गोवा कानकोण के मल्लिकार्जुन मंदिर का अनोखा शीर्षा रान्नी उत्सव

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गोवा का मल्लिकार्जुन मंदिर, गोवा राज्य के दक्षिणतम जिले, कानकोण में स्थित है। यह लगभग गोवा एवं कर्नाटक की सीमा पर स्थित है। गोवा के अन्य मंदिरों के समान यह मंदिर भी अपने आप में एक अनूठा मंदिर है। इसका इतिहास भी रोचक कथाओं से परिपूर्ण है। शीर्षा रान्नी, इस अनुष्ठान के विषय में सर्वप्रथम जब मैंने सुना, मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। यह ऐसा अनुष्ठान है जिस पर आप सहसा विश्वास ही नहीं कर सकते। इसलिए इस अनुष्ठान को मैं स्वयं अपनी आँखों से देखना चाहती थी।

मल्लिकार्जुन मंदिर श्रीस्थल का प्रथम द्वार
मल्लिकार्जुन मंदिर श्रीस्थल का प्रथम द्वार

इसका सुअवसर मुझे शीघ्र प्राप्त हुआ। होली के पर्व से कुछ दिवस पश्चात, गोवा के विभिन्न गाँवों में रंगबिरंगा पर्व शिगमोत्सव मनाया जाता है। इस उपलक्ष में कानकोण के मल्लिकार्जुन मंदिर में शीर्षा रान्नी उत्सव आयोजित किया जाता है। समाचार प्राप्त होते ही मैंने इसे देखने दक्षिण गोवा की ओर निकलने का निश्चय कर लिया।

एक छोटे से द्वार समान संरचना तथा उसके समक्ष स्थित एक श्वेत रंग के प्रदर्शन मंच ने श्रीस्थल में हमारा स्वागत किया। इस स्थान पर अपने जूते-चप्पल उतारकर हमें आगे का पथ नंगे पाँव पार करना पड़ा। ये तो अच्छा था कि आगे पथ पर दरी बिछी बिछाई हुई थी। किन्तु तपती धूप में दरी भी इतनी गर्म हो गयी थी कि इस पर चलने के कारण मेरे पाँव में फफोले हो गए थे।

मल्लिकार्जुन मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार
मल्लिकार्जुन मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार

यहाँ से आगे लगभग २०० मीटर तक चलने के पश्चात हम श्रीस्थल के मल्लिकार्जुन मंदिर पहुंचे। वह उत्सव का दिवस था। अतः सम्पूर्ण मार्ग पर कई विक्रेता भिन्न भिन्न वस्तुओं की बिक्री कर रहे थे। न्यूनतम वस्त्र धारण किये कई आदिवासी पुरुष रस बिक्री करने के लिए गन्नों की रेढियाँ लगा रहे थे। वहां पहुंचते ही एक लाल किनारी वाले श्वेत तोरण ने मंदिर परिसर में हमारा स्वागत किया। यह वृत्तखंड सामान्य होते हुए भी अत्यंत आकर्षक था।

कानकोण के मल्लिकार्जुन मंदिर का इतिहास

मल्लिकार्जुन, इस नाम की व्युत्पत्ति महाभारत की एक कथा से हुई है। मल्ल नामक एक असुर पाँडव पुत्र अर्जुन से युद्ध कर रहा था। भगवान् शिव ने एक व्याध का रूप धरकर मल्ल को मारने में अर्जुन की सहायता की। इसलिए शिव को मल्लिकार्जुन भी पुकारा जाता है।

लिंग स्वरुप मल्लिकार्जुन
लिंग स्वरुप मल्लिकार्जुन

एक अन्य किवदंती के अनुसार मल्लिका एवं अर्जुन, पार्वती एवं शिव के ही नाम हैं। एक दीर्घ वियोग के पश्चात यहीं उनका मिलन हुआ था। इसलिए इसे मल्लिकार्जुन कहा जाता है। इस मंदिर को गोवा के प्राचीनतम मंदिरों में से एक माना जाता है।

मल्लिकार्जुन मंदिर एक सुन्दर स्थान पर स्थित है जिसका नाम भी अत्यंत सुन्दर है – श्रीस्थल, अर्थात् श्री का स्थल अथवा लक्ष्मी का स्थान। चारों ओर पहाड़ियों से घिरी हरीभरी सुन्दर घाटी अत्यंत मनोहारी है। वैसे भी हरियाली गोवा के परिक्षेत्र का एक अभिन्न अंग है।

स्थानीय निवासी यहाँ के देव को अदवत सिंहासनधीश्वर महापति कहते हैं। इसका अर्थ है, सिंह पर विराजमान, अर्थात् देवी। महापति का अर्थ उनके सहचरी अर्थात पति हो सकता है। चूंकि इस स्थान को श्रीस्थल कहा जाता है, इन तथ्यों में सत्यता हो सकती है। किन्तु विशेषज्ञों द्वारा प्रमाणित करने की आवश्यकता है।

मंदिर की वर्तमान संरचना १८वी. शताब्दी के अंतिम चरण की है। अतः आप इसकी एवं गोवा के अन्य मंदिरों की वास्तु-संरचना में समानता देख सकते हैं। मूल मंदिर इससे प्राचीन है। कुछ का मानना है कि मूल संरचना १६वी. शताब्दी की है। वहीं कुछ इसे उस से भी अधिक प्राचीन मानते हैं। मैं केवल इतना कह सकती हूँ कि जीवंत मंदिर सतत निर्माण की स्थिति में रहते हैं।

मल्लिकार्जुन मंदिर का लिंग

निराकार रूप में पूजा जाने वाला शिवलिंग लकड़ी का है। मुख्य मंदिर के समीप इसका एक छोटा पृथक मंदिर है। यह लिंग ऊंचा है तथा इस पर सुन्दर नक्काशी की गयी है। इसके चारों ओर एक छोटी संगमरमर की भित्त है। इसके समक्ष एक दीप प्रज्वलित किया गया था। यह ऐसा स्थान है जहां भक्तगण लिंग के समीप बैठकर पूजा अर्चना कर सकते हैं।

निराकार लिंग - काष्ठ में बना
निराकार लिंग – काष्ठ में बना

मुख्य मंदिर के भीतर स्थापित पत्थर के शिवलिंग के विषय में कहा जाता है कि कुनबी समुदाय के एक सदस्य को यह इसी रूप में वन में प्राप्त हुआ था। इसलिए इस लिंग को स्वयंभू कहा जाता है। इसे चांदी के मुकुट से ढंका गया है। दर्शन करते समय हम इसी चांदी के मुकुट के दर्शन करते हैं।

श्रीसैलम की पहाड़ियों में स्थित मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग से भी इसका सम्बन्ध माना जाता है। इतिहासकार गोवा की कुनबी जनजाती एवं आन्ध्र की चेंचू जनजाती के मध्य समांतरता मानते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार इसका सम्बन्ध हब्बू ब्राम्हणों से बताया जाता है जो उत्तर कन्नड़ अथवा कानकोण में जा कर बस गए थे जिसके कारण मूल कुनबी समुदाय पीछे परिक्षेत्र में ढकेल दिए गए थे।

श्रीस्थल का मल्लिकार्जुन मंदिर

श्री मल्लिकार्जुन मंदिर कानकोण गोवा
श्री मल्लिकार्जुन मंदिर कानकोण गोवा

मल्लिकार्जुन मंदिर एक अत्यंत आकर्षक एवं मनमोहक संरचना है। कदाचित यह गोवा का सर्वाधिक सलोना मंदिर है। यह गोवा का एकमेव जीवंत मंदिर है जहां मैंने शिलाओं पर शिल्पकारियाँ देखी। भीतरी भित्तियों को उत्तम उत्कीर्णित लकड़ी के फलकों द्वारा मढ़ा गया है। मंदिर के भीतर प्रवेश से पूर्व आप दोनों ओर अश्वारोहक योद्धाओं की प्रतिमाओं को देखेंगे। भीतर प्रवेश करते ही पत्थर से बनी दो सुन्दर द्वारपालों की प्रतिमाएं द्वार के दोनों ओर दृष्टिगोचर होंगी।

पाषण अश्व पे सवार योद्धा
पाषण अश्व पे सवार योद्धा

मंदिर का मंडप छः विशाल स्तंभों पर टिका हुआ है जिस पर उत्तम नक्काशी की गयी है। हमें ज्ञात हुआ कि इनमें से एक स्तंभ का प्रयोग कुछ अनुष्ठानों में देववाणी के रूप में भी किया जाता है। किन्तु कौन से अनुष्ठानों में एवं कैसे प्रयोग किया जाता है, यह मैं नहीं जान पायी।

काष्ठ में उत्कीर्णित द्वारपाल
काष्ठ में उत्कीर्णित द्वारपाल

मंदिर की भीतरी भित्तियों पर लगे फलकों पर चित्रमालिका द्वारा शिवपुराण उत्कीर्णित किया गया है। दर्शन के उपरांत दक्षिणावर्त आगे बढ़ने पर आप इन फलकों पर शिवपुराण में उल्लेखित विभिन्न घटनाओं को देख सकते हैं। मैंने यहाँ ब्रम्हांड के कई ज्यामितीय निरूपण देखे किन्तु सामान्य दृष्टी से किंचित दूर होने के कारण इन्हें समझ कर इनका विश्लेषण करना संभव नहीं हो पाया।

इन फलकों के अंतिम भाग पर, शिव पुराण की कथाएं समाप्त होते ही, शीर्षा रान्नी उत्सव का चित्रण किया गया था। इस अनुष्ठान को भलीभांति समझने हेतु मुझे यह चित्र सर्वोत्तम प्रतीत हुआ।

मल्लिकार्जुन मंदिर का मंडप
मल्लिकार्जुन मंदिर का मंडप

गर्भगृह की बाहरी भित्तियों पर लगे लकड़ी के फलकों पर विष्णु की गाथाएँ उत्कीर्णित हैं। मुझे बताया गया कि इनमें से अधिकतर शिल्पकारी कर्नाटक स्थित कुमटा के कारीगरों ने किया है।

भीतर प्रवेश करते ही आपके बाईं ओर बगिलपाइक की प्रतिमा है जिन्हें संरक्षक देव कहा जाता है।

परिसर के अन्य मंदिर

काशी पुरुष मंदिर

कशी पुरुष मंदिर की छत
कशी पुरुष मंदिर की छत

मुख्य मंदिर के समक्ष स्थित यह एक छोटा सा मंदिर है जो उस योद्धा को समर्पित है जिसने सभी हब्बू पुरुषों का वध किया था। स्तंभों एवं छत पर की गयी नक्काशी अत्यंत सराहनीय है।

उत्कर्ष काष्ठ कला लिए कशी पुरुष मंदिर के स्तम्भ
उत्कर्ष काष्ठ कला लिए कशी पुरुष मंदिर के स्तम्भ

चूंकि मुख्य मंदिर के भीतर छायाचित्रण की अनुमति नहीं थी, मैंने इस मंदिर की लकड़ी पर की गयी उत्कीर्णन के कुछ छायाचित्र लिए। स्तंभों के मध्य में मंगल चिन्हों के अतिरिक्त मुझे राम एवं कृष्ण की कई गाथाएँ उत्कीर्णित दृष्टिगोचर हुए।

परशुराम मंदिर

कोंकण तट को परशुराम की भूमि माना जाता है। परशुराम भगवान् विष्णु के अवतार हैं जिन्होंने सारस्वत ब्राम्हणों को बसाने के लिए इस धरती को समुद्र से बाहर निकाला था। इस परिसर में उन्हें समर्पित मंदिर देख अन्यंत आनंद आया।

मल्लिकार्जुन मंदिर में भगवन परशुराम की प्रतिमा
मल्लिकार्जुन मंदिर में भगवन परशुराम की प्रतिमा

यह अत्यंत सादा मंदिर है। या यूँ कहें कि सादगी की पराकाष्ठा है। इसके भीतर परशुराम की शिला में बनी केवल एक प्रतिमा है। इस प्रतिमा का अनोखा तत्व यह है कि यह लिंग की भान्ति योनी पर स्थापित है।

देवी मंदिर

छोटी पहाड़ी पर स्थित देवी मंदिर
छोटी पहाड़ी पर स्थित देवी मंदिर

कुछ दूरी पर, एक छोटी पहाड़ी के ऊपर एक देवी मंदिर स्थित है। पहाड़ी के शीर्ष तक पहुँचने के लिए व्यवस्थित सीड़ियाँ हैं। मंदिर में देवी की पत्थर में बनी एक प्रतिमा है। मंदिर पर देवी के नाम का कहीं उल्लेख नहीं है। आसपास पूछने पर लोग इन्हें पार्वती देवी कह रहे थे। इसका कारण कदाचित इसका शिव मंदिर प्रांगन में स्थित होना हो सकता है।

येलम्मा देवी
येलम्मा देवी

जात्रा में मैंने कई येल्लम्मा प्रतिमाएं देखीं। सुन्दर साड़ियों एवं भव्य आभूषणों द्वारा अलंकृत येल्लम्मा की उजली तथा चमकदार प्रतिमाओं को कई पुरुष सम्पूर्ण उत्सव में उठाकर यहाँ वहां घूम रहे थे। जो भक्तगण इनके समक्ष आते, वे उन्हें प्रणाम कर उन्हें कुछ अर्पण करते।

छोटे शिव मंदिर

मल्लिकार्जुन मंदिर परिसर के छोटे बड़े शिव मंदिर
मल्लिकार्जुन मंदिर परिसर के छोटे बड़े शिव मंदिर

परिसर में कई छोटे मंदिर थे जिनके भीतर एकल अथवा बहुल शिवलिंग स्थापित हैं। सर्व शिवलिंगों पर उनकी आराधना किये जाने के चिन्ह थे किन्तु उनके विषय में कोई मुझे जानकारी नहीं दे पा रहा था।

मंदिर का जलकुंड

मल्लिकार्जुन मंदिर पुष्कर्णी
मल्लिकार्जुन मंदिर पुष्कर्णी

परिसर में एक चौकोर जलकुंड है जो मुझे कुछ कुछ राजस्थान अथवा हम्पी के विस्तृत बावड़ियों के सामान प्रतीत हो रहा था। सम्पूर्ण परिसर का केवल यही भाग मुझे उपेक्षित पड़ा हुआ प्रतीत हुआ। अब तक मेरा यह मानना था कि इन जलकुंडों का मन्दिर के अनुष्ठानों में महत्वपूर्ण स्थान है किन्तु यहाँ मंदिर के एक ओर स्थित नलकूप, जल की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण कर रहा था।

श्रीस्थल के मल्लिकार्जुन मंदिर के उत्सव

महाशिवरात्रि, शिग्मो तथा रथसप्तमी जैसे कई उत्सवों का यहाँ आयोजन किया जाता है। तथापि मैं आज यहाँ गोवा के एक अनोखे उत्सव की चर्चा करने वाली हूँ।

शीर्षा रान्नी अनुष्ठान

शीर्षा रन्नी का चित्र
शीर्षा रन्नी का चित्र

इस मंदिर का सर्वाधिक अनूठा उत्सव है वार्षिक जात्रा जहां शीर्षा रान्नी अनुष्ठान किया जाता है। हिन्दू पञ्चांग के अनुसार, यह उत्सव फाल्गुन मास की कृष्ण षष्ठी के दिवस पर आयोजित किया जाता है। आप जानते ही हैं कि एक दिवस पूर्व देश के विभिन्न भागों में रंग पंचमी भी मनाई जाती है तथा इसके ५ दिवस पूर्व होली का पर्व मनाया जाता है।

इस दिन यहाँ किसी काल में घटी किसी घटना का नाट्य रूपांतरण किया जाता है। ३ पुरुष जिन पर दैवी शक्ति का आगमन हुआ है, भूमि पर शयनावस्था में आकर अपने शीर्ष एक दूसरे से सटा कर त्रिकोण बनाते हैं। त्रिकोण के मध्य अग्नि प्रज्वलित की जाती है। अग्नि के संग शीर्ष का त्रिकोण चूल्हे का रूप ले लेता है। इस चूल्हे पर, मिट्टी की हांड़ी में चावल पकाया जाता है।

क्षत्रिय उत्सव में तलवार
क्षत्रिय उत्सव में तलवार

मंदिर के समीप का क्षेत्र सामान्य दर्शकों हेतु प्रतिबंधित किया जाता है। केवल अनुष्ठान में भाग लेते भक्त ही इस क्षेत्र में आ सकते हैं। इसके समीप स्थित सीड़ियों के ऊपर अस्थायी छत बनायी जाती है जहां बैठकर सभी दर्शक इस उत्सव का अवलोकन करते हैं।

रंग-बिरंगी साड़ियाँ पहनी स्त्रियाँ इस स्थान को अत्यंत जीवंत बना रही थीं। सम्पूर्ण उत्सव में पूर्ण समय वीर रस से ओत-प्रोत संगीत बजाया जा रहा था।

तरंग

तरंग - शीर्षा रन्नी उत्सव की साक्षी
तरंग – शीर्षा रन्नी उत्सव की साक्षी

अनेक साड़ियों को चुन्नटों में एकत्र कर छत्री बनायी जाती है। ऐसी कई रंग-बिरंगी छत्रियां हाथों में उठाये, लोग गाजे-बाजे के साथ, धूमधाम से मंदिर से गाँव तक की फेरी लगाकर वापिस मंदिर आते हैं। इन्हें तरंग कहते हैं।

गोवा के अन्य मंदिरों के सामान इस मंदिर में भी इन तरंगों का महत्वपूर्ण स्थान है। फेरी लगाकर जब ये तरंगें नृत्य एवं संगीत के साथ मंदिर वापिस लौटते हैं, तब हाथों में तलवार लिए कुछ युवक इसके समक्ष युद्धविद्या प्रस्तुत करते हैं। वहीं तरंगे हाथों में उठाये भक्तगण संगीत के सुर पर नृत्य करते रहते हैं। सम्पूर्ण दृश्य अद्भुत व दर्शनीय हो जाता है।

तरंग के शीष पर विराजित देवता
तरंग के शीष पर विराजित देवता

संध्या लगभग ४ बजे छः तरंगों को एक पंक्ति में भूमि पर खड़ा किया गया। मैंने इनमें से तीन छत्रियों के ऊपर भगवान् की प्रतिमाएं देखीं। ध्यान से इन प्रतिमाओं को देखने पर मुझे नंदी पर सवार शिव दिखाई दिए। साहित्यों के अनुसार वे कदाचित अवतार पुरुष हैं। तरंगों के लाल खम्बों पर कुछ बूटियाँ रंगी गयी थीं। किन्तु मैं उन्हें समीप से नहीं देख पायी। दूर से मुझे उन खम्बों पर कुछ हाथों के चिन्ह रंगे हुए दिखे। ये तरंगें तीन पुरुषों के शीर्ष पर भात पकाने के अनुष्ठान के साक्षात साक्षी होते हैं।

इन तरंगों के साथ हाथों में तलवार लिए पुरुष खड़े रहते हैं। इस क्षेत्र में स्त्रियों का जाना प्रतिबंधित है। इसलिए हम कुछ दूरी पर बैठ गए।

गड़े

तीन पुरुष जिनके शीर्ष पर चावल पकाया जाता है, उन्हें गड़े कहते हैं। इनके अंगों पर भस्म मलकर इनके शीर्ष पर केले की पत्तियों के एक मोटी परत बांधी जाती है। इनके शीर्ष पर भात पकाकर, एक गड़े का किंचित रक्त इस भात में मिलाया जाता है। तत्पश्चात इस पके हुए भात के दानों को भीड़ पर फेंका जाता है। भात के दानों के नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए लोग इधर उधर भागते हैं।

शीर्षा रन्नी की प्रथा
शीर्षा रन्नी की प्रथा

वर्तमान में यह सम्पूर्ण अनुष्ठान केवल प्रतीकात्मक रूप से मनाया जाता है। किन्तु मैं सोचती हूँ, किसी काल में यह अनुष्ठान, बुरी आत्माओं को समाप्त करने के लिए, अत्यंत विस्तृत रूप में मनाया जाता रहा होगा। साथ ही क्षत्रियों को उनके धर्म का स्मरण कराने हेतु भी यह उत्सव मनाया जाता रहा होगा। यह एक अत्यंत प्रसिद्ध उत्सव है। इसके दर्शन के लिए लोगों की इतनी भीड़ थी कि अनुष्ठान स्थल से कुछ ही मीटर की दूरी पर बैठने के पश्चात भी मैं सही प्रकार से अनुष्ठान देख नहीं पा रही थी।

यह उत्सव दो वर्षों में एक बार आयोजित किया जाता है। मैंने २०१९ में यह अनुष्ठान देखा था। अनुमानतः यह प्रत्येक विषम वर्षों में आयोजित किया जाता है।

मल्लिकार्जुन मंदिर के शीर्षा रान्नी उत्सव का विडियो

वीरमल उत्सव

वीरमल उत्सव फाल्गुन मास की शुक्ल द्वादशी के दिवस आयोजित किया जाता है अर्थात् होली से तीन दिवस पूर्व।

पुरुष सम्पूर्ण दिवस व्रत-उपवास करते हैं। इन्हें भगत कहा जाता है। संगीतज्ञों संग कुल १८ भगतों का एक समूह बनाया जाता है। ऐसे कई समूह बनाए जाते हैं। इन समूहों को गड़े कहते हैं। संध्याकाल के समय, ढोल की ताल पर, गड़े तलवार हाथों में लिए घर-घर दौड़ते हैं। उन घरों के वासी उन्हें पान-सुपारी भेंट चढ़ाते हैं।

मेरे अनुमान से यह युद्ध काल के किसी अनुष्ठान का नाट्य रूपांतरण हो सकता है। अथवा गांववासियों को सुरक्षा की दृष्टी से आश्वस्त करने हेतु युवकों द्वारा किया जाने वाला कोई अनुष्ठान हो। मुझे बताया गया कि इस उत्सव के समय गाँव की बिजली भी बंद कर दी जाती है।

क्षत्रिय समाज का मंदिर

दीपस्तंभ - गोवा के मंदिरों की विशेष शैली मैं
दीपस्तंभ – गोवा के मंदिरों की विशेष शैली मैं

यह क्षत्रिय समाज अर्थात् योद्धा कुलों का मंदिर है। निःसंदेह यह मल्लिकार्जुन के स्वरूप में शिव को समर्पित मंदिर है। ठीक वैसे ही जैसे तेलंगाना में श्रीसैलम की पहाड़ियों पर है। विचित्र तथ्य यह है कि जब जब मैं इसे हिन्दू मंदिर कहती, मुझे ‘यह क्षत्रिय मंदिर है’ कहकर संशोधित किया जाता था।

मैंने कहा भी कि क्षत्रिय भी हिन्दू ही हैं। उन्होंने कहा, सत्य है। किन्तु यह मंदिर सर्व हिन्दुओं का ना होकर केवल क्षत्रियों का है। चलिए, यह भी ठीक है।

गोवा में कुल १३ मल्लिकार्जुन मंदिर हैं जिनमें कानकोण में ही ४ मंदिर हैं।

कानकोण के निकवर्ती दर्शनीय स्थल

कानकोण का मूल नाम कण्व ऋषि पर कण्वपुर था। कण्व ऋषि के विषय में आप जानते ही हैं। कुछ समय पूर्व उत्तराखंड के कण्वाश्रम में मैं भी आप सबको ले गयी थी।

पालोले समुद्रतट – यह पर्यटकों में अत्यंत प्रसिद्ध समुद्रतट है। यह सदैव पर्यटकों से भरा रहता है। शान्ति से बैठकर सूर्यास्त दर्शन करने के लिए यह सर्वोत्तम स्थान है। दो पहाड़ियों के मध्य समुद्र के जल में सूर्य को अस्त होते देखना अत्यंत अद्भुत अनुभव है।

पालोले समुद्रतट पर कई भोजन कुटियाएँ एवं भोजनालय हैं। समुद्र की लहरों का आनंद उठाते हुए आप स्वादिष्ट भोजन का स्वाद ले सकते हैं। हमने यहाँ के सुप्रसिद्ध भोजनालय, द्रोपदी के भोजन का भरपूर आस्वाद लिया।

कोटिगाओ वन्यजीव अभयारण्य – यह एक अत्यंत मनोरम वन्यजीव अभयारण्य है। वर्षा ऋतु में यह कुसके जलप्रपात जैसे कई अनेक आकर्षक जलप्रपातों से भर जाता है। कोटिगाओ वन्यजीव अभयारण्य पर मेरा विस्तृत संस्मरण पढ़ें।

बुडबुडे ताल – बुलबुलों से भरा गोवा का यह जलाशय नेत्रवती क्षेत्र में है। यहाँ एक सुन्दर स्पाइस गार्डन अर्थात् मसालों के वृक्षों का वन भी है। बुडबुडे ताल के विषय में और पढ़ें।

श्रीस्थल कैसे पहुंचें?

मल्लिकार्जुन मंदिर कानकोण - गोवा

  • श्रीस्थल गोवा की राजधानी पणजी से ७५ की.मी. दक्षिण की ओर स्थित है। यह कानकोण के तालुका मुख्यालय चावडी से ५ की.मी. की दूरी पर स्थित है।
  • मडगाव से नियमित बसें आपको यहाँ पहुंचा सकती हैं।
  • यदि आप चाहें तो टैक्सी द्वारा यहाँ पहुँच सकते हैं। श्रीस्थल पहुँचने का यह श्रेयस्कर साधन है।
  • उत्सव के दिन मंदिर में भक्तगणों, दर्शकों एवं पर्यटकों का तांता लगा रहता है। परिसर में निःशुल्क भोजन की व्यवस्था है। यह और बात है कि मंदिर में भोजन कर आप चाहें तो कुछ दान दक्षिणा अवश्य कर सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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