योंकि उसने अपने मंगेतर को इससे पूर्व कभी नहीं देखा था। घर पहुंचकर वह उसी युवक को अपने घर में बैठे देखती है। पनिहारी संगीत में यह कथा अवश्य प्रस्तुत की जाती है।

जल के अभाव में यहाँ बर्तन धोने की प्रक्रिया भी भिन्न होती थी। वे घर के बर्तन सूखी राख या बालू से धोते थे। यह प्रक्रिया वैज्ञानिक रूप से भी उत्तम है। राख में शुद्ध कार्बन होता है जिसकी सरंध्रता अत्यधिक होती है। जब राख को जूठे बर्तन पर फैलाया जाता है तो वो तेल, घी आदि को तुरंत सोख लेता है। तत्पश्चात बर्तनों को सूखे कपडे से पोंछ लिया जाता था। इसे जलबिन स्वच्छता कहते हैं।

ऐसा नहीं है कि अब चारकोल अथवा कार्बन का प्रयोग नहीं किया जाता। जल स्वच्छ करने वाले यंत्रों में, दन्त मंजन तथा चेहरे धोने वाले साबुन आदि में इसका प्रयोग किया जाता है।

जयपुर में जल धरोहर पदभ्रमण

अनुराधा –  हमें अपने धरोहर पदभ्रमण के विषय में भी बताएं जो आप जयपुर के दो महलों में करते हैं। इन पदभ्रमणों के कौन से विशेष बिंदु हैं?

नीरज – हम जयपुर में दो स्थानों पर धरोहर पदभ्रमण कराते हैं। एक है, नाहरगढ़ दुर्ग तथा दूसरा है, आमेर दुर्ग

जलेब चौक से आमेर दुर्ग का दृश्य
जलेब चौक से आमेर दुर्ग का दृश्य

२०२१ में मैं अमेरिका से जयपुर वापिस आ गया था। जयपुर में मैंने एक वर्षा जल अनुसन्धान कंपनी खोली जो संस्थागत स्तर जल प्रबंधन के क्षेत्र में कार्य करती है। मैं एक मरुस्थल निवासी हूँ। मेरी १६ पीढ़ियाँ मरुभूमि में ही जन्मी तथा समाप्त हो गयीं। जब मैंने नाहरगढ़ जल प्रणाली तथा आमेर जल प्रणाली को देखा, मैं अचंभित रह गया। वे पहाड़ी के शीर्ष पर जल एकत्र करते हैं। यह अत्यंत अनोखा है। मुझे ऐसा लगा कि इसके विषय में सबको जानकारी देना कितना आवश्यक है।

राजस्थान की जल संस्कृति – ना जल, ना संस्कृति, ना सभ्यता!

पर्यटन की दृष्टि से राजस्थान भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय गंतव्यों में से एक है। इसे क्या विशेष बनाता है? जल। यदि राजस्थान में जल ना होता तो संस्कृति नहीं होती, सभ्यता नहीं होती तथा राजस्थान ही नहीं होता। आमेर नाहरगढ़ की तुलना में अधिक प्राचीन है। जब जयपुर की रचना की जा रही थी तब इसे जयपुर के रक्षण के लिए बनाया गया था। जब सेना के लिए दुर्ग का निर्माण किया जाता है तो उसके भीतर सक्षम जल प्रणाली भी बनाई जाती है। सैनिक-दुर्ग में प्रतिदिन बाहर से जल नहीं लाया जा सकता। दुर्ग की भित्तियाँ उस राजा की गाथाएँ कहती हैं जिन्होंने इस अद्वितीय दुर्ग की संरचना की थी तथा एक सक्षम जल प्रणाली भी बनाई थी।

हमारा जल धरोहर पदभ्रमण दो घंटों का है। इस भ्रपदमण में हम ३०० प्राचीन जल स्त्रोतों का अवलोकन करते हैं। इस पदभ्रमण के तीन घटक हैं, राजस्थान की वास्तु धरोहर, तकनीकी धरोहर तथा सांस्कृतिक धरोहर। आमेर दुर्ग राजस्थान की अनमोल धरोहर है जिसे राजा मानसिंह ने बनवाया था। दुर्ग का वास्तु शिल्प व स्थापत्य तथा जल संचयन प्रणाली इसकी तकनीकी धरोहर हैं। यह दुर्ग राजस्थान की संस्कृति का द्योतक है, जल जिसका एक महत्वपूर्ण भाग है। इस पदभ्रमण का ध्येय है कि लोग यहाँ आयें, इन धरोहरों को जाने, समझे तथा उनका आनंद उठायें तथा राजस्थान के मूल तत्व से जुड़ें।

जल संस्कृति के विषय में पर्यटकों का मत

अनुराधा –  पर्यटकों को आमेर दुर्ग में सबसे अधिक क्या भाता है?

नीरज – पर्यटकों को सबसे अधिक क्या भाता है, यह बता पाना कठिन है। मैं लोगों की प्रतिक्रियाओं से अभिभूत हो गया हूँ। उन्हें कथाएं रुचिकर लगीं। जल प्रणाली ने उन्हें अत्यंत प्रभावित किया। उन्हें यह सत्य अचंभित कर देता है कि कैसे हम सब जल द्वारा एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

अनुराधा –  क्या इन पदभ्रमणों के पश्चात आपने उनमें जल के प्रति कृतज्ञता का भाव देखा?

नीरज – अवश्य। भारत में लोग सामान्यतः जल के प्रति संवेदनशील हैं। किन्तु मैंने विदेशों से आये पर्यटकों में जल के प्रति अधिक संवेदनशीलता देखी है। उन्हें आमेर दुर्ग की सम्पूर्ण जल प्रणाली अचंभित कर देती है। वे जल संग्रहण एवं संरक्षण के साथ साथ, दुर्ग की जल प्रणाली के अन्य आयामों को जानने के लिए भी अत्यंत उत्सुक रहते हैं। आमेर दुर्ग एवं नाहरगढ़ दुर्ग की भिन्न आवश्यकताएं थीं। इसलिए उनकी जल प्रणाली भी भिन्न हैं। राजस्थान में इस प्रकार के अनेक दुर्ग हैं जो पहाड़ियों पर निर्मित हैं तथा सभी में इनके क्षेत्र के अनुसार जल प्रणालियाँ हैं।

जयपुर जल धरोहर का पदभ्रमण

अनुराधा –  इस संस्करण के पाठकों से मेरा कहना है कि यदि आप जयपुर की यात्रा कर रहे हैं, तो आप नीरज से अवश्य भेंट करें तथा जल धरोहर का पदभ्रमण करें। नीरज, भारत में कौन से अन्य जल-विशेष क्षेत्र हैं? मध्यप्रदेश का मांडू जल संरक्षण का अप्रतिम उदहारण है। मुंबई के कान्हेरी गुफाओं में भी उत्तम जल संरक्षण  प्रणाली है। पहाड़ियों पर निर्मित सभी दुर्गों में अप्रतिम जल प्रणालियाँ हैं क्योंकि सेना के लिए यह अत्यावश्यक है। क्या इनके अतिरिक्त भी ऐसे स्थान हैं जो विशेष रूप से जल को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं?

नीरज – दिल्ली एक ऐसी जल समृद्ध नगरी है।

अपने आसपास के जल धरोहरों को ढूँढें व जानें

अनुराधा –  मैं पणजी में रहती हूँ जो दो ओर से दो नदियों से तथा तीसरी ओर से अरब महासागर से घिरी हुई एक द्वीप नगरी है। इसके पश्चात भी इस नगरी का मूल धरोहर भूमिगत जल का स्तोत्र है। मूल नगरी पहाड़ी से आते हुए भूमिगत जल स्त्रोत के चारों ओर केन्द्रित थी। मैं आपसे सहमत हूँ कि हम सब जहां भी रह रहे हों, नगर, गाँव अथवा कस्बा, हमें अपने जल के धरोहरों को खोजना चाहिए। हमें भी उनके विषय में अवश्य बताएं।

नीरज – इस प्रकार की धरोहरों को खोजना तथा उनके विषय में सब को जानकारी देना, यह पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी होगा। भारत में ऐसे अनेक धरोहर होंगे। यही कारण है कि राजस्थान सरकार ने मुझे ऐसे पदभ्रमणों का विकास करने के लिए आमंत्रित किया था। राजस्थान एक मरुभूमि होने के कारण उसकी जल संरक्षण प्रणाली अत्यंत विकसित थी। भारत के अन्य राज्यों में भी ऐसे हीरे अवश्य होंगे।

अनुराधा – जल के विषय में इतनी रोचक जानकारी देने के लिए आपका हृदयपूर्वक धन्यवाद।

IndiTales Internship Program के अंतर्गत नीरज दोशी के साथ चर्चा के ध्वनी संस्करण का पल्लवी ठाकुर ने प्रतिलेखन किया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

1 COMMENT

  1. I really Impressed with reading very very important conversation between Niraj and you. I just working on spreading awareness among the people abt water conservation and important of water in our life when ground water rapidly down every year. I also working research on sarswati river passing through Ambaji to Patan vai Sidhdhpur .

    I just like to visit jaipur and like to meet niraj abt know much more how people of rajasthan live in desert with scarcity of water .Hope i will learn more from him

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