भारत के जलगत पुरातत्व – अवसरों का सागर

0
1577

अनुराधा : नमस्ते। इंडीटेल्स के अन्तर्गत, डीटुअर्स में चर्चा करने के लिए आज हमारे साथ है, डॉ. अनुरुद्ध सिंह गौर, जो एक समुद्री पुरातत्त्वविद् (marine archeologist) हैं। जलगत पुरातत्व से मेरा सर्वप्रथम सामना तब हुआ था जब मैं द्वारका गयी थी। मैंने उससे संबंधित एक पुस्तक भी पढ़ी थी जिसके लेखक डॉ. एस आर राव थे, जिन्होंने द्वारका के पुरातत्व पर शोध किया था। तब मुझे ज्ञात हुआ कि यह शोध कार्य राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान, गोवा (National Institute of Oceanography) द्वारा किया गया था जो मेरे घर के अत्यंत समीप स्थित है। तब मैंने डॉ. अनुरुद्ध सिंह गौर से अनुरोध किया कि वे हमें जलगत पुरातत्व के विषय में कुछ जानकारी दें। अनुरुद्ध जी, डीटुअर्स में आपका स्वागत है।

भारत का जलगत पुरातत्व

ए एस गौर : आपका बहुत बहुत धन्यवाद अनुराधा जी। मुझे यह जानकार प्रसन्नता हुई कि जलगत पुरातत्व में आपकी रूचि है। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान में हमारा यह अधिदेश होता है, हमारा ध्येय होता है कि हम समुद्र विज्ञान के प्रत्येक आयाम के विषय में जानकारी प्राप्त करें। इसके अंतर्गत समुद्र संबंधी भौतिकी, रसायन विज्ञान एवं जीव विज्ञान तीनों आते हैं। हम में से वैज्ञानिकों का एक छोटा समूह जलगत पुरातात्विक धरोहरों पर भी कार्य कर रहा है।

जलगत पुरातत्व क्या है?

समुद्र की सतह कभी स्थिर नहीं रहती। वह ऊपर-नीचे होती रहती है।

ऐसा कहा जाता है कि १०,००० वर्ष पूर्व समुद्र की सतह आज से लगभग १०० मीटर नीचे थी। इसका अर्थ है कि आज जो क्षेत्र जलगत है, वह उस काल में जल से बाहर था। उस समय तटीय क्षेत्र की अधिकाँश जनसँख्या उन स्थानों में निवास करती थी।

जलगत वसाहत

जलगत पुरातत्व का एक आयाम है, जलगत खँडहर। प्राचीन काल से समय के साथ लम्बे समय के लिए अनुपलब्ध जैसे जैसे समुद्र का स्तर बढ़ने लगा, वैसे वैसे अनेक वसाहती क्षेत्र जलगत हो गए। इससे हम जैसे पुरातत्ववेत्ताओं के लिए शोध के अवसर उत्पन्न हो गए हैं।

जब समुद्र का स्तर १-२ मीटर बढ़ा तब उन क्षेत्रों में, जहाँ भूमि की ढलान अधिक नहीं थी, इसका अधिक प्रभाव पड़ा, जैसे गुजरात एवं तमिल नाडू। इससे वहाँ की वसाहत भी प्रभावित हुई। प्राचीन काल में गुजरात के तटीय क्षेत्र में १ मीटर जल स्तर बढ़ने पर ही एक बड़ा क्षेत्र वसाहत के लिए उपलब्ध नहीं रहा। लोग उस स्थान को त्याग कर स्थानांतरित हो गए। वह स्थान जलगत खँडहर बन गया। अब उसकी पुनः खोज करने का सुअवसर हमें प्राप्त हुआ।

जहाजों के अवशेष

जलगत पुरातत्व का दूसरा आयाम है, जहाजों के अवशेष। सिन्धु घाटी सभ्यता से भी पूर्व से जल परिवहन मनुष्य जाति का अभिन्न अंग रहा है। उसने समकालीन संस्कृति एवं सभ्यता के साथ व्यापार एवं वाणिज्य को जन्म दिया। अनेक सूत्रों से यह सर्वविदित है कि सिन्धु घाटी सभ्यता के लोगों ने मेसोपोटामिया एवं मिस्र सभ्यता के लोगों के साथ जल मार्ग द्वारा ही व्यापार किया था। ओमान एवं संयुक्त अरब अमीरात की पुरातनता के कारण व्यापार के लिए थल मार्ग उपलब्ध नहीं था। थल मार्ग होता भी तो अत्याधिक लंबा होता। वहीं जल मार्ग अपेक्षाकृत अत्यंत छोटा था।

भारत का जलगत पुरातत्व मानचित्र
भारत का जलगत पुरातत्व मानचित्र

यदि आप मेसोपोटामिया एवं मिस्र से तुलना करें तो सिन्धु घाटी सभ्यता का तटीय क्षेत्र सर्वाधिक लंबा था। इसी कारण अपने समकालीन सभ्यताओं की तुलना में सिन्धु घाटी सभ्यता की समुद्री गतिविधियाँ अपेक्षाकृत अत्यधिक उन्नत थी। जल मार्ग द्वारा परिवहन में मानवी त्रुटियों एवं अनपेक्षित प्रतिकूल हवामान की भी संभावना अत्यधित रहती है। इन सब का परिणाम होता है, बड़े बड़े पोतों का जलमग्न हो जाना। भारतीय तटीय क्षेत्रों के निकट हमें समुद्र तल पर अनेक पोतों के अवशेष मिले हैं।

व्यापार एवं वाणिज्य

तीसरा प्रमुख आयाम जिसे हम समझने का प्रयास करते हैं, वह है व्यापार एवं वाणिज्य। इनका अनेक अभिलेखों में उल्लेख किया गया है। जैसे एक विदेशी सूत्र, ‘पेरिप्लस ऑफ दि एरिथ्रीयन सी’ में कहा गया है कि मध्य भारत के उज्जैन से अनेक वस्तुओं का जल मार्ग द्वारा व्यापार किया जाता था जिसके लिए उन वस्तुओं को सर्वप्रथम वर्यकाजा अथवा भरुकच्च  के तट पर लाया जाता था। इस प्रकार समुद्री विज्ञान के अंतर्गत अनेक विषयों पर शोध किया जा सकता है।

मानवी सभ्यता के विकास में समुद्री क्रियाकलापों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जल परिवहन द्वारा विचारों का आदान-प्रदान संभव हो पाया जो विकास का एक प्रमुख आयाम है। समुद्री क्रियाकलापों एवं व्यापार मार्गों ने एक दूसरे की आवश्यकताओं को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अन्यथा यदि सभ्यताएँ संकुचित रह जातीं तो आज उनका इतना विकास नहीं हो पाता।

सिन्धु घाटी सभ्यता के समय सभ्यता की जो नींव रखी गयी थी, वह अनवरत चलती रही। न्यूटन के विज्ञान के पश्चात भी सभ्यता में परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं थी। ना नगर नियोजन में किसी परिवर्तन की आवश्यकता रही, ना ही धातु विज्ञान, माप प्रणाली, कृषि प्रणाली आदि में।

गुजरात का समुद्री पुरातत्व

हमने अपने शोध का आरंभ गुजरात से किया था जहाँ हमें सभी कालखंडों के अवशेष प्राप्त हुए थे। उनमें सिन्धु घाटी सभ्यता, विभिन्न ऐतिहासिक कालखंड, मध्यकालीन कालखंड आदि सम्मिलित हैं। गुजरात तट की लंबाई लगभग २००० किलोमीटर है। वहाँ अनेक बंदरगाह हैं। हमने हमारा प्रथम अन्वेषण द्वारका एवं बेट द्वारका से आरंभ किया था। यह एक ऐसा इकलौता स्थान है जो शेष सौराष्ट्र से ओखा रण नामक रण द्वारा पृथक है। इस क्षेत्र को ओखा मंडल भी कहते हैं। प्राचीन काल में इसे उषा मंडल भी कहते थे क्योंकि इसका संबंध महाभारत के एक पात्र अनिरुद्ध एवं उनकी पत्नी उषा से है।

बेट द्वारका से प्राप्त लंगर
बेट द्वारका से प्राप्त लंगर

ओखामंडल में अनेक पुरातात्विक स्थल हैं, जैसे द्वारका, बेट द्वारका एवं नागेश्वर। वहाँ एक दर्जन से भी अधिक ऐसे स्थल हैं जो ऐतिहासिक कालखंड तथा मध्यकालीन कालखंड के हैं। ये सभी स्थल किसी ना किसी वर्त्तमान कालीन धार्मिक सिद्धांतों से जुड़े हुए हैं। उनमें से प्राचीनतम सिद्धांत है, नागेश्वर, जो एक सिन्धु घाटी सभ्यता का स्थल है। द्वारका अथवा बेट द्वारका तथा अन्य स्थल आरंभिक ऐतिहासिक कालखंड एवं मध्यकालीन सभ्यता से संबंधित हैं। समुद्र के भीतर शोध के द्वारा हमने यही जानकारी एकत्र की है तथा देखा है।

द्वारका

द्वारका में जल के भीतर, लगभग ३ से १० मीटर की गहराई में हमें अनेक संरचनाओं के अवशेष प्राप्त हुए। उन शैल संरचनाओं में कुछ भित्तियाँ, गोलाकार शैल संरचनाएं आदि प्रमुख हैं। वहाँ हमें बड़ी संख्या में शैल लंगर भी प्राप्त हुए। यह इस ओर संकेत करता है कि यहाँ बंदरगाह था। बंदरगाहों में लंगरों की आवश्यकता होती है। उन अवशेषों से यह संकेत प्राप्त होता है कि वह प्राचीनतम बंदरगाहों में से एक था। वहाँ डॉ. राव एवं डेक्कन कॉलेज द्वारा किये गए भूमि उत्खनन के कार्य से यह जानकारी प्राप्त हुई कि द्वारका का लगभग पाँच से छः गुना क्षेत्र जलमग्न हो गया तथा बालू के नीचे दब गया।

हमने देखा है कि सुनामी तथा चक्रवाती तूफानों जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण पूर्वी तटों को भारी क्षति पहुँची है। जैसे सन् २००४ में आयी सुनामी का परिणाम हम सब ने देखा है। इस प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं का सामना द्वारका ने भी किया होगा। अनेक ज्ञात सूत्रों में इनका उल्लेख किया गया है। महाभारत में भी कहा गया है कि द्वारका समुद्र में समा गयी थी। यह सत्य है कि नगरी का अधिकाँश भाग समुद्र द्वारा नष्ट हो गया था।

बेट द्वारका

बेट द्वारका में जब हम घाट के निकट अन्वेषण कर रहे थे, हमें एक पोत के अवशेष प्राप्त हुए। यदि हमारा अनुमान सही है तो यह प्राचीनतम पोत अवशेष हैं जो भारत-रोम काल का है। ये अवशेष अनुमानतः १८००-२००० वर्ष प्राचीन हो सकते हैं। ये अवशेष उस स्थान पर अब तक के प्राचीनतम अवशेष हैं जिन्हें हमने खोज निकाला था।

द्वारका जलगत पुरातत्त्व
द्वारका जलगत पुरातत्त्व

बेट द्वारका में हमें मछली पकड़ने का एक सुन्दर काँटा मिला जो वहाँ के भूभाग क्षेत्र से प्राप्त हुआ। यह काँटा सिन्धु घाटी सभ्यता के अंतिम भाग का प्रतीत होता है। कदाचित ४००० वर्ष प्राचीन है। उस मछली पकड़ने के कांटे में जिस तकनीक का प्रयोग किया गया था, वही तकनीक अब भी प्रयोग में लाई जाती है।

इस कांटे की लम्बाई लगभग ७ सेंटीमीटर है। जब हमने वहाँ के स्थानिकों से चर्चा की, उन्होंने हमें बताया कि इस कांटे से लगभग १०-१५ किलो की बड़ी मछली को पकड़ा जा सकता है। ऐसी मछलियाँ गहरे पानी में होती हैं जिनको पकड़ने के लिए उन्हें किसी नौका की आवश्यकता पड़ी होगी। इस प्रकार हमें एक कलाकृति से ही कई जानकारियाँ प्राप्त हो जाती हैं।

पावन शंख

बेट द्वारका क्षेत्र का अन्वेषण इस ओर संकेत करता है कि इस क्षेत्र में शंखों की कार्यशालाएं थीं। हमें यहाँ अनेक पवित्र शंख प्राप्त हुए जो भगवान विष्णु का प्रतीक हैं। यहाँ अनेक प्रकार की मछलियाँ भी पायी जाती थीं। जब हम ओखामंडल क्षेत्र से दक्षिण की ओर आये तब हम मूल द्वारका एवं विश्वाड़ा पहुँचे। गुजरात में चार द्वारका हैं। यहाँ भी हमें उसी प्रकार की वस्तुएं प्राप्त हुईं। जल के भीतर हमें शैल लंगर मिले, वहीं जलमग्न भूभाग में आरंभिक ऐतिहासिक काल के अवशेष मिले। २० किलोमीटर उत्तर में हमें हड़प्पा काल के अवशेष प्राप्त हुए।

पोरबंदर में हमें अनेक साक्ष्य प्राप्त हुए जो मध्यकाल के साथ साथ ब्रिटिश काल की ओर संकेत करते हैं। पूर्व की ओर नवीबंदर है जहाँ तट पर एक दुर्ग है। यह दुर्ग डाकुओं से नाविकों का संरक्षण करता था। हमें अनेक ऐसे साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जो यह संकेत करते हैं कि वहाँ के निवासी विदेशों से व्यापार व वाणिज्य संबंध बनाए हुए थे। अब हम सोमनाथ आते हैं, जिसे प्रभास क्षेत्र भी कहते हैं। मंदिर के दक्षिणी ओर भी हमें वही शैल लंगर इत्यादि प्राप्त हुए जो द्वारका में प्राप्त हुए थे। प्रभास स्वयं की एक हड़प्पा स्थल है जहाँ से हमें हड़प्पा पूर्व के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

डेक्कन कॉलेज द्वारा किये गए उत्खनन से यह ज्ञात हुआ कि नदी के समीप एक गोदाम था। यह स्थान हिरण्य नदी के किनारे है जो आगे जाकर समुद्र में विलीन हो जाती है। वह स्थान उस काल में अवश्य एक बन्दरगाह रहा होगा। समुद्री क्रियाकलापों का एक प्रमाणिक साक्ष्य शैल लंगर को माना जा सकता है।

शैल लंगर

अनुराधा : इन शैल लंगरों की आयु कैसे अनुमानित की जाती है?

ए एस गौर : यह लंगरों की निर्मिती तकनीक पर निर्भर करता है। प्राचील काल के लंगर शिला द्वारा बनाए जाते थे जबकि अब लोहे का प्रयोग किया जाता है। प्राचीन लंगरों में स्थानीय शिलाओं का प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार शिलाओं के प्रकार एवं तकनीक द्वारा हम उनकी आयु का अनुमान लगा सकते हैं।

सोमनाथ से कोडीनार आते हैं जो पुनः एक मूल द्वारका क्षेत्र है। वहाँ तट पर दो हड़प्पा स्थल हैं। उस क्षेत्र में लगभग आधा दर्जन प्रारंभिक ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल हैं। मूल द्वारका, जहाँ द्वारकाधीश मंदिर स्थित है, एक ४-५ मीटर ऊँची बेलनाकार संरचना है। स्थानिक इसे दिवा दांडी कहते हैं जिसका अर्थ है प्रकाश स्तंभ। सन् १९८० तक इसका उपयोग किया जाता था जिसके पश्चात एक चक्रवात ने इसके ऊपरी भाग को क्षतिग्रस्त कर दिया था। यदि हमारा अनुमान तथा स्थानिकों की मान्यता सही हैं तो मध्यकालीन, लगभग १२-१३वीं सदी का यह प्रकाश स्तंभ भारत का प्राचीनतम जीवित प्रकाश स्तंभ है।

हमें ऐसे प्रमाण मिले हैं जो यह संकेत करते हैं कि गुजराती व्यापारी सुकुत्रा द्वीप जाते थे जो यमन के दक्षिणी ओर स्थित है। वहाँ हक नामक एक गुफा है जहाँ से लगभग २०० अभिलेख प्राप्त हुए हैं। उनमें से लगभग १८० अभिलेख ब्राह्मी में लिखित हैं जो १-३री सदी से सम्बद्ध हैं। हक गुफा में कई मुहरें भी मिली हैं जिनकी रूपरेखा एवं उन पर किये गए चित्र अथवा अभिलेख भरूच में प्राप्त मुहरों जैसे हैं।

शिकोत्रा माता मंदिर

गुजरात में अनेक तटीय मंदिर हैं जो शिकोत्रा माता या सिकोतर माता को समर्पित हैं। डॉ. एस आर राव तथा मेरा भी मानना है कि शिकोत्रा माता नाम या सिकोतर माता नाम सुकुत्रा द्वीप से ही आया है क्योंकि लोग जब अपनी नौकाएं लेकर सुकुत्रा द्वीप तक जाकर वापिस आते थे तब अपनी सुरक्षित यात्रा के लिए माता का धन्यवाद करते थे। हमने भारत में देखा है, जो भी मानव का संरक्षण करता है, हम उसकी आराधना करते हैं।

अनुराधा : जैसे शक्ति माता यात्राओं में तथा अन्यथा भी हमारी सदैव रक्षा करती हैं।

ए एस गौर : सत्यनारायण की कथा में भी यही बताया गया है जहाँ व्यापारी व्यापार के लिए अपने बेड़े लेकर दूर-सुदूर देशों में जाते हैं तथा वापिस आकर भगवान की पूजा करते हैं। ये सभी कथाएं व्यापारी समाज से ही संबंधित होती हैं। इनके अतिरिक्त हड़प्पा स्थल लोथल एवं गोगा में भी अनेक प्रमाण मिले हैं। ये तटीय स्थल हैं। भारत सरकार अब इसे राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर के रूप में विकसित कर रही है। इस प्रकार गुजरात प्राचीन समुद्री व्यापार एवं वाणिज्य के सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयामों का साक्षी रहा है। सभ्यता के आरम्भ से व्यापार गुजरातियों के खून में बसा हुआ है। दक्षिण की ओर महाराष्ट्र में आयें तो सोपारा एक महत्वपूर्ण स्थल है जहाँ एलिफेंटा जैसे अनेक व्यापारिक केंद्र स्थल थे।

महाराष्ट्र का समुद्री पुरातत्व

अनुराधा : एलिफेंटा एक दुर्लभ गुफा प्रणाली है जो पूर्णतः भगवान शिव को समर्पित है। एक प्रकार से यह कहा जा सकता है कि इन गुफाओं में सम्पूर्ण शिव पुराण लिखा हुआ है। यह द्वीप एक व्यापारिक बन्दर के रूप में कैसा रहा होगा?

ए एस गौर : यह वास्तव में घारापुरी के नाम से जाना जाता था। यह भारत-रोम काल में एक बंदरगाह था जब समुद्र का स्तर अपेक्षाकृत नीचे था। कदाचित उस समय कल्याण या सोपारा जैसे बंदरगाह नहीं थे। रोम के सिक्के तथा उस काल से संबंधित अनेक वस्तुएं यहाँ प्राप्त हुए हैं।

दाभोल

दक्षिण की ओर जाते हुए हम दाभोल पहुँचते हैं। यहाँ तट पर एक अनोखा लोयलेश्वर मंदिर है। लंगर का अर्थ मराठी भाषा में लोयली होता है। इस मंदिर में वे एक लंगर को ही देवी के रूप में पूजते थे। दाभोल मुंबई से लगभग २०० किलोमीटर दक्षिण की ओर स्थित है। उससे दक्षिण की ओर आयें तो वहाँ विजयदुर्ग किला एवं पोतगाह है जो मराठा कालीन है। इसके दक्षिण की ओर सिंधुदुर्ग है। यह दुर्ग एक छोटे द्वीप पर स्थित है। वहाँ भी हमें शैल लंगर प्राप्त हुए हैं।

गोवा से प्राप्त लंगर
गोवा से प्राप्त लंगर

गोवा में भी हमें ४-५ पोतों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। पिलार क्षेत्र के निकट एक बन्दरगाह है जिसका नाम गोपकपट्टनम है। वहाँ हमें ऐसे प्रमाण मिले है जो यह संकेत करते हैं कि वह एक बंदरगाह था तथा यहाँ से व्यपारिक गतिविधियाँ की जाती थीं। केरल में हमने कोल्लम में भी गोताखोरी की है। वहाँ से हमें कई चीनी सिक्के प्राप्त हुए हैं। कदाचित वहाँ भी कोई पोत दुर्घटनाग्रस्त हुआ था क्योंकि खोज के समय वहाँ से बड़ी संख्या में सिक्के एवं कुम्हारी के अवशेष मिले हैं।

अनुराधा : केरल में अब भी मछली पकड़ने के लिए चीनी जाल का प्रयोग किया जाता है।

ए एस गौर : ऐसा लगता है कि चीन से लोग व्यापार के लिए कोल्लम तक आते थे। यहाँ से वे वस्तुएं अन्य पोतों द्वारा विभिन्न स्थानों तक पहुँचाते थे। कोल्लम में एक चाइना कॉलोनी भी है। गुजरात के हाथा में भी हमें एक लंगर मिला था जो चीनी लंगर के समान था।

लक्षद्वीप के दक्षिणतम द्वीप, मिनिकॉय में हमने तीन से चार दुर्घटनाग्रस्त पोतों का अन्वेषण किया था।

भारत के पूर्वी तट के पुरातत्व स्थल

भारत के पूर्वी तट पर एक प्रसिद्ध स्थल है, पूम्पुहार जहाँ पर हमने पुरातात्विक अन्वेषण किया था। हमें यह सुझाया गया था कि पश्चिमी तट पर बसे द्वारका के ही समान भारत के पूर्वी तट पर भी पूम्पुहार में संगम काल में एक नगरी बसी हुई थी। पाँच से छः मीटर गहरे अंतर्ज्वारीय क्षेत्र में हमें उस समय के कुम्हारी के अवशेष प्राप्त हुए थे। स्थानिक किवदंतियों के अनुसार वहाँ के राजा ने इंद्रदेव का उत्सव नहीं मनाया था जिसके कारण वह नगरी जलमग्न हो गयी थी। अब हम कह सकते हैं कि वह नगरी वास्तव में जलमग्न हो गयी थी।

द्वारका में मिले पाषाण लंगर
द्वारका में मिले पाषाण लंगर

कुछ उत्तर की ओर, महाबलीपुरम में कुछ रोचक परम्पराएं थीं। वहाँ ७ मंदिर अस्तित्व में थे जिनमें से छः जलमग्न हो गए। यद्यपि इसका भारतीय साहित्यों में कोई उल्लेख नहीं है। इसका प्रलेखन एक ब्रिटिश यात्री ने किया है। उसके आधार पर हमने यहाँ खोजबीन आरम्भ की। हमें ३-५ मीटर की गहराई में कुछ मानव निर्मित संरचनाएं अवश्य दिखीं किन्तु हम विश्वास के साथ यह नहीं कह सकते कि वे मंदिर ही हैं। कुछ अवशेष ९ मीटर की गहराई तक भी बिखरे हुए हैं। उन पर अधिक अन्वेषण शेष है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि उन कथाओं में कुछ सत्यता अवश्य होगी।

सुनामी

अनुराधा : लोग कहते हैं कि सन् २००४ में जब सुनामी आई थी तथा जब पानी पीछे हटा, तब ये संरचनाएं दृश्यमान होने लगीं थी। किसी ने उनका चित्र भी लिया था। इसमें कितनी सत्यता है?

ए एस गौर : उस स्थान का कोई भी मानचित्र अथवा उपग्रह चित्रण उपलब्ध नहीं है। यह सब अचानक ही हुआ था। उस समय किसी के पास आधुनिक कैमरे नहीं होते थे। इसी कारण उसका कोई प्रमाण नहीं है। अनेक लोगों ने हमें बताया कि जब ये मंदिर के अवशेष दृश्यमान हुए थे, तब उन लोगों ने उन्हें देखा था। पुरातत्व शास्त्र में एक वर्गीकरण है, वसाहती स्थल। जब हमें वहाँ कुम्हारी आदि के कोई अवशेष नहीं मिलते तो हम उस स्थल को वसाहती स्थल के वर्गीकरण में नहीं रखते। वहाँ से मिले अवशेषों के अनुसार हमने यह अनुमान लगाया है कि वे वसाहती स्थल थे। १९वीं सदी तक भी वहाँ स्तंभ आदि के कुछ अवशेष उपलब्ध थे। उनके चित्र भी लिए गए थे तथा प्रकाशित किये गए थे।

वैशाखेश्वर मंदिर

उत्तर की ओर जाते हुए हम वैशाखेश्वर मंदिर की चर्चा करते हैं जिस पर आंध्रा विश्विद्यालय ने कुछ अन्वेषण कार्य किया है। इस स्थान पर कुछ मध्यकालीन मंदिर जलगत अवस्था में उपस्थित हैं। किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा ने इन्हें नष्ट किया होगा।

अनुराधा : ऐसा कहा जाता है कि विशाखापटनम का नाम विशाखा देवी मंदिर के नाम पर रखा गया है। इससे यह अनुमान लगता है कि वहाँ विशाखेश्वर मंदिर भी रहा होगा। लोक कथाओं के अनुसार किसी कारण से यह मंदिर भी समुद्र के जल में समा गया था। क्या इस मंदिर के भी कोई अवशेष वहाँ मिले हैं?

ए एस गौर : हमने अभी तक उन स्थलों का अन्वेषण आरम्भ नहीं किया है। ओडिशा की ओर आयें तो वहाँ चिलिका सरोवर है जो जल परिवहन क्षेत्र में अत्यंत सक्रिय था। लोग वहाँ से दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों की यात्रा करते थे। वहाँ पर भी अनेक पुरातात्विक स्थल हैं जहाँ पर उत्खनन का कार्य किया गया है। वहाँ से उत्तर की ओर ताम्रलिप्ति बन्दरगाह था जो आरंभिक ऐतिहासिक काल में अत्यंत प्रसिद्ध था। यह बंदरगाह गंगा के मुहाने पर स्थित था। यहाँ से वाराणसी एवं कानपुर जैसे गंगा के मैदानी क्षेत्रों तक व्यापार मार्ग उपलब्ध था तथा यह मार्ग व्यापार के लिए लोकप्रिय था।

जलगत पुरातत्व – समुद्र या नदियाँ या सरोवर?

अनुराधा : मैंने १५-१६वीं सदी की कुछ बंगाली काव्य रचनाओं में इनके विषय में पढ़ा था। एक प्रश्न है, क्या आप पुरातात्विक उत्खनन केवल समुद्र में करते हैं कि नदियों तथा सरोवरों में भी करते हैं?

ए एस गौर : जब हम जलगत अथवा जलगत पुरातत्व कहते हैं तब उसमें सभी सम्मिलित होते हैं। अब तक हमने मीठे जल के स्त्रोतों के भीतर कोई उत्खनन कार्य आरम्भ नहीं किया है। अब तक हमने पुरातत्व अन्वेषण कार्य को समुद्र तक ही सीमित किया हुआ था। अर्थशास्त्र में कहा गया है कि जल मार्ग थल मार्ग की तुलना में अधिक सुगम तथा सस्ता होता है। उस काल में ही उन्होंने इसका अनुमान लगा लिया था। वे जान गए थे कि मगध से गंगा नदी द्वारा परिवहन व्यापार के लिए अधिक लाभकारी होगा। किन्तु नदियों के तल इसकी ठोस जानकारी नहीं दे पाते क्योंकि नदियाँ बहुधा अपना मार्ग परिवर्तित करती रहती हैं। नदियों के घाटों पर भी नवीनीकरण का कार्य समय समय पर किया जाता रहा है।

व्यवसाय के रूप में जलगत पुरातत्व

अनुराधा : प्रिय पाठकों, मैं आपको अनुरुद्ध जी के विषय में बताना चाहूंगी कि भारत में आज केवल तीन ही  समुद्री पुरातत्वविद् हैं तथा अनुरुद्ध जी उनमें से एक हैं। सर, क्या आप हमें बता सकते हैं कि यदि किसी को जलगत पुरातत्व को व्यवसाय के रूप में अपनाना हो तो उसे क्या करना चाहिए? उनके लिए कैसे अवसर उपलब्ध हैं?

ए एस गौर : एक योग्य पुरातत्वविद् के पास पुरातत्व शास्त्र तथा प्राचीन इतिहास में स्नातकोत्तर की उपाधि होनी आवश्यक है। उसे गोताखोरी भी सीखनी पड़ती है। भारत में अब इसके अनेक अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। यह एक अनछुआ क्षेत्र है। पुरातत्व स्थलों को पर्यटन स्थलों के रूप में भी विकसित किया जा सकता है। जैसे द्वारका, बेट द्वारका तथा महाबलीपुरम में यह किया जा सकता है क्योंकि वहाँ का जल पारदर्शी है। हम जलगत धरोहर स्थलों का विकास कर सकते हैं। सामान्य जनता को इनकी अधिक जानकारी नहीं है।

एक दक्ष पुरातत्वशास्त्री ही ऐसा कर सकता है तथा इस कार्य को आगे ले जा सकता है। जैसे पर्यटक ताज महल, कुतुब मीनार आदि देखने जाते हैं, उसी प्रकार उन्हें इस ओर भी आकर्षित किया जा सकता है। यह देशी एवं विदेशी दोनों पर्यटनों के लिए उत्तम अवसर प्रदान कर सकता है।

अवसर

अनुराधा : पुरातत्व शास्त्र में आवश्यक ज्ञान अर्जित करने के पश्चात हमारे लिए कैसे अवसर उपलब्ध हैं? हमें व्यवसाय के अवसर कौन प्रदान कर सकता है? भारत में समुद्री अथवा जलगत पुरातत्व का क्या भविष्य है?

ए एस गौर : वास्तव में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अंतर्गत जलगत पुरातत्व भी एक छोटा सा भाग है। किन्तु अभी सक्रिय नहीं है। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के अंतर्गत हम इस पर कार्य कर रहे हैं। भारत में इसके असीमित अवसर उपलब्ध हैं। भारत का लम्बा तटीय क्षेत्र है। उसके प्रत्येक भाग में जलगत उत्खनन अनुसंधान एवं व्यावसायीकरण के असीमित अवसर उपलब्ध हैं। लोग गोताखोरी सीख रहे हैं। लोग इस प्रकार के पर्यटन में भी रूचि दिखा रहे हैं।

पुरापाषण युगीन तटरेखा

वैज्ञानिक अनुसन्धान प्रयोजनों के लिए हम जलगत पुरातत्व को एक यंत्र के रूप में प्रयोग कर रहे हैं ताकि हम भारत के पुरापाषाणयुगीन तटरेखा को समझ सकें। समुद्री वैज्ञानिकों के समान हम भी वहाँ से नमूने एकत्र करते हैं तथा उन पर शोध कार्य करते हैं। उससे हमें यह जानकारी प्राप्त हो सकती है कि उस स्थान पर पुरातात्विक स्थल उपस्थित हैं अथवा नहीं हैं। समुद्र स्तर में परिवर्तन के साथ तटीय रेखाएं किस प्रकार परिवर्तित हुई हैं, यह जानकारी भी प्राप्त होती हैं। तटीय क्षेत्रों के विकास कार्यों में इन शोध परिणामों का उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार जलगत पुरातत्व का पर्यटन, औद्योगीकरण, तटीय विकास कार्य आदि में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।

अनुराधा : इसका अर्थ है कि जलगत पुरातत्व के अंतर्गत अनुसंधान कार्य, पर्यटन, सांस्कृतिक धरोहर तथा जलगत धरोहर आदि में अनेक अवसर उपलब्ध हैं। यदि लोगों को इनकी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध हो जाए तथा उन्हें इनमें रूचि उत्पन्न हो जाए तो अवसरों की कमी नहीं है। यह एक सकारात्मक संकेत है।

सर, जलगत पुरातत्व में आपने हमें आज अत्यंत रोचक एवं महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की है। इसके लिए मैं आपका हृदय से धन्यवाद करना चाहती हूँ।

IndiTales Internship Program के अंतर्गत इस वार्तालाप का प्रलेखन पल्लवी ठाकुर ने किया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here