महालक्ष्मी मंदिर – कोल्हापुर या करवीरपुर स्थित शक्ति पीठ

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कोल्हापुर एवं महालक्ष्मी मंदिर, यह दो शब्द हम प्रायः एक ही श्वास में कह जाते हैं। किसी तीर्थयात्री की दृष्टी से देखें तो दोनों शब्दों का एक ही तात्पर्य है। कोल्हापुर की यात्रा करते अधिकांश यात्री महालक्ष्मी मंदिर के दर्शनार्थ ही यहाँ आते हैं।

कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर पंचगंगा नदी के तट पर स्थित कोल्हापुर महाराष्ट्र का एक प्राचीन नगर है। इसका उल्लेख देवी भागवत पुराण के देवी गीता एवं शक्ति से सम्बंधित कई अनेक शास्त्रों में प्राप्त होता है। कोल्हापुर को करवीरपुर क्षेत्र तथा महालक्ष्मी को करवीरपुरवासिनी भी कहा जाता है। कोल्हापुर नगर का सम्पूर्ण जीवन अम्बाबाई के चारों ओर ही कन्द्रित रहता है। करवीरपुरवासिनी के समान अम्बाबाई भी महालक्ष्मी का ही एक नाम है।

अम्बाबाई मंदिर का एक पुराना चित्र
अम्बाबाई मंदिर का एक पुराना चित्र

कोल्हापुर का नामकरण कोल्हासुर नामक एक असुर के कारण हुआ था, जिसका वध देवी ने किया था। मृत्यु से पूर्व उस असुर ने अपनी अंतिम इच्छा के रूप में देवी से प्रार्थना की थी कि इस नगर का नामकरण उसके नाम पर किया जाये।

यह मंदिर एक शक्ति पीठ है जिसे भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवी मंदिरों में से एक माना जाता है। देवी के शक्ति पीठों की संख्या भले ही विभिन्न शास्त्रों के अनुसार भिन्न हों, परन्तु सभी शास्त्रों में कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर का उल्लेख शक्ति पीठ के रूप में अवश्य प्राप्त होता है। यह एक महा शक्ति पीठ है।

महालक्ष्मी अथवा अम्बाबाई मंदिर

महालक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर के हृदयस्थली स्थित है, ठीक उसी प्रकार जैसे कांची कामाक्षी मंदिर कांचीपुरम के हृदयस्थल में स्थित है। सम्पूर्ण नगर इस पावन स्थल के चारों ओर केन्द्रित है।

कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर का प्रवेश द्वार
कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर का प्रवेश द्वार

मैंने इस मंदिर के सर्वप्रथम दर्शन अपने डेक्कन ओडिसी यात्रा के समय किये थे। वह एक त्वरित दर्शन था। उस समय मैंने यहाँ फिर आने का संकल्प लिया था। उस संकल्प को पूर्ण करने में मुझे कुछ वर्ष लग गए। इस समय हमारी कोल्हापुर तक की यात्रा कुछ इस प्रकार हुई कि हम यहाँ प्रातः ४ बजे पहुंचे। समय सर्वोपयुक्त था। हम सीधे देवी के दर्शन करने मंदिर पहुँच गए। देवी को प्रातः जगाने के अनुष्ठान एवं काकड़ आरती की तैयारियां चल रही थीं। यह एक स्वर्णिम अवसर था। कोल्हापुर में मैं इससे अधिक क्या अभिलाषा कर सकती थी!

महालक्ष्मी मंदिर का वास्तुशिल्प

महलस्क्ष्मी मंदिर का वास्तुशिल्प
महलस्क्ष्मी मंदिर का वास्तुशिल्प

देवी के दर्शनोपरांत देहभान हुआ एवं मंदिर निहारने की सुध प्राप्त हुई। मंदिर देख अनुभव हुआ कि यह एक अन्यंत भव्य मंदिर है। मंदिर के भीतर प्रवेश करते ही गहरे धूसर रंग की शिलाओं से बने इस भव्य मंदिर का आधार दृष्टिगोचर होता है। इसे देख चालुक्य वास्तुकला की शैली का आभास होता है। दुर्भाग्य से भित्तियों पर उत्कीर्णित अधिकाँश प्रतिमाएं भंजित हैं।
यदि आप मंदिर के वास्तुशिल्प से परिचित हैं तो आप कई मदनिकाओं या सुर सुंदरियों की प्रतिमाओं को खोज सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार भित्ति के आलों पर ६४ योगिनियों की प्रतिमाएं हैं। उन्हें खोजना अथवा उनकी गणना करना कठिन था क्योंकि वे अनेक वस्तुओं द्वारा लगभग ढँकी हुई थीं।

मैंने भित्तिओं पर कुछ देवी-देवताओं की भी प्रतिमाएं देखीं। मंदिर की ओर जाती सीढ़ियों पर मैंने भूदेवी को मुँह पर धारण किये वराह की एक प्रतिमा देखी.

महालक्ष्मी मंदिर के शिखर

महालक्ष्मी मंदिर के तिकोने शिखर
महालक्ष्मी मंदिर के तिकोने शिखर

मंदिर का शिखर हल्के पीले रंग का था जिसकी किनारियाँ केसरिया थीं। शिखर शुण्डाकार की थीं। उन्हें देख ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें इस मूल प्राचीन मंदिर में कालान्तर में जोड़ा गया है। मूल शिखर नष्ट हो गया था व नवीन शिखर का निर्माण किया गया है अथवा मूल शिखर का ही नवीनीकरण किया गया है, इसका उत्तर मैं नहीं जान पायी।

भूतल से इन शिखरों की रचना समझना आसान नहीं है। यहाँ कुल ५ शिखर हैं। मध्य शिखर कूर्म मंडप के ऊपर स्थापित है। इसके चारों ओर, चार दिशाओं में स्थित अन्य चार शिखर हैं जो क्रमशः महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती एवं गणपति मंदिरों के ऊपर स्थापित हैं। यहाँ की अधिष्ठात्री देवी, महालक्ष्मी मंदिर के ऊपर स्थापित शिखर सर्वाधिक ऊंचा है।
एक कोने में ठेठ महाराष्ट्र शैली का दीपस्तंभ है। मैंने सोचा, प्राचीन समय के समान अब भी यदि इन दीपों को प्रज्वलित किया जाये तो इन्हें निहारने का अनुभव अद्वितीय होगा। मुझे बताया गया कि उत्सव दिवसों में इन्हें प्रज्वलित किया जाता है।

हलके पीली रंग के ऊँचे लम्बे शिखर
हलके पीली रंग के ऊँचे लम्बे शिखर

मुख्य द्वार को महाद्वार कहा जाता है। इस द्वार से भीतर प्रवेश करते ही आपकी दृष्टी देवी पर पड़ती है। उत्तर एवं पूर्व दिशा में भी द्वार हैं जिन्हें क्रमशः घाटी तथा पूर्व दरवाजा कहा जाता है।

अम्बाबाई मंदिर के दीपस्तंभ
अम्बाबाई मंदिर के दीपस्तंभ

मंदिर परिसर में दो जलकुण्ड थे जिनके नाम काशी एवं मणिकर्णिका थे, किन्तु अब उनका अस्तित्व नहीं है।

भूदेवी को थामे हुए वराह
भूदेवी को थामे हुए वराह

मुख्य मंदिर कई छोटे मंदिरों से घिरा हुआ है।

महालक्ष्मी की मूर्ति

महालक्ष्मी की मुख्य प्रतिमा काले पत्थर में बनी है। यह चतुर्भुज महालक्ष्मी की खड़ी प्रतिमा है जिसकी ऊँचाई लगभग ३ फीट है।

कोल्हापुर महालक्ष्मी या करवीरपुर वासिनी
कोल्हापुर महालक्ष्मी या करवीरपुर वासिनी

यदि आप देवी की प्रतिमा देखना चाहते हैं तो आपको प्रातः शीघ्र यहाँ आना पड़ेगा जब देवी की प्रथम आरती, काकड़ आरती की जाती है। प्रातः देवी को भजन गाकर किस प्रकार जगाया जाता है, इस आनंददायी दृश्य का अद्भुत अनुभव भी आप प्राप्त करेंगे। आरती के पश्चात उनके वस्त्र बदले जाते हैं तथा उनका प्रातःकालीन अलंकार किया जाता है। तत्पश्चात, अभिषेक के समय आपको उनकी प्रतिमा के दर्शन होंगे।

देवी महालक्ष्मी का पुरातन चित्र
देवी महालक्ष्मी का पुरातन चित्र

आरती के समय, कुछ स्त्रियों को गर्भगृह के भीतर आसन ग्रहण करने की अनुमति रहती है। जब घंटियों के नाद पर दीप घुमाकर देवी की आरती की जाती है, तब देवी के समीप बैठकर उन्हें निहारना एक दिव्य अनुभूति है।

अलंकृत महालक्ष्मी की मूर्ति
अलंकृत महालक्ष्मी की मूर्ति

देवी की महा अलंकार आरती दोपहर के समय की जाती है। श्री महालक्ष्मी को आकर्षक रंगों की रेशमी साड़ी पहनाकर उन्हें नाना प्रकार के अनेक आभूषणों द्वारा अलंकृत किया जाता है। इस प्रकार के आभूषण मुझे बाद में कोल्हापुर नगर की दुकानों में भी दिखाई दिए थे।

गर्भगृह के चारों ओर स्थित प्रदक्षिणा पथ मंदिर से अपेक्षाकृत साधारण प्रतीत हुई। इसका निर्माण ११वी. सदी में शिलाहारा राजवंश के राजा गंधारादित्य ने करवाया था। इसका अर्थ है मंदिर इससे भी पूर्व निर्मित है। देवी की प्रतिमा के ठीक पीछे की भित्ति पर थपथपाएं तो आपको विभिन्न शिलाखण्डों से भिन्न भिन्न स्वर सुनायी देंगे।

महाकाली एवं महासरस्वती

महालक्ष्मी की प्रतिमा के दाहिनी ओर एक छोटा सा मंदिर है जो देवी महाकाली को समर्पित है। वहीं बाईं ओर महासरस्वती को समर्पित एक और छोटा सा मंदिर है। ये तीन देवियाँ मिलकर शक्ति की उच्चतम त्रिमूर्ति की रचना करते हैं जो रजस, तमस एवं सत्व, इन तीन गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये तीनों प्रतिमाएं मुख्य मंदिर में हैं। दुर्गा सप्तशती के अनुसार महाकाली एवं महासरस्वती की उत्पत्ति महालक्ष्मी से ही हुई है।

गर्भगृह के समक्ष एक छोटा गणेश मंदिर है।

कूर्म मंडप

गर्भगृह के समक्ष दो मंडप हैं। एक है दर्शन मंडप जहां से महालक्ष्मी के दर्शन किये जाते हैं।

दूसरा है अष्टकोणीय रंगमंडप जिसे कूर्म मंडप कहा जाता है क्योंकि मध्य शिला एक कछुए के आकार में उत्कीर्णित है। इसे शंख तीर्थ मंडप भी कहते हैं क्योंकि यहाँ खड़े होकर पुजारीजी शंख द्वारा पवित्र तीर्थ जल भक्तों पर छिड़कते हैं। मैं भी वहां तीर्थ ग्रहण करने खड़ी हो गयी। पुजारीजी महालक्ष्मी के अभिषेक में प्रयुक्त जल लेकर आये एवं शंख द्वारा भरपूर तीर्थ जल हम भक्तों पर छिड़कने लगे। भक्तगण आँखें मूँद कर एवं मुँह खोलकर तीर्थ जल ग्रहण कर रहे थे।

मंदिर की सर्व संरचना गहरी काली शिला द्वारा की गयी है।

मातुलिंग

महालक्ष्मी मंदिर के गर्भगृह के ठीक ऊपर एक गुफा सदृश मंदिर है जिसके भीतर गणेश एवं नंदी के साथ मातुलिंग नामक शिवलिंग स्थापित है। यहाँ तक पहुँचने के लिए आपको कुछ सीढियां चढ़नी पड़ेंगी। यह एक गुफा मंदिर प्रतीत होता है।मातुलिंग मंदिर को प्रातःकालीन आरती के पश्चात कुछ क्षणों के लिए खोलते हैं। आप तब इसके दर्शन कर सकते हैं। मेरे अनुमान से इसके पश्चात इसे सम्पूर्ण दिवस बंद रखते हैं।

मातुलिंग तीर्थ स्थान १२वी. सदी में निर्मित है। यह मातुलिंग महालक्ष्मी के शीर्ष पर उत्कीर्णित लिंग का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि महालक्ष्मी के शीर्ष पर उत्कीर्णित लिंग भक्तगण देख नहीं पाते।

श्री यन्त्र

एक भित्ति के आले पर एक श्री यन्त्र उत्कीर्णित है। मुख्य देवी को अर्पित हल्दी, कुमकुम एवं पुष्प के समान इस श्री यन्त्र पर भी हल्दी, कुमकुम एवं पुष्प अर्पित किया गया था।

श्री यन्त्र को कांच से ढँका हुआ था जिसके कारण इसे ठीक से देख पाना संभव नहीं हो पाया।

महालक्ष्मी मंदिर परिसर के अन्य मंदिर

महालक्ष्मी मंदिर परिसर में नवग्रह मंदिर
महालक्ष्मी मंदिर परिसर में नवग्रह मंदिर

नवग्रह – यह मंदिर नौ ग्रहों को समर्पित है।
शेषशायी विष्णु – यह अष्टकोणीय संरचना पूर्वी द्वार के निकट है जिसके फलकों पर ६० जैन तीर्थंकर उत्कीर्णित हैं। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह नेमिनाथ को समर्पित है। तथापि, इस समय इसके भीतर विष्णु विराजमान हैं।
विट्ठल रुक्मिणी
दत्त मंदिर
राधाकृष्ण, कालभैरव, सिद्धिविनायक, सिंहवाहिनी, तुलजाभवानी, लक्ष्मी-नारायण, अन्नपूर्ण, इन्द्रसभा, रामेश्वर, नारायणस्वामी महाराज, ज्योतिबा तथा टेम्लाई बाई मंदिर।

विट्ठल रुक्मई मंदिर का पुराना चित्र
विट्ठल रुक्मई मंदिर का पुराना चित्र

कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर के उत्सव

प्रत्येक शुक्रवार के दिन, रात्रि लगभग साढे नौ बजे, मंदिर के चारों ओर महालक्ष्मीजी की पालकी के साथ एक शोभा यात्रा निकाली जाती है। कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर की मेरी इस यात्रा में मैं इस शोभायात्रा के दर्शन नहीं कर पायी। आशा है मुझे कोल्हापुर जाने का अगला अवसर शीघ्र प्राप्त होगा जब मैं यह शोभा यात्रा भी देख सकूँगी। इस साप्ताहिक अनुष्ठान के अलावा इस मंदिर में अन्य भी कई वार्षिक उत्सव मनाये जाते हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

महालक्ष्मी मंदिर की नवरात्रि

यह एक देवी मंदिर होने के कारण नवरात्रि यहाँ का सर्वाधिक लोकप्रिय उत्सव है। शरद नवरात्रि अर्थात् आश्विन मास के नौ दिवस उत्सवों से परिपूर्ण होते हैं। देवी की दैनिक अलंकार सज्जा अत्यंत भव्य होती है। नवरात्रि की प्रत्येक संध्या को उनकी पालकी निकली जाती है।

नवरात्रि के समय सजा हुआ कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर
नवरात्रि के समय सजा हुआ कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर

नवरात्रि के पांचवें दिन, अर्थात् ललिता पंचमी के दिवस, देवी यहाँ से ५ की.मी. दूर स्थित त्र्यम्बुली बाई मंदिर में भेंट करती है। भगिनी से भेंट करने का यह उनका वार्षिक नियम है। मार्ग में वे शाहू मिल में अल्प विश्राम करती है जहां उनकी पूजा की जाती है। छत्रपति , कोल्हापुर के स्थानीय राजा, देवी के लिए बलि चढ़ाते हैं। यहां वे देवी के रूप में एक कन्या के समक्ष तलवार से एक कद्दू को काटकर प्रतीकात्मक बलि चढ़ाते हैं।

नवरात्रि के आठवें दिवस अर्थात् अष्टमी के दिन देवी को एक तोप की सलामी दी जाती है। इस प्रथा का आरम्भ छत्रपति शिवाजी की पुत्रवधू रानी ताराबाई ने किया था। सलामी के पश्चात देवी पालकी में बैठकर नगर का भ्रमण करती है। भक्तगण उन्हें पान-सुपारी, साड़ी, पुष्प एवं अन्य पूजा सामग्री अर्पण करते हैं।

किरणोत्सव

कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर की संरचना कुछ इस प्रकार की गयी है कि वर्ष में दो बार सूर्य की किरणें देवी की प्रतिमा के भिन्न भागों पर गिरती हैं।

३१ जनवरी एवं ९ नवम्बर – सूर्य की किरणें महालक्ष्मी के चरणों पर पड़ती हैं।
१ फरवरी एवं १० नवम्बर – सूर्य की किरणें प्रतिमा के मध्य भाग पर पड़ती हैं।
२ फरवरी एवं ११ नवम्बर – सूर्य की किरणें महालक्ष्मी के सम्पूर्ण तन पर पड़ती हैं।
यह एक वास्तुकला का अचंभा ही है।

श्रृंगेरी के विद्याशंकर मंदिर में भी सूर्य की किरणें, हिन्दू पञ्चांग के १२ राशियों के अनुसार, मंदिर में उस राशि से सम्बंधित स्तंभ पर गिरती हैं।

रथोत्सव

अप्रैल मास में महालक्ष्मी की उत्सव मूर्ति रथ पर बैठकर भ्रमण करती है। उनकी स्वर्ण पालकी भी अत्यंत दर्शनीय है।

आसपास के बाजार

मंदिर के बाहर कुछ दुकानें हैं जहाँ रंगबिरंगी साड़ियाँ, चूड़ियाँ, आभूषण, नारियल तथा कमल पुष्प के गुच्छे बिकते हैं। दर्शनार्थी इच्छित वस्तुएं खरीदकर देवी को अर्पण करते हैं।

संध्या के समय आसपास की गलियाँ खाने-पीने की गुमटियों एवं खोमचेवालों से भर जाती हैं जो विभिन्न प्रकार के कोल्हापुरी व्यंजन बिक्री करते हैं।

कोल्हापुरी साज

महालक्ष्मी के असली आभूषण आप यहाँ इस अधिकारिक वेबस्थल पर देख सकते हैं। आप चाहें तो उन आभूषणों के स्वर्ण एवं चांदी में निर्मित प्रतिरूप आसपास की गालियों में स्थित दुकानों से खरीद सकते हैं।

कोल्हापुर का प्रसिद्द साज
कोल्हापुर का प्रसिद्द साज

मैंने एक सम्पूर्ण संध्या इन गलियों में भिन्न भिन्न आभूषणों को निहारते बिताई थी। कई आभूषण महालक्ष्मी की छवि से मुद्रित सिक्कों से बने हुए थे। कुछ आभूषणों में मूंगे की मोतियाँ जड़ी हुई थीं जो स्वर्ण को एक रंगीन आभा से सजा रही थीं। कुछ आभूषणों में मोतियों के स्थान पर स्वर्ण के ही छोटे छोटे गोले थे। वहां हार के कई आकर्षक लटकन थे जिन पर महालक्ष्मी की छवि थी।

मैंने यहाँ कई स्त्रियों को मंगलसूत्र खरीदते देखा। कई स्त्रियाँ महालक्ष्मी की छवि से मुद्रित आभूषण भी खरीद रही थीं। क्यों न खरीदें? महालक्ष्मी समृद्धि दात्री है। अंततः आभूषण शुभ समृद्धि का परम प्रतीक ही तो है।

कोल्हापुर के अन्य देवी मंदिर

कोल्हापुर देवी के मंदिरों का नगर है। यहाँ देवी के अनेक मंदिर हैं। आईये एक एक कर इनके दर्शन करते हैं।

जिस प्रकार महालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वती, तीनों देवियाँ महालक्ष्मी मंदिर संकुल में विराजमान हैं, उसी प्रकार, ये तीनों देवियाँ नगर में भी विराजमान हैं।

महाकाली मंदिर

यदि आप महालक्ष्मी मंदिर से रंकाला तालाब की ओर चलना आरम्भ करें, लगभग एक किलोमीटर आगे जाकर आपके बाईं ओर एक तोरण से सज्ज द्वार दृष्टिगोचर होगा। इसके भीतर प्रवेश कर एक संकरे पथ पर आगे जाएँ। बाईं ओर एक छोटा प्राचीन मंदिर है। मैंने इस मंदिर को अचानक ही खोज लिया था जब मैं नगर का पैदल भ्रमण कर रही थी।

कोल्हापुर का प्राचीन महाकाली मंदिर
कोल्हापुर का प्राचीन महाकाली मंदिर

हमने यहाँ महाकाली की एक प्राचीन मूर्ति देखी। हम भाग्यशाली थे क्योंकि उस समय देवी का अभिषेक आरम्भ था। हमें अभिषेक के साथ साथ देवी की मूल प्रतिमा देखने का स्वर्णिम अवसर एक बार फिर प्राप्त हुआ।

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इसके समीप इससे भी छोटा एक मंदिर है जिसके भीतर रसई देवी विराजमान हैं। मुझे उनके विषय में अधिक कुछ ज्ञात नहीं हो पाया।

रेणुका देवी मंदिर

कोल्हापुर की श्री रेणुका देवी की मूर्ति
कोल्हापुर की श्री रेणुका देवी की मूर्ति

रेणुका देवी महासरस्वती का ही एक स्वरूप है। यह मंदिर महाकाली मंदिर के दूसरी ओर स्थित है। यह एक छोटा किन्तु अत्यंत अनूठा मंदिर है। यहीं एक अन्य छोटा मंदिर परशुराम को भी समर्पित है जो रेणुका एवं ऋषि जमदग्नि के पुत्र हैं।

मातंगी देवी का मंदिर भी समीप ही स्थित है।

रेणुका देवी को यहाँ येल्लम्मा देवी का स्वरूप माना जाता है।

रेणुका जमदग्नि विवाह का आमंत्रण
रेणुका जमदग्नि विवाह का आमंत्रण

मुझे यहाँ की एक अनूठी रस्म के विषय में जानकारी मिली। यहाँ रेणुका एवं जमदग्नि का विवाह रचाया जाता है। बाहर एक फलक पर इस विषय में सूचना भी प्रदर्शित थी जहां आगामी कुछ दिनों पश्चात आयोजित होने वाले इस विवाह में सम्मिलित होने के लिए खुला निमंत्रण दिया गया था। ऐसा ही निमंत्रण मैंने द्वारका में रुक्मिणी विवाह का भी देखा था।

भवानी मंडप में तुलजा भवानी मंदिर

कोल्हापुर भवानी मंडप में तुलजा भवानी का मंदिर
भवानी मंडप में तुलजा भवानी का मंदिर

भवानी मंडप वास्तव में एक प्राचीन महल है। तुलजा भवानी इस क्षेत्र के राजपरिवार की कुलदेवी है। उनका मंदिर अब भी पुराने महल के परिसर में है जबकि कालान्तर में महल कोल्हापुर के नवीन क्षेत्र में स्थानांतरित हो गया था।

मैंने तुलजा भवानी की प्रतिमा कशी की पञ्च क्रोशी यात्रा पर भी देखी थी।

यहाँ के खुले प्रांगण में मुझे मेरी पिछली यात्रा के समय दंड पट्टा देखने का अवसर मिला था। दंड पट्टा मराठा स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला युद्ध कौशल नृत्य है। आईये मैं आपको इसका विडियो दिखाती हूँ:

त्रिअम्बुली अर्थात् टेम्लाई देवी मंदिर

यह नगर से कुछ किलोमीटर दूर स्थित यह एक छोटा मंदिर है। नवरात्रि के पांचवे दिवस अर्थात् ललिता पंचमी के दिन देवी महालक्ष्मी इस मंदिर में अपनी बहन त्रिअम्बुली से भेंट करने आती हैं।

त्रिअम्बुली देवी मंदिर - कोल्हापुर
त्रिअम्बुली देवी मंदिर – कोल्हापुर

इससे सम्बंधित एक कथा के अनुसार जब महालक्ष्मी असुर कोल्हासुर से युद्ध कर रही थी, उस समय इस क्षेत्र के राजा की पुत्री उनकी सहायता कर रही थी। किन्तु युद्ध समाप्ति के पश्चात देवी उस कन्या के विषय में भूल गयी। इससे कन्या का मन दुखी हो गया। इसकी अनुभूति होते ही देवी ने कन्या से भेंट की तथा उसे वरदान दिया कि कोल्हापुर में उसकी भी आराधना की जायेगी। वर्ष में एक बार वे उससे भेंट करने उसके मंदिर अवश्य आयेंगी, ऐसा उन्होंने कन्या को वचन भी दिया। इस परंपरा का आज भी पालन किया जाता है।

त्रिअम्बुली देवी की प्रतिमा
त्रिअम्बुली देवी की प्रतिमा

त्रिअम्बुली देवी को प्रेम से टेम्लाई भी पुकारते हैं। इन्हें महालक्ष्मी देवी की छोटी बहन माना जाता है।

समीप ही मंगई देवी को समर्पित एक मंदिर है।

कपिलेश्वर अथवा कपिल तीर्थ मंदिर

प्राचीन कपिलेश्वर मंदिर या श्री कपिल तीर्थ
प्राचीन कपिलेश्वर मंदिर या श्री कपिल तीर्थ

कुछ ही दूरी पर एक सब्जी मंडी है। कौतुहलवश हमने मंडी में प्रवेश किया। कदाचित कोई दैवीय शक्ति हमें वहां खींच कर ले गयी थी। वहां हमने छोटा किन्तु प्राचीन कपिलेश्वरी मंदिर खोज निकाला। ठेठ चालुक्य शैली के स्तंभों पर खड़ा यह एक प्राचीन शिव मंदिर है।

बाद में हमने टाउन हॉल संग्रहालय देखा। वहां हमने कई ऐसी कलाकृतियाँ देखीं जो इस परिसर में हुई खुदाई के समय प्राप्त हुई थीं। हमें यह भी बताया गया कि बाजार उस स्थान पर है जहां एक समय मंदिर का जलकुण्ड था। सुनकर अत्यंत दुःख हुआ।

लिंग के स्थान पर श्री यन्त्र
लिंग के स्थान पर श्री यन्त्र

यहाँ तक कि नगर के सभी मंदिरों के जलकुण्ड अब अस्तित्वहीन हैं।

कोल्हापुर में मेरी सर्वाधिक अद्भुत खोज थी एक श्री यन्त्र जिसे एक योनी पर शिवलिंग के समान उत्कीर्णित किया गया है। यह एक अद्वितीय नक्काशी है जिसे मैंने इससे पूर्व कभी नहीं देखा था।

संग्रहालय में मैंने अनुभव किया कि किसी काल में नगर का विशाल तीर्थ क्षेत्र अथवा शक्ति क्षेत्र कितना कला व संस्कृति संपन्न रहा होगा।

कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर के लिए यात्रा सुझाव

कोल्हापुर पुणे एवं मुंबई जैसे महानगरों से सड़क एवं रेल मार्ग से सुव्यवस्थित ढंग से जुड़ा हुआ है।

कोल्हापुर में ठहरने के लिए हर श्रेणी के अनेक अतिथिगृह हैं। आलीशान होटलों में मुझे केवल सयाजी के विषय में ज्ञात है। हम मराठा रेजीडेंसी में ठहरे थे। मुनासिब मूल्य में उपलब्ध यह अतिथिगृह मूल सुखसुविधा संपन्न था।

महालक्ष्मी मंदिर भक्तों के लिए प्रातः ४:३० बजे खुलता है तथा रात्रि ९:३० तक खुला रहता है।

मंदिर के भीतर छायाचित्रिकरण की अनुमति नहीं है। कुछ दूरी से इसके चित्र ले सकते हैं।

मंदिर परिसर के बाहर एवं भीतर दुकानें हैं जहां से आप पूजा सामग्री ले सकते हैं। यह एक भीड़भाड़ भरा मंदिर है। विशेषतः मंगलवार एवं उत्सवों के दिवसों में यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है।

कोल्हापुर के अन्य मंदिर प्रातः से संध्या तक खुले रहते हैं। इन मंदिरों में नाममात्र की भीड़ रहती है। जब मैंने इन मंदिरों के दर्शन किये, तब वहां गिनती के ही दर्शनार्थी उपस्थित थे।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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